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लोकार्पण समारोह

लोकार्पण

रफां : ‘दूसरी दुनिया का यथार्थ’-1997

सन् 1997 में ही ही रशियन कल्चरल सेंटर, फिरोजशाह रोड, दिल्ली में एक बड़ी गोष्ठी की गई जिसमें दिल्ली के सभी बुद्धिजीवी लेखक तो थे ही साथ ही मध्यप्रदेश से भी लोग आ गए थे। इस गोष्ठी में कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, प्रताप सहगल, मैनेजर पांडेय, जगदीश चतुर्वेदी, महीप सिंह, चंचल चौहान, प्रणव बंदोपाध्याय, पुरुषोत्तम सत्यप्रेमी, श्यौराज सिंह ‘बैचेन’, जयप्रकाश ‘कर्दम’, मैत्रोयी पुष्पा, जबरीमल पारख, गंगाप्रसाद विमल तथा रशियन केन्द्र के तत्कालीन निदेशक उपस्थित थे। इस गोष्ठी का दूरदर्शन द्वारा राष्ट्रीय चैनल पर दो-दो बार पच्चीय मिनट तक प्रसारण हुआ। यह गोष्ठी दलित कहानियों के हिन्दी के प्रथम कथा-संग्रह ‘दूसरी दुनिया का यर्थाथ’ पर हुई थी।

रफां : ‘दलित चेतना सोच’-1998

28 अक्तूबर, 1998 को रमणिका फाउंडेशन के सहयोग से ‘दलित चेतना : सोच’ पुस्तक का विमोचन ‘बी.पी. हाउस’ दिल्ली में कराया गया, जो ‘युद्धरत आम आदमी’, ‘दलित राइटर्स फोरम’ तथा ‘दलित शिक्षा आंदोलन’ दिल्ली, के संयुक्त तत्वावधान में हुआ। इसका लोकार्पण सी.पी.एम. के पोलित ब्यूरो सदस्य कामरेड सीताराम येचुरी ने और अध्यक्षता डॉ. मैनेजर पांडे तथा डॉ. श्यौराज सिंह बेचैन ने की। जयप्रकाश ‘कर्दम’, जबरीमल पारख और डॉ. बी. कृष्ण ने आलेख पढ़े। श्री राम शरण जोशी (सं.-नई दुनिया), श्री विभांशु दिव्याल (सं.-राष्ट्रीय सहारा), सुश्री प्रेम लता जैन और दलित लेखक एवं पत्राकार चन्द्रभान प्रसाद, रमणिका गुप्ता, गोविन्द प्रसाद तथा मोहनदास नैमिशराय ने चर्चा में शिरकत की और रेखा अवस्थी (जनवादी लेखक संघ, दिल्ली) ने कार्यक्रम का संचालन किया। अंत में डॉ. श्यौराज सिंह ‘बेचैन’ और मैनेजर पांडे ने अपना अध्यक्षीय भाषण दिया।

सीताराम येचुरी ने कहा-‘‘आज देश में खासकर दलितों में एक नई चेतना उभर कर आ रही है। ऐसे समय में रमणिका जी ने देश के विभिन्न भागों के एक साथ इतने दलित लेखकों के, दलितों की विभिन्न समस्याओं पर व्यक्त विचारों को कलमबद्ध और संपादित कर ‘दलित चेतना : सोच’ पुस्तक प्रकाशित कर, ऐन समय पर एक जरूरी काम करने की पहल की है। हमें दलित समस्या को जातिवाद के घेरे से बाहर लाना है। देश में सदैव दो संस्कृतियां रही हैं। एक तरफ यदि वेद-पुराणों की संस्कृति है तो दूसरी तरफ एकलव्य और शम्बूक की संस्कृति भी है लेकिन आज सरस्वती-वंदना के बहाने दलितों पर फिर उसी पुरानी संस्कृति को लादने की कोशिश और साजिश हो रही है जिसने दलितों के अधिकार छीने थे। आज मिल-जुल कर इन प्रश्नों को हल करना है, खासकर दलितों को इसके खिलाफ आगे आना चाहिए। आज वर्ग और सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई हम सब को एक साथ मिल कर लड़ने की जरूरत है।’

डॉ. मैनेजर पांडेय ने कहा-‘‘दलित साहित्यकारों को अपने दोस्तों और दुश्मनों में फर्क करना सीखना होगा। आज फिर से भारत की दूसरी खोज की साजिश हो रही है। उन्होंने कहा यह पुस्तक आज के दलित आंदोलन की देन है और दलित विमर्श की एक जरूरी और मुकम्मल किताब है। दलित आंदोलन दरअसल भारतीय समाज में आमूल परिवर्तन का आंदोलन है जिसका लक्ष्य जाति व्यवस्था के अंत के साथ दलित का भी अंत हैµइसके बाद ही मनुष्यता और मानवता का विकास संभव होगा। डॉ. पांडेय ने नया मूल्यांकन करने की जरूरत को जरूरी बताया लेकिन कहा कि मूल्यांकन में कटुता से बचना चाहिए चूंकि दलित आंदोलन जितना बड़ा और बीहड़ काम है, उसी के अनुरूप धैर्य भी रखना होगा, केवल आक्रोश से काम नहीं चलेगा।’’

डॉ. श्यौराज सिंह ‘बेचैन’ ने अध्यक्षीय भाषण में कहा-‘‘दलित चेतना : सोच पुस्तक इस दिशा में पहली पुस्तक है। अब दलित लेखकों को अपना एजेंडा तय करना चाहिए।’’ डॉ. अम्बेडकर ने कम्युनिस्टों का विरोध नहीं किया। उन्होंने कहा था-‘‘कम्युनिस्टों का ध्येय मूलतः अत्यंत अनुचित है ऐसा हमें नहीं लगता। कम्युनिज्म के आर्थिक व राजनीतिक ध्येय को समझने की पात्राता बहुजन समाज ने अभी आत्मसात नहीं की है।’’ दरअसल, डॉ. साहब ने जो विरोध किया था वह मार्क्स की मंशा का विरोध नहीं था बल्कि भारतीय मार्क्सवादियों की प्रैक्टिस का विरोध था जिन्होंने भारत में व्याप्त जातिवाद को नजरअंदाज किया। उन्होंने कहा कि दलितों को केवल अपनी ही अभिव्यक्ति तक सीमित नहीं रहना चाहिए बल्कि गैर-दलितों ने उनके बारे में क्या कहा और लिखा, यह भी जानना और लिखना चाहिए।

इस संगोष्ठी में जयप्रकाश ‘कर्दम’, डॉ. वी. कृष्ण (रीडर हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी) तथा जबरीमल्ल पारख द्वारा दलित चेतना : सोच पर आलेख पढ़े गए। जयप्रकाश ‘कर्दम’ ने अपने आलेख में कहा-‘‘यह पुस्तक दलित चेतना के विभिन्न आयामों पर केंद्रित है। इस पुस्तक में दलित प्रश्नों पर पहली बार गंभीर ढंग से चिंतन किया गया है। धर्म परिवर्तन से ही दलितों की स्थिति में परिवर्तन होता है। अन्यथा सवर्णों की दृष्टि में दलित चूहड़े-चमार ही रहते हैं।’’

डॉ. वी. कृष्ण ने अपने आलेख में कहा कि-‘‘समाजवादी क्रांति से पहले दलित जनक्रांति होना आवश्यक हैµयानी जाति उन्मूलन अपेक्षित है। दलितों के सांस्कृतिक इतिहास का भी निर्माण होना चाहिए। आज की ये मांग है कि सभी को बोलना है। सभी की ओर से एक नहीं बोलेगा चूंकि आज की परिस्थिति बहु-आयामी अभिव्यक्ति खोजती है। यह इस पुस्तक में मौजूद है। रमणिका जी ने इस पुस्तक में मार्क्सवाद और अम्बेडकरवाद के आईने में दलित समस्या को समझने का प्रयास किया है।’’

जबरीमल्ल पारख ने इस पुस्तक को एक सार्थक और ठोस कदम बताते हुए कहा कि-‘‘दलित आंदोलन अब बहुत आगे निकल आया है। दलितों की अस्मिता और स्वाभिमान के साथ जमीन और रोजगार का सवाल भी जुड़ा है, इसलिए हम जनवाद की लड़ाई को तब तक पूरा नहीं कर सकते जब तक हम दलितों की लड़ाई को पूरा नहीं करते। पुस्तक में दलित सोच के सभी आयामों को ठोस और प्रमाणित रूप से रखा गया है। यह पुस्तक पूरे समाज की चिंता व्यक्त करती है।’’

डॉ. राम शरण जोशी ने श्री कर्दम की इस बात का समर्थन करते हुए कहा कि-‘‘दलितों के उद्धार या उत्थान की चर्चा करना गलत है, उद्धार तो किसी पतित व्यक्ति का होता हैµदलित तो पतित नहीं हैंµवे मनुष्यता का हक चाहते हैं। दलित-समता का आंदोलन होना चाहिए, दलित-उद्धार या उत्थान का नहीं, तभी समाज में लोकतांत्रिक चेतना आ सकती है। दलितों को कंप्यूटर तथा अन्य तकनीकी विधाओं में भी महारत हासिल करनी चाहिए ताकि वे उन पेशों में भी आ सकें जहां सवर्णों ने कब्जा जमा रखा है।’’

कथाकार-पत्राकार विभांशु दिव्याल ने कहा कि-‘‘गांधी ने सवर्णों में अपराध-बोध की भावना जागृत की। अवर्ण श्रम करते हैं इसलिए वे हीन माने जाते हैं जबकि होना इससे उलट चाहिए। हमें जो श्रम न करे उसे हीन मानने की प्रवृत्ति पैदा करनी है ताकि उसमें अपराध-बोध पैदा हो। ऐसा नहीं होने से समाज में इस सवर्ण मानसिकता का विकास होगा कि ‘जो श्रम न करे वह सवर्ण, जो श्रम करे वह अवर्ण’। दलितों को इस मानसिकता से बचना होगा ताकि दलित चेतना का सवर्णीकरण न हो।’’

चन्द्रभान प्रसाद ने कुछ सवाल अपनी बहस में उठाते हुए कहा कि-‘‘दलितों के दुश्मन केवल ब्राह्मण ही नहीं, शूद्र भी हैं जिसका उदाहरण तमिलनाडू में शूद्रों द्वारा दलितों की हत्याएं हैं। बंगाल और केरल में भी दलितों की आर्थिक और शैक्षणिक तौर पर स्थिति खराब ही है। उन्होंने सवाल पूछा कि कौन सवर्ण हैंµकेवल ब्राह्मण या शूद्र भी?’’

रमणिका गुप्ता ने बहस का उत्तर देते हुए कहा कि-‘‘हम सवर्ण मानसिकता का विरोध करते हैं-वह ब्राह्मण में हो, ठाकुर में हो अथवा शूद्र या दलित में। भाग्यवाद, कर्मफल, पुण्य-पान धार्मिक आडंबर, विकृत परंपरागत और अंधविश्वास मानने वाला दलित भी उसी मानसिकता का पोषक माना जाएगा। अगर कोई दतिल लेखक हनुमान चालीसा टाइप अथवा पाप-पुण्य या जाति-परक साहित्य रचता है तो उसे जन्मना दलित होने के कारण दलित साहित्यकार अथवा लेखक नहीं माना जा सकता । हमारी लड़ाई सवर्ण मानसिकता से है-व्यक्ति से नहीं है। हमें डॉ. अम्बेडकर की 22 प्रतिज्ञाओं को याद रखना चाहिए जिनमें वैज्ञानिक सोच को अहम् माना गया है और धार्मिक आडंबरवाद, भाग्य और भगवान, कर्मकाण्ड और देवी-देवताआें को नकारा गया है।’’

डॉ. गोविन्द प्रसाद ने पुस्तक के परिचय के बहाने दलित प्रश्नों की चर्चा की। बहस में नैमिशराय, प्रेमलता जैन और बी. आर. आज़ाद ने भी अपने विचार व्यक्त किए।

रफां : ‘पंजाबी साहित्य में दलित कदम’ विशेषांक ‘युद्धरत आम आदमी’-2001

26 नवम्बर, 2001, को ‘साहित्य अकादेमी’ दिल्ली के रवीन्द्र भवन सभागार में ‘पंजाबी साहित्य अकादमी’, ‘पंजाबी लेखक मंच’, तथा ‘रमणिका फाउंडेशन’ की तरफ से किए गए आयोजन में ‘पंजाबी साहित्य में दलित कदम’ पूर्णांक 58 का लोकापर्ण श्री राजेन्द्र यादव ने किया। इसका संचालन श्री श्यौराज सिंह ‘बैचेन’ ने किया। इसकी अध्यक्षता ‘पंजाबी साहित्य अकादेमी’ के अध्यक्ष डॉ. एस.एस. नूर तथा ‘साहित्य अकादेमी’ के सचिव के. सच्चिदानन्दन ने की। रमणिका जी ने अंक के प्रकाशन की पृष्ठभूमि पर वक्तव्य दिया। श्यौराज सिंह ‘बैचेन’ तथा महेश दर्पण ने इस विशेषांक पर आलेख पढ़े। डॉ. ज्ञानसिंह बल, द्वारका भारती, बलवीर माधोपुरी तथा मोहन सिंह बाबा समेत पंजाब के कई वरिष्ठ लेखकों ने दिल्ली पहुंच कर इस कार्यक्रम में शिरकत की। प्रख्यात दलित लेखक एवं नाटकरकार चरण सिंह सिद्धू, ने भी शिरकत की। कमलेश्वर जी और मैनेजर पांडेय ने इस प्रयास को बहुत सराहा। इस कार्यक्रम में की गईं कुछ महत्त्वपूर्ण टिप्पणियां निम्न हैं-

विशेषांक के लोकार्पण सह वैचारिक संगोष्ठी में विशिष्ट अतिथि कमलेश्वर ने कहा कि-‘‘जैसे-जैसे अन्याय और शोषण बढ़ते जाएंगे दलित-चेतना का विकास होता जाएगा। दलित साहित्य में अनुभव की दुनिया बड़ी महत्वपूर्ण और साहित्य में अनुभव की दुनिया का बड़ा महत्व है। साहित्य के सौन्दर्य-शास्त्रा के पैमाने पर मनुष्य के अंतरतम की रचना कभी पूरी की पूरी नहीं उतरेगी।’’ मैं यह स्वीकार करता हूं कि जब से मराठी एवं हिन्दी के दलित साहित्यकारों की आत्मकथाएं मैंने पढ़ी हैं, तब से लग रहा है कि अपनी तमाम संवेदनाओं के बावजूद मैं वैसा दलित साहित्य नहीं रच सकता क्योंकि वहां जो यातनाएं और उत्पीड़न हैं वह मेरे अनुभव का हिस्सा कभी नहीं रहीं। दरअसल दलित साहित्य में पूरकता की आवश्यकता है, परिवर्तनकामी दलित साहित्य अपने अनुभव सत्य के साथ-साथ उसके विपरीत के सच और उसके प्रतिरोध की चेतना को भी विकसित करे, तभी उसकी यात्रा आगे बढ़ेगी। ‘युद्धरत आम आदमी’ की संपादिका रमणिका गुप्ता बधाई की पात्रा है। रमणिका जी द्वारा हिन्दी में विभिन्न भाषाओं के दलित साहित्य को प्रकाश में लाने का काम ऐतिहासिक महत्व का है। जिस कार्य को मैं और राजेन्द्र यादव नहीं कर पाए उसे रमणिका जी ने किया।’’ संगोष्ठी की शुरूआत में विशेषांक की संपादिका रमणिका गुप्ता ने रमणिका फाउंडेशन और ‘युद्धरत आम आदमी’ पत्रिका के लक्ष्य को स्पष्ट करते हुए कहा कि-‘‘हमारा

ध्येय, खासकर हाशिए पर रखी दी गईं जमातों को ऐसा मंच प्र्रदान करना है जहां वे लोग अपनी बात खुद कह सकें और कर सकें। उस पर अमल कर और करवा सकें। एक नीतिगत फैसले के तहत हमारी संस्था ने यह तय किया कि ऐसे विशेषांकों में हम केवल दलित और आदिवासी का लिखा ही प्रकाशित करेंगे ताकि उनकी अपनी सोच सामने आ सके और उनकी समस्याओं के समाधान भी उनके माध्यम से ही आएं। मुख्यधारा का वर्तमान हिन्दी साहित्य एक अंतिम बिंदु तक पहुंच चुका है और वह बार-बार अपनी बातें दोहराने लगा है। उसके अनुभव भी बासी पड़ चुके हैं, इसलिए दलित आदिवासियों की ये पीढ़ी जिन अनुभवों के साथ लेखन कर रही है वह अनुभव मूलधारा के साहित्यकारों के पास नहीं है। ‘‘दलित लेखन एक अपना महत्व रखता है और नई संस्कृति का द्योतक है।’’

श्यौराज सिंह ‘बैचेन’ ने कहा कि-‘‘दलित मात्रा सदियां से दबे-कुचले ही नहीं हैं, दलित तो जन्म से ही अश्पृश्यता का दंश झेल रहे हैं। यदि पंजाबी साहित्यकारों ने दलित-साहित्य का बहिष्कार नहीं किया होता तो पंजाबी का दलित-साहित्य भी आज शिखर पर होता । सवर्ण संपादकों ने दलित साहित्य के साथ जो राजनीति की है, वह हैरतअंगेज है। दलित साहित्य कभी भी केंद्रीय साहित्य की मुख्यधारा का हिस्सा नहीं बन पाया। रमणिका गुप्ता तो सवर्ण संपादकों की भीड़ में एक विद्रोही संपादक हैं। दलित लेखक उनके इस प्रयास के लिए उन्हें हमेशा याद रखेंगे।’’

महेश दर्पण ने कहा कि-‘‘ दलित यदि अपनी पहचान छिपाते हैं तो लोग जानना चाहते हैं कि वे क्यों अपनी पहचान क्यों छिपाते हैं? इस पुस्तक में उन कारणों की विवेचना मिलती है। पंजाबी साहित्य में दलित कदम एक विचारोत्तजक पुस्तक है।’’

‘हंस’ के संपादक राजेन्द्र यादव ने कहा कि-‘‘दलित एवं नारी अपने दमन में इतने नजदीक हैं कि इन्हें अलग नहीं किया जा सकता। दोनां को अपने जन्म का दंश झेलना पड़ा है। सत्ता, संपत्ति, सुरक्षा और स्वतंत्राता यह ऐसी ‘कॉमन’ चीजें हैं जो इन दोनों के पास नहीं है। यही चीजें दोनों को एक जगह खड़ी करती हैं। यह सच है कि दलित और नारी पर बात करना आज लोग फैशन समझते हैं। दलित साहित्य पर बात करते हुए अक्सर साहित्य के सौन्दर्यशास्त्रा की बात उठती है जो अकादमी क्षेत्रा के पढ़े-लिखे विकसित किंतु वैचारिक रूप से बंजर लोग करते हैं। दलित साहित्य की परिभाषा मराठी या पंजाबी दलित साहित्य से ही निकलेगी, हिन्दी साहित्य से नहीं क्योंकि हिन्दी भाषा गढ़ी हुई है। यह भावनाओं की भाषा है और इसका अपना कोई भौगोलिक क्षेत्रा भी नहीं है। लोक से जुड़ी भाषा ही किसी सामाजिक आंदोलन को गति दे सकती है। हिन्दी में दलित-विमर्श एक अकादमिक सवाल है क्यांकि यहां संस्कृति का एक ‘गैप’ है जबकि मराठी या पंजाबी में दलितों के अस्तित्व का सवाल है, जिसमें कुछ भटकाव होने के बावजूद अपार ऊर्जा है। हिन्दी में आरक्षण और अनुकंपा के आधार पर ही दलित साहित्य को स्थान मिलता रहा है और दलित साहित्य आंदोलन को भटकाने की बातें होती रही हैं। अमूर्तता हम हिन्दी वालों की सबसे बड़ी कला है जिसका सामान्यीकरण कर दिया गया है। लोग शास्त्रों का उदाहरण देकर दलितों के साथ धूर्तता करते रहे हैं। ‘सर्वे भवंतु सुखिनः’ की बात करते हैं, लेकिन जो समाज वर्गों और वर्णों के आधार पर बटा है, वह सुखी कैसे रह सकता है?’’

संगोष्ठी की अध्यक्षत कर रहे डॉ. मैनेजर पांडेय ने कहा कि-‘‘राजेन्द्र यादव लोककथा की उस सास की तरह हैं जो किसी भी स्थिति में दूसरों की निंदा ही करती है। जिस दलित साहित्य के मुद्दे को लेकर राजेन्द्र जी हिन्दी में वर्षों से सब की ऐसी-तैसी कर रहे हैं, वही आज हिन्दी को गाली दे रहे हैंµमो सम कौन कुटिल खल कामी। दलित साहित्य की बहती गंगा में हाथ धोने वाले लोग बहुत हैं और ढेला मारने वाले भी बहुत हैं लेकिन इससे घबराने की जरूरत नहीं है। साहित्य में रचना और रचनाकारों के आधार पर बात हो सकती है। लोकार्पित विशेषांक की कविताओं में आक्रोश और विद्रोह का स्वर प्रमुख है और प्रतिरोध की चेतना का विकास भी इनमें दिखता है। हम हिन्दी के दलित लेखक या थोड़ा बहुत मराठी के लेखकों से परिचित थे लेकिन रमणिका जी ने हमें तेलगु, गुजराती, आदिवासी और इस पंजाबी अंक के माध्यम से यह बतलाया कि दलित आन्दोलन एक अखिल भारतीय आंदोलन है।’’

पंजाबी लेखक एस. एस. नूर ने कहा कि-‘‘दलितों को केवल जाति के आधार पर परिभाषित नहीं किया जा सकता क्यांकि संसार में केवल दो ही जातियां हैंµएक दलित तो दूसरी उसे दलने वाली। दलित-चेतना के विकास में मार्क्सवादी विचारधारा का बहुत बड़ा योगदान है। लेखक कोई भी हो वह दलित ही होता है। दलित चेतना एक ‘विचारधारा’ की तरह है, जिसकी आवश्यकता है।

द्वारका भारती ने कहा कि-‘‘पंजाब में दलितों की हालत बहुत ही दयनीय है। यह धारणा कि पंजाब में जातिवाद नहीं है, सही नहीं है। वहां भी सिक्खों में वही ब्राह्मणवाद हावी है जो हिन्दुओं में है।’’

हिन्दी के दलित लेखक मोहनदास नैमिशराय का मानना था कि-‘‘लेखक की भी जाति होती है। वह जिस समाज और संस्कृति से आता है उसकी स्पष्ट छाप और दबाव लेखन में अवश्य दिखता है। उन्होंने कहा कि दलित जाति का व्यक्ति कितने भी ऊंचे पद पर पहुच जाए लेकिन उसे यह अहसास करा दिया जाता है कि तुम दलित हो। सवर्ण लेखक अपने साहित्य में ऐसे शब्दों का प्रयोग करते हैं जो दलित जाति व अस्मिता को चोट पहंचाते हैं।’’

जयप्रकाश ‘कर्दम’ का मानना था कि-‘‘सभी भाषा साहित्य में दलित लेखकों की संवेदनाएं एक सी हैं। वामपंथ के साथ दलित साहित्य व साहित्यकारों के जुड़ावों को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि केवल धर्मांतरण से दलितों का कल्याण नहीं हो सकता। दलित साहित्य की सुस्पष्ट परिभाषा, सीमाएं, विस्तार, औकात का स्पष्टीकरण जरूरी है। इसके बिना हम दलित आंदोलन को बहुत आगे नहीं ले जा सकते।’’

पंजाबी लेखक चरणदास सिद्धू ने कहा कि-‘‘अगर हमारी कलम से क्षमता होगी तो हम उसी के बल पर आगे बढ़ेंगे क्योंकि कलम ही तलवार का मुकाबला कर सकती है’’

सुश्री विमल थोराट ने कहा कि-‘‘दलित चेतना और आंदोलन की दार्शनिक पृष्ठभूमि में जाने की जरूरत है।’’

ज्ञान सिंह बल ने कहा कि-‘‘गुरुवाणी मुक्ति की बात करती है लेकिन जाति को खत्म करने की बात नहीं करती । ऐसा दर्शन साहित्य नहीं हो सकता।’’

पंजाबी कथाकार मनेन्द्र सिंह कांग ने कहा कि-‘‘आज के हिंसक दौर में दलित-साहित्य की बात करना बड़े ही जोखिष्म का काम है। दलित साहित्य दबे-कुचले लोगों के लिए दलितों द्वारा लिखा गया है, इसलिए दलित-साहित्य की परिभाषा की ज़्यादा फिक्र न करें।’’

कार्यक्रम के अंत में पंजाबी कवि बलवीर माधोपुरी ने धन्यवाद ज्ञापन किया।

रफां : ‘आदिवासी स्वर और नई शताब्दी’µ28 दिसम्बर, 2001

दिनांक 28 दिसंबर, 2001 को विश्व पुस्तक मेला, रांची में वाणी प्रकाशन की ओर से ‘आदिवासी स्वर और नई शताब्दी’ पुस्तक का लोकार्पण श्री रामदयाल मुंडा जी ने किया। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता ‘प्रभात खबर’ के संपादक श्री हरिवंश जी ने की और संचालन फाउंडेशन की कार्यकारिणी सदस्या सुश्री वासवी ने किया। इस पुस्तक पर ‘रांची एक्सप्रेस’ के संपादक श्री बलवीर दत्त, प्रख्यात आलोचक श्री केसरी, श्री कृष्ण चन्द्र टुडू के अतिरिक्त हजारीबाग से आए वरिष्ठ आलोचक डॉ. नागेश्वर लाल ने प्रखर टिप्पणियां दीं। सभी ने एक मत से इस पुस्तक को भारतीय स्तर पर पहली पुस्तक कहा। पुस्तक की सफलता की भी सभी ने चर्चा की।

रफां : ‘भीड़ सतर में चलने लगी है’-1 मार्च, 2002

1 मार्च, 2002 को रमणिका गुप्ता के कविता-संग्रह ‘भीड़ सतर में चलने लगी है’ (कविता-संग्रह) लेखिका रमणिका गुप्ता का लोकार्पण विख्यात कवि श्री केदारनाथ सिंह ने ‘विश्व पुस्तक मेला’, प्रगति मैदान, नई दिल्ली में ‘रमणिका फाउंडेशन’ एवं ‘शिल्पायन’ के संयुक्त बुक स्टाल पर किया जिसमें नामवर सिंह, राजेन्द्र यादव एवं अनेक बुद्धिजीवी शामिल हुए। ‘कदम’ (दलित संस्थान) की अध्यक्ष रजनी तिलक ने इस कार्यक्रम का संचालन किया।

रफां : ‘आदिवासी स्वर और नई शताब्दी’ एवं ‘पंजाबी साहित्य में दलित कदम’µ4 मार्च, 2002

विश्व पुस्तक मेले में ‘आदिवासी स्वर और नई शताब्दी’ (खंड-1) की पुस्तक का लोकार्पण, वाणी प्रकाशन के बुक स्टाल पर 4 मार्च, 2002 को मनोहर श्याम जोशी ने किया जिसमें कमलेश्वर, अशोक वाजपेयी, महेश दर्पण तथा राजेन्द्र यादव भी शामिल हुए।

उसी दिन दिनांक 4 मार्च, 2002 को ‘रमणिका फाउंडेशन’ और शिल्पायन के स्टाल पर रमणिका फाउंडेशन द्वारा प्रकाशित ‘पंजाबी साहित्य में दलित कदम’ पुस्तक का लोकार्पण श्री राजेन्द्र यादव जी ने किया जिसमें उपरोक्त सभी लेखक शामिल हुए।

रफां : ‘दलित कहानी संचयन’ 23 मई, 2003

23 मई 2003 को श्रीमति रमणिका गुप्ता द्वारा संपादित और साहित्य अकादेमी द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘दलित कहानी संचयन’ का लोकार्पण साहित्य अकादेमी के सभागार में अकादेमी के अध्यक्ष गोपीचंद नारंग की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। पुस्तक का विमोचन हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार कमलेश्वर जी द्वारा किया गया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. रंजीत साहा ने किया। श्री सच्चिदानंदन सचिव साहित्य अकादेमी ने सभी लोगों का स्वागत किया।

अकादेमी के अध्यक्ष गोपीचंद नारंग ने कहाµपहले साहित्य के अलग कायदे थे। जरूरी नहीं कि दलित साहित्य उसके तकादों को पूरा करे। आज दलित साहित्य का नया सौन्दर्यशास्त्रा वजूद में आ रहा है। सदियों से जात-पात में घिरे लोगों में एक न एक दिन जाग्रति तो होगी ही। पीड़ा को शब्दों में लिखना कोई आसान खेल नहीं है। साहित्य जो त्याग, कुर्बानी, तपस्या व लगन से लिखा जाता है, वही सच्चा साहित्य है। कबीर, मीरा, शाह, हुसैन ने कभी सौंदर्यशास्त्रा की परवाह नहीं की केवल खूने जिगर से लिखा। रमणिका गुप्ताजी बहुत-बहुत बधाई की पात्रा हैं कि इन्होंने दलित लेखकों की रचनाओं को उपलब्ध करवाया।

श्री कमलेश्वर जी ने अपने लोकार्पण भाषण में कहाµदलित साहित्य पेट से लिखा साहित्य है। इसे अब कोई सीमाएं दबोच नहीं सकती। सबसे पहले जो मुझे इस दुनिया में लाई, वह दाई मां दलित थी। वह हाथ मेरी मां के नहीं दाई मां के थे। मेरा अस्तित्व मेरा आधार वही है। जन्म के इसी अनुभव का सारा प्रभाव दलित साहित्य में है। यह संग्रह भारतीय लेखन की उस परंपरा को दिखाता है जो अपरंपरा रही है। उन्होंने कहा कि ब्राह्मणवाद में किताबों में से किताबें निकलती हैं, ज़िंदगी में से नहीं, जबकि दलित साहित्य जिं़दगी सामने लाता है। जहां तक परिवर्तन का सवाल है वह केवल आर्थिक सामाजिक, सांस्कृतिक ही नहीं बल्कि एक सम्यक् चौतरफा परिवर्तन होना चाहिए, जिसकी परिकल्पना दलित साहित्यकार ही कर सकता है। ये परंपरावादी साहित्य नहीं है। चेतना की शक्ल बदलती है तो मनुष्य की आत्मा का परिष्कार शुरू होता है। दलित साहित्य ने परंपरावादी साहित्य के उस झुर्रीदार विकृत चेहरे को उद्घाटित कर दिया है। ब्राह्मणवाद का सौंदर्यशास्त्रा उसे ही मुबारक हो। उन्होंने पुस्तक की चर्चा करते हुए कहा कि यह काम एक संस्थान या एक व्यक्ति को करना चाहिए था। इस काम को साहित्य अकादेमी और रमणिका गुप्ता ने मिलकर किया है इसके लिए ये दोनों बधाई के पात्रा हैं।

जाने-माने पत्राकार इब्बार रब्बी ने पुस्तक की कहानियों पर टिप्पणियां कीं और कहाµयह ऐतिहासिक अवसर है जिसमें विभिन्न भारतीय भाषाओं से अनुवाद करके यह संकलन निकाला गया है। उन्होंने मराठी की ‘मंजिल वाला मकान’ और ‘जब मैंने जाति छुपाई’ कहानी की विशेष चर्चा की। गुजरात के हरीशमंगलम् की कहानी ‘दाई’ का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि दाई मां जिन बच्चों को जन्म दिलाती है, वही बड़े होकर उससे घृणा करते हैं, यह हिंदुत्व की त्रासदी है जो दलित लेखक को सालती है। पंजाबी की ‘बिच्छू’ और ‘रेप’ हिंदी की ‘फुलवा’, ‘अपना गांव’, ‘हरिजन’, ‘अंतिम बयान’, ‘दलित ब्राह्मण’ आदि कहानियों को उन्होंने परिवर्तनशील एवं श्रेष्ठ कहानियां माना। दलित आंदोलन निराश नहीं है। वह चुनौती को स्वीकारता है और कहता हैµहम बार-बार उठेंगे, हम बार-बार उभरेंगे। तुम कितनी बार गिराओ।

पंजाब के मानवतावादी संस्था से जुड़े श्री ज्ञान सिंह बल ने अंबेडकर की विचारधारा की कसौटी पर इन कहानियों को परखते हुए श्रेष्ठ संकलन बताया। उन्होंने यह भी इंगित किया कि सवर्ण जातीय विभेद से पीड़ित हैं, इसलिए उन पर भी दलित साहित्यकारों को लिखना चाहिए। इस पुस्तक की कहानियों को उन्होंने तीन भागों में बांटते हुए बताया कि ये उत्पीड़न, आर्थिक सामाजिक शोषण, आक्रोश, संकल्प तथा परिवर्तन की कहानियां हैं।

कदम संस्था से जुड़े अशोक भारती ने कहा कि-रमणिका जी के जीवन की अलग-अलग भूमिकाएं हमें मिलती हैं। उन्होंने ‘युद्धरत आम आदमी’ के जरिए दलित साहित्य पर हस्तक्षेप किया है। वह हम सबके धन्यवाद की पात्रा हैं। उन्होंने हिंदी की विभिन्न कहानियों की चर्चा की जिसमें विशेषतः ‘डॉ श्यौराज सिंह बेचैन की ‘अस्थियों के अक्षर’ और दयानंद बटोही की कहानी ‘सुरंग’ को श्रेष्ठ बताया और यह जानना चाहा कि इस संकलन में चयनित कहानियों के चयन का आधार क्या है ?

पुस्तक की संपादिका रमणिका गुप्ता ने बताया कि-दलित साहित्य का òोत अंबेडकर की विचारधारा ही है। इसी आधार पर कहानियों का चयन किया गया है। इन कहानियों में दलित लेखकों ने अंबेडकर द्वारा दिए गए दिशा-सूत्रों को प्रतिपादित किया है। दीक्षा के समय बाबा साहब ने नकार और स्वीकार को परिभाषित किया था। इन कहानियों में वह नकार, स्वीकार, बाइस प्रतिज्ञाएं ‘गुलाम को यह अहसास करा दो कि वह गुलाम है तो वह स्वयं आजाद हो जाएगा’, ‘अप्पदीपो भव’, ‘हीन भावना’ छोड़कर अपनी पहचान बनाने और आत्मसम्मान निर्मित करने, अपनी विसंगतियों और जातीयता दूर करके नवसंस्कृति का निर्माण करने की स्पष्ट समझ चिन्हित की गई है। ‘शिक्षित बनो/संघर्ष करो/संगठित होओ का सूत्रा भी इन कहानियों में मुखर है। इनमें संकल्प है तो आक्रोश भी है। उन्होंने कहा कि दलित साहित्य की आलोचना ब्राह्मणवादी सोच से नहीं की जा सकती। दलित साहित्य को बाबा साहब के दर्शन और विचारधारा की कसौटी पर ही तौलना होगा। इसलिए दलित लेखकों की जाति या लेखक के प्रति आलोचक की पसंद या नापसंद किसी साहित्य की कसौटी नहीं हो सकती। पाठक के मन में उस कथा को पढ़कर संवेदना जगीµवह कितना प्रेरित हुआ, इस बटखरे पर आलोचना करनी होगी। उन्होंने कहा कि यह संचयन अंतिम संचयन नहीं और भी कई लेखक हैं जो छूट गए हैंµयह प्रकाशन की अपनी सीमाएं हैं।

अंत में डॉ. रंजीत साहा जी ने सबका धन्यवाद किया।

रफां : ‘अपने घर की तलाश में’ 9 जून, 2004

रमणिका फाउंडेशन द्वारा रांची में आहूत दो दिवसीय अखिल भारतीय साहित्यिक मंच सम्मेलन के दौरान सांथाली कवियत्रा निर्मला पुतुल के प्रथम द्विभाषी कविता-संग्रह अपने घर की तलाश में का लोकार्पण 9 जून, 2004 को कन्नड़ विश्वविद्यालय के आदिवासी विभाग के अध्यक्ष एवं कन्नड़ लेखक के. एम. मित्रा द्वारा थियोसाफिकल हॉल, रांची में किया गया। यह द्विभाषी संकलन-सांथाली एवं हिन्दी भाषा में है। इस पुस्तक के लोकार्पण के समय श्रीमती रमणिका गुप्ता तथा वासवी ने आदिवासियों के साथ गैर-आदिवासी साहित्यकारों के नकारात्मक रुख की जानकारी देते हुए बताया कि किस प्रकार निर्मला पुतुल की इस पुस्तक को साहित्य अकादेमी, दिल्ली द्वारा प्रकाशित होने से रोका गया। सम्मेलन में इसका पूरा ब्यौरा देना इसलिए भी आवश्यक है ताकि आइन्दा आदिवासी साहित्यकारों की उपेक्षाएं होने से रोकी जा सकें।

इस पुस्तक को सम्मिलित रूप से प्रकाशित करने की घोषणा रमणिका फाउंडेशन (अध्यक्ष) और साहित्य अकादेमी (सचिव) द्वारा 1 जून, 2001 को साहित्य अकादेमी के रवीन्द्र भवन में सम्पन्न आदिवासी सम्मेलन में की गई थी। इसी योजना के तहत रमणिका फाउंडेशन ने इस पुस्तक की द्विभाषी पाण्डुलिपि तैयार कर अकादेमी को भेज दी जिससे अकादेमी ने अपने चयन बोर्ड के समक्ष रखा, जिसके

अध्यक्ष श्री गिरिराज किशोर हैं लेकिन चयन बोर्ड के कुछ सदस्यों के विरोध के चलते साहित्य अकादेमी चाहते हुए भी इसे प्रकाशित नहीं कर पाई और उन्होंने पाण्डुलिपि लौटा दी। बोर्ड के अध्यक्ष श्री गिरिराज किशोर ने रमणिका जी को बताया कि बोर्ड के सदस्य श्री केदारनाथ सिंह और अरूण कमल तथा पटना के कुछ अन्य सदस्यों ने बोर्ड की मीटिंग में ही निर्मला पुतुल की पुस्तक छापने का विरोध किया। श्री केदारनाथ सिंह ने निर्मला पुतुल की अकेली पुस्तक छापने की बजाय एक संकलन में उनकी कुछ कविताएं छापने का सुझाव रखा। बाकी बिहार और रांची के सदस्यों ने विरोध ही किया। गिरीराज किशोर जी से यह जानकारी मिलने पर रमणिका जी ने अकादेमी के सचिव व अध्यक्ष को एक विरोध-पत्रा लिखा और बोर्ड की मीटिंग दोबारा बुलाने का आग्रह किया, जिसकी प्रतियां उन्होंने चयन बोर्ड के अध्यक्ष गिरिराज किशोर और सदस्य केदारनाथ सिंह तथा अरूण कमल को भी भेजीं। दूसरी बार मीटिंग बुलाई गई। उस मीटिंग में भी बिहार और रांची के प्रतिनिधियों ने मुखर विरोध किया, खासकर रांची की ऋता शुक्ल और पटना के अरूण कमल ने। इतना ही नहीं दूसरी मीटिंग में तो रांची के सदस्यों ने निर्मला पुतुल को आदिवासी की बजाय उनके पंजाबी होने की बात कहकर भी पुस्तक छापने की अनुमति देने से इन्कार किया। किसी प्रकार गिरिराज किशोर जी ने इस पुस्तक को रिव्यू के लिए डोमन साहू समीर के पास भेजने का प्रस्ताव पारित कराया। वहां से उत्तर नहीं आया और ऐसे हालात में अकादेमी ने इसे छापने में अपनी असमर्थता जाहिर की। तब रमणिका फाउंडेशन ने इस पुस्तक को स्वयं ही छापने का निर्णय लिया। विरोधों के बावजूद भी यह पुस्तक छपी और दिल्ली ही नहीं देश भर के साहित्यिक केंद्रों ने निर्मला पुतुल की इस पुस्तक का स्वागत किया और इसे सराहा। दुःख तो कतिपय गैर-आदिवासी लेखकों के रवैये पर है। रमणिका फाउंडेशन को इस बात का गर्व है कि उन्होंने इतनी सक्षम आदिवासी कवयित्रि को अपनी पहचान बनाने में मदद ही नहीं की बल्कि गैर-आदिवासी कवियों व लेखकों के इस दंभ को भी चुनौती दी कि लेखक वे ही नहीं हैं, आदिवासियों में भी उनसे अच्छे लेखक मौजूद हैं। रमणिका फाउंडेशन यह मानती हैं ऐसी परिस्थितियों में निर्मला पुतुल की पुस्तक तत्काल न छापना, न केवल आदिवासी लेखकों की ही उपेक्षा होती बल्कि आदिवासी समाज की उपेक्षा होती।

देश के बड़े केन्द्रों में स्थित कतिपय बड़े कहलाने वाले गैर-आदिवासी लेखकों के ऐसे रवैये को उजागर करना जरूरी समझा गया ताकि लोग जान पाएं कि कैसे दूर-दराज के आदिवासी लेखकों की उपेक्षा शहरों के साहित्यकार करते हैं।