Nij Ghare Pardesi/निज घरे परदेशी

Rs.200/-

Isbn: 81-8143-116-2

Writer: Ramnika Gupta/रमणिका गुप्ता

Year: 2004

" हजारों बरसों से आदिवासियों को खदेड़ने का काम जारी है। उनका शोषण और दोहन। उनकी संस्कृति को न तो यहाँ के वासियों ने पनपने या विकसित होने दिया और न ही उसे आत्मसात कर मूलधारा में शामिल होने दिया। जिससे इन पर उनका वर्चस्व कायम रहे। फलस्वरूप रूक गया उनकी संस्कृति और भाषा का विकास। इस सबके बावजूद उसने अपनी पहचान आदिवासी के रूप में कायम रखी। भले उसे गूंगा बना दिया गया था अभिव्यक्ति की ताकत नहीं थी उसके पास, पर अन्याय हद से गुजर जाने पर उसके हाथ गतिशील हो उठते। आज कोई सबसे बड़ा खतरा अगर आदिवासी जमात को है तो वह उसकी पहचान मिटने का है। रमणिका जी के लेखों की यह पुस्तक आदिवासी मुद्दों पर किए संघर्षों की कथा ही नहीं उनका आँखों देखा हाल भी है। इसमें आदिवासी जिजिविषा और सरकारी उपेक्षा का एतिहासिक विवरण प्रस्तुत है। "