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Aadiwasi Bhasha aur Shiksha

Rs.250/-
Description :
" भाषा निस्संदेह संप्रेषण का एक सशक्त माध्यम है यह संप्रेषण केवल संवाद ही नहीं होता बल्कि विचारों का चाहक भी होता है। ये विचार उन भाषा-भाषियों के समग्र लोक, सामाजिक-सांस्कृतिक रीति-रिवाज़, स्थानीय विशिष्टताओं और उनकी बहुरंगी आभाओं एवं गतिविधियों को भी पूर्णतया प्रतिबिम्बित करते हैं। मुख्यधारा की भाषाएं कहीं दलित बन जाती हैं, तो कहीं सवर्ण! कहीं सर्वहारा हैं, तो कहीं कॉरपोरेट जगत की उद्घोषक। आदिवासी अपनी भाषाएं किसी पर थोपथे नहीं। वे मूलतः लोकतांत्रिक हैं। हम हजार फूल खिलने क्यों नहीं देते? भाषा-विमर्श के मूल में आज यही प्रश्न महत्वपूर्ण है जो जवाब खेजता है। इस पुस्तक के माध्यम से, जो लेख हमने प्रस्तुत किए हें, उसके मूल में यही सोच यही चिंता है। यह पुस्तक भाषा-नीति तय करने के लिए सरकार को भी आदिवासी दृष्टि देने में सक्षम् होगी। भाषाविदों के लिए संभवतः यह पुस्तक ज़मीनी सच्चाइयों के दरवाजे़ खोलने में सहायक होगी, क्योंकि इसमें लिखे गए लेख उनके हैं, जिन्हें अपनी भाषाओं के लिए चिंता है। "
Format :
HB
ISBN No. :
978-93-81582-46-6

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