Welcome to Ramnika Foundation


रफां : आयोजन - 2002

रफां : आयोजन - 2002

  • अखिल भारतीय आदिवासी साहित्यिक मंच (अभासम-1)
  • रमणिका फाउंडेशन द्वारा संयोजित
  • पूर्वोत्तर राज्यों का प्रथम क्षेत्राय सम्मेलन
  • (21 दिसंबर, 2002 स्थान : लक्खीराम बरुआ सदन, गोहाटी)

21 दिसंबर, 2002 को लक्खीराम बरुआ सदन, गोहाटी में पूर्वोत्तर राज्यों का क्षेत्राय सम्मेलन संपन्न हुआ जिसका उद्घाटन असम विधानसभा के अध्यक्ष माननीय पृथ्वी मांझी ने किया। इस सम्मेलन की अध्यक्षता मंच के अखिल भारतीय अध्यक्ष और रांची विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आदिवासियों का यू.एन.ओ. में प्रतिनिधित्व करने वाले डॉ. रामदयाल मुंडा, असम विधानसभा के जुझारू विधायक एवं साहित्य में गौरव सम्मान प्राप्त श्री करेन्द्र बासुमैत्रा तथा उड़ीसा के विधायक, पूर्व मंत्रा एवं पूर्व सांसद रह चुके श्री चेतन मांझी ने की।

सभा का आरंभ इस सम्मेलन की स्वागताध्यक्ष श्रीमती प्रोमिला बोड़ो ने आगत अतिथियों तथा प्रतिनिधियों का स्वागत करके किया। विषय का प्रवर्तन रमणिका फाउंडेशन की अध्यक्ष श्रीमती रमणिका गुप्ता ने किया और श्री अनिल बोड़ो ने रपट रखी। अपने उद्घाटन भाषण में श्री पृथ्वी मांझी ने इस बात पर खेद प्रकट किया कि आदिवासी संस्कृति और परंपरा के समृद्ध होने के बावजूद भी आदिवासी लेखकों की साहित्यिक कृतियों का मुख्यधारा के साहित्य में सही मूल्यांकन नहीं किया जाता। उन्हें कमतर आंका जाता है। मुख्य भाषाओं के गैर-आदिवासी लेखकों ने अपने साहित्य में आदिवासी भाषाओं और उनकी समृद्ध संस्कृति को एकदम दरकिनार कर दिया बल्कि यूं कहा जाना अधिक उपयुक्त होगा कि बड़ी भाषाओं के गैर-आदिवासी लेखकों द्वारा सही आकलन और तटस्थ दृष्टिकोण न अपनाया जाना ही आदिवासी साहित्य के विकास में बाधक बना है। संस्कृत मिश्रित बड़ी भाषाओं को प्रमुखता दिए जाने के कारण ही आदिवासी भाषाएं स्थिर हो गईं और वे विकास की धारा से पिछड़ती चली गईं। हकीकत यह है कि भारत की सभी प्रमुख बड़ी भाषाओं की नींव आदिवासी बोलियों में है लेकिन संस्कृत को सभी भारतीय भाषाओं का मूल मानने वाले भाषाविदों और भाषा विज्ञानियों ने जान बूझकर इस अवधारणा को अनदेखा किया। भाषा के वर्तमान संस्कृत आधारित सिद्धांत को नकारते हुए उन्होंने कहा कि ”यह विचारधारा आदिवासियों पर थोपी गई है। केवल भाषा की ही बात नहीं, थोपने का सिलसिला संस्कृति के क्षेत्रा में भी जारी है। उदाहरणार्थ ब्रह्मपुत्रा नदी का ही नाम लेंµजो आदिवासी शब्द है लेकिन इसका संस्कृतिकरण कर दिया गया। वास्तविक नाम ‘बड़ा पानी’ है। ‘ट्राइबल लिटरेरी फोरम’, जो पूर्वोत्तर के क्षेत्रा में पहली बार गठित हो रहा है इसमें देश के दूसरे भागों के आदिवासी लेखक भी शामिल हुए हैं, सभी लेखकों से मैं अपील करता हूं कि अब समय आ गया है आदिवासी संस्कृति और भाषा का गहन अध्ययन करके सत्य को सामने लाया जाए ताकि आदिवासी पहचान और समृद्धि को बरकरार रखा जा सके।“ उन्होंने शिव का विश्लेषण भी किया और यह सिद्ध किया कि शिव एक संथाल शब्द है।

‘रमणिका फाउंडेशन’ की अध्यक्षा और ‘अखिल भारतीय ट्राइबल/आदिवासी साहित्यिक मंच’ की संस्थापक रमणिका गुप्ता, जिन्होंने साहित्य अकादेमी के साथ मिलकर आदिवासी लेखकों का पहला सम्मेलन दिल्ली में 1 जून, 2002 को कराया था, ने इस सभा को संबोधित करते हुए कहाµ”पहले आदिवासी एक ऐसे सांझे मंच से वंचित थे जहां वे एक साथ बैठकर अपनी समस्याओं पर विचार-विमर्श कर सकते। रमणिका फाउंडेशन ने राष्ट्रीय स्तर पर उन्हें यह मंच देने का प्रयास किया है और तय किया है कि इस मंच का नेतृत्व आदिवासियों के ही हाथ में रहेगा। रमणिका फाउंडेशन इसे समायोजित (ब्व.वतकपदंजम) करने का कार्य करेगा। रमणिका जी ने कहा कि आज आदिवासियों की पहचान इस हद तक मिटाई जा रही है कि उन्हें राम के वंशज कहकर दंगों में इस्तेमाल किया जा रहा है। गुजरात में पहले आदिवासी आपस में मिलते थे तो एक-दूसरे को ‘जोहार’ कहते थे वे आज ‘जय श्रीराम’ कहने लगे हैं। दयामनी बरला झारखंड से दो-दो बार गुजरात जाकर आदिवासी क्षेत्रों का दौरा कर आई हैं, कैसे इनकी गरीबी का फायदा उठाया जा रहा है, यह उन्होंने ‘जलता गुजरात’ पुस्तिका में लिखा भी है। हमें इस सबसे सावधान रहना होगा। पहले यह प्रवृत्ति थी कि केवल गैर-आदिवासी, आदिवासियों पर लिखते थे और आदिवासी सुनते या पढ़ते थे। हमने इस प्रक्रिया को उलट कर यह प्रयास शुरू किया है कि आदिवासी व ट्राइबल्स जो उपेक्षित व अन्याय के शिकार हैं वे अब खुद ही बोलें और लिखें कि उन्हें कैसा परिवर्तन चाहिए। दरअसल आदिवासी समाज सीधा-सादा, छल-कपटहीन एक अत्यंत ही जनतांत्रिक समाज है जो समूह में फैसले लेता है और उन पर अमल करता है। सभ्य समाज की तरह वे अपनी बात दूसरों पर थोपता नहीं, वह अपने को श्रेष्ठ भी नहीं कहता, इसलिए उस समाज में कोई छोटा-बड़ा भी नहीं होता, सब बराबर हैं। वह समाज शब्द की कीमत जानता है इसलिए कथन और वचन को वजन देता है। सभ्य समाज तो कोर्ट में की गई लिखा-पढ़ी को भी नकार देता है। उनके यहां दहेज नहीं है। उनके जीने की शैली ही उनका धर्म है। उनके देवता आसमान पर नहीं रहते, पेड़ों पर, पूर्वजों की समाधियों पर और खेतों में उनके साथ रहते हैं। वे प्रकृति को पोसते हैं और उससे उतना ही लेते हैं जितनी उन्हें जरूरत है। उन्हें लाठा, छावन और जलावन चाहिए! उन्हें जल-जंगल-जमीन चाहिए। लेकिन विकास के नाम पर उनका विनाश किया जा रहा है। जंगल काटे जा रहे हैं।

उन्हें वनवासी कहकर, उनकी पहचान मिटाने की साजिश की जा रही है। उनकी भाषा में शिक्षा नहीं दी जाती। गैर-आदिवासी धर्मग्रंथों में उनके सिर पर सींग, बड़े-बड़े दांत, मोटे होंठ और पूंछ लगी हुई है यानी वे राक्षस हैं मनुष्य नहीं। आदिवासी इतिहास वेदों से पहले का है। वेदों में मुंडारी के शब्द भी पाए जाते हैं लेकिन उनके इतिहास को मिटा दिया गया और आज इस मंच के माध्यम से हम यही मुद्दे आपके सामने रखने जा रहे हैं जिस पर आपको शोध करना है, लिखना है और अपना साहित्य और इतिहास विकसित करना है। हमने दसवां मुद्दा अनुवाद का रखा है ताकि आपका आपस में भी संवाद कायम हो सके और खुद को मुख्यधारा कहने वाले साहित्यकारों के रू-ब-रू भी आपके साहित्य को प्रस्तुत किया जा सके। आप कोई और मुद्दा जोड़ना चाहे तो जोड़ा जा सकता है।

आदिवासी लेखक एवं बुद्धिजीवी डॉ. रामदयाल मुंडा ने अपने अध्यक्षीय भाषण में बताया कि इस मंच का इसी प्रकार का क्षेत्राय सम्मेलन कर्नाटक राज्य की हम्पी यूनिवर्सिटी की सहायता से 18-19 जनवरी 2003 को होने जा रहा है। इसके बाद हम राष्ट्रीय स्तर पर दिल्ली में एक सम्मेलन करेंगे। जिसमें राष्ट्रपति श्री अब्दुल कलाम तथा डिप्टी स्पीकर पी.एम. सईद को आमंत्रित करने की योजना है। उस अवसर पर हम एक सोविनियर भी तैयार कर रहे हैं जिसमें आदिवासी बुद्धिजीवियों के शोधपूर्वक लेख उपरोक्त मुद्दों पर छपेंगे। जरूरत पड़ी तो हम शिलांग में भी फिर आकर एक बार सम्मेलन करेंगे।

इसके बाद श्री चेतन मांझी ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि अगला क्षेत्राय सम्मेलन जो पूर्वी राज्यों का होगा उसे हम उड़ीसा में करवाने के लिए आमंत्रित करते हैं। उन्होंने आदिवासियों के भगवाकरण पर भी चिंता जताई।

श्री के. बासुमैत्रा ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि ”यह सम्मेलन हालांकि जल्दबाजी में हुआ है फिर भी इसमें इतने लोग जुट गए हैं, क्रिसमस की वजह से तीन राज्योंµमिजोरम, नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश के लोग नहीं आ पाए हैं, पर उनके संदेश आ गए हैं और उन्होंने अपना लेखकीय बायोडाटा भी भेज दिया है।“ उन्होंने आश्वासन दिया कि अगला सम्मेलन हम सातों राज्यों में घूम-घूमकर पूरी तैयारी के साथ करेंगे। आज यहां पूर्वोत्तर राज्यों के ट्राइबल/आदिवासी लेखकों का एक मंच पर आना बड़ी बात है। हमारे साहित्य का हिन्दी अनुवाद होना हमारी पहचान को बल देगा। हमारी बोड़ो भाषा का साहित्य इतना समृद्ध हो गया है फिर भी उसे मान्यता नहीं दी जा रही है। करबी भाषा में भी लोग लिख रहे हैं। खासी भाषी लोगों ने तो अंगेजों के समय, यानी लगभग 200 वर्ष पहले से ही लिखना-पढ़ना शुरू कर दिया था। उनका साहित्य भी विकसित हुआ है और अंग्रेजी में उसका अनुवाद भी हो रहा है। संथाली भाषा लाखों लोग बोलते और लिखते हैं फिर भी उसे मान्यता नहीं मिली। आज साहित्य अकादेमी के दो पर्यवेक्षक श्री भट्टाचार्य और श्री गिरधर राठी यहां आए हुए हैं। हमारा निवेदन है कि साहित्य अकादेमी आदिवासी लेखकों को पुरस्कार की अलग व्यवस्था करे।

3ः00 बजे भोजन के उपरांत प्रतिनिधि सम्मेलन शुरू हुआ और 5ः00 बजे तक चला जिसमें 37 प्रतिनिधियों ने अपनी बात रखी और मंच द्वारा पेश किए गए दस मुद्दों का समर्थन किया। मंच की तरफ से 6 प्रस्ताव भी रखे गए और उन्हें सर्वसम्मति से पारित किया गया।

5ः30 बजे चाय के बाद क्षेत्राय कमेटी का चुनाव हुआ जिसमें हर ट्राइब के ग्रुप से दो-दो प्रतिनिधि लिए गए और केंद्रीय कमेटी में भी हर राज्य से दो-दो प्रतिनिधि चुने गए। मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड और सिक्किम को छोड़कर जिनके लिए रिक्त स्थानों को भरने के लिए क्षेत्राय कमेटी को अधिकृत किया गया।

क्षेत्राय कमेटी में तीन संयोजक चुने गएµआसाम से अनिल बोड़ो, मेघालय से किम फेम सिंग मोंगक्रीह और त्रिपुरा से बिमल देव बर्मा।

6ः30 बजे से 9ः00 बजे तक कवि सम्मेलन का आयोजन हुआ जिसमें बोड़ो, खासी, टीवा, रभ्भा, कोकबोरोक, संथाली, छोटा नागपुरी, मुंडारी, उड़िया, मराठी और हिन्दी में अनुवाद के साथ कविताएं पढ़ी गईं। इसके बाद कोयला क्षेत्रा में आदिवासियों के विस्थापन पर बनी ‘फायर विद इन’ का फिल्मांकन भी श्री श्रीप्रकाश ने किया जो बहुत सराहा गया।

सम्मेलन में पारित प्रस्तावµ

अखिल भारतीय ट्राइबल साहित्यिक मंच की क्षेत्राय कमिटी जिसमें पूर्वोत्तर राज्यों तथा केंद्रीय कमिटी के झारखंड, उड़ीसा, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और दिल्ली के प्रतिनिधियों ने भाग लिया और पूरी तरह बहस-मुबासा के बाद निम्न प्रस्ताव पारित किए।

सर्वसम्मति से तय पाया गया कि-

  • 1. केंद्र सरकार बोड़ो, खासी, संथाली, करबी तथा अन्य आदिवासी भाषाओं को आठवे शैड्यूल में शामिल करे।
  • 2. केंद्र सरकार एवं संबंधित सरकारें आदिवासी साहित्य को हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद कराने हेतु पर्याप्त कोष उपलब्ध कराएं।
  • 3. आदिवासी लोक-कथाओं, गीतों, वीरगीतों और मिथकों को हिन्दी अनुवाद के साथ प्रकाशित करने हेतु तत्काल कदम उठाएं।
  • 4. केंद्र सरकार और संबंधित राज्य सरकारें वरिष्ठ, योग्य आदिवासी लेखकों तथा कवियों की पहचान करके उन्हें पुरस्कृत करें।
  • 5. ट्राइबल और आदिवासी लेखकों की हिन्दी और अंग्रेजी में बिबलियोग्राफी (डायरेक्ट्री) प्रकाशित की जाए और ऐसी परियोजनाओं को केंद्र सरकार तथा संबंधित राज्य सरकार सहायता करे।
  • 6. केंद्र सरकार ट्राइबल और आदिवासी बच्चों को प्राइमरी स्कूल से विश्वविद्यालय की शिक्षा तक उनकी मातृभाषा में दी जाए।

पूर्वोत्तर राज्यों की क्षेत्राय कमिटी के लिए चुने गए ट्राइबल समूहों के प्रतिनिधियों की राज्यवार सूचीµ

मेघालयµ1. मि. किमफाम सिं नोंगक्रीह, 2. प्रो. एस.एस. मागा, 3. श्रीमती मिनीमोन लालू, 4. मि. के. डब्ल्यू. नोंगरुम, 5. डॉ. स्ट्रीमलेट डखार

त्रिपुराµ1. डॉ. नीलमणि दखर्मा, 2. बिमल देव बर्मा, 3. श्यामलाल देव बर्मा, 4. चन्द्र कांत मोंसे आदिवासीµ1. मि. पृथ्वी मांझी, 2. मि. दिलेश्वर तांती बोड़ोµ1. करेन्द्र बा सुमैत्रा, 2. डॉ. अनिल बोड़ो करबीµ1. श्री हंगमिजी हन्से, 2. श्री रोंग बोंग कथार रावा µ1. डॉ. उपेन रभ्भा हकंग, 2. संदेश रावा बक्साका टीवाµ1. राजेन्द्र नाथ बरदोलोई, 2. वीरेन चन्द्र बरदोलोई विशेष महिला प्रतिनिधि : असमµ1. मिस अंजूले बासुमैत्रा, कोकराझार कॉलेज, कोकराझार केंद्रीय समिति के सदस्य : मेघालयµ1. किमफाम सिं नोंगक्रीह, 2. के.डब्ल्यू. नोंगरूम त्रिपुराµश्यामलाल देव बर्मा असमµ1. श्री करेन्द्र बासुमैत्रा, 2. श्री पृथ्वी मांझी