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हमारे बारे में

रमणिका फाउंडेशन : एक परिचय

रमणिका फाउंडेशन की विधिवत स्थापना 29 मई, 1997 को हुई। पूर्व विधायक, एक मजदूर नेत्रा, संपादक ‘युद्धरत आम आदमी’, लेखिका, कवियत्रा कथाकार एवं चिन्तक रमणिका गुप्ता और बॉटनी के जाने-माने विद्वान, उस समय विनोबा भावे विश्वविद्यालय के कुलपति श्री कृष्ण कुमार नाग इस संस्था के संस्थापक सदस्य हुए। यह फाउंडेशन श्रीमती रमणिका गुप्ता का मानस-शिशु है जो एक महत्वपूर्ण सामाजिक व्यक्तित्व है। उन्होंने सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों को नई पहलकदमियों की शृंखला के माध्यम से एक नया आयाम दिया है। उनकी इच्छा, उनका दृढ़ निश्चय और उनकी योग्यता ने औरों को भी मानवीय कारणों से फाउंडेशन को, गूंगे को आवाज़ देने वाला एक शक्तिशाली और लोकप्रिय मंच बनाने के लिए प्रेरित किया है।

संस्था का उद्देश्य हाशिए पर किए गए लोगों, जमातों, व्यक्तियों को विकास करने में सहायक होकर, उनमें आत्म-सम्मान जगाना और उन्हें समाज में प्रतिष्ठित करना है। इस श्रेणी में दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, महिला और बच्चे आते हैं। इनमें सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक चेतना लाने के लिए जहां एक तरफ इन्हें जागरूक करने और व्यक्तित्व का विकास करने हेतु साहित्य, कला, शिल्प, मीडिया, सेमिनार, कांफ्रेस, गोष्ठियां, पुस्तकालय, फिल्म, प्रदर्शनी, वकर्शाप आदि को माध्यम बनाने का निर्णय हुआ, वहीं दूसरी तरफ इन्हें रोज़गार के योग्य बनाने हेतु विभिन्न ट्रेडों में प्रशिक्षण देने की योजना भी बनी। राजनीतिक चेतना के लिए कानूनी सलाह देना और संगठित करना भी तय पाया गया। इन्हें जागरूक करने और सामाजिक राजनीतिक तथा अर्थिक तौर पर सक्षम बनाने हेतु रमणिका फाउंडेशन ने जो कार्य, अपने स्थापना काल से आज की तिथि के अन्तराल में किए, उनका ब्यौरा आगे पन्नों में दर्ज है।

एक भारतीय एन.जी.ओ. (स्वयंसेवी संस्था) के रूप में वर्षों से सक्रिय रमणिका फाउंडेशन जो आदिवासी, दलित, अल्पसंख्यक एवं स्त्रा जैसे उपेक्षित और शोषित समुदायों के सशक्तिकरण द्वारा अपनी स्पष्ट दृष्टि और उद्देश्यों के साथ समाज में समतामूलक बदलाव की आकांक्षी है, को वैचारिक और भौतिक दोनों स्तर पर कई सफल शुरुआतों का सूत्राधार बनने और मार्गदर्शक की भूमिका निभाने में विशेषज्ञता हासिल है। फाउंडेशन आम आदमी के प्रयासों, संघर्षों, आशाओं और आकांक्षाओं को गति देने वाले एक परिवर्तनशील एवं शिष्ट समाज को विकसित करने के लिए प्रयासरत है जो हाशिये पर कर दिए गए लाखों लोगों को मानवीय अधिकार, सम्मान, स्वास्थ्य एवं शिक्षा सुनिश्चित कर सके। हम यह मानते हैं कि सिविल समाज का यह सामूहिक दायित्व बनता है कि वह गरीब और कमजोर लोगों को राष्ट्र की मुख्यधारा में लाए चूंकि वे एक पक्षपाती, पूर्वाग्रह ग्रसित सामंती जातिवादी व्यवस्था द्वारा योजनाबद्ध तरीके से बर्बर शोषण के शिकार होते रहे हैं। संस्थागत भेदभाव के शिकार लोगों को, जो आधुनिक समाज मुक्त न करा सके, उसे सभ्य या जनतांत्रिक समाज कहलाने का कोई हक नहीं। इस विचार से लैस फाउंडेशन का मुख्य एजेंडा आरंभ से ही ऐसी सामाजिक-सांस्कृतिक शक्तियों को निर्मित करना रहा है, जो लोगों के नज़रिए में दृष्टिकोणात्मक बदलाव लाने के लिए जरूरी हैं। इस व्यापक आदर्श को आकार देने तथा इस दृष्टि को यथार्थ में बदलने हेतु यदि पूर्णरूपेण नहीं तो भी पर्याप्त मात्रा में सुगठित और ठोस ढंग से गत कई वर्षों से फाउंडेशन ने जन-शिक्षा तथा जन-चेतना व जागृती लाने हेतु कई कैंप आयोजित किए। इसके अतिरिक्त वह कई सांस्कृतिक एवं साहित्यिक कार्यक्रम भी आयोजित करती रही है। बदलाव हेतु सतत् प्रयोगरत फाउंडेशन का यह निश्चित मत है कि केवल बदलाव हेतु प्रतिश्रुत मानसिकता ही क्रांतिकारी परिवर्तन की मानसिकता का वातावरण बना सकती है, जहां गली के हर छोर पर अवस्थित अन्तिम व्यक्ति को भी सम्मान से जीने का हक होगा। यह उलटफेर समाज को सचमुच में जनतांत्रिक बनाकर ही संभव है और इससे संपूर्ण परिवर्तन की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। 21 वीं सदी की दहलीज पर भारत एक संक्रमणकालीन एवं परिवर्तनशील स्थिति से गुजर रहा है। रास्ते के पारंपरिक अवरोधों की परवाह न करते हुए जनता का जनतांत्रिक संघर्ष कई रूपों और कई स्तरों पर पूरी गंभीरता से शुरू हो चुका है। देश के कोने-कोने में समाज का कमजोर वर्ग, खासकर दलित, आदिवासी और महिलाएं, सदियों से उन पर थोपे जा रहे तिरस्कारों और कष्टों को अब सहन करने के लिए तैयार नहीं है और वे लगातार अपनी आवाज बुलंद करते जा रहे हैं।

रमणिका फाउंडेशन को भारत में सतत् चल रही जनतांत्रिक क्रांति का एक अंग होने पर गर्व है चूंकि त्रास्त जमातें उन शक्तियों की खिलाफत करने के लिए धीरे-धीरे एकजुट हो रही हैं जिन्होंने उन्हें सदियों से अन्धेरे में कैद रखा था। फाउंडेशन का पूरा प्रयास और गतिविधियां जनता के कानूनी अधिकारों के न्यायसंगत संघर्ष की पक्षधर व समर्थक हैं, जो प्रत्येक प्राणी का सरोकार है, यदि नहीं है तो होना चाहिए। प्रत्येक सही सोच एवं लोकतंत्रा में आस्था रखने वाले व्यक्ति का नैतिक दायित्व बनता है कि वह असहायों एवं पीड़ित मनुष्य की रक्षा में खड़ा हो। क्या हम आपको अपने साथ गिन सकते हैं? बेहतर व्यवस्था और खुशहाल भविष्य के लिए क्या आप हमारी मानवीय मुहिम से जुड़ना चाहेंगे? यदि आपकी इसमें दिलचस्पी हो तो हमारे विषय में कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां हैं।