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रफां : आयोजन - 2004

रफां : आयोजन - 2004

  • आयोजन-2004 : अखिल भारतीय आदिवासी साहित्यिक मंच (अभासम-3)
  • रमणिका फाउंडेशन द्वारा संयोजित
  • पूर्वी राज्यों का प्रथम क्षेत्राय सम्मेलन
  • 9-10 जून 2004, स्थान : थियोलाजिकल सेमीनार सभागार, जी.ई.एल. चर्च, रांची

बिरसा के शहादत दिवस 9 जून 2004 की प्रातः कार्यक्रम शुरु हुआ। सबसे पहले खड़िया भाषा की कथाकार, कवियित्रि एवं चिन्तक डॉ. रोज केरकेट्टा ने अपने स्वागत भाषण में अतिथियों का स्वागत करते हुए कहाµ‘‘बिरसा मुंडा, सिद्दू-कान्हू, तिलका-मांझी जैसे आदर्शों को इतिहास या साहित्य में जगह नहीं दी गयी। झारखंड की जष्मीन, खनिज संपदा और यहां का भौगोलिक स्तर हमेशा से आकर्षण का केंद्र रहा है। इसलिए हमारी सदियों पुरानी संस्कृति को अक्षुण्ण बनाये रखने की जष्रूरत है। झारखंड की भी भाषाएं जीवंत हैं।’’

इसके बाद डॉ. मित्रा ने बिरसा मुंडा की पुण्यतिथि के इस अवसर पर उनकी तसवीर पर माल्यार्पण कर कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए कहाµ‘‘भावी पीढ़ी को हमें बताना होगा कि इस धरती में हमारी भूमिका क्या है। आदिवासियों की पहचान जल-जंगल-जष्मीन यानी प्रकृति से है। और प्रकृति पर हमले के लिए सभ्य समाज जिष्म्मेवार है न कि आदिवासी समाज। आदिवासी साहित्यकारों के सामने आज इसी पहलू को उजागर करने की चुनौती है। इस आयोजन द्वारा आदिवासी लेखकों को एक मंच पर लाए जाने से सामाजिक-सांस्कृतिक शक्तियों का सृजन होगा। आदिवासियों का दलितों की तरह कोई नेटवर्क नहीं है, जिस कारण आज आदिवासी समुदाय की घोर उपेक्षा की जा रही है। इसलिए आदिवासियों का भी नेटवर्क होना चाहिए। आज आदिवासी समुदाय अपना मूल स्वरूप खोता जा रहा है। आदिवासियों का धर्म परिवर्तन होने के कारण बहुत ज्ष्यादा बिखराव हुआ है। हमें आदिवासियों को अखिल भारतीय आदिवासी साहित्यि मंच के माध्यम से जोड़ना होगा तभी आदिवासियों का विकास होगा। आदिवासियों को बिरसा के आदर्श को अपने जीवन में उतारना चाहिए।’’

रमणिका गुप्ता (रमणिका फांउडेशन की अध्यक्ष तथा अभासम की को-आर्डिनेटर) ने अपने बीज भाषण में कहाµ‘‘संगठित रूप में आदिवासियों के सामने नहीं आने के कारण लोग उन्हें वैसा महत्व नहीं देते। हमें आदिवासी साहित्य को दलित साहित्य की तरह आंदोलन के रूप में बढ़ाने की जष्रूरत है। सर्वहारा की बात, प्रकृति की रक्षा और आदमियत इसी साहित्य में है। आदिवासी साहित्य का अनुवाद कर हमने तथाकथित मुख्यधारा के साहित्यकारों को यह बताया है कि आदिवासी साहित्य समृद्ध है। हमारी संस्था आदिवासियों का सामूहिक नेतृत्व विकसित करने हेतु प्रयासरत हैं। हमें बिखरी सोच को एक सूत्रा में पिरोना है। आदिवासी साहित्य के जष्रिए इस समाज को अभिव्यक्ति की ताकष्त मिलेगी जिससे इन जमातों का सशक्तीकरण संभव हो पायेगा। आदिवासियों में अनेक प्रखर लेखक, चिंतक, व साहित्यकार हैं।

‘‘सरकार स्थानीय भाषा के विकास के नाम पर लोगों को छल रही है। झारखण्ड सरकार के द्वारा दो करोड़ रुपये की पुस्तकें ख़रीदी जानी थीं लेकिन सरकार ने स्थानीय व आदिवासी लेखकों की किताबें ख़रीदने की बजाय एक करोड़ 55 लाख रुपये की पुस्तकें प्रभात प्रकाशन से ख़रीद लीं जो संघी विचारधारा का है। इतिहासकारों ने आदिवासियों को हमेशा उपेक्षित रखा है। महात्मा गांधी से पहले झारखंड के जतरू उरांव ने अंग्रेजषें के खिलाफष् सत्याग्रह किया था परंतु किसी इतिहासकार ने इसका जिष्क्र तक नहीं किया। अंग्रेजषें के खि़लाफष् पहली लड़ाई भारत के आदिवासियों ने ही लड़ी जो एक सौ वर्ष तक चली। संताल हुल हुआ-सिद्धू कानू व बिरसा मुण्डा के नेतृत्व में लड़ाई जारी रही। ये किसान विद्रोह के साथ-साथ आजषदी की लड़ाई थी लेकिन इतिहासकारों ने 1857 को आजषदी की लड़ाई कहा जो वास्तव में राजाओं, महाराजाओं व बादशाहों तथा नवाबों ने अपने स्वार्थ हित अपना-अपना राज बचाने के लिए लड़ी थी अंग्रेजषें से देश को मुक्त कराना उनका लक्ष्य नहीं था।’’

वासवी (अभासम की सहायक सचिव) ने मंच के जन्म से लेकर सम्मेलन के आयोजन तक की जानकारी दी। इस क्रम में उन्होंने साहित्य अकादमी की गतिविधियों पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने बतायाµ”आदिवासी कथाकार, लेखक, कवियों आदि को एक मंच पर लाने की कष्वायद रमणिका फांउडेशन द्वारा गत तीन साल से चल रही है। उन्होंने कहा कि बहुत से आदिवासी अपनी भाषा में नहीं लिखना चाहते। साहित्य अकादमी द्वारा सभी भाषाओं की पुस्तकों का प्रकाशन किया जाता है लेकिन आदिवासी लेखकों की लिखी पुस्तकों की उपेक्षा की जाती है। निर्मला पुतुल की किताब साहित्य अकादमी ने रमणिका फांउडेशन से मिलकर प्रकाशित करने का वायदा 1 जून को दिल्ली में हुए आदिवासी सम्मेलन में किया था लेकिन रांची की एक लेखिका और पटना और दिल्ली के जाने माने कुछ लेखकों ने पुतुल के द्विभाषी संकलन (हिन्दी और संताली) का विरोध किया तब रमणिका फांउडेशन ने इस पुस्तक को प्रकाशित किया।’’

सपन प्रमाणिक (पश्चिम बंगाल) ने कहाµ‘‘संघर्ष के बाद मंजिष्ल मिलती है। इस तरह के आयोजन से आदिवासी साहित्यकारों को एकजुट करने में सफलता मिलेगी।’’

कार्यक्रम में भाग लेने दिल्ली से रांची पहुंची अभासम की उपाध्यक्ष डॉ. ग्रेस कुजूर ने कहाµ”आज आदिवासियों को मुख्यधारा से जोड़ने की बात कही जा रही है, लेकिन मुख्यधारा के दोनों किनारे अपनी बग़लों को काटते हुए निकल जाते हैं। ऐसे में हम मुख्यधारा से कैसे जुड़ पायेंगे। मुझे विश्वास है कि झारखंड की राजधानी रांची में इस आदिवासी साहित्य सम्मेलन के आयोजन से दूरगामी परिणाम सामने आयेगा। आदिवासी भाषा में जो भी लिखा जाता है उसका हिन्दी अनुवाद बहुत जष्रूरी है। प्राथमिक विद्यालयों में भी स्थानीय भाषा की पढ़ाई होनी चाहिए ताकि भाषायी संस्कार व संस्कृति बनी रहे।’’

बिहार विधानसभा के पूर्व उपाध्यक्ष एवं ‘हो’ भाषी लेखक देवेन्द्रनाथ चंपिया ने विशिष्ट अतिथि के रूप में बोलते हुए आयोजन के लिए श्रीमती गुप्ता के प्रयासों की सराहना की। उन्होंने कहाµ”अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आदिवासी इंडिजिनियस कहलाते हैं। संविधान लागू होने पर उन्हें अनुसूजित जनजाति कहा गया। हमारी पहचान को संविधान के आधार पर भी बदलने की कोशिश की गई और हमें जनजाति कहा गया, जबकि हमारे बीच जाति जैसी कोई बात नहीं है। आदिवासियों को पहले जनजाति बनया गया, अब गिरिजन और वनवासी कहकर उनके मूल पहचान पर ही संकट खड़ा किया जा रहा है। औद्योगिक संस्कृति के कारण यहां उपनिवेशवाद बढ़ा है। इस उपनिवेशवाद के कारण आदिवासियों के भाषा, संस्कृति, धर्म तथा साहित्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। साहित्य जगत में हो भाषी लेखकों की संख्या 20 है, जबकि प्रकाशित पुस्तकों की संख्या 15 है। जिनमें पोपो, रघुवंश, सराजुड, सागन, बहाबुरु-बोगाबरु आदि प्रमुख हैं। शिक्षण संस्थाओं के पाठ्यक्रम में अभी तक ‘हो’ भाषा की पढाई नहीं शुरू की गई। सरकार द्वारा ‘हो’ भाषा की पढाई शुरू की जाए। ‘हो’ भाषा में शिक्षित लोगों को रोजष्गार मुहैया कराए जाएं। जेपीएससी परीक्षा में हो भाषा को शामिल किया जाना चाहिए।’’

संताली भाषा परिषद के अध्यक्ष दिगंबर हांसदा ने कहाµ‘‘आदिवासी संस्कृति लोगों को जोड़नेवाली है तथा ये आर्यों से पहले की है। हमारी भाषा, संस्कृति एवं इतिहास की पुस्तक कभी नहीं लिखी गई है। वेद, पुराण, रामायण आदि आर्यों के द्वारा लिखित साहित्यों में आदिवासियों को अहमियत नहीं दी गई। कभी आदिवासियों को आदमी के रूप में देखा नहीं गया। इसलिए आज हमें स्वयं अपना साहित्य लिखना होगा।’’ उद्घाटन सत्रा का संचालन अभासम की स्वागत समिति के सचिव श्री डेमका सोय ने किया।

भोजनोपरान्त ‘आदिवासी संस्कृति’ की एकरूपता’ पर अपराह्न तीन बजे प्रथम सत्रा शुरू हुआ, जिसकी अध्यक्षता डॉ निर्मल मिंज ने और संचालन ‘झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा’ त्रौमासिक पत्रिका की संपादक सुश्री वंदना टेटे ने किया।

श्रीमती वंदना टेटे ने कहाµ‘‘खड़िया भाषा में लेखकों की संख्या लगभग 30 है। इस भाषा में लगभग 10 पुस्तकें व दो पत्रिकाएं प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें सिन्कोम सुलो, जुझेर डांड, प्रेमचंद : उड़कोय, हेपड् आवकिंड बेर, खड़िया संस्कृति रोड़ाः आदि पुस्तकें, सातोःड़ व तारदीः पत्रिका शामिल है। खड़िया साहित्य समिति व प्यारा केरकेट्टा फाउंडेशन खड़िया भाषा पर कार्यरत दो महत्वपूर्ण संस्थाएं हैं। आज खड़िया साहित्य के लेखकों की कमी, प्रकाशन की समस्याएं, प्रकाशित पुस्तकों के प्रचार-प्रसार की कमी, लुप्त होती खड़िया भाषा-संस्कृति आदि प्रमुख चुनौतियां हैं।’’

‘सेंड सेतेगा जैमकियजिक’ के संपादक नवीन मुंडा ने कहाµ‘‘मुंडारी भाषा में लेखकों की संख्या लगभग 40 है व मुंडारी पुस्तकों की संख्या लगभग 60 है, जिनमें इनसाइक्लोपीडिया मुंडारिका, मतुराः कहानी, काव्य संकलन मुंडा दुरांग व बांसुरी बज रही है आदि प्रमुख हैं। मुंडारी साहित्य के विकास में सेडेंग सेता प्रकाशन मंडली, मुंडा जगर नितिर सभा, मुंडा सभा व होड़ो सेड़ा समति प्रमुख हैं। आज शहरों में रह रहे कई मुंडा परिवार मुंडारी का प्रयोग नहीं कर रहे हैं।’’

बिहार के कुड़ुख भाषा के शोधार्थी कुड़ख लिपि के निर्माणकर्ता डॉ. नारायण उरांव ने कुडुख लिपि पर हुए शोध का ब्योरा देते हुए कहाµ”तीन भाषाएं पढ़ना जष्रूरी हैंµअंग्रेजष्ी, हिन्दी और अपनी मातृभाषा। यही फार्मूला शिक्षा के लिए स्कूलों में लागू होना चाहिए।“ इग्नासिया टोप्पो खड़िया साहित्यकार एवं इतिहासकार ने विस्तृत रूप से बतायाµ”खड़िया भाषा की उपेक्षा की गई है जबकि उसमें काफष्ी साहित्य रचा जा चुका है।’’

जी.वी.पी. हेम्ब्रम ने हेल्थ कल्चर के बारे में कहाµ”जड़ी-बूटियों के ज्ञान के बारे में आदिवासियां से बेहतर और कोई नहीं जानता। इन्हें बचाना बेहद जष्रूरी है।“

डॉ. निर्मल मिंज जो गोस्सनर कॉलेज, रांची के संस्थापक प्राचार्य व प्रमुख लेखक हैं ने कहाµ‘‘कुडुख भाषा में लेखकों की संख्या लगभग 40 है व इस भाषा में प्रकाशित पुस्तकों की संख्या लगभग एक सौ है। इस भाषा में दो पत्रिकाएं भी प्रकाशित होती हैं। प्रमुख पुस्तकों में कुडुख प्रकला, चुरकी, डहरे, कुडुख सन्निखिरि, मुंता पुंप झूंपा आदि हैं। डॉ. मिंज के अनुसार लेखकों की कमी है। लिखित पुस्तकों के प्रकाशन की समस्या, आर्थिक संसाधन की समस्या, भाषा में एकरूपता की कमी, कुडुख भाषा के व्यवहार में कमी, समाज में सहयोग की कमी आदि प्रमुख समस्याएं हैं। आदिवासी भाषा अकादमी का सुचारू रूप से गठन, आदिवासी भाषा साहित्य के प्रकाशन के लिए सरकारी आर्थिक सहायता, प्राथमिक स्तर की पढ़ाई कुडुख में किए जाने आदि की व्यवस्था होनी चाहिए।“

द्वितीय सत्रा साहित्य, संस्कृति, इतिहास व मिथक पर हुआ। इसकी अध्यक्षता अगुस्टीन केरकेट्टा ने की और इसका संचालन दयामनी बारला ने किया।

श्री गोमास्ता प्रसाद (पश्चिमी बंगाल) ने कहाµ‘‘आदिवासी संस्कृति सबसे अलग है लेकिन ये लुप्त हो रही है। हमारे विश्वास, धर्म, रहन-सहन, रीतिरिवाज सबसे अलग किंतु अनूठे हैं। आज हमारी लिपि और भाषा दोनों को बचाने की जरूरत हैं। इन्हें बचाने से ही हमारी संस्कृति और इतिहास को बचाना सम्भव है।’’

रमणिका गुप्ता ने कहाµ”हमारी आदिवासी संस्कृति को बाहरी लेखकों ने अपने तरीकषें से दुनिया के सामने रखा है। उन्होंने हमारे इतिहास को भी दर्ज नहीं किया। जहां हमारे बारे में लिखा तो हमारा विकृत रूप ही दिखाया। हनुमान को पूंछ लगा दिया, हमारे सिर िंसंग लगा दिए। धर्म शास्त्रों में हमें असुर बताया गया है। हमें इसके खि़लाफष् लड़ने की जरूरत है और जरूरत है, आदिवासियों को स्वयं अपना इतिहास खोजने और लिखने की।’’

प्रभात ख़बर के विशिष्ट संपादक हरिवंश जी ने आदिवासी साहित्य को बढ़ाने में मदद की पेशकश की।

मुंडारी लेखक व कवि श्री रेमिस कुन्डुलना ने कहाµ‘‘मुंडारी भाषा और संस्कृति और इतिहास की खोज की जाए तो इसके चिन्ह न केवल झारखंड में बल्कि देश के कई हिस्सों में मिलते हैं।’’ द्वितीय सत्रा के अपने अध्यक्षीय भाषण में अगुंस्टीन केरकेट्टा ने कहाµ‘‘आदिवासी संस्कृति और इतिहास में हमें अनावश्यक बाहरी हस्तक्षेप को रोकना होगा।’’

सत्रा समाप्ति पर ‘विकास : बंदूक की नाल से’ फिल्म दिखायी गई। इसका आयोजन ‘अखड़ा’ की तरफष् से साथी मेघनाथ और बीजू टोप्पो ने किया।

रात्रि में भोजनोपरान्त कवि गोष्ठी हुई। इसकी अध्यक्षता मोरा जी देवगम ने की और इसका संचालन महादेव टोप्पो ने किया। इस कवि गोष्ठी में पश्चिम बंगाल के गोमास्ता प्रसाद तथा झारखंड के नारायण सुरीन, डांगूसूरीन, श्याम चरण टूडू, एस.सी वीरुली, प्रो. बी.पी. पिंगुआ, महादेव टोप्पो, डोबारो विररुली व शिवलाल किस्कु ने कविता पाठ किया। कवियों ने अपनी कविताएं अपनी-अपनी भाषाओं में पढ़ीं, जिनका अनुवाद हिन्दी में किया गया। रमणिका गुप्ता ने निर्मला पुतुल की ‘उठो बिटिया मुर्मु’ कविता पढ कर सुनायी और महादेव टोप्पो ने सरिता बड़ाईक की कविता पढी।

सम्मेलन का तीसरा सत्रा 10 जून 2004 को प्रातः 10 बजे ‘लोक साहित्य व समाकालीन साहित्य की बाह्य और आन्तरिक चुनौतियां’ विषय पर बातचीत से शुरू हुआ जिसकी अध्यक्षता और संचालन इग्निसिया टोप्पो ने किया।

उपन्यासकार मार्टिन टोप्पो ने कहाµ”आज आदिवासी समुदाय में युवाओं की रुचि साहित्य से हट रही है। इसलिए युवाओं को लेते हुए हमें साहित्य को बचाना है क्योंकि साहित्य के बिना हम अभिशाप में जी रहे हैं।“

शिवलाल किस्कु ने कहाµ‘‘झारखंड का साहित्य खान में छुपे सोने की तरह है। इसको तराशने की जष्रूरत है।’’

कृष्ण चन्द्र टुडू ने कहाµ”विभिन्न जनजातीय भाषाओं की पांडुलिपियों का प्रकाशन नहीं हो पा रहा है। आदिवासी साहित्य को बचाने के लिए एक अलग मापदंड का होना बहुत जष्रूरी है, ताकि आदिवासी साहित्य को पाठ्यक्रम में लागू किया जा सके। आदिवासी लोक साहित्य में अनेक विद्वान हैं।’’ संताली भाषा के लेखकों की संख्या पांच सौ से अधिक व प्रकाशित पुस्तकों की संख्या 10 हजार से अधिक है। संताली में 15 पत्रिकाएं प्रकाशित हो रही हैं। प्रमुख संताली पुस्तकों में जुरी खातिर, ओनोड़हे बहा डलुआ, तिरियो तेता, खेरवाड़ बोंशाधर्म पोथी, आषाढ़ बिनती, अखड़ा थुती, मायाजाल आदि प्रमुख हैं। संताली साहित्य के समक्ष लिपि प्रमुख समस्या है।’’

डॉ. बी.पी. केसरी ने कहाµ”पूरे विश्व में जहां भी क्रांति हुई है उसमें बुद्धिजीवियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। आज भी जनवादी लड़ाई का सबसे सशक्त हथियार लोक साहित्य या लोकभाषा ही हो सकती है, क्योंकि हर वर्ग के लोग इसे आसानी से समझते हैं। हमें झारखंडी चेतना का व्यापक विकास करने की जष्रूरत है। झारखंड में जितनी भी भाषाएं हैं उन सभी को मिलकर अपनी समृद्धि की लड़ाई लड़नी होगी। इसे बाहरी दबाव से भी बचा कर रखना होगा। अगर आदिवासी लोक साहित्यकार दस-पंद्रह वर्षों तक अपने साहित्य को समृद्ध बनाने के लिए संघर्ष करें तो ही सभी आदिवासी भाषाओं की अपनी-अपनी पहचान बनाने का सपना साकार हो पायेगा। अभासम जैसे आयोजन की बहुत आवश्यकता है और यह सम्मेलन आदिवासी संस्कृति के लिए ऐतिहासिक कष्दम है।“

महादेव टोप्पो (कथाकार व चिंतक, कोलकाता) ने कहाµ‘‘भाषा का सवाल भी आदिवासियों की अस्मिता से जुड़ा हुआ मामला है। हमें अपनी भाषा की रक्षा करनी होगी। आज देश में जो आदिवासी संस्कृति के अस्तित्व की जागृति आई है, यह ख़ुशी की बात है। हमारे बीच पारदर्शिता और एकजुटता ही हमें मंजिष्ल दिलाएगी।“

बीर सिंह बोदरा ने साहित्यिक विसंगतियों को दूर करने के लिए झारखंड की सभी भाषाओं व लिपियों को साथ मिला कर लड़ाई लड़ने को कहा।

ईश्वर सोरेन (संथाली भाषा के लेखक तथा नाटककार एवं रंगकर्मी) ने कहाµ”आदिवासियों को अपने लोक साहित्य को बचाने के लिए आज तीर-धनुष नहीं बल्कि दिमाग़ से लड़ाई लड़ने की आवश्यकता है। आदिवासियों को जितना हो सके अपनी भाषा का प्रयोग करना चाहिए। लोग यह समझ नहीं पा रहे है कि आखि़र आदिवासी कौन हैं। आदिवासीµहो, मुंडा, संताली, उरांव किस रूप में अपना परिचय दें?’’

डॉ. गिरधारी राम गोंझू ‘गिरीराज’ (नागपुरी भाषा के विशेषज्ञ) ने कहाµ”अगर हम सभी आदिवासी भाषाओं का अध्ययन करें तो इससे यह पता चलेगा की उन भाषाओं की आत्मा एक है। पहले से आदिवासियों के जितने भी इतिहास उपलब्ध हैं वे या तो अंग्रेजषें द्वारा लिखे गए हैं या फिर मुग़लों द्वारा। आदिवासियों का उनके द्वारा लिखा गया इतिहास ग़ैर आदिवासियों की दृष्टि से लिखा गया है। आज हमें ख़़ुद से आदिवासी लोकसाहित्य का दस्तावेजष्ीकरण करके उनके मूल इतिहास को उजागर करने की जष्रूरत है।“

एम. केरकेट्टा (खड़िया भाषा के लेखक) ने कहाµ”खड़िया भाषा को अन्य नागपुरी भाषाओं की तरह महत्व नहीं दिया जा रहा जिस कारण यह भाषा उपेक्षित होती जा रही है।“

दयामनी (झारखंड; पत्राकार एवं एक्टीविस्ट) ने कहाµ”साहित्य के विकास व संघर्ष के लिए अपने आदिवासी समाज के भावनात्मक सहयोग की भी जष्रूरत है और जष्रूरत है आदिवासी लेखिकाओं को तलाशने की, तभी हम इस चुनौती का मुकषबला कर सकेंगे। साहित्य में महिलाओं की भूमिका के बिना साहित्य जिंदा नहीं रह सकता है।“

मुरूल केरकेट्टा ने खड़िया भाषा के प्रति चिंता व्यक्त की व इसके विकास की गति बढ़ाने का आह्नान किया।

शरण उरांव ने कहाµ‘‘आदिवासियों की भाषा मिटती जा रही है। अगर हम अपनी भाषा को बचाने में कामयाब हो गए तो हम अपने साहित्य को बचाने में भी कामयाब हो जाएंगे। आज आदिवासी समाज आधुनिकता की दौड़ में इस प्रकार घुलमिल गया है कि हमारी पहचान खोने का ख़तरा उत्पन्न हो गया है। हमें इस बात पर गहरा दुख है कि झारखंड के गठन के तीन वर्ष से ज़्यादा बीत जाने पर भी स्कूल तथा कॉलेजों में जनजातीय भाषाओं की पढ़ाई ठीक प्रकार से नहीं हो पा रही है। स्कूलों में तो हमारी भाषाओं में पढ़ाई शुरू ही नहीं की गई। हमें एक मंच तैयार करना होगा जिसके माध्यम से आदिवासी लेखकों की पुस्तकों को प्रकाशित किया जा सके।’’

सरिता बड़ाईक ने झारखंड की नारी की समस्या, उनके परिवेश, परंपरा व संस्कृति पर अपने विचार व्यक्त किए।

श्री सुरेश सलील (समीक्षक, कवि और कथाकार, दिल्ली) ने कहाµ‘‘निर्मला पुतुल की नई काव्य पुस्तक ‘अपने घर की तलाश’ आदिवासी समाज व संस्कृति के नवजागरण की दिशा में एक ऐतिहासिक कष्दम है। निर्मला पुतुल का काव्य-संग्रह नारी संवेदना की विश्व की समकालीन रचना है।“

डॉ. के एम. मैत्रा ने नागपुरी को संपर्क भाषा के रूप में विकसित करने का सुझाव दिया। साथ ही झारखंड में आदिवासी विश्वविद्यालय की स्थापना कर यहां की आदिवासी कला-संस्कृति, साहित्य, रीति-रिवाजों पर शोध करने की जष्रूरत पर बल दिया।

वासवी (रमणिका फांउडेशन की कार्यकारणी की सदस्या व पत्राकार) ने कहाµ”तीन-तीन राज्यों के आदिवासी रचनाकार एक मंच पर इकट्ठा होकर एक-दूसरे को जान पाए और उनकी रचनात्मक क्षमता से अवगत हुए। दूसरी बड़ी बात यह कि इससे नेटवर्किंग में भी महत्वपूर्ण सफलता मिलेगी। आज ‘हो’ भाषा में लिपि को लेकर जो विवाद पिछले कई वर्षों से चल रहा था, उसे सुलझाने के लिए भी आज एक आम सहमती बनी है, जो सम्मेलन की प्रमुख सफलताओं में से एक है। जहां तक द्वितीय भाषा का सवाल है तो जनजातीय भाषा विभाग में जिन नौ भाषाओं की पढ़ाई की जाती है, उन्हें मिलाकर ही दूसरी राजभाषा बनाई जाए। झारखंड का संघर्ष पूरी सांस्कृतिक इकाई के लिए था परंतु सिफर्ष् बिहार से अलग किए गए 18 जिष्लों को मिला कर झारखंड राज्य का गठन राजनीतिक कुचक्र है, जिससे हमारी सांस्कृतिक और भाषिक एकरूपता की मुहिम बंट गई है।’’

मंगरा कुजूर ने साहित्य व भाषा के विकास के मार्ग में आने वाली बाधाओं पर चर्चा की व कहाµ‘‘भाषा में रुचि लेकर ही उसमें क्रांति संभव है।’’

अनिता मुंडा ने कहाµ”दूसरे समुदाय की बातों को भी अपनाने पर बल दिया जाए।“

बासंती ने कविता सुनाई।

सुनील मिंज ने सम्मेलन की सराहना की। उन्होंने अनुरोध कियाµ”अभिभावक अपने बच्चों को अपने समाज की भाषा जष्रूर सिखाएं।“

अजय तिर्की ने अपनी भाषाआें में साहित्य रचने पर जषेर दिया।

निर्मला पुतुल ने स्त्रा के प्रति सही दृष्टिकोण अपनाने पर बल दिया।

जेवियर कुजूर ने कहा कि आदिवासी साहित्य की समृद्धि एवं विकास के लिए मेरे सुझाव हैंµसामाजिक स्वीकार्यता प्रदान करना, लिपि का प्रसार, लोकप्रिय बनाएं, आदिवासी लेखक संघ व प्रकाशन समूह का गठन किया जाए, आदिवासी भाषाओं में इतिहास लेखन किया जाए, आदिवासी भाषा सहित्य एवं अन्य झारखंडी भाषाओं में एकरूपता-समरूपता लाई जाए, आदिवासी राजभाषा के लिए झारखंडी भाषाई क्षेत्राय भूगोल के अनुसार भाषाई स्वायत्तता कषयम की जाए, झारखंडी भाषा साहित्य एकादमी का गठन किया जाए, आदिवासी भाषाओं को शिक्षा-साहित्य के साथ-साथ मीडिया और सरकारी सूचना के स्तर पर स्थापित करने के लिए राजनीति तैयार की जाए, आदिवासी भाषा और शिक्षा नीति में लोकगीत, लोककथा, लोकसंस्कृति और लोकइतिहास को शामिल किया जाए। झारखंड सरकार पर राजनीतिक दबाव बनाया जाए, झारखंडी शिक्षा नीति में मातृभूमि और मातृभाषा की रक्षा करना हरेक झारखंडी का परम धर्म और नागरिक कर्त्तव्य हैµऐसी शिक्षा दी जाए। पूर्व के झारखंडी भाषा-साहित्य सम्मेलन या परिषद द्वारा लिए गए प्रस्तावों को जोड़ा जाए।

डॉ. निर्मल मिंज ने अपने अध्यक्षीय भाषण के साथ एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया जिसे सर्वसम्मति से सम्मेलन में उपस्थित प्रतिनिधियों ने पारित किया। (प्रस्ताव अलग से नीचे दिया जा रहा है)

रमणिका गुप्ता ने कहाµ‘‘आदिवासियों की अस्मिता, आत्मसम्मान, अवसरों की समानता के लिए फेडरेशन प्रतिबद्ध है। हम सरकारी या विदेशी संस्थाओं से फण्ड नहीं लेते। आपस में ही मिलजुल कर आयोजन करते हैं। साम्प्रदायिक शक्तियों की सरकार का साथ तो हमें कतई नहीं चाहिए। रमणिका फांउडेशन अभासम के माध्यम से आदिवासी साहित्य को सशक्त करने का प्रयास जारी रखेगा। हर क्षेत्रा में इसी तरह के आयोजन करके आदिवासी रचनाकारों को एकजुट किया जाएगा तथा उन्हें एक मंच प्रदान कर मुद्दों एवं समस्याओं को सामने लाने का मौकष दिया जाएगा ताकि उनकी अभिव्यक्ति की ताकष्त विकसित हो और वे सरकारी नीतियों को अपने मन मुताबिक़ प्रभावित करने में सफल हो सकें। जहां तक द्वितीय भाषा का सवाल है इस मुद्दे पर हम झारखंड सरकार का पुरजोर विरोध करते हैं और झारखंड की सभी भाषाओं को द्वितीय भाषा का स्तर देकर प्रोत्साहित करने की मांग करते हैं।’’

नारायण भगत ने कहाµ‘‘आदिवासी जनजातियों को जो संवैधानिक दर्जा मिला है उसका उन्हें उपयोग करना चाहिए। जिस प्रकार संस्कृत के लिए मध्यमा और उर्दू के लिए सरकार ने अलग बोर्ड बनाया है उसी प्रकार सरकार ने झारखंड मेंं कुड़ूख, संताली, मुण्डारी, हो, खड़िया व नागपुरी आदि भाषाके लिए अलग से बोर्ड क्यों नहीं बनाए? जनता से सम्पर्क रखने के लिए और उनकी भाषा के विकास के लिए यह जष्रूरी है कि सभी सरकारी अधिसूचनाएं जनजातीय भाषाओं में भी निर्गत की जाए।’’

डॉ. रोज केरकेट्टा ने कहाµ‘‘साहित्य जीवन के हर क्षेत्रा में समाहित है। साहित्य जीवन को प्रतिफलित करता है। साहित्य के माध्यम से हम अपने जीवन के मूल्यों को स्थापित करते व उनकी रक्षा करते हैं। लोक साहित्य व समकालीन साहित्य की बाह्य व भीतरी चुनौतियां विषय पर आज विभिन्न वक्ताओं व विद्वानों ने चर्चा की। आदिवासी जनजातियों के सभी लेखक, कथाकार और कवि साहित्य जगत से जुड़े अन्य लोगों से उनकी भाषा व साहित्य को जानें, तो वे उनके सहयात्रा हो सकते हैं। आज समाज की सड़ी-गली परंपरा, जिसमें स्त्रा को दोयम दर्जे से बांध दिया है, को तोड़ने की जष्रूरत है। साथ ही ‘हो’, खड़िया, मुंडा, संताली, नागपुरी व अन्य सभी जनजातीय भाषियों को एकजुट होकर आदिवासी अस्मिता की रक्षा करने के लिए आगे आना होगा। इसके सम्वर्द्धन के लिए झारखंडी भाषा परिवार के संयुक्त आंदोलन की आवश्यकता है।’’

प्रस्ताव

आज दिनांक 10.6.04 को रांची में सम्पन्न अखिल भारतीय आदिवासी साहित्यिक मंच (रमणिका फाउंडेशन द्वारा को-ऑर्डिनेटेड) के पूर्वी राज्यों के सम्मेलन के प्रतिनिधि यह महसूस करते हैं कि ”आदिवासी सांस्कृतिक एवं साहित्यिक एकरूपता के विषय पर अखिल भारतीय दृष्टिकोण प्रस्तुत करना कठिन तो है परन्तु आवश्यक भी है। पश्चिमी भारत में भील, गोंड, मीणा, कुड़कू आदि प्रमुख आदिवासी जातियां हैं। जनसंख्या की दृष्टि से क्रमशः भील, गोंड सबसे अधिक हैं, पर इनकी अपनी निजी भाषाओं पर मुख्यधारा की भाषाओं का इतना अधिक प्रभाव पड़ा है कि अब वे इंडो-आर्यन भाषा भाषी हो गए हैं। कुड़कू समुदाय को छोड़ बाकष्ी सब इस प्रभावित धारा में बह चुके हैं।

दक्षिण भारत (द्रविड़) के आदिवासी अपनी भाषा के मूल स्वरूप (व्तपहपदंसपजल) को बनाए रखने में असमर्थ रहे हैं। टोडा तथा कोटा आदिवासी समूहों को छोड़ अन्य आदिवासी समूह दक्षिण के तमिल, तेलुगू, कन्नड़ और मलयालम के विकृत रूप बनकर रह गए हैं।

उत्तर-पूर्व के आदिवासी अपना-अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए भाषिक आधार पर राज्य स्थापित कर खड़े होने में कामयाब हुए हैं। अरुणाचल प्रदेश तथा अन्य राज्यों में यद्यपि भाषा-साहित्य की एकरूपता स्थापित करने में कठिनाइयां आ रही हैं लेकिन वे अपना रास्ता भी निकाल रहे हैं। नागा समूह ने न्यू नागानी राजभाषा बना ली है। मेघालय के लिए खासी और गारो को मूल भाषा मानकर उन्होंने भाषा और साहित्य को स्वरूप देना आरंभ कर दिया है। मिजषेरम की राजभाषा मिजषे ही बन गई है। असम में पहले से असमिया राजभाषा थी इसलिए वहां जो रुकावटें थीं उनका हल निकालने हेतु संघर्ष हुआ और हल भी निकला। वहां बोड़ो को आठवीं सूची में शामिल करने के बावजूद अन्य आदिवासी अपनी-अपनी भाषाओं की पहचान बनाने के लिए अभी भी संघर्षरत हैं। हालांकि संताली को आठवीं सूची में ले लिया गया है लेकिन भारत के अन्य भागों में कई आदिवासी समूहों की भाषाओें को अभी मान्यता दिया जाना बाकष्ी है, जिसके लिए आदिवासी आवाजष् उठाने लगे हैं।

पूर्वी भारत तथा मध्य भारत (पश्चिम बंगाल, बिहार, उड़ीसा, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश) की आदिवासी संस्कृति और साहित्य पर बाहरी प्रभाव लगातार जारी हैं। इन राज्यों के विभिन्न आदिवासी भाषा-भाषियों ने अपनी मूल भाषाओं को जीवित रखने, उनकी साहित्यिक विधाओं को विकसित करने और पहचान बनाने का प्रयास किया है। इन भाषा-भाषियों को अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग ढंग से दमन की नीतियों के खि़लाफष् संघर्ष करना पड़ रहा है। आदिवासियों के साथ फूट डालो और राज करो की नीति आज भी बरकरार है। उरांव, मुंडा, संताल, खड़िया और हो आज भी पश्चिम बंगाल, झारखंड, उड़ीसा तथा झारखंड राज्य में विभाजित हैं। निश्चित है कि इस क्षेत्रा में आदिवासी संस्कृति और साहित्य में एकरूपता का अभियान अन्य क्षेत्रों की वनिस्पत अधिक कठिन मार्ग से गुजष्रेगा। फिर झारखंड तो तीन मूल भाषा परिवारों का संगम है। आस्ट्रिक भाषा परिवार (मुंडा, हो, संताल, खड़िया), द्रविड़ भाषा परिवार (कुडुख, मालतो कुछ मायने में गोंडी भी) और इंडो-आर्य भाषा परिवार (नागपुरी, खोरठा, कुरमाली, पंचपरगनिया) एक्र-दूसरे से लगभग दो हजार वर्षों से लेन-देन करते आ रहे हैं। इसके बावजूद अपना स्वतंत्रा अस्तित्व बनाए हुए हैं। अपनी अस्मिता बनाए रखने के लिए ये सारी भाषाएं निरंतर संघर्ष कर रही हैं। इनके सामने मुसीबतों के पहाड़ खड़े हैं। हालांकि पश्चिम बंगाल में शुरू से ही वहां की सरकार ने संताली भाषा को प्रोत्साहित कियाµस्कूलों में प्राइमरी स्तर से उसकी पढ़ाई शुरू की और उनकी ओलचिकी लिपि को भी मान्यता दी लेकिन बाकष्ी राज्यों की सरकारें इनकी भाषाओं को बचाने, विकसित करने और पनपने देने के प्रति जष्रा भी संवेदनशील नहीं हैं। ये सरकारें इनके विकास को राज्य के विकास में बाधक मानती हैं। इसलिए सरकार इन भाषाओं को छोटा मानती हैं। परन्तु सरकार को स्मरण कराना आवश्यक है कि इन क्षेत्रों की भाषाओं का अस्तित्व अखिल भारतीय परिप्रेक्ष्य में कम नहीं है। संताल समाज अकेले में एक करोड़ का दावा रखता है। कुडुख आधा करोड़ (40-50 लाख) का दावा करते हैं। अतः ये तो भाषिक राज्यों की पृष्ठभूमि में स्वयं अपना राज्य गठित करने में सक्षम हैं, बल्कि पूर्वोत्तर के राज्यों की तुलना में इस क्षेत्रा की कई भाषाएं, भाषाई आधार पर राज्य गठित करने का दावा भी कर सकती हैं। ख़ैर, इस राजनीतिक समस्या को किनारे करके आज इनकी सांस्कृतिक और साहित्यिक समस्याओं का निदान एकता, एकरूपता एवं परस्पर संवाद के स्वरूप में खोजना अनिवार्य हो गया है।

इन भाषा समूहों की सबसे बड़ी समस्या हैµएकजुट होना तथा साहित्य की रचना (मातृभाषा में) और एकरूपता के लिए आगे बढ़ने में आर्थिक अभाव। चूंकि सरकारें इन सांस्कृतिक और भाषिक समूहों को सहयोग नहीं कर रही हैं, उन्हें अलग-अलग ही रहकर संघर्ष करते हुए काम करना पड़ रहा है, अतः यहां साहित्यिक एकरूपता के लिए पहल करने में काफष्ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। इनके निदान स्वरूप निम्न बिन्दुओं पर ध्यान देने की आवश्यकता हैµ

1. भाषा की अपनी लिपि होती है। यह उसकी दृश्य पहचान है। देखते ही एक व्यक्ति समझ जाएगा यह अमुक भाषा है। अभी ये भाषाएं लिपि की समस्या में ऐसी उलझी हुई हैं कि उससे निकलकर आगे बढ़ने में कठिनाई हो रही है। बेहतर होगा इस मुद्दे पर लेखकों को लिपि की स्वतंत्राता रहे और वे एकरूपता को अपने-अपने सामने रखकर काम करें। कुडुख में इसी नीति को अपनाकर चलने का प्रयास हो रहा है। आज की पीढ़ी के लिए साहित्य, लिपि से अधिक आवश्यक है।

2. चूंकि झारखंड तीन भाषा परिवारों का संगम है (आस्ट्रिक, द्रविड़ और इंडो-आर्य) अतएव यह अनिवार्य माना जाए कि इस भाषा परिवार के अंदर आपसी संवाद, लेन-देन जारी किया जाए। उनके बीच एकरूपता के दृष्टिकोण को सामने रखकर पांच सालों तक शोध कार्य चालू रहे। अगले और पांच सालों में शोध के फलस्वरूप एकरूपता में आगे बढ़ने के लिए कौन-सी राह दिखाई देती है, उसे खोज कर एकरूपता पर पहल की जाए। इन दस वर्षों के बाद ही एकरूपता के प्रतिफल के आधार पर झारखंड में भाषा, साहित्य की नीति का निर्धारण किया जाए।

3. इस बीच यहां के आदिवासी बच्चों को क्षेत्राय स्वायत्तता सहित मातृभाषा में प्राइमरी शिक्षा दी जाए तथा एम.ए. तक इन सभी भाषाओं में पढ़ाई जारी रहे।

4. अभी झारखंड राज्य में द्वितीय राजभाषा के सवाल पर तत्काल रोक लगाई जाए। यहां के सभी क्षेत्राय और आदिवासी भाषा-समूहों द्वारा सरकार द्वारा द्वितीय राजभाषा बनाने की पहल का समुचित विरोध किया जाए।

इसके लिए झारखंड की वर्तमान नौ जन-भाषाओं के साहित्य को राज्य शिक्षा प्रणाली तथा पाठ्यक्रम में नीतिगत फैष्सला लेकर शामिल किया जाए और उनकी शिक्षा-दीक्षा जारी रहे।

5. आदिवासी लोकसाहित्य ही आदिवासियों के इतिहास को उजागर कर सकता है अतः इस ओर लेखकों का ध्यानआकर्षित किया जाए। अपनी-अपनी भाषाओं में सभी लेखकों को शोध सहित इतिहास की खोज करने एवं तार्किक ढंग से अन्य लोगों के समझने योग्य साहित्य सृजन के लिए प्रोत्साहित व प्रेरित किया जाए।

6. आदिवासी भाषाओं के साहित्य का हिन्दी में अनुवाद सहित पुस्तकें लिखीं व प्रकाशित की जाएं ताकि अन्य भारतीयों के लिए आदिवासी साहित्य मूल्यों में प्रवेश करने का रास्ता खुल जाए। इससे भूतकाल की नासमझी तथा ग़लत समझ का निदान भी होता जाएगा और ये ग़ैर-आदिवासी समाज की, आदिवासियों के प्रति मानसिकता बदलने में भी सहायक होगा। इससे परस्पर संवाद भी कषयम होगा और राष्ट्रीय तथा भाषायी एकजुटता (प्दजमतपहपजल) को भी बल मिलेगा।

7. झारखंड में मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा देने तथा इन्हीं भाषाओं में झारखंड जन-सेवा परीक्षा देने का प्रावधान तो सरकार ने कर दिया है लेकिन अभी तक अध्यादेश प्राप्त नहीं हुआ और ना ही स्कूलों में मातृभाषा में पुस्तकें प्रकाशित कर वितरित की गईं हैं। इस विषय पर सरकार आदिवासी संगठनों से राय कर कार्य करें।

8. आदिवासी भाषा एवं साहित्य अकादमी की स्थापना की जाए ताकि इसके माध्यम से नवलेखन, शोध एवं अनुवाद को प्रोत्साहित किया जा सके। उपरोक्त सभी प्रस्तावों पर सरकार तत्काल ध्यान दे और कष्दम उठाए।

9. उपरोक्त प्रस्तावों को कार्यरूप में परिणत कराने के लिए रमणिका फाउंडेशन (ब्व.वतकपदंजवत) अन्य सहयोगी संगठनों, समर्पित व्यक्तियों से सम्पर्क एवं राय कर पूर्वी राज्यों की एक तदर्थ समिति का तत्काल गठन करे और समिति के पदाधिकारियों एवं सदस्यों की घोषणा करे। जिन राज्यों के प्रतिनिधि नहीं आए उनके लिए स्थान रिक्त रखा जाए।

(प्रस्तुति : डॉ. निर्मल मिंज)

सभाध्यक्ष-समापन सत्रा

अखिल भारतीय आदिवासी साहित्यिक मंच (पूर्वी राज्य)

समापन सत्रा का संचालन महादेव टोप्पो ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन श्रीप्रकाश ने किया।