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रफां : आयोजन - 2002

रफां : आयोजन - 2002

  • नागरिक अधिकारों से वंचित लोग
  • ‘विमुक्त-घुमंतू आदिवासी आदिवासियों की स्वतंत्राता का स्वर्ण जयंती सम्मेलन’
  • (31 अगस्त, 2002 स्थान : अकादेमी ऑफ फाईन ऑर्ट्स एंड लिटरेचर, नई दिल्ली )

लगभग 8 करोड़ आदिवासी लोग जिनकी मुक्ति की घोषणा आजादी के 5 वर्ष बाद सन् 1952 में पंडित नेहरू ने की थीµआज भी, अंधेरे की जिंदगी जी रहे हैं। 31 अगस्त, 2002 को उनकी तथाकथित विशेष मुक्ति का पचासवां वर्ष पूरा होता है। विमुक्त एवं घुमंतू आदिवासियों की इन्हीं समस्याओं पर विमर्श के लिए उसी दिन सुबह 10 बजे से शाम 6.00 बजे तक ‘विमुक्त-घुमंतू आदिवासियों की स्वतंत्राता का स्वर्ण जयंती सम्मेलन’ रमणिका फाउंडेशन, विमुक्त घुमंतू आदिवासी महासंघ, मुंबई एवं अकादेमी ऑफ फाईन ऑर्ट्स एंड लिटरेचर के संयुक्त तत्वावधान में अकादेमी के हॉल में आयोजित किया गया।

इस सम्मेलन का उद्घाटन विमुक्त-घुमंतू जनजातियों एवं आदिवासियों के लिए संघर्षरत साहित्यकार महाश्वेता देवी ने किया और मुख्य अतिथि थे देश के भूतपूर्व प्रधानमंत्रा श्री वी.पी. सिंह।

अपने उद्घाटन भाषण में महाश्वेता देवी ने कहा कि इन जातियों को संविधान निर्माताओं ने बिल्कुल भुला दिया और सरकार अंग्रेजों के जाने के बाद भी अपनी सामंती मानसिकता के कारण इनके साथ अपराधियों जैसा सलूक कर रही है। इनसे जंगल तक छीन लिए गए हैं। उन्होंने देश और राजधानी के प्रबुद्ध समाज को झकझोरा जो इनके लिए बिल्कुल खोया हुआ है और उनसे अपील की कि वे ऐसे कानूनी केंद्र बनाएं जहां इन्हें न्याय मिल सके। आज इनकी कोई पहचान नहीं है, पहचान है तो सिर्फ चोर-अपराधी की। हमें इनके आरक्षण की बातें करनी चाहिएं।

कार्यक्रम के प्रारंभ में श्रीमती अजीत कौर ने सबका स्वागत किया।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि पूर्व प्रधानमंत्रा श्री वी.पी. सिंह ने कहा कि 8 करोड़ के लगभग इस आदिवासी समाज को भी अन्य नागरिकों की तरह सभी तरह के संवैधानिक अधिकार प्राप्त करने का पूरा अधिकार है। एक समाज को अपराधी कहकर उस पर मोहर लगा दी जाए इससे बड़ा कोई दंड नहीं। मृत्यु का दंड एक बार होता है लेकिन अपमान का दंड इन्हें हजारों बार सहना पड़ता है। उन्होंने कहा कि ये लोग भारतीय तो हैं लेकिन भारतवासी नहीं। हम सबको मिलकर इनके लिए संघर्ष करना होगा।

रमणिका फाउंडेशन की अध्यक्ष रमणिका गुप्ता ने अपने प्रस्तुति भाषण में कहा कि सन् 1871 में अंग्रेज सरकार ने इन्हें जन्मजात अपराधी करार देने का कानून बनाया। सन् 1952 में देश के प्रथम प्रधानमंत्रा ने नोटीफाइड और नोमैडिक ट्राइब्ज को ‘विशेष मुक्त’ घोषित कर आजाद किया था लेकिन आज भी ये मुक्त नहीं हैं। इन्हें अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का दर्जा भी नहीं दिया गया है। इनके न घर हैं, न खेत और न रोजगार। प्रशासन की नजर में ये लोग चोर और गुनहगार हैं। इनकी संख्या करीब 8 करोड़ है। इन जातियों के 95 फीसदी लोग केंद्र की किसी सूची में दर्ज नहीं हैं। लगभग सवा करोड़ लोग तो देश के नागरिक ही नहीं बनने दिए गए। हर साल 15 अगस्त, 26 जनवरी व 2 अक्तूबर को इन लोगों को घुमंतू व विमुक्त जनजातियों में जन्म लेने के कारण ‘देश की शांति को इनसे खतरा है’ का आरोप लगाकर दिल्ली, मुंबई तथा अन्य शहरों में पांच-पांच, छः-छः सौ की संख्या में जेल में बंद कर दिया जाता है।

विमुक्त-घुमंतू आदिवासी महासंघ के अध्यक्ष श्री लक्ष्मण गायकवाड ने कहा कि इस देश में मां के पेट से ही बच्चा गुनहगार होता है। ऐसा कानून अंग्रेजों ने सन् 1871 में बांबे प्रेसीडेंसी में बनाया और हमें बाईबर्थ क्रिमीनल करार कर दिया उसके तहत हमें इस देश के 52वें संशोधन में कैद करके रख दिया। जबकि असली आजादी की लड़ाई लड़ने वाले हमीं लोग थे। पंडित नेहरू ने हमें आजादी के 5 वर्ष बाद 1952 में आजाद किया, लेकिन तब तक संविधान बन चुका था, इसलिए जाहिर है कि हमें संविधान में स्थान नहीं दिया जा सका। जिसके कारण आज तक केंद्र सरकार द्वारा हमारे लिए बजट में कोई प्रावधान नहीं किया जाता।

रंजीत नायक ने अपने अध्क्षीय भाषण में कहा कि लगभग 8 करोड़ घुमंतू आदिवासियों की समस्या को राष्ट्रीय मुद्दा बनाया जाना चाहिए और भारतीय संविधान के तहत इन जातियों को तीसरी अनुसूची में डाला जाना चाहिए।

महाराष्ट्र से आए रिपब्लिकन पार्टी के सांसद रामदास आठवले ने कहा कि हमें चोर-अपराधी करार दिया गया है लेकिन चोरी करने वाले तो बड़े-बड़े लोग हैं जो देश को लूट रहे हैं, हमें आज तक न्याय नहीं मिल पा रहा है।

इस सम्मेलन में साहित्यकार व ‘हंस’ के संपादक श्री राजेन्द्र यादव और वरिष्ठ साहित्यकार एवं पत्राकार श्री कमलेश्वर ने इन जातियों के संदर्भ में कई प्रश्न उठाएं कि इन्हें अभी तक संवैधानिक पहचान क्यों नहीं दी गई? कमलेश्वर ने कहा कि शोषित समाज लेखकों से बड़ी उम्मीदें रखता है लेकिन सच्चाई है कि आज का लेखक भी दलित श्रेणी में शामिल हो चुका है।

कदम संस्था की अध्यक्ष रजनी तिलक ने कहा कि दलित को भी इनके साथ मिलकर चलना चाहिए तभी सरकार पर दबाव बनाया जा सकता है। दलित और आदिवासी दोनों एकजुट होकर प्रशासन से लड़ सकते हैं।

अखिल भारतीय किसान सभा के नेता नन्दकिशोर शुक्ल ने कहा कि सभा के 2 करोड़ सदस्य अपने संसाधनों सहित इन जातियों के संघर्ष में साथ देंगे।

यह सम्मेलन तीन सत्रों में चला जिसमें देश के विभिन्न विमुक्त-घुमंतू आदिवासियों के प्रमुख साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों और उनसे संबंधित विभिन्न संस्थाओं के जाने-माने लोगों ने भाग लिया, जिन्होंने घुमंतू जातियों के इतिहास से लेकर वर्तमान तक को खोलकर पूरे देश के सामने रखा, जिस पर आज तक कभी कहीं किसी ने ध्यान देने की कोशिश नहीं की थी।

जिन लोगों ने भाग लिया, उनमें प्रमुख थे झारखंड से दयामनी बरला, गुजरात से आए लक्ष्मण भाई पटनी, हैदराबाद से बलैया नायक, मुंबई से मछिन्द्र भोंसले, अविनाश गायकवाड़, बलैया नायक तेजावत, राजस्थान से रतन कात्यायनी, कर्नाटक से रामचन्द्र हंदीगुंद, शिवाजी सेलर, दिल्ली से सूरजपाल नांगिया, अशोक भारती, रमेश राठौर और बूधन पत्रिका के संपादक अनिल पांडे आदि।

इस सम्मेलन में एक खास बात यह देखने को मिली कि इसमें अपनी बात कहने का प्रावधान भी रखा गया था, जिसमें बंजारा, सांसी तथा ओढ जाति के घुमंतू लोगों ने पुलिस-जुल्म एवं उन पर प्रतिदिन होने वाले शोषण की गाथा स्वयं सुनाई कि किस प्रकार पुलिस उनके साथ तथा उनकी मां-बहनों से मारपीट करती है और उन्हें बेगुनाह होने पर भी जबरदस्ती जेल में डाल देती है महज इसलिए कि वे लोग घुमंतू व विमुक्त जातियों से आते हैं।

अंत में रमणिका फाउंडेशन के श्रीप्रकाशजी ने धन्यवाद दिया। व