Bheed Satar Me Chalne Lagi Hai/भीड़ सतर में चलने लगी है

Rs.125/-

Writer: Ramnika Gupta/रमणिका गुप्ता

Year: 2002

" भीड़ सतर में चलने लगी है’ कविता-पुस्तक में रमणिका गुप्ता की ‘बात’ बोलती है, सीधे-सीधे बोलती है और वही ‘बात’, ‘भेद’ भी खोलती है, सब कुछ बताती है, सब कुछ खोलकर रख देती है। षड्यंत्रा, चालाकी और हैवानियत के विरुद्ध मासूमियत, सह-अनुभूति और संघर्ष के पथरीले रास्तों पर चलती हैं ये कविताएं। ‘भीड़ सतर में चलने लगी है’ की कविताएं पूरी तरह श्रमिक वर्ग से जुड़ी कविताएं हैं। यहां मजदूर-जीवन के विभिन्न पक्षों का बारीक अनुभवजन्य चित्रण मिलता है। कवयित्री की आस्था भगवान, खुदा या चमत्कारिक शक्तियों पर नहीं, श्रमिक शक्ति पर है। ये लोकभाषा, बोलचाल की भाषा, मजदूरों की भाषा, जीवन्त भाषा के गहरे रंग में पगी हैं। यहां सीधा कथन है, नाटकीयता है, बिम्बात्मक आकर्षण है। मुझे लगता है, रमणिका गुप्ता की मजदूर-संबंधी ये कविताएं और गीत, मजदूरों के बीच, श्रमिक वर्ग के बीच, साधारण जनता के बीच विशेष प्रिय होंगे। "