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रफां : आयोजन - 1997

रफां : आयोजन - 1997

सन् 1997 में हजारीबाग में विनोबा भावे विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में ‘अखिल भारतीय दलित साहित्य लेखक सम्मलेन’ का सफल आयोजन।

1 से 2 अक्तूबर 1997 को हजारीबाग के स्थानीय संत कोलम्बा महाविद्यालय के ह्विटले हॉल में रमणिका फाउंडेशन एवं विनोबा भावे विश्वविद्यालय, हजारीबाग के संयुक्त तत्वावधान में ‘अखिल भारतीय दलित साहित्य लेखक सम्मेलन’ संपन्न हुआ। इस सम्मेलन का उद्घाटन महामहिम डॉ. ए.आर. किदवई, राज्यपाल एवं कुलाधिपति, बिहार ने किया एवं महामहिम श्री माताप्रसाद, राज्यपाल, अरूणाचल प्रदेश ने दो दिन तक इस सम्मेलन में भागीदारी की। अपने स्वागत भाषण में विनोबा भावे के कुलपति डॉ. के.के. नाग ने कहाµ‘‘दलित साहित्य के लेखक दलित एवं गैर-दलित दोनों ही हो सकते हैं। देश का यह दुर्भाग्य है कि वर्ण-व्यवस्था आज भी कायम है।’’ रमणिका फाउंडेशन की अध्यक्ष रमणिका गुप्ता ने अतिथियों का परिचय कराने के बाद सम्मेलन के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए कहा किµ‘‘दलित साहित्य लेखक सम्मेलन को लेकर बुद्धिजीवियों में बहुत भ्रम फैला हुआ है। इसके लेखन को बिना पढ़े ही पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर इसकी आलोचना हो रही है, जबकि यह लेखन समानता और आजादी की भावना से प्रेरित सच्ची मानवता की ओर अग्रसर है। दलित साहित्य को खेमेबाजी की संज्ञा दी जाती है। सच तो यह है कि अब दलित-वर्ग को अभिव्यक्ति की ताकत मिल गई है। हिन्दी पट्टी में पहली बार, वह भी दो गैर-दलित संस्थाओंµएक विश्वविद्यालय और एक न्यास द्वारा मिलकर संयुक्त रूप से यह दलित सहित्य लेखक सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है।’’

महामहिम डॉ. ए.आर. किदवई ने दीप प्रज्वलित कर सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए कहा किµ‘‘साहित्य समाज का आईना है वही साहित्य कामयाब है जो समाज की सही तस्वीर पेश करता है। आज साहित्य ही एक मात्रा ऐसा विकल्प है, जिसके माध्यम से समाज में व्याप्त गैर-बराबरी की भावना को समाप्त कर, आम लोगों में इसके प्रति चेतना पैदा की जा सकती है।’’

सम्मेलन के विशिष्ट अतिथि ‘अस्मितादर्श’ के संपादक गंगाधर पानतावने ने कहाµ‘‘अब हर प्रदेश में दलित सम्मेलन होने लगा है, जिनका बुनियादी उद्देश्य ऐसे साहित्यकारों को एक मंच पर लाकर कुछ प्रतिज्ञाएं करना और इस साहित्य की विशेषताएं प्रकट करना है। महाराष्ट्र इस साहित्य की आधार-भूमि है। अब इसकी चर्चा विदेशों में भी होने लगी है। दलित साहित्य स्वयं प्रकाशमान है। यह न तो पाश्चात्य और न ही किसी अन्य साहित्य से प्रेरित है। हिन्दी में दलित साहित्य की पहली रचना हीरा डोम द्वारा भोजपुरी में लिखी गई थी। जो गैर-दलित, राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक बुराइयों को दूर करने का काम करता है, वह भी दलित साहित्यकार है।’’

अध्यक्षीय भाषण में अखिल भारतीय दलित साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष सोहनपाल सुमनाक्षर ने कहाµ‘‘मनुस्मृति के नाम पर जितना शोषण दलित समाज का हुआ है, उतना अन्य किसी का नहीं हुआ। दलितों को अपनी अस्मिता जगाने के लिए भी दलित साहित्य की सर्जना की आवश्यकता है।’’

उद्घाटन सत्रा के बाद अपराह्न 3 बजे ‘शिक्षा का पाठ्यक्रम एवं दलित साहित्य’ विषय पर बहस शुरू हुई जिसकी अध्यक्षता सोहनपाल सुमनाक्षर, अवंतिका प्रसाद मरमट और रमणिका गुप्ता ने की। मुख्य वक्ता के रूप में राजेन्द्र यादव थे। चर्चा में विनोबा भावे विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. के. के. नाग के अतिरिक्त डॉ. शरण कुमार लिम्बाले, कंवल भारती, डॉ. नागेश्वर लाल, मोहनदास नैमिशराय, जयप्रकाश ‘कर्दम’, कुमुद पांवड़े, डॉ. पुरुषोत्तम सत्यप्रेमी, डॉ. तारा परमार, श्यौराज सिंह ‘बेचैन’, किशोर भाई, डॉ. सुशीला टाकभौरे, मलखान सिंह, डॉ. चमन लाल, कुसुम वियोगी, श्री मरमट, श्री धावन, गंगाराम परमार, डॉ. मैनेजर पांडेय, सूरजपाल चौहान तथा अन्य 80 दलित लेखकों ने भाग लिया।

दूसरे दिन लगभग आठ बजे रात्रि में समापन भाषण प्रस्तुत करते हुए डॉ. चन्द्रेश्वर कर्ण ने सम्मेलन के आयोजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए डॉ. के. के. नाग, कुलपति, विनोबा भावे विश्वविद्यालय को बधाई दी। उन्होंने मनोज यादव, विधायक, बरही क्षेत्रा, बादल जयसवाल, वेस्ट बोकारो के सहयोगियों, शिक्षा विभाग, बन-विभाग तथा सी. सी. एल. से सब सहयोगियों के साथ-साथ मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सभी कार्यकर्ताओं तथा अम्बेडकर हॉस्टल के लड़कों का तमाम प्रकार की सहायता के लिए हार्दिक आभार प्रकट करते हुए हजारीबाग की मनोरम धरती पर आयोजित इस ऐतिहासिक सम्मेलन को सम्पन्न घोषित किया।

इस सम्मेलन में बिहार और स्थानीय स्तर पर भी लेखकों ने भारी शिरकत की। कई विश्वविद्यालयों से बुद्धिजीवियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई। उद्घाटन-सत्रा के अतिरिक्त इस दो दिवसीय सम्मेलन में तीन सत्रा चले।

पहले सत्रा का विषय था ‘शिक्षा का पाठ्यक्रम और दलित साहित्य’। पाठ्यक्रम में दलित साहित्य का समावेश किया जाए ताकि भेदभाव की भारतीय मानसिकता को बदला जा सके और आजादी, समानता और भाईचारे की भावना पनपे।

दूसरा सत्रा ‘दलित साहित्य की अवधारणा और सौंदर्यशास्त्रा’ तथा तीसरा सत्रा ‘आदिवासी संस्कृति पर हिन्दी लेखिकाओं के उपन्यास’ पर हुआ। इन तीनों सत्रों में काफी बहस हुई तथा दलित और गैर-दलित लेखकों और बुद्धिजीवियों में संवाद भी कायम हुआ। कई गलतफहमियां भी दूर हुईं, जिससे दलितों का मनोबल तो बढ़ा ही, साथ-ही-साथ गैर-दलितों के दिमाग से धुंध भी छटी। सत्रा के अंत में कवि गोष्ठी के माध्यम से जनता से जुड़ाव कायम हुआ। दलित-कविता की इस नई दिशा का बोध लोगों को पहली बार बिहार (अब झारखंड) की धरती पर हुआ।

इस सम्मलेन को लेकर छह महीनों तक ‘प्रभात खबर’, ‘जनसत्ता’ और अन्य प्रांतीय तथा राष्ट्रीय अखबारों में बहस/चर्चा होती रही।

बुद्धिजीवी जगत में रमणिका फाउंडेशन का यह प्रयास चेतना और जागृति का प्रयास माना गया। कई दलित लेखक बिहार तथा देश भर में ‘युद्धरत आम आदमी’ पत्रिका से जुड़े, जिसके माध्यम से रमणिका फाउंडेशन अपने उद्देश्यों का प्रचार-प्रसार कर रहा है।