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क्रूसेडर

संस्थापक के बारे में - क्रूसेडर

यह फाउंडेशन श्रीमती रमणिका गुप्ता का मानस-शिशु है जो एक महत्वपूर्ण सामाजिक व्यक्तित्व हैं और जिन्होंने सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों को नई पहलकदमियों की शृंखला के माध्यम से एक नया आयाम दिया है। उनकी इच्छा, उनका दृढ़ निश्चय और उनकी योग्यता ने औरों को भी मानवीय कारणों से फाउंडेशन को, गूंगे को आवाज़ देने वाला एक शक्तिशाली और लोकप्रिय मंच बनाने के लिए प्रेरित किया है। बचपन से ही विद्रोही वे बहुआयामी व्यक्तित्व की धनी हैं। आज वे एक सामाजिक कार्यकर्ता, संस्कृतिकर्मी, समकालीन हिन्दी साहित्य की महत्वपूर्ण लेखिका-कवयित्रा और एक श्रमिक नेता के रूप में ख्यात और प्रतिष्ठित हैं। उनकी गतिविधियां और समर्पण ऊपरी तौर पर भले ही बिखरीं और उग्र या दुष्कर लगें लेकिन जो भी गहराई में जाकर विचार करेगा वह महसूस करेगा कि आदिवासी, दबे-कुचले व वंचित समाज के बेहतर भविष्य के आदर्श से उनका जीवन-दर्शन जुड़ा हुआ एवं प्रभावित है। सामान्य आदमी की योग्यता और अच्छाई में उनका अदम्य विश्वास है। वे मानती हैं कि हर प्रकार के अन्याय को बढ़ावा देने और उसे वैधानिकता प्रदान करने वाले पारंपरिक वंशानुगत सामाजिक वर्गीकरण को नष्ट करने में जनसाधारण महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगा। श्रमिक आंदोलन के प्रमुख पैरोकार के रूप में पैंतीस वर्षों से झारखंड के छोटानागपुर क्षेत्रा में आदिवासियों, दलितों एवं स्त्रियों के अधिकार के लिए वे एक अंतहीन संघर्ष छेड़े हुए हैं। वहां घर-घर में लोग उन्हें जानते हैं। वे वाम-लोकतांत्रिक संगठन से जुड़ी हुई हैं और विधान सभा तथा विधान परिषद में दलितों का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात है कि आज के दौर में जबकि लोगों का निजी जीवन और सामाजिक जीवन में परस्पर मेल कठिन है उनका मौलिक जीवन-दर्शन और जीवन-व्यवहार एक समान है। उनका जीवन हर प्रकार के अन्याय और अतीतोन्मुख व्यवहार के खिलाफ एक जंग है। 1948 में किए अपने अंतर्जातीय विवाह और समाज तथा परिवार के वर्चस्व के खिलाफ वैयक्तिक स्वतंत्राता और जगह के लिए उन्होंने संघर्ष किया। उन्होंने कभी भी पुरानी अनुपयोगी परंपराओं का आदर नहीं किया।

सामाजिक बदलाव की उनकी इच्छा, उनका दृढ़ निश्चय और व्यग्रता फाउंडेशन की बहुआयामी गतिविधियों से प्रकट लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित है। अपने लेखकीय जीवन में उन्होंने गद्य एवं पद्य विधा की कई महत्वपूर्ण किताबें लिखीं जिसमें उपेक्षितों खासकर आदिवासी और दलित स्त्रियों के प्रति प्रेम और आदर झलकता है, जो उन्हें हृदय से प्रिय हैं। यह उनकी पत्रिका ‘युद्धरत आम आदमी’ के नाम से ही प्रकट होता है जिसका शाब्दिक अर्थ हैµ‘अपने अस्तित्व के प्रति संघर्षरत आम आदमी।’ इस ख्याति प्राप्त पत्रिका का वे वर्षों से कुशल संपादन करती आ रही हैं। उनकी पत्रिका न केवल लोकप्रिय सामाजिक-संस्कृति मुद्दों और गरीबों की समस्या को उठाती हैं बल्कि यह बात भी रेखांकित करने लायक है कि उनके सहयोगी लेखक भी अधिकतर दलित, कमजोर और वंचित दलित आदिवासी समुदाय के ही होते हैं। उन रचनाकारों को हिंदी साहित्य में किसी से भी ज्यादा प्रकाशन और अपनी पत्रिका में गौरवपूर्ण स्थान देकर उन्होंने दलित-आदिवासी व महिला लेखकों के मुद्दों को उठाया है।

‘युद्धरत आम आदमी’ के तेलुगु, गुजराती और पंजाबी साहित्य में दलित लेखन पर केंद्रित विशेषांक और 11 क्षेत्राय भाषाओं के लेखकों द्वारा आदिवासी लेखन पर दो खंडों में ‘आदिवासी स्वर और नई शताब्दी’ विशेषांक उल्लेखनीय कार्य हैं। रमणिका जी ने नाटक, कथा साहित्य एवं विश्लेषणात्मक दलित खंडों का हिन्दी और अहिन्दी भाषाओं में परस्पर अनुवाद कार्य के अलावा दलित लेखन पर आलोचनात्मक कार्य भी किया है। उन्होंने यह सब दलित-आदिवासी प्रतिभाओं को राष्ट्रीय नेटवर्क प्रदान करने के लिए किया है और सामाजिक-सांस्कृतिक रूप से बेहद जरूरतमंद वर्गों में जागरूकता फैलाने की तरफ लोगों के ध्यानाकर्षण के लिए प्रेरक की भूमिका निभाई है।

दरअसल उनकी सारी रचनात्मक ऊर्जा और भौतिक स्रोत, उनका समय और उनकी जगह, एक बड़े सामाजिक लक्ष्य से जुड़े हुए हैं। ऐसे में जबकि वे लंबे हृदय रोग के कारण जीवन के लिए संघर्ष कर रही हैं उनका धैर्य और संघर्ष अंधेरे में रोशनी जलाने की तरह अपने आप में अनूठा है। अपने सपनों को सच करने के लिए वे पूरी जीवंतता, उत्साह और उम्मीद के साथ निरंतर मिशनरी भावना से कार्य करती हैं। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि डिफेंस कॉलोनी स्थित उनका घर जहां से वे अभी संगठन के सारे काम चलाती हैं देश भर के दलित-आदिवासी बौद्धिकों और कार्यकर्ताओं का प्रिय शिविर बन गया है। सचमुच आज वे युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत और आदर्श बन गई हैं और विभिन्न क्षेत्रों-स्तरों से आने वाले युवाओं को आत्मिक प्रेम, स्नेह देकर उनका उत्साह बढ़ाते हुए उनमें नेतृत्व एवं सांगठनिक क्षमता विकसित करती हैं क्योंकि उनका कहना हैµ”यह तो संघर्ष की शुरुआत है...“

रमणिका गुप्ता का व्यक्तित्व एवं कृतित्व राजनीतिक आन्दोलन और संघर्षों के संदर्भ में

22, अप्रैल 1930 को जन्मी रमणिका गुप्ता को बचपन से ही स्वतंत्राता आंदोलन के प्रति भारी लगाव था। वे बचपन से ही दबंग थी। और शोषण का खुलकर विरोध करती थी। वे पटियाला के संभ्रात वेदी कुल में पैदा हुई। उनके पिता स्वर्गीय प्यारेलाल बेदी थे। वे पटियाला रियासत लेफ्टिनेट कर्नल डाक्टर थे। रमणिका गुप्ता की शिक्षा विक्टोरिया कॉलेज पटियाला में आई.ए. तक हुई। इस कम उम्र में भी उन्होंने 1946-47 में बंटवारे के क्रम में जो भूमिका अपनाई वह व्यवस्था के प्रतिरोध की थी। उन्होंने 14 साल की उम्र में ही खादी पहननी शुरू कर दी थी। जब आई.ए. में पढ़ती थीं तो विक्टोरिया कॉलेज फॉर वूमेन, पटियाला में आई.एन.ए. (सुभाष चन्द्र बोस की फौज) की स्पोर्ट में हड़ताल कराई थी और प्राचार्य ने उनकी केनिंग भी की थी। रमणिका जी अरूणा आसफअली और गांधी की अनन्य भक्त रहीं। रमणिका जी साहित्य, कविता, अभिनय, नृत्य के साथ-साथ खेल-कूद में भी शिरकत करती थीं वे कॉलेज की चैम्पियन, नेटबॉल की कैप्टन होने के साथ-साथ वाद-विवाद में भी बहुत हिस्सा लेती थीं।

उन्होंने दंगों का विरोध किया और जिन मुसलमान लड़कियों को दंगाई जबरदस्ती उठा कर ले गए थे उनके संबंध में सार्वजनिक तौर पर तत्कालीन मुख्यमंत्रा गुरुमुख सिंह मुसाफिर और डॉ. सुशीला नैयार के समक्ष महारानी पटियाला की उपस्थिति में कहा कि रियासत के अफसरों के घरमें वे लड़कियां हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि उनको पटियाला के बाहर मामा के यहां भेज दिया गया। विशेष रूप से उल्लेखनीय यह है कि उन्होंने बेदी कुल की होने के बावजूद वेद प्रकाश गुप्ता से, जो अंबाला में उनके मामा की मातहती में सहायक नियोजन पदाधिकारी थे, से प्रेम विवाह किया।

उनके मां-बाप और संबंधियों ने इसका कड़ा विरोध किया। लेकिन उन्होंने वही किया जो उन्हें उचित लगा। आपने शादी के बाद बी.ए., एम.ए. और बी.एड. किया। 1948 में अन्तर्जातीय विवाह सिविल मैरिज विधि से किया।

उनका जीवन संघर्ष का वृत्तांत है और उनका लेखन उस वृत्तांत का प्रतिबिंब। अपना जीवन समाज सेवा में न्यौछावर कर चुकी रमणिका गुप्ता की एक संघर्षशील छवि है। जहां वे सामाजिक परिवर्तन बराबरी और भाईचारे के अपने सपने को साकार करने में कार्यरत हैं वहीं वे दलितों, आदिवासियों, स्त्रियों, मजदूरों, किसानों और खेतहरों के अधिकार के लिए निरंतर तत्पर रहती हैं। वे कम्यूनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी में सक्रिय हैं। और इस पार्टी की ओर से कोयला खानों की मजदूर यूनियन में अब अध्यक्ष हैं। वे सामाजिक सांस्कृतिक और साहित्यिक के साथ राजनीतिक-आर्थिक दायरों में एक साथ और समान तत्परता से सक्रिय हैं।

उनकी पत्रिका अपने नाम से आम आदमी की युद्धरत स्थिति उजागर करती है। उनके साहित्य में उनके जीवन की कला है। उनके द्वारा संपादित एवं प्रकाशित पत्रिका ‘युद्धरत आम आदमी’ उनके जीने के सृजन और लिखने के सृजन के बीच सेतु की तरह है। चीन भारत युद्ध के समय सिविल डिफेन्स का प्रशिक्षण भी लिया और कविता पाठ, टैबेल्यू तथा नृत्य के शो देकर देश के रक्षा-कोष हेतू साठ हजार रुपए का संग्रह करवाया। 1965 में उनके पति वेद प्रकाश गुप्ता का तबादला कानपुर हुआ तो उन्हें पति बाल-बच्चों के साथ धनबाद छोड़कर जाना ठीक नहीं लगा। वस्तुतः वे वहीं अपना कार्यक्षेत्रा बना चुकी थीं। वहां वे समाज-सेवा से जुड़ीं तथा बच्चों की बालवाड़ी और महिलाओं का प्रशिक्षण केन्द्र खोला, जिसमें वे महिलाओं को काम भी दिलाती थीं ताकि वे कुछ आर्थिक उर्पाजन कर सकें। सोशल वैलफेयर बोर्ड के तहत 5 गांवों में सेंटर खोले। अकाल के दिनों में सक्रिय रहीं और लंगर चलाए।

1967 में रमणिका जी कच्छ आंदोलन में गईं। जार्ज फर्नाडीज के साथ दो बार गिरफ्तारी हुईं। आंदोलन में उन्हें इतनी मार लगी थी कि वे बेहोश हो गईं। 1968 में वे संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर मांडू क्षेत्रा से चुनाव लड़ीं जो एक उपचुनाव था। ये सीट राजा कामख्या नारायण ने खाली की थी। चुनाव के दरम्यान ही उन्होंने गोमिया में पानी की लड़ाई लड़ी। मांडू क्षेत्रा पानी की कमी वाला क्षेत्रा रहा है। उस समय मांडू क्षेत्रा में गोमिया और चुरचू, प्रखंड भी थे। चुरचू का थोड़ा भाग छोड़कर बाकी सब खनन् क्षेत्रा था। आप केवल 700 वोटों से चुनाव हारीं, लेकिन जनता से जो वायदा किया वे उन्होंने निभाया और टाटा की वेस्ट बोकारो कोलयरी में लड़ कर मजदूरों के बच्चों के लिए हाई स्कूल का भवन बनवाया और स्कूल चलवाया। पीने के पानी की लड़ाई और जंगल के अधिकारों की लड़ाई भी वे वहीं रहकर सन् 1969 में ही लड़ीं। ‘बंजी बस्ती को टाटा’ द्वारा पानी देने की लड़ाई तथा छोटानागपुर के जंगलवासी आदिवासियों के जंगल के अधिकारों की जबरदस्त लड़ाई भी सन् 1969 में ही उन्होंने छेड़ी।

पहला चापाकल मांडू क्षेत्रा के बंजी गांव में टाटा ने लगवाया जो अब भी इस आंदोलन का गवाह है। पानी के आंदोलन के चलते जनता उन्हें ‘पानी की रानी’ कहने लगी। लाठा, छावन, जलावन के लिए ‘कूप दो’ की और जल-जंगल जमीन के अधिकार तथा डिमॉर्केशन (क्मउंतबंजपवद) में जोती गई जमीन रैयत को वापिस दिलाने की लड़ाई में वे पूरे जिले के आदिवासियों को जेल भरो अभियान में लाने के लिए सफल हुईं। 8 हजार एकड़ जमीन के करीब मुक्त कराई गई। जंगल के सिपाहियों द्वारा महिलाओं पर किए जा रहे जुल्म के खिलाफ, उन्होंने ‘घूस नहीं अब घूसा देंगे’ का आंदोलन वहां की आदिवासी जनता को साथ लेकर चलाया। पतरातू स्वांग और खुदगड्डा में पानी का आंदोलन भी चलाया। कोलमाइंस में यूनियन बनाई। एन.सी.डी.सी. की सरकारी खदानों में झाडू लगाने वाले स्वीपर भी राजस्थान से लाए जाते थे। इसके विरोध में स्वांग और कथारा कोलयरी से 1969 में ही, उन्होंने स्थानीय लोगों के रोजगार की लड़ाई शुरू की।

यूनियन के माध्यम से उन्होंने ठेकेदारी प्रथा के खिलाफ राजाराम गढ़ की केदला झारखंड की खदानों में भीषण संघर्ष छेड़ा और ठेकेदारों, लठैतों, माफिया का सामना कर, मजदूरों के अधिकार दिलाए। लोकसभा की याचिका-समिति के सामने भी उन्होंने जार्ज फर्नाडीस के माध्यम से लड़ाई छेड़ी। हमारा काम क्या है, लिख कर दो। हमारा नाम क्या है, लिखकर दो, वेतन क्या है, लिखकर दो। हम कौन हैं, लिखकर दोµमजदूरों को यह नारे दिए जो पूरे कोयला तेज में गूंज उठे। इन मांगों को लेकर उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। कुजु में ठेकेदारों के खिलाफ आंदोलन छेड़ा तो ठेकेदारों, पहलवानों ने इन पर जानलेवा हमला किया जिसने इनका बायां हाथ और कालरबोन टूट गई। लाठियों के इक्कीस घाव शरीर पर लगे तथा भाला से आंख का ऊपरी हिस्सा कट गया। फिर तो इन पर हुए तेरह बार जानलेवा हमले कई संघर्ष हुए, इन्होंने सदैव किसान व मजदूरों को मिलाकर लड़ाईयां लड़ीं। हड़ताल के दौरान मजदूर आठ आना चौका पर मिट्टी काटते रहे। चूहे की बिलों से धान चुनकर लाते और खाते रहे पर झुके नहीं। आपने केदला माइंस के राष्ट्रीयकरण के लिए संघर्ष किया। केदला माइंस में लगभग सवा साल तक हड़ताल चली और खदानें सरकारी हुईं।

कोयला खदानों के राष्ट्रीयकरण के बाद वे अपील कमेटी की मैम्बर बनीं और हजारों लोगों को नौकरी दिलाई, जिसमें महिलाएं भी थीं। पर महिलाओं की नौकरी में काफी दिक्कत हुई। अधिकांश बहुत सी स्त्रा-कामगारों की छंटनी कर दी गई। इससे पहले वे 1972-74 में कांग्रेस की तरफ से बिहार विधान परिषद की सदस्यता (एम.एल.सी.) भी रहीं। 1977 में स्थानीय लोगों के सवाल उन्होंने कांग्रेस का अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। और वे लोकदल के टिकट पर 1979 में एम.एल.ए. चुनी गईं। उनके भीतर पूर्ण परिवर्तन की जो छटपटाहट है उसने उन्हें अंत में कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवाद) के संगठन में पहुंचा दिया।

1980 के अगस्त आंदोलन में 2000 लोगों को लेकर विस्थापितों के सवाल पर जेल गईं जिसमें भारी संख्या में महिलाएं भी गिरफ्तार हुईं। सब लोग दो माह जेल में रहे। बिहार सरकार के साथ समझौता होने पर वे और उनके सभी साथी विस्थापितों को 3 एकड़ पर नौकरी की बजाय चूल्हा परती एक नौकरी दो एवं विस्थापित महिलाओं को भी नौकरी दो की मांग की। सुप्रीम कोर्ट में केस दायर किया गया। जमीन के बदले जमीन अन्यथा मुआवजे की कर्मिशियल दर मांगी गई खदानों के 10 किलोमीटर के क्षेत्रा के भीतर (कोल माइंस के ईदगिर्द का) सामुदायिक विकास की योजना बनाने की मांग रखी गई और कोल इण्डिया से कई मांगें भी मनवाईं।

विस्थापितों को मुआवजा, नौकरी और बेहतर पुनर्वास की मांग को लेकर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में तीन अलग-अलग मुकदमें दायर किए और रोजगार व पुनर्वास की योजना के लिए कोल इंडिया को आदेश दिलावाए तथा इसे होने तक कोर्ट से काम पर रोक के आदेश लिए। कोल इण्डिया में प्रचलित वालंटरी रिटायर और योजना जिसमें औरतों को किसी को भी नौकरी देकर रिटायर होने का प्रावधान था पर भी रोक लगवाई लेकिन कोल इण्डिया ने इसे न मानने के दूसरे रास्ते खोल दिए। 1985 में सिंगरौली क्षेत्रा में मजदूरों और किसानों के आंदोलन के सिलसिले में उन्हें छः महीने भूमिगत भी रहना पड़ा। और वे हृदय रोग की शिकार हो गई।

रमणिका जी द्वारा किसानों के साथ मिलकर एक और रिट पैटीशन दायर की गई। ये सभी केस 1981 से 1997 तक सुप्रीम कोर्ट में चले। इस बीच सुप्रीमकोर्ट ने कई स्थगनादेश दिए और कोलइंडिया को एक पुर्नवासनीति बनाने का भी आदेश दिया। इन 16 वर्षों के दौरान श्रीमति गुप्ता ने किसानों और मजदूर के आंदोलनों के बल पर सरकार को कई सुधार करने के लिए मजबूर किया। सर सिफ्टन द्वारा 1908 में किए गए सर्वे के अनुसार टांड जमीन की मुआवजा दर मात्रा 2/- प्रति एकड थी। इनके आंदोलन की वजह से यह दर 30 हजार रुपए प्रति एकड तक पहुंच गई। देरी करने के एवज में सूद की राशि अलग से दी जाने लगी।

गांव वालों को रोजगार न देकर स्वैच्छिक अवकाश के नाम पर मजदूरों के बदले, खासकर औरतों के बदले उनके द्वारा किसी व्यक्ति को भी नौकरी देने के प्रवाधान को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी और इस योजना को रद्द करवाया। पुनर्वास किए बिना जमीन नहीं ली जाए इस आशय का कोर्ट का अस्थाई ऑर्डर करवाया।

कोड़कर राईट की लड़ाई बिहार सरकार से जीती, जिसके चलते गैरमजुरआ जमीन पर भी किसानों को नौकरी मिली। संघर्ष के चलते कहीं भी गांव उजड़ने नहीं दिए गए। सुप्रीम कोर्ट ने विस्थापित स्त्रा को भी नौकरी देने का आदेश दिया।

21 देशों की यात्रा रमणिका जी कर चुकी हैं। 1975 में अर्न्तराष्ट्रीय महिला सम्मेलन बर्लिन में, 1975 में मैक्सिको, 1984 में रूस में पीस मिशन के डेलिगेशन का नेतृत्व किया। 1987 में यूगेस्लाविया, नार्वे 1993 में फिलीपींस, 1994 में क्यूबा में मजदूरों का प्रतिनिधित्व किया भारत की ओर से। 2000 में द्वितीय विश्व दलित सम्मेलन में भाग लिया।