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रफां : आयोजन - 2002

रफां : आयोजन - 2002

  • आदिवासी लेखकों का अखिल भारतीय सम्मिलन
  • विषय : जनजाति साहित्य समस्याएं, अवदान और लघु पत्रिकाओं की भूमिका
  • 1 जून, 2002 स्थान : रवीन्द्र भवन, नई दिल्ली
  • हम स्टेज पर गए ही नहीं/और हमें बुलाया भी नहीं
  • उंगली के इशारे से/हमारी जगह हमें दिखाई गई
  • हम वहीं बैठे/हमें शाबाशी मिली
  • और वे स्टेज पर खड़े हो/हमारा दुख
  • हमें ही बताते रहे/हमारा दुःख
  • अपना ही रहा/कभी उनका हुआ ही नहीं...

डॉ. वाहरू सोनवणे की ‘स्टेज’ नामक यह कविता उन लोगों पर तीखा प्रहार है जो आदिवासी समाज की पीड़ा तो अभिव्यक्त करते हैं, लेकिन उनके शब्द-स्वरों के लिए कोई जगह नहीं छोड़ते। एक जून, 2002 को आदिवासी साहित्य सम्मिलन में इसी पीड़ा की सामूहिक अभिव्यक्ति सुनाई पड़ी। साहित्य अकादमी ने स्वीकारा कि आदिवासी साहित्य के बारे में चिंतन और समझ का अभाव रहा है। जो काम कई बरस पहले होना चाहिए था वह अब किया जा रहा है। आदिवासियों के दर्द को दूसरे ही कहते-बोलते रहे, उनकी जष्ुबान को कोई मंच न मिला। रमणिका फाउंडेशन की पहल पर साहित्य अकादमी ने फाउंडेशन के साथ संयुक्त रूप से इस सम्मिलन का आयोजन किया।

एक जून, 2004 को दिल्ली में हुए ‘अखिल भारतीय आदिवासी लेखक सम्मिलन’ का उद्घाटन आदिवासियों के लिए संघर्षरत लेखिका तथा इस समारोह की मुख्य अतिथि सुश्री महाश्वेता देवी ने किया। विषय की प्रस्तुति फाउंडेशन की अध्यक्ष श्रीमती रमणिका गुप्ता ने की और बीज भाषण गुजरात के श्री गणेश एन. देवी ने पढ़ा। विशिष्ट अतिथियों में श्री रामदयाल मुंडा, लक्ष्मण गायकवाड़ तथा भुजंग मेश्राम थे। महाश्वेता जी ने ‘युद्धरत आम आदमी’ के ‘आदिवासी स्वर और नई शताब्दी’ खंड-2 का एवं साहित्य अकादेमी द्वारा प्रकाशित मिजो सांग्स एंड टेल्स और भरर्तरी (छत्तीसगढ़) का भी लोकार्पण किया।

इस अवसर पर देश भर के आदिवासी लेखक, कवि, कथाकार, गीतकार, सिद्धान्तकार एकत्रित हुए और उन्होंने अपनी बेबाक अभिव्यक्ति से आदिवासी साहित्य की प्रखरता और विशिष्टता को उजागर किया।

इस ऐतिहासिक अवसर पर आदिवासी साहित्यकारों ने यह महसूसा कि कलम की विधा पर भी उनकी पकड़ श्रेष्ठ और गहरी है। इसलिए ‘कलम को तीर होने दो’ (ग्रेस कुजूर) जैसी कविता में आह्नान की सघन अभिव्यक्ति देखने-सुनने को मिली। आदिवासी साहित्यकार आह्लादित थे लेकिन संपूर्ण कार्यक्रम के दौरान उनके शब्द पीड़ा से घिरे रहे। उपस्थित विद्वानों ने इस बात को स्वीकारा कि भारतीय वाङ्मय में दलित, प्रगतिशील जनवादी, हिन्दी, मराठी, आदि विविध भाषाओं के साहित्य की विभिन्न विधाओं पर चर्चा तो जबरदस्त होती रही है लेकिन आदिवासियों को हमेशा बिसरा दिया गया, उन्हें भागीदार ही नहीं बनाया गया। उनकी वेदना और संघर्ष के मर्म की अभिव्यक्ति को ‘साहित्य’ ही नहीं माना गया। वे मानते हैं कि आज ‘आदिवासी साहित्य’ को स्वीकारने की चुनौती उनके सामने गंभीर रूप में है।

अपने उद्घाटन भाषण में महाश्वेता देवी ने कहाµ”इतना महत्वपूर्ण और बड़ा आदिवासी का कोई साहित्य सम्मिलन मैंने अपने जीवन में कहीं भी नहीं देखा। ज्ञानपीठ इससे बहुत पीछे है। मैं इतने बड़े-बड़े सम्मेलनों में भाग लेती रही हूं लेकिन वे सब इस सम्मेलन से बहुत छोटे होते थे सत्य तो यह है कि कई मामले में आदिवासियों से सभी लोग बहुत पीछे हैं, क्योंकि सही अर्थ में भारत में स्वतंत्राता क्या है, समता क्या है, यह आदिवासी लोग ही जानते हैं। आदिवासी समाज का सब कुछ छीना गया, उन्हें बेबस और लाचार बनाया गया। उनका साहित्य भी अब तक किनारे ही रहा। दरअसल यह समाज दूसरे समाज की तुलना में ज़्यादा सभ्य और सुसंस्कृत है। आदिवासी समाज में दहेज प्रथा नहीं है। उनके समाज में दूसरा विवाह करने के सामाजिक नियम है। विधवा विवाह का भी चलन है। उन्हें शिक्षा, मेडिकल, बिजली की सुविधा तक नहीं मिल सकी है। झारखंड अलग राज्य बना, वहां भी सब कुछ वैसा ही है। आदिवासियों को कहीं कुछ नहीं मिला।“ उन्होंने संपादक रमणिका गुप्ता की प्रशंसा करते हुए कहाµ”मैं रमणिका गुप्ता को नहीं जानती थी, इनसे मेरा परिचय नहीं था, मैं बहुत घूमती हूं लेकिन बहुत से अच्छे लोगों के संपर्क में नहीं आ पाई। रमणिका जी जो आदिवासियों के लिए काम कर रही हैं वह बहुत बड़ी बात है। ये हम सब के लिए कलंक की बात है, शर्म की बात है कि एक औरत इतने वर्षों से हजारीबाग में केंद्र बनाकर लड़ रही है, आदिवासियों के लिए अदालती लड़ाई भी लड़ी है, फिर महाश्वेता का इतना नाम है तो रमणिका गुप्ता का नाम क्यों नहीं?“

साहित्य अकादेमी के सचिव श्री के. सच्चिदानन्दन ने डॉ. वाहरु सोनवणे की उपरोक्त काव्य-पंक्तियों से अपने भाषण का आरम्भ करते हुए कहाµ”यह सम्मिलन भारत में अपनी तरह का पहला सम्मिलन है। दलित लेखन और महिला लेखन पर तो साहित्य अकादेमी ने अनेक संगोष्ठियां आयोजित की हैं लेकिन आदिवासी साहित्य पर पहला अवसर है कि कोई विमर्श आयोजित किया है।

‘‘बीसवीं शताब्दी कामगारों, महिलाओं, अश्वेत जनों, आप्रवासियों और यौनकर्मियों की जागृति की गवाह रही है। इक्कीसवीं सदी जनजातियों से संबंधित है और यह समूचे संसार में जनजातीय लोगों के महान आंदोलनों की साक्षी बन चुकी है। वे धरा के आदिमपुत्रा हैं और पूरी पृथ्वी वस्तुतः उन्हीं से संबंधित है। संस्कृति और सभ्यता भी उन्हीं से आरंभ हुई। पहली कविता और कहानी, चित्रा और शिल्प उन्हीं से जुड़े हैं। वे ही पहले किसान थे, प्रथम मिथक निर्माता, प्रथम ब्रह्मज्ञानी और प्रथम वैज्ञानिक। मानव जाति का इतिहास तथाकथित सभ्य लोगों के द्वारा जनजातियों के क्रमिक विस्थापन और विनाश का भी इतिहास है, जिनकी सभ्यता शोषण और हिंसा से उत्पन्न हुई थी। आज, जबकि वह सभ्यता भूमंडलीकरण, सांप्रदायिक और जातीय हिंसा, पारिस्थितिकीय विनाश और युद्ध के माध्यम से मानव जाति को आत्मघात के कगार पर ले आई है, तब पहले से ज्यषदा जरूरी है कि हम जनजातीय लोगों के सामुदायिक मूल्यों और प्रकृति के साथ उनके बंधुत्व से सीख प्राप्त करें। जनजातीय साहित्य इन मूल्यों का मूर्त रूप है और विस्थापन, अपमान एवं शोषण के शिकार जनजातीय लोगों की चिंता और वेदना प्रकट करता है। आदिवासी साहित्य में वेदना है, विद्रोह है और अपने दंभ की अभिव्यक्ति है। अंगूठा काटनेवालों से सावधान रहने का इशारा भी है।“

डीनोटीफाइड एंड नोमेडिक ट्राइब राइट एक्शन ग्रुप में महाश्वेता देवी के साथ काम कर रहे डॉ. गणेश एन. देवी ने कहाµ”मैं अपने आदिवासी दोस्तों को खास तरीकेष् से कहना चाहता हूं कि वे डिनोटीफाइड और नोमेडिक ट्राइब्स के बारे में संभवतया थोड़ा कम ही जानते हैं। आम तौर पर हम लोग यह नहीं जानते कि 1871 में एक बहुत भयानक कषनून बनाया गया था जिसके तहत इन ट्राइब्स को सैटलमैंट्स में रखा गया था और इन्हें एक अपराधी का जीवन जीने को अभिशप्त किया गया था। इनसे श्रम करवाया जाता था। उनसे ही ब्रिटिश सरकार के ज़माने में सड़कें बनवाई गईं, पुल, बांध बनवाए गए। इन्हें पैसे दिए बगष्ैर 1952 में यानी आज़ादी के पांच वर्ष बाद विमुक्त यानी डिनोटीफाइड किया गया अर्थात् उस कषनून से मुक्त किया गया। यह सब तथ्य आदिवासी भाषा और साहित्य में काम करने वालों को भी बहुत कम मालूम हैं। नार्थ ईस्ट राज्यों में ये सब नहीं हुआ। यह सब मध्य भारत, उत्तर भारत, पश्चिम भारत और दक्षिण भारत में ही हुआ। इसका परिणाम यह हुआ कि आदिवासी और डिनोटीफाइड ट्राइब्स या विमुक्त जनजाति सब मूलतः एक होते हुए भी उनका एक बहुत बड़ा ताकष्तवर हिस्सा दलित मूवमेंट के अंतर्गत समाहित हो गया। उनका दूसरा हिस्सा अनुसूचित जनजाति के नाम से जाना जाने लगा। इस सूचीबद्धता की सच्चाई भी क्या है? 1871 में जनजातियों की सूची बनी। सच तो यह है कि ये दोनों ही किसी जाति में नहीं थे। भारत में जो मूल निवासी हैं वही आदिवासी हैं लेकिन आज डिनोटीफाइड कम्युनिटी की जाति बनाई जा रही है। आदिवासी समाज में भी वही किया जा रहा है।“

विषय प्रवर्तन कराते हुए ‘युद्धरत आम आदमी’ की संपादक व पूर्व विधायक रमणिका गुप्ता ने भी वाहरू सोनवणे की स्टेज शीर्षक कविता का अंश उद्धृत करते हुए कहाµ”बहुत से लोगों ने आदिवासियों पर लिखा है, उन पर बोला है, लेकिन आदिवासी स्वयं क्या सोचता है, क्या चाहता है, वह किस बदलाव का सपना देखता है, इस प्रक्रिया को अमल में लाने की ज़रूरत नहीं समझी गई। महाराष्ट्र में ये कोशिश शुरू की विनायक तुमराम ने आदिवासी लेखकों का पहला सम्मेलन बुलाकर। वह सम्मेलन पूरे भारत के पैमाने पर तो नहीं हो पाया हालांकि उन्होंने बुलाया तो सबको था लेकिन महाराष्ट्र के सभी आदिवासी लेखक ही जुटे। इसके बाद संभवतः छह सम्मेलन हो चुके हैं, जिनकी अध्यक्षता कभी भुजंग मेश्राम जी ने तो कभी वाहरू सोनवणे जी ने की। आज तुमराम जी उसके अध्यक्ष हैं। महाराष्ट्र में आदिवासी लेखकों की कृतियों का आकलन ही नहीं अपितु उन पर शोध भी किया गया है लेकिन यह प्रक्रिया देश के बाकष्ी हिस्सों में आगे नहीं बढ़ी। ऐसे ही प्रयासों की कड़ी में देश के पैमाने पर राजधानी दिल्ली में यह पहला प्रयास है। हमने ‘युद्धरत आम आदमी’ के दो विशेषांकों द्वारा यह प्रयास किया है कि आदिवासियों की सोच, उनकी दिशा, उनकी रचनात्मकता को एकजुट करके हिन्दी भाषियों के समक्ष प्रस्तुत करें ताकि लोग जानें कि कितना कुछ लिखा जा रहा है और कितना महत्वपूर्ण लिखा जा रहा है। आदिवासी लेखकों को भी यह अहसास हो कि वे भी लिखते हैं और केवल लिखते ही नहीं, दूसरों से बेहतर लिखते हैं। गिरिराज किशोर जी ने ‘युद्धरत आम आदमी’ के ‘आदिवासी स्वर और नई शताब्दी’ खंड एक पर अपनी प्रतिक्रिया ज़ाहिर करते हुए कहा था कि यह अंक हिन्दी साहित्यकारों के लिए एक आईना है। जहां तक साहित्य की विषयवस्तु का सवाल है तो आदिवासी साहित्य की शुरुआत ही जीवन से होती है, प्रकृति से होती है और ये दोनों यथार्थ से जुड़े हैं। उनका साहित्य जीवन की समस्याओं से जुड़ा है चूंकि आदिवासी विपरीत स्थितियों से संघर्षरत होकर सदियों से जीता आ रहा है और अपने अस्तित्व को ही नहीं, अपनी संस्कृति, भाषा और जीवन-शैली को मूल रूप में बरकरार रखते हुए अवांछित परिवर्तन की पीड़ा झेलकर वांछित परिवर्तन को अपनाते हुए कषयम है। उसके साहित्य की विषयवस्तु क्रांतिकारी भावना का स्रोत बनके तथा परिवर्तनकामी सोच को मूर्त रूप देने में इस्तेमाल की जा सकती है, ऐसा हो भी रहा है। उसकी कल्पना प्रकृति जितनी विशाल है तो उसका यथार्थ धरती-सा ठोस है। विज्ञान से जुड़ने की चाहत भी उनमें पनपी है और समय के साथ चलने की बात भी वे करने लगे हैं लेकिन अपनी अस्मिता और अस्तित्व कषयम रखते हुए। जहां तक लघु-पत्रिकाओं की भूमिका का सवाल हैµआज इतने प्रदेशों से लोग आए हैं, वे अपने-अपने इलाकेष् की पत्रिकाओं की क्या स्थिति है इसके बारे में बताएंगे। क्या हो रहा है पत्रिकाओं के विकास हेतु या क्या दिक्ष्कष्तें हैं, उन सबके बारे में हमें सुनने को मिलेगा। आज हिन्दी पत्रिकाओं में क्या हो रहा है ये भी पता लगेगा। कृष्णचन्द्र टुडू जी के लेख से मुझे पता चला कि केवल झारखंड में ही 147 संथाली भाषा की पत्रिकाएं रजिस्टर्ड हैं। कुछ बंद हो गई हैं, कुछ चालू हैं। आज इस सम्मिलन के माध्यम से जिसे हम सम्मेलन का नाम नहीं दे रहे चूंकि अभी ये शुरू का कष्दम है, हम सब मिल रहे हैं और यहां एक बड़े सम्मेलन के आयोजन की चर्चा हो सकती है। इस आयोजन में पूरा का पूरा हमारा नार्थ ईस्ट छूट गया है, दक्षिण भाग छूट गया है। समय की कमी थी, सबको नहीं बुला पाए क्योंकि बुलाने में ही पंद्रह दिन लग जाते हैं और चिट्ठी जाने में ही देर लग जाती है। कई लोग कहीं बाहर गए हुए हैं। इसलिए अगली बार कुछ हो तो हम लोग पूरे देश के पैमाने पर उसको आगे ले जाने की कोशिश करेंगे।“

विशिष्ट अतिथि डॉ. रामदयाल मुंडा ने इस मौकेष् पर आदिवासी साहित्य पर तीखे विचार रखते हुए हज़ारों सालों से चले आ रहे अन्याय का ज़िक्र किया। उन्होंने कहाµ”साहित्य को सामान्य तौर पर हम लोग ज्यादातर भावनाओं की दुनिया कहते हैं लेकिन आज यहां पर जब साथ चलने की बात हो रही है तो इस साथ चलने में प्रबंधन का जो पक्ष है, उसमें हम कहां पर हैंµइस से स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। हम लोगों को भावनाओं से थोड़ा हटकर चलना होगा। भावना भी रहे क्यांकि चलना तो हृदय मिलाकर ही संभव होगा लेकिन उसके प्रबन्धन और परिभाषागत पक्ष स्पष्ट होने चाहिएं। मुझे लगता है कि हम लोग विरोधाभासों के बीच खड़े हैं। कई बातें अभी ऐसी आई हैं, जिनके पैरोडाक्स, विडंबना या विरोधाभास को समझना होगा। शुरुआती तौर पर ही देखें तो अभी आदिवासी शब्द दर्जनों बार बोला गया लेकिन साइनबोर्ड जनजाति का लगा हुआ है। हमारे जैसा आदमी ‘जन’ शब्द पर उतना ध्यान नहीं देता है लेकिन ‘जाति’ शब्द पर बरबस ध्यान चला जाता है। क्या आप हमें जाति में लटकी हुई इकाई समझना चाहते हैं? आप जान-बूझकर ऐसा कर रहे हैं, क्योंकि वह अंतर्मन में कहीं पड़ा है। हालांकि सही अर्थों में आदिवासी ही भारतीय हैं। देवी जी ने यही कहा है लेकिन इस सही भारतीय यानि आदिवासी को आप एक्सटिक्शन यानि निरस्तित्व के रास्ते पर डाले हुए हैं। एजेंडा भी वही है पर सच यह है कि यह सही भारतीय सौ साल के बाद खष्त्म हो जाएगा। असल विरोधाभास यही है। हम कहते हैं हमें आदिवासी से सीखना है लेकिन हम सीखते कहां हैं? अभी भगवान दास को नया भील पुराण महाभारत लिखने की ज़रूरत क्यों पड़ रही है? पांच हजार साल से हिन्दुस्तान सीखना नहीं चाहता है। वह सिर्फ बताना चाहता है, स्वयं सिखाना चाहता है। दरअसल, यह प्रबन्धन की बात है। हिन्दुस्तान के सारे लोग प्रतिनिधि रूप में इस सम्मिलन में बोलना चाहते हैं। यद्यपि सब आदिवासी लोग यहां बैठे हुए हैं, किन्तु ये आदिवासी की पहल पर नहीं बैठे हैं। चिंता तो आदिवासी की ही है लेकिन ये पहल आदिवासियों के मित्रों ने की है। हम कोई शिकायत नहीं कर रहे। ये एक बड़ी बात है। जो आदमी कादो-कीचड़ में फंसा हुआ है उसे ऊपर उठने के लिए जो हाथ-पैर मारने चाहिए, वे तो वह मार ही रहा होगा लेकिन वह जो दिखाई दे रहा है, वह बाहर वाला आदमी है। आदिवासी साहित्य का जो भी उत्सव है वह अपनी जगह है लेकिन आज हम इसे ऐतिहासिक अवसर क्यों कह रहे हैं? इसलिए कि ऐसा पहली बार होता दीख रहा है। आदिवासी साहित्य इसके पहले कहीं दिखाई नहीं दे रहा था ऐसा तो नहीं है! आज इस रूप में दिख रहा है तो क्यों दिखाई दे रहा है? कैसे दिखाई दे रहा है? महाश्वेता देवी जी से दिखाई दे रहा है, देवी जी के प्रयासों से दिखाई दे रहा है, रमणिका गुप्ता जी के प्रयासों से दिखाई दे रहा है, लेकिन इन तीनों में से कोई आदिवासी नहीं है। क्या आदिवासी साहित्य का मतलब आदिवासी भाषाओं में आदिवासियों द्वारा ज़्यादातर लिखा जाना है? इनमें से कोई भी आदिवासी नहीं है, ये क्या विरोधाभास नहीं है? आदिवासी साहित्य का डंका बजे। दलित के बारे में तो और भी मुश्किल है। कहा गया है अंगूठा काटने वाले से सावधान रहना है। यह भी कहा जाता रहा है कि एकलव्य ने प्रेम से अंगूठा दिया था लेकिन आज वह इंकार कर रहा है। भीम कह रहा है अंगूठा ले ही लेना है। जहां पांच हजार साल से अंगूठा प्रेम से देने की परंपरा बना दी गई हो, वहां दावा कैसे करें? महिषासुर पर कुठाराघात किया गया, विभीषण हमारा मित्रा बना दिया गया। राम की संस्कृति थोप दी गई। महाश्वेता दीदी ने लोकधर्म की चर्चा की है। इसी से सारी चीजें़ खड़ी करनी होगी। हजारों सालों की प्रताड़ना के बाद भी ऐसी कौन सी ताकष्त रही, जिससे हम सब और हमारी आदिम-संस्कृति जीवित रही? इसके कारणों की तलाश करनी पड़ेगी।“

विशिष्ट अतिथि श्री लक्ष्मण गायकवाड़ ने इस मौकेष् पर कहाµ‘‘देर से ही सही साहित्य अकादेमी ने आदिकाल से बसे लोगों का सम्मिलन किया। ‘उचक्का’ नामक पुस्तक के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित व विमुक्त/घुमन्तु आदिवासी जाति के नामी लेखक श्री गायकवाड़ ने कहा ‘‘हमारी जाति गाली बन गई है। हमारा धर्म तो इंसानियत का धर्म है एकलव्य का अंगूठा काटनेवाले द्रोणाचार्य की कमी नहीं है। के.सी. पावड़े कहते हैं कि हम वैदिक परंपरा को नकार रहे हैं। यहां सम्मेलन में गुजरात दंगों में आदिवासियों द्वारा घर लूटे जाने तथा जलाए जाने की बात कही लेकिन इनके पीछे बैठी ताकष्तों को कोई नंगा नहीं कर रहा है। आदिवासी परंपरा मौखिक है, हमें उसे लिपिबद्ध करने का काम करना है। भुजंग मेश्राम और वाहरू सोनवणे ने यह काम किया है। हमें अपना इतिहास भी नए तरीके से लिखना है। आदिवासी संस्कृति को नौटंकी बताया जाता है। माधुरी दीक्षित के नाच तो सब लोग देखना चाहते हैं लेकिन वे ही लोग आदिवासी संस्कृति को हीन बताने से नहीं चूकते। आदिवासी कला-संस्कृति के नाम पर सरकार धन इकट्ठा करती है। कतिपय ऊंची जातियों के लोग भी हमारी भावनाओं के प्रति संवेदनशील है। ऐसे लोग भी हमारे ही हैं। हमें आदिवासी साहित्य के दायरे को व्यापक बनाना होगा। आदिवासियों का सर्वनाश होने जा रहा है। इस देश में जन्मजात 8 करोड़ आदिवासी अपराधी जाति कहे जाते हैं किन्तु तुकाराम महाराज, ज्योतिबा फुले जैसे महत्त्वपूर्ण क्रान्तिकारी लोग भी इसी समाज की देन हैं। बहुत अत्याचार झेला है हमने। मार्क्स का सिद्धांत अच्छा लगता है लेकिन आदिवासी समाज तो पहले से ही सबसे बड़ा समाजवादी है। हमारा जीवन ही समूह का जीवन है। हम लोग तो कुत्ते को भी हिस्सा देते हैं। धर्म व भगवान की बात कहकर आज हमें खत्म किया जा रहा है।’’

विशिष्ट अतिथि श्री भुजंग मेश्राम ने अपने विचार रखते हुए कहाµ‘‘आदिवासी लेखकों को भद्र लेखक नहीं कहा गया। इतिहास के पुनर्लेखन की आवश्यकता है ताकि तंट्या भील, (मध्यप्रदेश) महाराष्ट्र के खांज्या नाईक, रामदास महाराज, भागोजी नाईक, उमाजी नाईक की कुर्बानी को चित्रित किया जा सके। इन बलिदानियों के इतिहास रचे (लिखे) नहीं गए।’’ उन्होंने बताया किµ‘‘छोटी पत्रा-पत्रिकाओं ने आदिवासी साहित्य आंदोलन को गति प्रदान की है। 1970 में लघु भाषा पत्रिका आंदोलन से क्षेत्राय व आदिवासी भाषा में पत्रिकाएं छपने लगीं। पहल, अभिव्यक्ति, युद्धरत आम आदमी, दायित्वबोध (पत्रिकाओं) ने इस दिशा में कुछ प्रयास किए हैं। संताली भाषा की ‘होड़ संवाद’ महाराष्ट्र के जागो रायताड़ और ढोल नामक पत्रिका निकलीं पर बाद में बंद हो गईं। मुख्यधारा के लोग हम आदिवासी को पिछड़ा कहते हैंµतो हमारे साहित्य को क्या कहेंगे वे लोग? स्वर्गीय राजीव गांधी को बिरसा मुंडा पुरस्कार मिला तो ऐसा कहा जाने लगा कि जैसे बिरसा मुंडा का भाग्य ही बदल गया हो। हमें क्या लिखना चाहिए क्या नहीं हमें यह सोचना होगा। संस्कृति के ऐसे ठेकेदारों से हमें सावधान रहना चाहिए जो बच्चों के कंप्यूटर पर गेम खेलने को प्रगति मानते हैं। अपनी मातृभाषा को छोड़कर जो गए वे पनप नहीं सके। गोंड आदिवासी अपनी भाषा की बजाय मराठी में लिखना पसंद करते हैं। आदिवासी लेखकों को पुरस्कारों से भी बचना चाहिए। कलम के साथ हड्डी भी संभाल कर रखी जानी चाहिए।’’

उद्घाटन सत्रा का अध्यक्षीय भाषण करते हुए अकादेमी के उपाध्यक्ष व उर्दू के प्रख्यात आलोचक गोपीचंद नारंग ने कहाµ‘‘रमणिका फाउंडेशन वर्षों से यह काम कर रहा है। जब इन्होंने इस कार्यक्रम के संबंध में बात की तो मैंने कहाµक्यों नहीं, यह काम तो पांच साल पहले ही हो जाना चाहिए था। अकादेमी 22 भाषाओं को लेकर चली थी, बाद में हमने इनमें कोंकणी व सिंधी को भी जोड़ा। आदिवासी साहित्य की जरूरत है, इस पर विचार किया जाना चाहिए। कबीर ने और वारसशाह ने जिस तरह का काव्य रचा वह इलिटिस्ट पोयटिक्स तो नहीं है। दूसरी परंपरा को बिल्कुल हाशिए पर कर दिया गया। सत्ता के संघर्ष में फुरकत नहीं रही तो सियासतबाज़ों ने अनेक तरह की बेइंसाफष्ी की। उन्हें आदिवासियों की समस्याओं पर सोचने या फैसले करने की फुरसत ही नहीं मिली। वे लोग गुजरात का ज़हर पूरे देश में फैला नहीं सके। हालांकि वहां सांप्रदायिकता राजसत्ता द्वारा प्रायोजित की गई थी। धर्म व भाषा को लेकर जिस तरह हम सोचते रहे उससे विषमता व दूरियां बढ़ गईं। भाषाई आधार पर पहचान की नीति ही बुनियादी तौर पर गष्लत थी।

अखिल भारतीय आदिवासी लेखक सम्मिलन के प्रथम सत्रा की अध्यक्षता उड़ीसा के पूर्व मंत्रा व संताली लेखक चैतन्य प्रसाद मांझी ने की। श्री मांझी ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहाµ”आदिवासी आदिम समय से भारत में हैं, वे हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की संस्कृति से चलकर यहां तक आए हैं लेकिन हम आदिवासियों को अपनी संस्कृति से ही दूर कर दिया गया है। उड़ीसा के जगन्नाथ जी आदिवासी के देवता थे मगर आज वहां आदिवासियों के लिए कोई स्थान नहीं है।“

इस सत्रा के मुख्य वक्ता हरिराम मीणा ने आदिवासी साहित्य में लघु-पत्रिकाओं की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहाµ”अरावली उद्घोष, बूधन, मड़ई और आकार जैसी पत्रिकाओं ने आदिवासी साहित्य पर काम किया है मगर इस क्षेत्रा में ऐतिहासिक काम रमणिका जी ने ये दोनों विशेषांक निकालकर किया है। इस प्रयास की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि दोनों खंडों में दूरदराज़ के अधिकांश आदिवासी लेखकों को एक जगह लाकर प्रस्तुत किया गया। इन अंकों में लोकगीत, आधुनिक कविता व गद्य की विभिन्न विधाओं का संकलन किया गया है। इन रचनाओं को पढ़कर लगता है कि आदिवासी साहित्य की असली जमीन आदिवासियों के अपने गहरे और व्यापक जीवनानुभव हैं। इतिहास, संघर्ष, संस्कृति और श्रम आधारित शैली की लंबी परंपरा, प्रकृति प्रदत्त उन्मुक्त मन और सब अभावों, विस्थापन, पलायन की त्रासदी है। यह बड़ा परिवेश उनके जीवन से ताल्लुकष् रखता है। इस सब की अभिव्यक्ति अगर हो पाती है तो निश्चित रूप से बेहतरीन साहित्य की संभावना बनती है, चाहे उसे आदिवासी रचे या गष्ैर-आदिवासी। असली साहित्य वही होगा जो आदमी और समाज की चिंता करे। उसके दुख-सुख को अभिव्यक्त करे। स्वप्नलोक में अमूर्त चित्रा बनाने बाले साहित्य से हमारा अधिक संबंध और मोह नहीं।“

दूसरे सत्रा की मुख्य वक्ता श्रीमती ग्रेस कुजूर ने कहाµ”आज जब आदिवासी समाज ने कष्लम की नोक से अपना चित्रा उकेरना शुरू किया है तो लोगों को उसका खुरदरापन चुभने लगा है। ये गष्रीब दलित, आदिवासी अपनी तंगहाली और मजबूरी के लिबास में फषेटोग्राफरों के कष्ैमरे का अच्छा एंगल बन सकते हैं, उनकी अर्धनग्न तस्वीरें ग्लोबल कैनवस में बेझिझक पेश की जा सकती हैं लेकिन ये उन्हें रोजी-रोटी दे नहीं सकते।“

गुजरात से आए भगवानदास पटेल ने भील रामायण के प्रसंग को उद्धृत करते हुए कहाµ”जब समुद्र लांघते वक्ष्त हनुमान बीच समुंद्र में जाते-जाते थक गए तो राम ने अपने बाण द्वारा हनुमान को गंतव्य तक पहुंचने में सहायता की। लघु-पत्रिकाएं आदिवासी साहित्य के विकास के लिए राम का बाण बन सकती हैं और संबल प्रदान कर सकती हैं तथा आदवासी साहित्य को गतिशील बनाकर नई दिशा दे सकती हैं।“

दूसरे सत्रा में अरावली उद्घोष के वयोवृद्ध संपादक श्री बी.पी. वर्मा ‘पथिक’ ने अध्यक्षीय भाषण में आदिवासी साहित्य के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहाµ”जो समाज विकसित होता है उसी समाज में लेखक और पत्राकार होते हैं। आदिवासी समाज ऐसा है जिसमें लेखक और पत्राकार कम हैं इसलिए जरूरत इस बात की है कि हमारे समाज का विकास कैसे हो, इस पर सोचा जाए।“

इस सत्रा की मुख्य वक्ता खड़िया भाषा की विद्वान डॉ. रोज केरकेट्टा ने कहाµ‘‘लघुपत्रिकाओं में ही दलित और आदिवासी साहित्य को स्थान मिलता है क्योंकि लघुपत्रिकाएं ही क्षेत्रा की विशिष्टता और समस्याओं को बार-बार उठा पाती हैं। विडंबना यह है कि यदि आदिवासी अपने बारे में लिखता है तो उसे स्तरीय नहीं माना जाता, लेकिन आदिवासियों के बारे में गैष्र-आदिवासी लिखता है तो उसे उच्च कोटि का माना जाता है जबकि ये साहित्य उनके जीवन से कोसों दूर का साहित्य है।’’

निर्मला पुतुल ने कहा कि हमारे साहित्य को अब तक जिन लोगों ने बचाए रखा वे अनपढ़ और गांव के गंवार लोग हैं, इसलिए सबसे बड़ा योगदान उन्हीं का है।

रांची विश्वविद्यालय में संताली भाषा के प्राध्यापक प्रो. कृष्णचन्द्र टुडू ने कहाµ”संताली भाषा में तीन हज़ार से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। संताली साहित्य के इतिहास की शुरुआत 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से होती है और संताली भाषा का सबसे पहला पत्रा सन् 1890 ई. में प्रकाशित हुआ था।“

अशोक सिंह ने कहा कि आज आदिवासी साहित्य के सामने सबसे बड़ी समस्या हैµआदिवासी समुदाय के लिखने-पढ़ने वाले लोगों में अपनी भाषा और संस्कृति के प्रति रुचि उत्पन्न करना।

केरल से आए मलयालम के वरिष्ठ आदिवासी साहित्यकार श्री नारायण ने कहाµ”यह सही है कि आदिवासियों की अपनी जिष्ंदगी, अपनी भाषा और अपनी संस्कृति रही है। इन्हें असभ्य कहा जाता रहा है। मैं इन बातों का पोस्टमार्टम नहीं करना चाहता। राष्ट्रीय तथा क्षेत्राय साहित्य में उनके पूर्वजों तथा उनके वारिसों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। दरअसल, आदिवासी जंगलों में आनंद से रहते रहे और कला, संस्कृति तथा कृषि कार्य को प्रदूषण-रहित भूमि में पनपने को प्रोत्साहित करते रहे लेकिन वर्चस्ववादी सभ्यता के हमले ने उन्हें पराजित कर दिया। गहरे घने चट्टानों से भरे जंगलों में आदिवासियों को शरण लेने के लिए मजबूर होना पड़ा। आदिवासियों को अपने जीवन-यापन के लिए बाहरी लोगों से जूझना पड़ा पर अपनी इस दुख भरी जिष्ंदगी के बावजूद वे अपने पुराने गौरवगीत अपनी शैली में गाते रहे और पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपनी संस्कृति को बचाते रहे। वे भले ही अपनी लिपि भूल गए लेकिन अपनी संस्कृति को नहीं भूले। पहाड़ों की चट्टानों पर भी वे लिखते रहे।’’

तीसरे सत्रा की अध्यक्षता महाराष्ट्र के विद्वान लेखक डॉ. विनायक तुमराम ने की। श्री तुमराम ने कहाµ‘‘आदिवासी समाज हजषरों साल से, कई सदियों से भूखा पेट जी रहा है लेकिन पेट में भूख होने के बावूजद अपना तमाम खाना उसने दूसरों को दिया है। उसने अपना पूरा इतिहास दूसरों के लिए लुटा दिया है। आज वह लंगोटी पहनकर जंगलों और पहाड़ों में जी रहा है। इसलिए तमाम लोग आदिवासी की तारीफष् करते हैं।“

लब्धप्रतिष्ठ आदिवासी चिंतक व सिद्धांतकार वाहरू सोनवणे ने कहाµ”हम आदिवासी साहित्य किसे कहेंगे? जो आदिवासी लिख रहे हैं उसे, आदिवासी बोली में जो लिखा जा रहा है उसे या फिर जो आदिवासी के बारे में गष्ैर-आदिवासी लिख रहे हैं उसे मेरी समझ से जो आदिवासी संस्कृति है, जिसमें मानवीय मूल्य हैं, उसे केंद्रबिंदु बनाकर जो लिखा जाता है उसे आदिवासी साहित्य कहना चाहिए। आदिवासी साहित्य किसी की तारीफष् करने के लिए नहीं लिखा जाता बल्कि जो उसका दुख होता है उसे वह अपनी कविता, कहानी एवं अन्य विधा के माध्यम से अभिव्यक्त करता है।“

श्री बी. चीनिया नायक ने कहाµ”आदिवासी लोग गांव से दूर जंगल में रहते हैं। ये लोग राजनीतक, वैज्ञानिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हुए लोग हैं। यदि इनकी तरक्कष्ी करनी है तो इन्हें शिक्षा उन्हीं की मातृभाषा में देनी होगी।“

कार्यक्रम की संचालक सुश्री वासवी ने कहाµ”सरकार ने आदिवासियों को अनुदानजीवी बनाकर उनको ख़रीद लिया है। उनके स्वाभिमान, उनके मान, उनके जीवन की सामूहिकता, स्त्रा-पुरुष सहभाग और सर्वानुमति आधारित जनतंत्रा की बात, जिसमें एक आदमी के मत की भी कष्ीमत हैµको भी ख़रीद लिया है। आदिवासी समाज को इस प्रकार तोड़ दिया गया है कि ये सिर्फष् इन्दिरा आवास और लाल कार्ड की बात करते हैं।’’

कलकत्ता से आए महादेव टोप्पो ने कहाµ”युद्धरत आम आदमी के दो आदिवासी विशेषांक आदिवासी साहित्य में मील के पत्थर की तरह हैं। आदिवासी साहित्य को एकजुट करने और विकसित करने में साथ ही एक-दूसरे के बीच संवाद स्थापित करने में लघु-पत्रिकाओं का प्रमुख योगदान रहा है।“ डॉ. मंजु ज्योत्स्ना ने कहाµ”हमें बहुत कुछ भोगना पड़ा है, हम दलित और उपेक्षित रहे, हम दबाए गए और जष्ुल्म सहते रहे यह हम सभी जानते हैं लेकिन अब क्या करना है, इस बात का फष्ैसला हमें ख्षुद लेना चाहिए।“

शाम को हुई काव्य-गोष्ठी में झारखंड के जिला दुमका की संताली कवयित्रा निर्मला पुतुल ने संताली, डॉ. वाहरू सोनवणे ने भिलोरी भाषा, डॉ. रामदयाल मुंडा ने मुंडारी, हरिराम मीणा, महादेव टोप्पो, भुजंग मेश्राम, श्रीमति ग्रेस कुजूर, कृष्णचंद्र टुडू व रमणिका गुप्ता ने हिन्दी भाषा में काव्य-पाठ किया। व

प्रस्तुति : वासवी एवं बिरसी कुजूर