Lehron ki Lai/लहरों की लय

Rs.225/-

Isbn: 81-88080-22-5

Writer: Ramnika Gupta/रमणिका गुप्ता

Year: 2008

"प्रख्यात लेखक-चिन्तक निर्मल वर्मा ने कभी कहा था ‘यात्राएं हमें बाहर ही नहीं, हमारे अन्दर के अपने अनजाने कोनों तक भी ले जाती है।’ रमणिका गुप्ता अपने इन यात्रा-संस्मरणों में बार-बार अपने अन्दर के इन्हीं अनजाने कोनों में पहुंच जाने के रोमांच से भरी दिखती हैं, मगर यह कोना महज एक लेखक का नहीं, बल्कि एक सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक कार्यकर्ता का भी कोना है, जो एक तरफ नियाग्रा जलप्रपात व एल्पस पर्वत के अद्भूत सौन्दर्य पर मुग्ध होता है नार्वे के जांबाज नाविकों के डोंगियों में जोखिम भरी समुद्री यात्राएं करने या उत्तरी और दक्षिणी ध्रर्वों के लिए साहसिक यात्राओं पर निकल जाने पर विस्मित ही नहीं अभिभूत भी होता है। दूसरी तरफ फिलीपींस में सोने की खदानों में पोटेशियम के साए में काम करते या छोटे घरों में मशरूम की तरह ठूंस-ठूंस कर भरे मजदूरों की दुर्दशा पर तड़पता-छटपटाता और गुस्से से भर उठता है। वह रूस में साम्यवादी व्यवस्था के विघटन और पूंजीवाद के निर्लज्ज आत्मविश्वास से भी आहत होता है। वहीं वह क्यूबा जैसे छोटे-से देश को बर्बर पूंजीवाद से टकराकर सम्मान से उठ खडे़ होते देखकर गहरी आश्वस्ति से भर जाता है। विश्वास है यात्रा-संस्मरणों में वैचारिकता के लिए निर्मित यह स्पेस पाठकों को उन देशों-लोगों की संवेदना के करीब लाएगा।"