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रफां : आयोजन - 2004

रफां : आयोजन - 2004

रमणिका फाउंडेशन के सहयोग से साहित्य अकादेमी द्वारा आयोजित अखिल भारतीय आदिवासी सम्मेलन रांची आदिवासी साहित्य संस्कृति का महाकुंभ
-डॉ. महुआ माजी

रमणिका फाउंडेशन तथा अखिल भारतीय आदिवासी साहित्यिक मंच ने केंद्रीय साहित्य अकादमी के सौजन्य-सहयोग से झारखंड की राजधानी रांची में तीन दिवसीय (26-28 अप्रैल 2005) अखिल भारतीय आदिवासी साहित्य सम्मेलन का आयोजन किया जिसमें आदिवासी साहित्य और जनजीवन के विभिन्न पक्षों पर वैचारिक विमर्श हुआ। अपने तरह का यह पहला ऐसा सम्मेलन था जिसमें इतनी बड़ी संख्या में आदिवासी साहित्यकारों ने भाग लिया। यह आयोजन इतना भव्य था कि नीलगिरी की टोडा साहित्यकार श्रीमती कुर्तज वसामल्ली ने तो कह ही डाला कि पहली बार अपने आदिवासी होने का गर्व हो रहा है उन्हें।

भारतवर्ष के लिए बहुप्रचलित विशेषण ‘विविधता में एकता’ भी इस सम्मेलन की विशेषता थी। देश के विभिन्न हिस्से से आए पचहत्तर आदिवासी साहित्यकारों एवं विद्वानों ने जब अपने-अपने आलेख, कथा, कविता आदि का पाठ किया तो उनमें से निकले विविध स्वरों में एकरूपता का अद्भुत राग प्रतिध्वनित होता रहा। यह प्रमाणित हुआ कि आदिवासी संस्कृति कितनी समृद्ध है।

कार्यक्रम का उद्घाटन हिंदी के लब्ध प्रतिष्ठ साहित्यकार कमलेश्वर के हाथों होना था पर अस्वस्थता की वजह से वे आ नहीं पाए। उनके द्वारा प्रेषित उद्घाटन भाषण को ही पढ़ा गया। जिसमें आदिवासी साहित्य, संस्कृति और समाज के संकट पर प्रकाश डाला गया था। झारखंड के प्रख्यात बुद्धिजीवी डॉ. रामदयाल मुंडा ने अपने अध्यक्षीय व्याख्यान में आदिवासी साहित्य को पूरे समाज का साहित्य कहा। उन्होंने कहा कि अपनी सामूहिकता की ताकत की बदौलत ही आदिवासी साहित्य हजारों वर्षों के संघर्ष के बाद भी बचा हुआ है। अकादमी के सचिव के. सच्चिदानंदन और रमणिका गुप्ता ने स्वागत भाषण दिया। बीज भाषण देते समय जी. एन. देवी ने कहा कि आज ‘आदिवासी साहित्य’ चुनौती बनकर उभरा है। सम्मेलन के प्रथम सत्रा में ‘आदिवासी भाषा, संस्कृति और साहित्य में अस्मिता’ के प्रश्न पर देवेंद्र चंपिया, एल.टी. लियाना ख्यिंङते, आर. वशुम, मनोरंजन लाहारी, नेचुरियाजो चुचा ने अपने आलेख पढ़े। सत्रा का संचालन किया नारायण भगत ने और अध्यक्षता की निर्मल मिंज ने। दूसरे और तीसरे सत्रा में क्रमशः आदिवासी कहानी और कविता का पाठ किया गया। कहानी पाठ में लक्ष्मण गायकवाड़, शंकरलाल मीणा, गौरचंद्र मुर्मू, इन्दुरानी किड़ो ने तथा कविता पाठ में भुजंग मेश्राम, चंद्रकांत मुरासिंह, निर्मला पुतुल, लाल साङजुआली साइलौ, चारूमोहन राभा, केखरी वोऊ योमे, पोब्र फर्नांडीज आदि ने भाग लिया।

सम्मेलन के दूसरे दिन ‘साहित्य और मिथकों में आदिवासियों का चित्राण’ विषय पर आयोजित चौथे सत्रा का संचालन वासवी ने किया। अध्यक्ष हरिराम मीणा, जो पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी भी हैं और जिन्होंने आदिवासी समाज पर शोधपरक काम किया है ने इस बात पर अफसोस जताया कि इतिहासकारों ने आदिवासियों को मनुष्य के दरजे से खारिज कर दिया है। कुछ वर्ष पहले विश्व स्तर पर ‘इंडिजीनस इयर’ मनाया गया था। भारत सरकार ने संयुक्त राष्ट्र संघ को सीधे लिख दिया कि भारत में इंडिजीनस लोग हैं ही नहीं। इस सत्रा में लटारी कवरू मड़ावी, के. एम. मित्रा, सिलवानस लामारे तथा रति सक्सेना ने अपने आलेख पढ़े। सम्मेलन में उपस्थित कई आदिवासी साहित्यकारों ने इस बात पर क्षोभ व्यक्त किया कि भारतीय साहित्य में आदिवासियों को गौरवपूर्ण स्थान नहीं दिया गया है। आदिवासियों को राक्षस, असुर, असभ्य आदि कहा गया है और आदिवासियों की संस्कृति को हेय दृष्टि से देखा गया है। आज भी लोगों ने उनकी संस्कृति के बारे में भ्रांत धारणाएं हैं। लटारी कवरु मड़ावी ने अपने आप को रावण का वंशज मानते हुए कहा कि रावण की संतति में जो टोटम है, वही टोटम उनका भी है। उन्होंने रावण को अहिंसावादी कहा। कहा कि राम ने रावण से अधिक हत्याएं कीं। सुपर्णखा की नाक काट कर तो राम-लक्ष्मण ने रावण को सीता हरण के लिए मजबूर कर दिया था। भला कौन स्वाभिमानी राजा अपनी बहन का अपमान सहन करेगा? रावण तो इतने चरित्रावान थे कि उन्होंने अपने कब्जे में रही सीता पर हाथ तक नहीं लगाया। रावण के वंश ने तो सिंधु-सभ्यता की पहली इमारत खड़ी की थी। आर्किटेक्चर तथा पहली लिपि भी तैयार की थी। राम द्वारा रावण का वध करना उच्चवर्णों द्वारा आदिवासी संस्कृति को नष्ट करने की साजिश थी। इसलिए आदिवासियों को साहित्य की पुनर्रचना करना होगा। भारतीय साहित्य में जो गलत ढंग से आदिवासियों का चित्राण किया गया है, उसका विरोध करना होगा। शोधकर्मी मड़ावी ने दशहरा के दिन रावण दहन को बंद करने की लिए हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर किया है।

पांचवे सत्रा में ‘आदिवासी वाचिक साहित्य और समकालीन साहित्य’ पर वी. रामकोटी, भगवानदास पटेल, तेजस्वी कट्टीमणी, दमयंती बेसरा आदि ने आलेख प्रस्तुत किए। अध्यक्षता की राजेंद्र ठाकरे ने और संचालन किया इंद्रजीत उरांव ने। छठे सत्रा में कविता और अगले सत्रा में कहानी-पाठ किया गया। मंगल सिंह हाजोवरी की अध्यक्षता में किए गए कहानी पाठ में वाल्टर भेंगरा तरुण, ममंग देई, बादल हेम्ब्रम तथा कृष्ण चंद्र टुडू ने भाग लिया जबकि कविता-पाठ किया जदुमनी बेसरा, राघवन अत्तोली, दुर्गाप्रसाद मुर्मू आदि ने। चेरापुंजी ने प्रसिद्ध युवा कवि किनफाम सिंह नौंगनकिरिह की कविताएं विशेष रूप से पसंद की गईं। इस सत्रा के अध्यक्ष थे एच. कामखेनथांग।

सम्मेलन के अंतिम दिन आठवें सत्रा के आलेखों का विषय थाµआदिवासी संस्कृति और साहित्य में स्त्रा का दर्जा। इसमें अध्यक्षता की रोज केरकेट्टा ने और आलेख पढ़ा बिटिया मुर्मू, मिनिमॉन लालू, रमणिका गुप्ता, कुर्तज वसामल्ली ने। संचालन कुमारी वासंती ने किया। नौंवे सत्रा में पुष्पा टेटे के संचालन में आदिवासी साहित्य के भविष्य पर विमर्श करते हुए अखिल भारतीय आदिवासी साहित्यिक मंच के वाहरू सोनवणे ने कहा, ‘‘हमें मुख्यधारा में शामिल नहीं होना है। शोषण, दमन, विषमता की संस्कृति पर आधारित मुख्यधारा में हम क्यों शामिल हो? जबकि हमारे पास श्रेष्ठ मानवीय गुणों की संस्कृति है। यदि हम मुख्यधारा में शामिल होंगे तो हमारी बहू-बेटियां भी दहेज के लिए मारी जाएंगी। आज हमें एकलव्य की मानसिकता से बाहर आना होगा। हम किसी गुरु द्रोणाचार्य से क्यों अपना अंगूठा कटवाएंगे? हमें किसी गुरु के आशीर्वाद या समर्थन की आवश्यकता नहीं। हम अपने आप को स्वयं स्थापित करने की क्षमता रखते हैं।’’

शायद इसी क्षमता को रमणिका गुप्ता ने पहचाना और इस आयोजन के लिए अपनी पूरी ताकत लगा दी। चार राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त झारखंड की पत्राकार वासवी का कहना है, ‘‘रमणिका गुप्ता ने हम आदिवासियों के लिए ऑल इंडिया नेटवर्किंग का काम किया है। जिसकी एक महत्वपूर्ण कड़ी है उनके द्वारा संपादित पत्रिका ‘युद्धरत आम आदमी’ का आदिवासी विशेषांक, जो समसुच एक संदर्भ ग्रंथ है। दिल्ली स्थिति रमणिका जी का घर एक तरह से झारखंड भवन ही है।’’

प्रसिद्ध संताली कवयित्रा निर्मला पुतुल, प्रसिद्ध ऐक्टिविस्ट बिटिया मुर्मू और दयामनी बारला भी यही मानती हैं। आज निर्मला पुतुल को जो राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है उसका बहुत बड़ा श्रेय रमणिका गुप्ता को ही जाता है। झारखंड के कोयला-खदानों में कार्यरत मजदूरों को लेकर उन्होंने सन् 1980 के आसपास बहुत संघर्ष किया था। हजारीबाग के मांडू से एम.एल.ए. थीं वे उस वक्त। क़रीब दो हज़ार लोगों को लेकर वे जेल भी गई थी। वे चाहती थीं कि बाहरी मजदूरों को न लाकर यहीं के मजदूरों को रोजगार दिया जाए। सक्रिय राजनीति में रहने के कारण लोगों से घिरे रहने की, लोगों के हित में कुछ करने की आदत पड़ गई है उन्हें। यही आदत अब आदिवासी साहित्य के काम आ रहा है। सन् 2001 से उन्होंने आदिवासी साहित्य पर काम करना शुरू किया। उससे पहले दलित साहित्य पर फोकस था उनका। सन् 2002 में साहित्य अकादमी के सौजन्य से साहित्य अकादमी के दिल्ली स्थित सभागार में छोटे पैमाने पर उन्होंने आदिवासी सम्मेलन करवाया था जिसमें सिर्फ नौ राज्य के आदिवासी साहित्यकारों ने भाग लिया था। पूरा पूर्वोत्तर इलाका छूट गया था उस वक्त। पर इस बार का आयोजन अभूतपूर्व रहा।

इस आयोजन में रमणिका गुप्ता के साथ-साथ अखिल भारतीय आदिवासी साहित्यिक मंच के अध्यक्ष डॉ. रामदयाल मुंडा, सचिव वासवी, महासचिव वाहरू सोनवणे तथा साहित्य अकादमी के उपसचिव ब्रजेन्द्र त्रिपाठी की अहम् भूमिका रही। लक्ष्मण गायकवाड़, हरिराम मीणा ने भी काफी मदद की। होटल युवराज पैसेल का वातानुकूलित सभागार सभी सत्रों में खचाखच भरा रहा। सम्मेलन के अंतिम दिन भी किसी के चेहरे पर ऊब या थकान का नामोनिशान नहीं था। सांध्यकाल में आयोजित पैकी, सरहुल, खड़िया तथा छऊनृत्य जैसे जनजातीय सांस्कृतिक-कार्यक्रमों ने भी लोगों में ताजगी बनाए रखा। सभी के चेहरे से झलकता संतोष, जोश, आत्मविश्वास इस सम्मेलन की उपलब्धि रही। झारखंड के प्रसिद्ध साहित्यकार महादेव टोप्पो ने अत्यंत जोश में कहा कि भारत में अगला नोबेल पुरस्कार किसी आदिवासी लेखक को ही मिलेगा क्योंकि जीवन और प्रकृति से जुड़े साहित्य की रचना आदिवासी ही कर सकते हैं।

दसवें सत्रा में इग्नाशिया टोप्पो की अध्यक्षता में लोक कथा पाठ करते हुए जब कार्बी की थेस्सो-क्रॉपी तथा अन्य लेखकों ने ‘सृष्टि का जन्म’ जैसी लोककथाओं का पाठ किया तब उस सत्रा की संचालिका रमणिका गुप्ता ने टिप्पणी की कि आदिवासी लोककथाओं में तो पूरी डार्विन की थ्योरी ही आ जाती है। सम्मेलन के समापन सत्रा के अध्यक्ष असम विधानसभा के स्पीकर पृथ्वी मांझी का रुख गैर-आदिवासियों के प्रति कुछ नर्म था। उन्होंने कहा, ‘‘हम अपने साहित्य का विकास करना चाहते हैं तो इसका मतलब यह नहीं कि हम दूसरों के साहित्य को घृणा करते हैं। यदि हम अपनी मां को प्यार करते हैं, उन्हें उम्रदराज़ कहते हैं तो इसका अर्थ यह कैसे हो सकता है कि हमें दूसरों की मां से घृणा है? हम तो बस यही चाहते हैं कि हमारे साहित्य, संस्कृति और भाषा का विकास हो। अंग्रेजी भी तो किसी जनजातीय भाषा से ही निकली है। मगर देखिए, आज अंतरराष्ट्रीय भाषा बन गई है। वैश्वीकरण, उपभोक्तावाद से हमें अपनी भाषा-संस्कृति को बचाना है ताकि हमारी भाषा, संस्कृति लुप्त न हो जाए।

बंगाल के वर्दमान जिले से आए प्रसिद्ध संताली लेखक गौड़चंद्र मुर्मू के इसीलिए तो साक्षात्कार के दौरान कहा, ‘‘यदि हम अपनी भाषा संस्कृति से विमुख होंगे तो जड़हीन काई की तरह पानी में इधर-उधर तैरते फिरेंगे। हमारा अस्तित्व ही मिट जाएगा।’’

अखिल भारतीय आदिवासी साहित्यिक मंच की ओर से वाहरू सोनवणे ने साहित्य-अकादमी के समक्ष दो प्रस्ताव रखे। पहला आदिवासी साहित्य अकादमी का गठन किया जाए और दूसरा, प्रत्येक दो वर्षों के अंतराल पर ऐसे ही भव्य और महत्वपूर्ण सम्मेलन का आयोजन किया जाए।

साहित्य अकादमी के उपसचिव ब्रजेन्द्र त्रिपाठी भी इस आयोजन को अत्यंत महत्वपूर्ण मानते हैं। उनका कहना है कि हमारे समाज में आदिवासी समाज के बारे में जो भ्रांत धारणाएं फैली हैं, उन्हें इसी तरह के सम्मेलनों द्वारा दूर किया जा सकता है। इस तरह के सम्मेलनों से ही यह पता चलता है कि कौन-कौन सी आदिवासी पत्रिकाएं निकल रही हैं, किन-किन विधाओं में कौन-कौन क्या लिख रहे हैं। युवा रचनाकारों को भी बहुत बल मिलता है, इस तरह के आयोजनों से। मुझे लगता है कि छोटी-छोटी भाषाएं भी बहुत महत्वपूर्ण होती है। जब कोई भाषा मरती है तो उसके साथ एक पूरी संस्कृति मर जाती है। हमें केवल आदिवासी भाषा, साहित्य ही नहीं आदिवासियों की कला, जीवन पद्धतियों पर भी गौर करना चाहिए। हमें लगता है कि हमारा समाज बहुत आधुनिक है पर आदिवासी समाजों में झांककर देखिए, वे कितने आधुनिक हैं। आदिवासी चिकित्सा पद्धति, उनके कुटीर उद्योगों आदि का लाभ उठाना चाहिए हमें। जनजातीय साहित्य-संस्कृति की रक्षा के लिए साहित्य अकादमी प्रतिबद्ध है। हर साल दो आदिवासी साहित्यकारों को भाषा-सम्मान दिया जा रहा है। साहित्य अकादमी ने पहले बाईस भाषाओं को मान्यता दी थी। पर अब बोड़ों और संताली को भी शामिल कर लिया गया है। यह अत्यंत संतोष की बात है।

पचहत्तर की उम्र में भी बिना थकान के सुबह से रात तक सम्मेलन के कार्यों में भागती-फिरती रमणिका गुप्ता मानती है कि उनके सपने को पूरा किया साहित्य अकादमी ने। आदिवासी लेखक हो सकते हैं, बुद्धिजीवी हो सकते हैं मगर पूंजीपति नहीं होते। और चूंकि बिना पैसों के इस तरह का आयोजन संभव नहीं होता, इसलिए साहित्य अकादमी की भूमिका सबसे बड़ी है।

संपर्क : 18 सी. राधा गोविन्द स्ट्रीट, थड़पकना, रांची-834001 (झारखंड)

रमणिका फाउंडेशन एवं अखिल भारतीय आदिवासी साहित्यिक मंच के सहयोग से साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित

अखिल भारतीय आदिवासी साहित्य सम्मेलन 2005 रांची (झारखंड) के यादगार लम्हें