Kalam Ko teer Hone Do/कलम को तीर होने दो

Rs.225/-

Isbn: 978-93-5229-277-6

Writer: Ramnika Gupta /रमणिका गुप्ता

Year: 2015

"हिंदी पट्टी के आदिवासी समाज, विशेष रूप से झारखंड और छत्तीसगढ़ के आदिवासियों के राजनीतिक संघर्षों पर तो थोड़ा ध्यान दिया गया है, लेकिन उनके समृद्ध सांस्कृतिक परम्परा, सादगी और करुणा को सामने लाने का उपक्रम प्रायः नहीं हुआ है। आदिवासी समाज के संघर्ष और करुणा की गाथाएं उनकी आदिवासी भाषाओं में तो दर्ज हैं ही, इधर कुछ आदिवासी कवियों ने भी हिंदी में लिखने की पहल की है, जो स्वागत योग्य है। पहली बार 1980 के दशक में रामदयाल मंुडा के कविता-संग्रह के प्रकाशन के साथ उस महान सांस्कृतिक विरासत को हिन्दी कविता के माध्यम से व्यक्त करने का उपक्रम सामने आया। सन् 2004 में रमणिका फाउंडेशन ने पहले-पहल संताली कवि निर्मला पुतुल की कविताओं के हिंदी अनुवाद का द्विभाषी संग्रह ‘अपने घर की तलाश में’ प्रकाशित किया। उसके बाद ही आदिवासी लेखन को लेकर हिंदी समाज गंभीर हुआ। रमणिका जी आदिवासियों के राजनीतिक, सामाजिक वे आर्थिक संघर्षों के साथ-साथ उनकी साहित्यिक गतिविधियों में भी सक्रिय रूप से शामिल होती हैं। अपनी पत्रिका के माध्यम से भी उन्होंने कई आदिवासी कवियों व कथाकारों को सामने लाने का काम किया है। उन्होंने आदिवासी भाषाओं की कविताओं, कहानियों, लोक-कथाओं, मिथकों व शौर्यगाथाओं के अनुवाद भी प्रकाशित कराए हैं। अब वे पहली बार, हिंदी में लिखने वाले झारखंड के 17 कवियों की चुनी हुई कविताओं का यह संग्रह सामने ला रही हैं, जिसका स्वागत किया जाना चाहिए। हिंदी कविता का लोकतंत्रा दलितों, स्त्रिायों आदि के साथ-साथ इन आदिवासी कवियों को शामिल करने पर ही बनता है। यह विमर्श सबसे नया है लेकिन उसकी जमीन बहुत मजबूत है।"