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कंसेप्ट नोट : रफां/अभासम

कॉन्सेप्ट-नोट : रमणिक फाउंडेशन एवं अखिल भारतीय आदिवासी साहित्य मंच

रमणिका फाउंडेशन, हाशिये पर जीने वाले और उत्पीड़ित शोषित समुदायों, खासकर आदिवासियों के सशक्तीकरण द्वारा समाज में बदलाव लाकर बराबरी का दर्जा दिलाने के लिए प्रतिबद्ध है। हमारी मान्यता है कि संस्थागत भेदभाव के शिकार लोगों को जो आधुनिक समाज मुक्त न करा सके, उसे सभ्य या जनतांत्रिक समाज कहलाने का कोई अधिकार नहीं है।

हमारा मुख्य उद्देश्य, कार्यक्रम एवं एजेन्डा आरम्भ से ही ऐसी सामाजिक-सांस्कृतिक शक्तियों को निर्मित करना रहा हैµजो अन्याय के शिकार लोगों, खासकर आदिवासियों, दलितों और स्त्रियों के प्रति लोगों के भावनात्मक नजरिये में दृष्टिकोणात्मक बदलाव लाने के लिए-जरूरी हैं। इसके लिए यह बहुत आवश्यक है कि अन्याय, शोषण और भेदभाव की शिकार जमातें आगे आएं और समवेत रूप से अपनी बात पेश करें। अपना हक जताने के लिए वे सक्षम हों, इसके लिए जरूरी है कि सदियों से चले आ रहे दमन और दासता के चलते उनके मानस में जड़ जमाए बैठी हीनता की ग्रन्थि से वे मुक्त हों और अपने आत्मसम्मान और अस्मिता के लिए संघर्ष करें।

यद्यपि उन्होंने अपनी अस्मिता, आत्मसम्मान, अवसरों की समानता और अधिकारों के लिए देश के विभिन्न हिस्सों में संघर्ष शुरू कर दिया है लेकिन अभी भी वे आवाजें बिखरी-बिखरी हैं और बिखरे हैं उनके संघर्ष, प्रतिरोध और हक के दावे! विशेषकर आदिवासियों के मामले में सच्चाई यही है कि किसी राष्ट्रीय नेतृत्व के अभाव में, एक ही वक्त अथवा अलग-अलग काल में, देश के अलग-अलग हिस्सों में µ इससे अनजान कि उनके साथी भी उन्हीं मुद्दों पर उसी समय अन्यत्रा संघर्ष कर रहे हैं µ वे लोग विरोध, संघर्ष व विद्रोह करने में नेतृत्वकारी भूमिका निभाते रहे हैं। अंग्रेजों द्वारा अपनी जमीनों पर सामूहिक अधिकार के विपरीत व्यक्तिगत सम्पत्ति का अधिकार लागू किए जाने के खिलाफ उन्होंने वीरतापूर्वक अंग्रेजों व उनके पिट्ठू राजपूत राजाओं, महाराजाओं के खिलाफ युद्ध किया। उन्होंने सूदखोर, महाजनों जिन्होंने उनकी जमीनें हथिया ली थीं, के शोषण के विरुद्ध बहादुरी से लड़ाईयां लड़ीं। वे जमींदारों, सामंतों तथा विदेशियों द्वारा लागू की गई नई राजस्व नीति के खिलाफ साहस के साथ उठ खड़े हुए और ऊलगुलान (क्रांतिकारी विद्रोह) कर दिए। अंग्रेजों और उनके शासन के खात्मे के लिए 1857 की तथाकथित आजादी की लड़ाई के बहुत पहले शुरू किए गये उनके ये संघर्ष, वास्तव में वर्ग-संघर्ष और राजनीतिक लड़ाईयां ही थे। संथाल परगना का ‘संथाल हूल’ और सूदखोरों और पुलिस के अत्याचारों के खिलाफ सिद्धू कानू की मुहिम, 1857 के पहले ही चलाई गई थी। बिरसा का विद्रोह 1857 के तुरंत बाद अर्थात् 1859 में शुरू हुआ था। आंध्र के आदिवासियों पर दोरा (गोरा) और उनके गुर्गों द्वारा ढाए गए जुल्मों के खिलाफ ‘फितूरी’ नाम का आदिवासी विद्रोह श्रीराम राजू के नेतृत्व में हुआ था। महात्मा गांधी के ‘पूर्ण स्वराज’ या ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन के बहुत पहले यह श्रीराम राजू ने घोषणा की थी कि ”हमारी लड़ाई दोरा (गोरा) के खिलाफ है और उन्हें भारत छोड़ना होगा ।“

अंग्रेज सरकार को लगान न देने की गोविन्द गुरु की घोषणा और उनके बर्तानियां राज तथा राजस्थान एवं गुजरात के राजपूत राजाओं के खिलाफ जबरदस्त अभियान से अंग्रेज इतने क्रोधित हुए कि उन्होंने राजस्थान की बांसवाड़ा पहाड़ियों में एक ही रात में 1500 भीलों को गोलियों से भून डाला। इतिहासकारों ने आदिवासियों के इस या ऐसे अनेकों विद्रोहों और बलिदानों को कभी भी मान्यता नहीं दी, जबकि यह जलियांवाला बाग से भी बड़ा नरसंहार था।

हमने आदिवासी लेखकों, कलाकारों एवं सक्रिय कार्यकर्ताओं को एक साथ, एक मंच पर लाने का काम हाथ में लिया है ताकि आदिवासियों का सामूहिक नेतृत्व जो ऐसे प्रयासों से राष्ट्रीय स्तर पर उभरेगा, अपने समान मुद्दों को उजागर कर सकने मे सक्षम होगा ।

फाउंडेशन ने उनके साहित्य से तथाकथित मुख्यधारा के लेखकों को परिचित कराने की जरूरत महसूस की। आज तक गैर-आदिवासी लेखक ही आदिवासियों के बारे में लिखते रहे हैं, बिना इस बात की चिंता किए कि वास्तव में आदिवासी क्या चाहते हैं, सोचते हैं या सपने बुनते अथवा कल्पना करते हैं। वे ही उनका प्रतिनिधित्व करते रहे हैं। हम इस प्रक्रिया पर विराम लगाना चाहते हैं। इसलिए हमने उल्टी प्रक्रिया शुरू कर दी अर्थात् अन्याय और भेदभाव के शिकार व पीड़ित, अपने लिए स्वयं बोलें और बतलाएं कि वे किस किस्म का बदलाव श्रेयस्कर समझते हैं या विकसित करना चाहते हैं?

वाहरू सोणवने जो महाराष्ट्र के महान् आदिवासी कवि हैं की निम्नलिखित कविता ‘स्टेज’ में इस भावना को सुंदर ढंग से व्यक्त किया गया हैं।

स्टेज

  • हम कभी उस स्टेज पर नहीं गए जो हमारे नाम पर बनायी गयी थी
  • उन्होंने हमें आमंत्रित नहीं किया
  • उन्होंने अपनी अंगुली से इशारा किया
  • और हमें हमारी जगह दिखा दी
  • हम वहां बैठे
  • उन्होंने हमारी तारीफ की
  • वे हमें ही हमारे अपने संकल्पों और संतापों
  • का वर्णन सुना रहे थे
  • जो केवल हमारे थे, कभी भी उनके नहीं थे
  • हमारे कुछ संशय थे
  • हम बुदबुदाए
  • उन्होंने ध्यान से हमें सुना और आहें भरीं
  • उन्होंने हमारे कान उमेठे और कहा -
  • ‘माफी मांगों...नहीं तो तुम्हें....’

आज इन्हीं सब वजहों से आदिवासी साहित्य को सामने लाने की जरूरत है।

आदिवासियों में प्रख्यात विद्वान्, महान् साहित्यकार, मानवशास्त्रा, इतिहासकार, शिक्षाविद्, भाषाविद्, पत्राकार, राजनीतिज्ञ और उत्साही बुद्धिजीवी हैं। वे विभिन्न क्षेत्रों में काम कर रहे हैं लेकिन बिखरे हुए हैं। यदि वे एकजुट होकर, समान एजेंडे पर एक स्वर में बोलें तो एक ऐसा वातावरण सृजित किया जा सकता है जिससे दृष्टिकोणात्मक एवं भावनात्मक परिवर्तन लाने हेतु समाज और सरकार पर दबाव बना का प्रभावित किया जा सकता है। समानता, भाईचारा और आजादी आधारित एक नई सामाजिक व्यवस्था के निर्माण हेतु जोर-शोर से उत्साहपूर्वक कार्य किया जा सकता है चूंकि अनेकों अत्याचार सहने के बावजूद भी यही उनकी विरासत है - उनकी संस्कृति है।

यह मीडिया और प्रचार का युग है। इसलिए जब तक आदिवासियों के निमित्त संगठित तरीके से लड़ाई नहीं लड़ी जाएगी अथवा जब तक अन्याय का प्रतिरोध नहीं किया जाएगा, कार्यशालाओं, सम्मेलनों और गोष्ठियों का आयोजन कर बुद्धिजीवियों, साहित्यिकारों और समाज के अन्य विशिष्ट लोगों के सहयोग से लेख और कहानियां प्रकाशित कर, मीडिया को स्थिति से अवगत नहीं कराया जाएगा, तब तक यह मसला रफ्तार नहीं पकड़ सकता। हम यही करने का प्रयास कर रहे हैं। हम आदिवासी लेखकों, कलाकारों और सक्रिय कार्यकर्ताओं को एक जगह इकट्ठा कर, उन्हें अपने मसलों के बारे में लिखने, बोलने और विमर्श करने तथा उदार गैर-आदिवासियों से अपने मुद्दों पर समर्थन प्राप्त करने के लिए संवाद व मैत्रा कायम करने हेतु प्रेरित करते हैं ताकि गैर-आदिवासी और मितभाषी आदिवासी में अपने साहित्य के अनुवाद और अभिलेखों के प्रस्तुतीकरण द्वारा संवाद स्थापित किया जा सके। उन्हें खुद अपने लिए लड़ना पड़ेगा जिसके लिए सामूहिक नेतृत्व तैयार होना जरूरी है। यह काम सबसे अच्छी तरह आदिवासी लेखकों और बुद्धिजीवियों द्वारा ही किया जा सकता है।

रमणिका फाउंडेशन ने छः साल पहले यानी 1998 में अपनी पत्रिका ‘युद्धरत आम आदमी’के आदिवासी संस्करणों के प्रकाशन की घोषणा करके इस प्रक्रिया की शुरुआत की थी, जिनमें केवल आदिवासी लेखकों की रचनाएं ही आमंत्रित की गई थीं। वर्ष 2001 और 2002 में क्रमशः ‘आदिवासी स्वर और नई शताब्दी’ खण्ड-1 और खण्ड-2 के नाम से पत्रिका के विशेष संस्करण प्रकाशित हुए। इन संस्करणों में लोकगीत, लोककथाएं, लघुकथाएं, कविताएं, उपन्यास, नाटक, संस्मरण, आत्मकथाओं के हिस्से, धर्म, भाषा, इतिहास, विस्थापन, विकास, आदिवासी समाज में स्त्रियों का स्थान, उनकी जीवन शैली एवं समाज तथा उनके विद्रोहों, आंदोलनों और उनकी शहादतों की आदिवासी लेखकों द्वारा लिखित रचनाएं प्रकाशित कीं। ये रचनाएं आदिवासी बोलियों और ग्यारह अन्य भारतीय भाषाओं से अनूदित की गई थीं ताकि आदिवासी लेखक समुचित रूप से हाइलाईट हो सके, वे तथाकथित मुख्यधारा के लेखकों से रू-ब-रू हों ताकि दोनों के बीच संवाद की शुरुआत हो। हालांकि हम यह महसूस ही नहीं विश्वास करते हैं कि आदिवासी साहित्य ही वास्तविक भारतीय साहित्य है।

फाउंडेशन आदिवासी साहित्य पर कुछ विशेष प्रकाश डालना चाहती है। हालांकि आदिवासी साहित्य का अस्तित्व युगों से है लेकिन यह साहित्य या तो केवल आदिवासियों तक ही सीमित रहा या दूसरों द्वारा अपने लाभ हेतु इसका उपयोग किया जाता रहा। यूं तो आदिवासियों को ही नुमाईश की चीज़ बनाकर रखने का रिवाज विश्वभर में प्रचलित रहा है और आज भी है। भारत भी उससे भिन्न नहीं रहा। इसलिए उनके साहित्य को भारत में भी आज तक मान्यता नहीं मिली।

कहा जाता है कि जब कोई आदिवासी बोलता है तो वह गाता है, जब चलता है तो नाचता है। विडंबना यह है कि वह समुदायµजिसके पास कला और संस्कृति की इतनी समृद्ध परंपरा हैµको तथाकथित मुख्यधारा के समक्ष कभी भी अपने सच्चे रूप में प्रस्तुत होने नहीं दिया गया। लोगों में यह धारणा भी प्रचलित है कि आदिवासी केवल नाचते और गाते हैं। यह सच नहीं है। वे गुस्सा भी होते हैं प्रतिरोध भी करते हैं और प्रतिकार में संघर्ष भी! ये सब उनके साहित्य में चाहे वह लेक साहित्य हो µ चाहे समकालीन, प्रतिबिंबित होता है। वास्तव में आदिवासी साहित्य जीवन और प्रकृति का समरूप है और दोनों एक यथार्थ हैं। आदिवासी प्रकृति पर अपना वर्चस्व कायम करने की प्रवृत्ति नहीं पालता। वह प्रकृति का सहयोगी है। उनके साहित्य को उनके जीवन और समस्याओं से अलग नहीं किया जा सकता। उन्होंने अपनी संस्कृति, भाषा और जीवनशैली का युगों से संरक्षण किया है लेकिन अब वह खतरे में है।

  • यह विडंबना ही है कि भारत सरकार उन प्रवासी भारतीयों µ जो दूसरे देशों के नागरिकता ले चुके हैं का स्वागत कर रही है लेकिन वह भारत में आदिवासियों / मूल निवासियों के होने को ही यानी अस्तित्व को ही नकार रही है। उन्हें अपनी पहचान से वंचित करने और उन्हें हिंदू संस्कृति एवं संप्रदाय का हिस्सा बनाने के लिए योजनाबद्ध तरीके से आदिवासी के बदले ‘वनवासी’ नाम दिया जा रहा है ताकि उन्हें अपने बंधुओं को मारने के लिए हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा सके, जैसाकि गुजरात में हुआ। भारतीय संविधान में भी आदिवासी को ‘जनजाति’ कहकर उसे जाति के कटघरे में खड़ा कर दिया है, जबकि आदिवासियों में कोई जाति ही नहीं होती।
  • आज उन्हें अपने जंगल और उसकी पैदावार से वंचित किया जा रहा है जो उनके जीवनयापन का सबसे प्रमुख साधन है। वे ‘जल-जंगल-जमीन’ और ‘लाठा-छावन-जलावन’ अर्थात् सिंचाई के लिए लाठा घर छाने तथा आग जलाने के लिए लकड़ी से भी वंचित किये जा रहे हैं। जंगलों के वाणिज्यीकरण और हमारी सरकार के प्रतिकूल जंगल कानूनों के कारण ही ऐसा हुआ है। ‘जंगल सीमारेखा निर्धारण कानून’ के कारण जंगलों में आदिवासियों के प्रवेश और जंगल की पैदावर तक उनकी पहुंच पर रोक लग गई है।
  • बांध, खनन कार्य और कोयले का ओपेन कॉस्ट खनन, जो विश्व बैंक और औद्योगीकरण की नीति के तहत किया जा रहा है, के कारण विस्थापितों की बड़ी जमात खड़ी हो रही है। अन्य सभी सरकारी व गैर-सरकारी विकास योजनाएं भी आदिवासियों को उनकी जमीन और जंगल, दोनों से वंचित कर रही हैं। इस प्रकार वे जंगल पर अपने अधिकार खो रहे हैं। किसान और खेतिहर अपनी सामाजिक स्थिति गंवाकर झारखंड के कोयलाक्षेत्रों में ‘कोयलाचोर’ कहलाने लगे हैं। वे अपनी जड़ों, संस्कृति, भाषा और जीवनशैली से कटकर भट्ठा मजदूर अथवा भूमिहीन श्रमिक बन गए हैं।
  • सबसे बुरी हालत विमुक्त और घुमंतू जनजातियों की है। वे अभी भी ‘अपराधी’ होने का कलंक ढोते हैं और उन्हें उन सभी सुविधाओं से जो अंग्रेज़ों ने अपराधी के रूप में अधिसूचित करते हुए उन्हें दी थीं, वंचित कर दिया गया है। दरअसल इन सरकार ने इन जनजातियों को विमुक्त करने के बाद किसी भी अनुसूची में नहीं रखा। ऊपर से उनपर क्षेत्राय प्रतिबंध भी लगा दिया, जिसके कारण इनकी परेशानी और बढ़ गई । आंध्र प्रदेश में जो परिवार अनुसूचित जनजाति का समझा जाता है तो वह उसे उदाहरणार्थ कर्नाटक में अनुसूचित जाति का दर्जा दिया जाता है। महाराष्ट्र और देश के अन्य भागों में वह किसी भी अनुसूची के तहत नहीं आता। इसके चलते वे जनजाति होने की सुविधाओं से तो वंचित हो ही जाता है लेकिन उसकी जाति पर लगे ‘अपराधी’ होने के कलंक का ठिप्पा उसे जेल के सींखचों में आज भी बंद करवा देता है।
  • कुछ जनजातियां अभी भी आदिम अवस्था में रह रही हैं और उनकी शिक्षा और विकास के लिए सरकार या समाज द्वारा कुछ भी नहीं किया जा रहा।
  • आदिवासियों को अपनी मातृभाषा में शिक्षा नहीं दी जा रही इसलिए प्राथमिक विद्यालय स्तर पर पढ़ाई छोड़नेवालों की दर बहुत ऊंची है। झारखंड में विश्वविद्यालय स्तर पर स्नातकोत्तर वर्गों और पीएचडी के लिए नौ आदिवासी भाषाओं का चयन किया गया है लेकिन स्कूल और कालेजों में इनकी पढ़ाई का कोई प्रबंध नहीं है।
  • अब आदिवासी बुद्धिजीवियों, साहित्यिक लोगों, लेखकों और कवियों को यह बात समझ में आ रही है कि उनके समुदायों को बड़े दांतों, सींगों व पूंछ वाला दर्शाने की साजिश उन्हें नीचा दिखाकर अपमानित, अवमानित (डीमॉरेलाइज) व हतोत्साहित कर हीन भावना से ग्रस्त करने हेतु रची गई थी। वे अब ऐसे साहित्य व धर्मशास्त्रों में संशोधन की मांग करने लगे हैं जो मनुष्य-मनुष्य के बीच भेदभाव ही नहीं प्रचारित करते बल्कि उनके समुदाय व उनके मनुष्यत्व को अपमानित करते हैं।
  • आदिवासी इतिहासकार समझ चुके हैं कि आदिवासियों ने भारत के विकास में बहुत योगदान किया है और विदेशी आक्रमणकारियों से वीरतापूर्वक युद्ध किया है लेकिन उनके वीरतापूर्ण कार्यों को इतिहास में अंकित नहीं किया गया है। वे महसूस करते हैं कि आदिवासियों के इतिहास का अन्वेषण कर उसे लिखा जाना चाहिए और उनकी साहित्यिक कृतियों के साथ उसे पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए।
  • आज भूमंडलीकरण और निजीकरण का मसला भी अहम् है क्योंकि इसका आदिवासियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। इसके चलते वे अपनी जीविका से वंचित तो हो ही रहे हैं वे अपनी जमीनें भी गंवा रहे हैं। उनके लिए नौकरी के अवसर नहीं रहेंगे। भूमंडलीकरण के साथ मुख्य समस्या है कि यह केवल पूंजी को देश के बाहर जाने देता है न कि श्रमशक्ति या श्रमिक वर्ग को। इस कारण बेकारी बढ़ती है। युवावर्ग के पास जीविका का कोई विकल्प नहीं रह जाता है इसलिए वे बंदूक उठा लेते हैं और अपनी बात सुनाने के लिए गोलियों का सहारा लेते हैं।
  • देश के कोने-कोने में समाज का कमजोर वर्ग, खासकर दलित, आदिवासी और स्त्रियां सदियों से उन पर थोपे जा रहे तिरस्कारों और वंचना को अब और अधिक सहन करने को तैयार नहीं है। अब वे लगातार आगे आकर बढ़-चढ़कर अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं।

रमणिका फाउंडेशन को इस बात का गर्व है कि वह भारत में सतत् चल रही इस लोकतांत्रिक जनतांत्रिक क्रांति का एक हिस्सा है क्योंकि त्रास्त जमातें उन शक्तियों के खिलाफ धीरे-धीरे एकजुट हो रही हैं, जिन्होंने इन्हें शताब्दियों तक अंधेरे में कैद कर रखा है। फाउंडेशन एवं अखिल भारतीय आदिवासी साहित्यिक मंच का पूरा प्रयास व गतिविधियां, जनता के विधिसम्मत अहस्तांतरणीय अधिकारों के न्यायसंगत संघर्ष की समर्थक व पक्षधर हैं जो प्रत्येक प्राणी का सरोकार है, यदि नहीं है तो इसे प्रत्येक आदमी की चिंता का विषय होना चाहिए। हरेक सही सोच एवं लोकतंत्रा में आस्था रखने वाले व्यक्ति का नैतिक दायित्व बनता है कि वह असहाय एवं पीड़ित, खासकर उत्पीड़ित लोगों के हितार्थ उठ खड़ा हो और उनके संघर्षों में मददगार बने। क्या हम आपको अपनों में से एक गिन सकते हैं? क्या आप बेहतर व्यवस्था और अधिक खुशहाल कल के लिए हमारे मानवीय अभियान में भागीदारी के इच्छुक हैं? यदि हैं तो आईये इन मुद्दों पर साथ चलेंµसाथ-साथ संघर्षरत होंµसाथ-साथ समाधान खोजें।

अखिल भारतीय आदिवासी साहित्यिक मंच का ग्यारह सूत्राय एजेण्डा

  • 1. ‘विकास के नाम पर विनाश’ की वर्तमान सरकारी नीति का विकल्प, जमीन व जंगल के अधिकारों की सुरक्षा, आदिवासियों की हड़पी हुई जमीन की वापसी तथा जल-जंगल-जमीन और लाठा-छावन-जलावन के अधिकार।
  • 2. आदिवासी अस्मिता, आत्मविश्वास और आत्मसम्मान का निर्माण एवं वनवासी और संविधान में जनजाति शब्द के प्रयोग का नकार।
  • 3. आदिवासी इतिहास की खोज और पुनर्रचना,
  • 4. साहित्य और मिथकों, खासकर भारतीय साहित्य और धर्मशास्त्रों में, आदिवासियों के अपमानजनक चित्राण का नकार एवं पुनर्मूल्यांकन।
  • 5. आदिवासियों की शिक्षा उनकी मातृभाषा में एवं आदिवासी भाषा और साहित्य का उनकी पाठ्य-पुस्तकों और पाठ्यक्रम में समावेश।
  • 6. आदिवासी संस्कृति में स्त्रियों का स्थान एवं सम्पत्ति में बराबर हिस्से का प्रावधान।
  • 7. भारतीय संस्कृति और इतिहास के निर्माण में आदिवासियों के योगदान को मान्यता एवं स्वीकृति को दर्ज करना।
  • 8.घुमंतू व विमुक्त जनजातियों के मूल नागरिक और संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा।
  • 9.उपेक्षित आदिम जनजातियों की उन्नति और विकास हेतु विशेष योजनाएं, अध्ययन एवं शोध कराया।
  • 10.संवाद, वार्ता और एकजुटता हेतु आदिवासी साहित्य का अनुवाद।
  • 11.आदिवासियों पर भूमंडलीकरण के दुष्प्रभाव के विरुद्ध संघर्ष।