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रफां : आयोजन - 2003

रफां : आयोजन - 2003

  • आयोजन-2003 : अखिल भारतीय आदिवासी साहित्यिक मंच (अभासम-2)
  • रमणिका फाउंडेशन द्वारा संयोजित
  • दक्षिणी राज्यों का प्रथम क्षेत्राय सम्मेलन
  • 18-19 जनवरी, 2003 (रमणिका फाउंडेशन तथा कन्नड़ विश्वविद्यालय, हम्पी)

जनवरी 18-19, 2003 को रमणिका फाउंडेशन तथा कन्नड विश्वविद्यालय हम्पी के संयुक्त तत्वाधान में ‘अखिल भारतीय आदिवासी साहित्यिक मंच’ के पहले दक्षिण भारतीय आदिवासी लेखकों का सम्मेलन विद्यारण्य कन्नड़ यूनिवर्सिटी के कैम्पस में संपन्न हुआ। यह सम्मेलन दक्षिण भारतीय आदिवासियों के सशक्तिकरण और विकास की मुहिम में एक मील का पत्थर है । पहली बार यहां दक्षिण भारत के विभिन्न भागों से आए आदिवासी लेखकों को एक सांझा मंच पर मिलने, परस्पर संवाद करने तथा अपने विचार और अपना पक्ष प्रस्तुत करने का अवसर मिला। इस सम्मेलन में 24 आदिवासी समुदायों से आंध्र प्रदेश, गोवा, कर्नाटक और केरल व तमिलनाडु से कुल 182 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। सम्मेलन में आए प्रतिनिधियों का उत्साह और खुशी इसलिए और भी बढ़ गई कि ये विश्वविद्यालय के ‘गिरीसीम’ हॉल में हुआ जो एक आदिवासी ग्रामीण परिवेश में विश्वविद्यालय के भीतर ही एक लघु विश्वविद्यालय के रूप में निर्मित है।

सम्मेलन का आरंभ श्रीमति कुर्ताज वसामल्ली ने टोडा आदिवासी गीत से किया। श्रीमती वसामल्ली ‘सेवा’ संस्था की कोऑर्डीनेटर हैं और ‘क्रशमूंड’ नामक टोडा आदिवासी गांव जिला नीलगिरी की रहने वाली हैं। डॉ. के.एम. मित्रा सम्मेलन के सचिव एवं कन्नड़ विश्वविद्यालय में ट्राइबल स्टडी विभाग के रीडर, ने प्रतिनिधियों का स्वागत किया। उन्होंने संक्षिप्त भाषण से कार्यवाई शुरू करवाई। इसके पश्चात् डॉ. रामदयाल मुंडा ‘अ.भा.आ.सा. मंच’ के अध्यक्ष तथा रांची विश्वविद्यालय के पूर्व उपकुलपति ने दीप प्रज्जवलित किया।

सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए डॉ0 रामदयाल मुंडा ने आदिवासियों की प्रकृति सहयोगी प्रवृत्ति की तरफ विशेष जोर देते हुए यह ध्यान दिलाया कि आज की उपभोक्ता संस्कृति का विकल्प आदिवासियों की ‘प्रकृति मित्रा’ संस्कृति ही हो सकती है। उन्होंने इस बात पर दुख प्रकट करते हुए कहा कि आदिवासी समाज, देश की कुल जनसंख्या का 10 प्रतिशत होने के बावजूद भी इस समाज की पूरी की पूरी आबादी को देश की मुख्यधारा से अलग-थलग रखा गया और देश व कौम के निर्माण में उनकी भूमिका का सही ढंग से दस्तावेजीकरण नहीं हुआ। उन्होंने कहाµ”आजादी से पहले युद्ध में ‘सिपाही देने’ के अलावा देश की स्वतंत्राता की लड़ाई के आंदोलन में इतिहासकारों ने आदिवासियों की भूमिका को दर्ज नहीं किया है। इस प्रकार आदिवासी भारतीय विरासत और परंपरा में निहित अन्याय के शिकार बने और उपेक्षित रखे गए।“

‘अ.भा.आ.सा. मंच’ की ‘कोआर्डीनेटर’ तथा ‘रमणिका फाउंडशेन’ की अध्यक्ष श्रीमति रमणिका गुप्ता ने अपने बीज भाषण में भारतीय आदिवासियों के सशक्तिकरण की चर्चा की। उन्होंने कहाµ”आधुनिक समाज को सभ्य और जनतांत्रिक कहलाने का कोई हक नहीं बनता क्योंकि यह शोषितों को शोषित होने से बचा नहीं पाया। आदिवासियों पर लगातार अन्याय और शोषण जारी है। विकास के नाम पर आदिवासियों का विध्वंस रोका जाना चाहिए और उनकी पहचान को भी बचाना जरूरी है। चूंकि उन्हें बनवासी कहकर खत्म किया जा रहा है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आदिवासियों पर शोध कर उनका पुर्नमूल्यांकन करना एवं इतिहास की खोज भी जरूरी है और इसके लिए सबसे ज्यादा जरूरी है आदिवासियों को उनकी मातृभाषा में पढ़ाना। मातृभाषा में न पढ़ाए जाने के कारण ही ज्यादातर आदिवासी बच्चे प्राइमरी स्कूल के बाद पढ़ाई छोड़ देते हैं और यह समाज अशिक्षित रह जाता है।“

डॉ. के.वी. नारायण रजिस्ट्रार कन्नड यूनिवर्सिटी हम्पी ने अतिथियों का अभिनन्दन करते हुए यह दुख प्रकट किया कि आज भी आदिवासियों को उनकी मातृभाषा में पढ़ाने से रोका जाता है। वे अपनी भाषा भुला रहे हैं। भाषा गंवाने की ये प्रवृत्ति केवल भारत में ही नहीं बल्कि विश्व के सभी देशों में आम बात हो रही है। आज केवल उनके साहित्य पर ही नहीं बल्कि उनकी भाषा के बारे में भी विचार होना चाहिए।

श्री के. सुन्दरनायक मंगलौर विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार जिन्होंने उद्घाटन सत्रा की अध्यक्षता की ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि वैश्वीकरण और उदारीकरण की प्रक्रिया का दुष्प्रभाव भोले-भाले आदिवासियों के शोषण के रूप में सामने आया है। उन्होंने पढ़े-लिखे आदिवासियों को सलाह दी कि वे अपनी हीनभावना को छोड़ें और अपने साहित्य की भाषा और सांस्कृतिक विरासत के विकास के लिए कार्य करें। वे अपने आदिवासी समाज के विकास के लिए भी कार्य करें।

डॉ. मंजूनाथ बेविनाकट्टी जो कन्नड़ यूनिवर्सिटी के लोकगीत अध्ययन विभाग की अध्यक्ष हैं ने धन्यवाद ज्ञापन किया। इस सेमिनार को चार सत्रों में बांटा गया जिसमें निम्न चार विषय रखे गए।

1. आदिवासी अस्मिता, 2. आदिवासियों का रूपांतरण, 3. आदिवासी शिक्षा और समायोजन 4. आदिवासी आस्थाएं।

पहले सत्रा की अध्यक्षता डॉ. तेजस्वी कट्टीमनी ने की, उसकी रिर्पोटिंग श्री सुन्हेर सिंह ताराम ने और स्वागत डॉ0 मंजूनाथ बेविनाकट्टी ने किया तथा धन्यवाद डॉ. तारीहाली हनुमन्थप्पम ने दिया। इस सत्रा में पंद्रह आदिवासी लेखकों ने लेख पढ़े।

18 जनवरी को रात्रिभोज कैंपफायर के गिर्द आरंभ हुआ। इसका उद्घाटन प्रसिद्ध कलाकार श्री बाबू गिरीगोली सिद्धी ने किया। यहां पर कई आदिवासी समूहों ने अपने नृत्य और गान द्वारा श्रोताओं का मनोरंजन किया।

तृतीय सत्रा का आरंभ 19 दिसंबर सुबह 9.00 बजे हुआ। इसकी अध्यक्षता श्री के. कुमारप्पन ने की। इसमें 12 आदिवासी लेखकों ने लेख पढ़े। विषय था ‘शिक्षा और एकीकरण’।

चौथे सत्रा का आरंभ 11.00 बजे हुआ। इसकी अध्यक्षता डॉ. डी.बी. नायक ने की। इसका विषय था ‘आदिवासी विश्वास’ इसमें कुल 13 आलेख पढ़े गए।

चारों सेमिनारों में कुल 50 लेख पढ़े गए और हर सत्रा के बाद एक जीवंत बहस हुई जिसमें श्रोताओं ने भी भाग लिया।

सम्मेलन और सेमिनारों का समापन सत्रा कन्नड़ वि.वि. के उपकुलपति श्री लकप्पा गौड़ा की अध्यक्षता में संध्या 4.00 बजे 19 जनवरी को सम्पन्न हुआ।

आदिलाबाद जिला के लोक कलाकार श्री मडावी मानिक राव मोकाशी के गोंडीगीत द्वारा सभा का आरंभ हुआ। श्री चेलू व राजू आदिवासी अध्ययन विभाग (कन्नड़ यूनिवर्सिटी) के लेक्चरर ने सबका स्वागत किया।

श्री वसंत पी. जमकर श्री जी. मधार राव तथा श्रीमति के. वसामल्ली ने प्रतिनिधि प्रतिभागियों की राय को प्रस्तुत किया। ‘अ.भा. आ. सा. मंच’ के अध्यक्ष डॉ. रामदयाल मुंडा ने अपने समापन भाषण में सभी आदिवासी लेखकों से अपनी अद्भुत संस्कृति और पहचान पर गर्व करने के लिए अपील की और कहा कि वे अपनी कला और संस्कृति तथा आदिवासी समाज को नष्ट होने से बचाएं। उन्होंने इस बात की ओर भी यह लक्ष्य किया कि यह आदिवासी संस्कृति जो सतत् विकास और सहअस्तित्व तथा सच्ची जनतांत्रिक व्यवस्था पर अधिक जोर देती है। यह संस्कृति पूरे विश्व के लिए एक मॉडल प्रस्तुत कर सकती है। साथ ही साथ हमें प्रगति की शक्ति को भी पहचानना जरूरी है और उसे उपयोग करना चाहिए। अंत में उन्होंने अपनी आदिवासी पहचान का परिचय एक मुंडारी लोकगीत गाकर दिया।

मुख्य अतिथि के रूप में डॉ. एच.सी. बोरालिंगय्या जो कन्नड़ यूनीवर्सिटी समाजशास्त्रा के डीन क्मंद हैं, ने कहा कि आदिवासी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। डॉ. बोरालिंगय्या ने यह भी बताया कि कर्नाटक में कुल 49 आदिवासी समूह हैं, लेकिन आज तक केवल 8 या 9 को ही पहचान मिली है।

डॉ. तेजस्वी कट्टीमनी जो कन्नड़ विश्वविद्यालय सिंडिकेट के सदस्य हैं ने कर्नाटक के आदिवासियों की स्थिति पर प्रकाश डाला।

डॉ. कोरीगौड़ा बेचानल्ली निदेशक अध्यनंगा कन्नड़ विश्वविद्यालय ने अतिथियों का स्वागत किया। उन्होंने आदिवासियों को एक होकर अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ने को कहा।

श्रीमति रमणिका गुप्ता ने निम्नलिखित प्रस्ताव पढ़े जो सभी प्रतिनिधियों और श्रोताओं ने सर्वसम्मति से पारित किए।

1. भारत सरकार से यह अनुरोध किया जाता है कि समानार्थी जनजातीय नामों को मान्यता देने हेतु विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा भेजी गई सिफारिशों को स्वीकृत कर भारतीय संविधान के आर्टिकल 342 (2) में संशोधन करें। तमिलनाडु संदर्भ में संविधान में दर्ज कुरुमांस के बदले कुरुमांस, कुरुमा, कुरुम्बा, कुरुम्बन, कुरुम्बंस, कुरुम्बार को, कर्नाटका में गोंड के बदले गोंड, कुरुबा, धांगर (केवल बिदार और गुलबर्ग जिला में) आदि को, मेदा के बदले मेदा, मेदार, बुरुड़, गोरीगा आदि, टोकरेकोली के बदले टोकरी कोली, हरीकंता, कोली, बेस्ठा, कबालिंगा, सुनागर आदि तथा नायक के बदले नायक, तलवा, परिवार आदि को दर्ज करें। केंद्र सरकार द्वारा उन आदिवासियों पर लगाए गए क्षेत्राय प्रतिबंध समाप्त किए जाएं जो दूसरे क्षेत्रा में प्रवास कर गए हैं।

2. भारत सरकार को हर राज्य को विश्वविद्यालय में आदिवासी अध्ययन तथा शोध विभाग की स्थापना सुनिश्चित करनी चाहिए।

3. ये सिफारिश की जाती है कि भारत सरकार दूसरे राज्यों में एक या अधिक विश्वविद्यालयों की स्थापना करे।

4. आदिवासियों के आरक्षण का प्रतिशत राज्य और केन्द्र में बढ़ाया जाए।

कन्नड़ विश्वविद्यालय के उपकुलपति डॉ. एच.जे. लक्प्पागौड़ा ने, महात्मा बामा गोंडेश्वर जो कर्नाटक के बिदार जिला के गोंड आदिवासी थे का ‘मोमेन्टो’ तथा ‘प्रमाणपत्रा’ सेमिनार में आए सभी प्रतिभागियों को दिया। उन्होंने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि कन्नड़ विश्वविद्यालय शीघ्र ही विश्वविद्यालय में एक आदिवासी अजायबघर तथा पुस्तकालय स्थापित्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र करेगा और आदिवासी लेखकों की एक वर्कशाप भी बुलाएगा। उन्होंने उन सभी आदिवासी लेखकों एवं कलाकारों का स्वागत किया जो आदिवासी अध्ययन विभाग के विकास में अपना सहयोग दे रहे हैं। डॉ. के.एम. मित्रा जो सम्मेलन के संगठन सचिव थे ने धन्यवाद ज्ञापन किया।

त प्रस्तुति : के. एम. मैत्रा