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हादसे (आत्मकथा-अंश)

हादसे (आत्मकथा-अंश)

संजय गांधी से मुलाकात

इसी बीच कांग्रेस का अधिवेशन गुवाहाटी में होना तय हुआ। मैं बिहार प्रदेश कांग्रेस कमेटी (बी.पी.सी.सी.) और आल इंडिया कांग्रेस कमेटी (ए.आई.सी.सी.) दोनों की सदस्य थी। हजारीबाग जिला बीस सूत्राय कार्यक्रम की सदस्या भी थी। मैं बीस सूत्राय कार्यक्रम को मुस्तैदी से लागू कराने के लिए कटिबद्ध थी। मांडू का विधायक वीरेन्द्र पांडे संजय गांधी को उल्टा-सीधा समझा आया था और गैरकानूनी खदानों को बी.एम.डी.सी. (बिहार मिनरल डिवेलपमेंट कार्पोरेशन) के माध्यम से ठेकेदारों की मार्फत चलाने का प्रस्ताव रख आया था। मुझे जैसे ही यह बात मालूम हुई तो मैं दिल्ली पहुँची। मैंने संजय गांधी के यहाँ समय लेने की चेष्टा की पर कुछ मित्रों ने बताया कि उनका पी.ए. वीरेन्द्र पांडे का मित्रा है और वहाँ यह नोट करवा गया है कि रमणिका गुप्ता को किसी भी हालत में संजय गांधी से बात करने का समय नहीं दिया जाए। मेरे भाई रविव्रत बेदी, जो टाइम्स ऑफ इंडिया के चीफ फोटोग्राफर थे, मेनका गांधी को तब से जानते थे जब वे माडलिंग किया करती थीं। वे उनकी फोटो खींचा करते थे। वे प्रधानमंत्रा इन्दिरा गांधी के साथ भी फोटोग्रॉफी के लिए विदेश दौरे पर जाते रहते थे। ब्रिटेन की महारानी एलिजाबैथ का पूरा कार्यक्रम उन्होंने ही कवर किया था, इसलिए उनका संजय से भी परिचय था। बाद में दिल की बीमारी होने पर संजय की ही मदद से वे आस्ट्रेलिया जाकर अपना ऑपरेशन करवाए थे। संजय ने ही उनके पूरे खर्च का इन्तजाम किया था। मैंने अपने भाई से कहाµ‘‘मैं अपना नाम बताऊँगी तो मुझे संजय से मिलने का टाइम नहीं मिलेगा, इसलिए या तो तुम मेरे लिए समय ले दो अन्यथा मैंने सुना है वह सर्विस प्लेन से पटना जा रहे हैं। मुझे उस फ्लाइट का नम्बर और तिथि ले दो और उनके बगलवाली बर्थ मेरे लिए रिजर्व करा दो ताकि रास्ते में मैं उनसे बातें करती जा सकूँ।’’

ऐसा ही हुआ। मैं प्लेन की इकानॉमी क्लास में अगली सीट पर मेनका जी के बगल में बैठ गई। किनारे की सीट पर मैं, बीच में मेनकाजी और खिड़की के पास संजय। मैंने उनसे वार्ता शुरू की और उन्हें अपने भाई रवि के बारे में बताया। दोनों ने बड़ी खुशी जाहिर की। मैंने अपना बिहार की एम.एल.सी.वाला परिचय भी उन्हें दिया। उसी दौरान संजय ने कहाµ‘‘आप हजारीबाग से हैं ! वहाँ तो बहुत सी खदानें चल रही हैं, जिनमें बहुत से आदिवासी रोजगार पा रहे हैं, लेकिन फिर भी आपके मुख्यमन्त्रा उन्हें बी.एम.डी.सी. को देने को तैयार नहीं हैं।’’

तब मैंने उन्हें बतायाµ‘‘मैं भी तो इसी सिलसिले में आपसे बात करना चाह रही थी। सच्ची बात तो यह है कि आदिवासियों को रोजगार नहीं दिया जा रहा, बल्कि रोजगार के नाम पर उनकी जमीनें बन्धक रखवाकर, कर्जदार बनाकर, उनसे मुफ्त काम लिया जा रहा है। उन्हें यह लालच देकर फुसलाया जाता है कि उनका नाम अगर रजिस्टर में दर्ज होगा तो खदानें सरकारी होने पर वे सरकारी नौकरियाँ पा जाएँगे। ये खदान मालिक हर तीसरे महीने अपने रजिस्टर बदल देते हैं और नए लोगों से पैसा लेकर उनका नाम चढ़ा देते हैं। इस प्रकार यह षड्यन्त्रा खदानों को सरकारी करने के नाम पर जोरों से चल रहा है। इसमें बड़े-बड़े नेता भी साझीदार हैं, यहाँ तक कि कांग्र्रेस व सोशलिस्ट सभी लोग।’’

इसी बीच पीछे की सीट से दामोदर पांडे उठ खड़े हुए और संजय को सम्बोधित कर बोलेµ‘‘मैं उसी क्षेत्रा का सांसद हूँ जी।’’

उनकी ये हिम्मत तो नहीं हुई कि मेरी बात को काट दें पर उनके हस्तक्षेप से नेताओं का नाम बताना रह गया। खैर, संजय ने मेरे साथ तर्क शुरू कर दिया। वे बोलेµ‘‘सरकारी खदानें तो बेकार हैं, वे घाटा देती हैं, वहाँ चोरी होती है, भ्रष्टाचार है और लोगों को रोजगार भी पूरा नहीं मिलता।’’

उन्होंने मुझे फिर कहाµ‘‘सारी दुनिया में प्राइवेट खदानें चलती हैं, भारत में सरकारी क्यों ?’’

मैंने उन्हें बतायाµ‘‘राष्ट्रीयकरण गलत नहीं है उसे चलानेवाले लोग गलत हो सकते हैं। हमें उसे सुधारना चाहिए। निजी ठेकेदारों ने पहले सरकार का करोड़ों रुपया रायल्टी में मार रखा है और वे मजदूरों का शोषण भी करते रहे हैं। मजदूरों का पैसा मारकर और रायल्टी की चोरी करके वे मुनाफा कमाते हैं। वास्तव में वह मुनाफा तो नहीं होता न! हमें कोयला सस्ते दामों पर बेचना पड़ता है ताकि देश में मूल्य नहीं बढ़ें। इस कारण भी हमें कागजों में तो घाटा नजर आता है जो वास्तव में घाटा नहीं होता। जैसे अनाज में सब्सिडी देकर हम उसे सस्ते दर पर बेचते हैं वही हाल कोयले का है। ऐसे भी जितना गहरे हम खनन में जाते हैं उतना लागत मूल्य तो बढ़ेगा ही। फिर कोयला मुनाफे के लिए नहीं हमें इसकी जरूरत है इसलिए पैदा किया जाता है।’’

मैंने उन्हें बेल्जियम की खदानों के बारे में बताया जहाँ खदानें भले ही प्राइवेट मालिक चलाते हैं, लेकिन पिचानवे प्रतिशत पैसा बेल्यिजम की सरकार उन्हें चलाने हेतु सब्सिडी के रूप में इसलिए देती है क्योंकि देश को कोयले की जरूरत है। ब्रिटेन में तो प्राईवेट खदानों की हालत भी अच्छी नहीं है। उनमें भी घाटा ही है और जर्मनी में भी यही हाल है।

उन्होंने अमरीका का उदाहरण देते हुए पूछाµ‘‘अमरीका में खदानें कैसे मुनाफे में चलती हैं ?’’

‘‘भारत अमरीका नहीं है। यहाँ आबादी ज्यादा और संसाधन कम हैं। अमरीका में आबादी कम और संसाधन ज्यादा हैं। बड़ा क्षेत्रा भी तो है अमरीका के पास ! वे ओपन कास्ट माईनिंग करना अफोर्ड कर सकते हैं क्योंकि इफरात जमीन है उनके पास। हम वैसा करेंगे तो इतने विस्थापित लोगों का क्या होगा ? हमारे पास कोयला ही एकमात्रा ऐसा साधन है जो ईंधन और ऊर्जा दोनों पैदा करता है, इसलिए इसे पैदा करने के लिए इसे बचाकर रखना और वैज्ञानिक ढंग से पैदा करना भी जरूरी है। पिछले सालों का अनुभव बताता है कि प्राईवेट मालिक कोयले को वैज्ञानिक ढंग से उत्पादन नहीं करते। इसलिए सार्वजनिक क्षेत्रा में कोई खोट है तो उसे सुधारना बेहतर होगा। उस पर कड़ाई की जाए न कि उसे बन्द कर दिया जाए ! सार्वजनिक क्षेत्रा को रोजगारोन्मुखी बनाया जाए, मशीनोन्मुखी नहीं! इससे बेराजगारी भी घटेगी।’’ मैंने कहा।

मैंने उन्हें यह भी बतायाµ‘‘गैरकानूनी खदानों के कारण माफिया बढ़ा है, कोयला बर्बाद हो रहा है, आदिवासी और दलित एक्सप्लाईट हो रहे हैं। ये सब नहीं होने देने के लिए वर्तमान राष्ट्रीयकरण अधिनियम (नेशनेलाइजेशन एक्ट) में संशोधन करना जरूरी है। मैंने संशोधन का एक प्रारूप बनाकर खान और ऊर्जा मन्त्रा श्री के.सी. पन्त को भेजा है ताकि बन्द पड़ी खदानों को सरकारी कम्पनी के अलावा कोई और न चला सके। मुझे पता चला है कि आपको इस पर आपत्ति है। वीरेन्द्र पांडे जो वहाँ का विधायक है स्वयं एक माफिया है, वह गैरकानूनी खदानें चलाता और चलवाता है। उसने आपको कुछ गलत तथ्य दिए हैं। वही यह प्रचार कर रहा है कि आप इन खदानों को प्राईवेट चलवाना चाहते हैं। कृपया आप पटना से लौटने के बाद इस मामले को स्वयं देखें तो आपको सच्चाई पता चल जाएगी। ये संशोधन कोयला चोरी और आदिवासियों का शोषण बन्द करने में सहायक हो सकता है।’’

मुझे आश्चर्य हुआ कि इस भेंट के कुछ ही दिनों के बाद केबिनेट में वह संशोधन पारित हो गया जो कई महीनों से लटका था। मैं यह कैसे जान पाई थी कि संजय ही इसमें बाधक बने हुए थे, इसकी एक अलग कथा है।

अब जब चर्चा चल गई है तो उस किस्से को भी बयान कर ही दूँ। राष्ट्रीयकरण के बाद हम तो मजदूरों की बहाली के लिए संघर्ष में जुट गए लेकिन उधर जो ठेकेदार और मालिक खदानों से बेदखल किए गए थे, वे भी अपनी जुगत बिठाने में जुट गए थे कि वे कैसे इस नई स्थिति का सामना करें और अपना धन्धा बढ़ाएँ। उनमें से कुछ तो यूनियनों की नेतागिरी करने लगे और कुछ ग्रामीणों को भड़काने लगे। पुराने मजदूरों को भगाकर देहात के नए मजदूरों को बहाल करने की मुहिम चलाने लगे यानी बाहरी भगाओ, लोकल को रोजगार दो। कुछ बाहर के रंगदार और माफिया भी सरकारी खदानों में पुराने मजदूरों की जगह नए को लगाकर पैसा कमाने में जुट गए थे। इससे अफसर, नेता और माफिया की तिकड़ी खूब फल-फूल रही थी। लोकल लोगों की बहाली की लड़ाई बाहरी ठेकेदारों को भगाने के लिए नहीं थी, बल्कि बिलासपुर, रायगढ़, गया, उड़ीसा, पुरुलिया, पलामू या पछमाहा मजदूरों को भगाने हेतु थी जो बहुत कम मजदूरी पर ठेकेदारों के यहाँ बरसों से खटते आ रहे थे या कम्पनियों द्वारा सरकारी सहमति से चलाए जा रहे गोरखपुरी कैम्पों में रहकर खदानों को चला रहे थे। यही मजदूर अपनी यूनियन के माध्यम से इन खदानों के राष्ट्रीयकरण तथा ग्रामीणों के नाम ठेकेदारों की हाजिरी-बही में चढ़ाने के लिए संघर्ष कर रहे थे।

उन दिनों ग्रामीण मजदूर प्रायः यूनियन में नहीं आते थे। एक तो वे गाँवां से आकर खटते थे दूसरे देर से आते थे और अन्य मजदूरों से पहले ही छुट्टी पा जाते थे चंकि उन्हें दूर अपने गांव जाना होता था। तीसरे वे किसी-न-किसी गाँववाले के माध्यम से आते थे जिसे ठेकेदारी में हिस्सा मिलता था अथवा वह खुद ठेकेदार होता था। कुछ मालिक सी.सी.एल. द्वारा बन्द कर दी गई या छोड़ दी गई खदानों में बहाली के नाम पर स्थानीय लोगों को लालच देकर अत्यंत कम मजदूरी पर खटाने लगे थे। वे उन खदानों से गैर-कानूनी कोयला निकालकर कुछ नौजवानों को अपना पैटी-ठेकेदार बनाकर कोयला बेचने लगे थे। इससे थोड़ा बहुत रोजगार तो स्थानीय मजदूरों को मिला लेकिन इसमें पैसा लेकर ठेकेदारों ने अपने रजिस्टरों में ये कहकर उनका नाम दर्ज करना शुरू कर दिया कि वे भी सरकारी कर्मचारी हो जाएँगे। ठेकेदारों की कमाई का यह एक और साधन हो गया। उन्होंने पुलिस से साँठ-गाँठ कर ली। एकाएक हर कस्बे में, खासकर रामगढ़ टॉउन में सुबह-शाम भारी-भरकम पहलवान, मूँछ मरोड़ते हुए ठेकेदार, बड़ी-बड़ी कारों में इधर-उधर घूमते हुए तथा कलकत्ता, धनबाद और राँची के पूँजीपति या नेता तथा प्रशासन के बड़े-बड़े अधिकारी रेस्टोरेंटो में बातचीत करते नजर आने लगे। यहाँ तक की हाईकोर्ट के कतिपय जज भी इसमें हिस्सेदार बन गए। अजीब सी दहशत फैलने लगी थी हजारीबाग जिले में। उस समय हजारीबाग जिले में चतरा, कोडरमा, बेरमो और गिरीडीह सब-डिवीजन भी आते थे। रामगढ़ और बेरमो छोड़कर अब सभी अलग जिले बन गए हैं। रामगढ़ और बेरमो सब-डिवीजन बन गए। जो सरकारी खदान में मजदूर थे वे स्क्रीनिंग में छँट गए या छूट गए मजदूरों के साथ नई चली खदानों में अपने सम्बन्धियों को भी ला-लाकर काम पर लगा रहे थे और सरकारी खदानों का पूरा माटी-टोपी यानी ब्लास्टिंग का सामान ओवरमैन, मुंशी तथा अन्य अधिकारियों के माध्यम से इन गैरकानूनी खदानों में पहुँचने लगा था। कुछ सरकारी हुई खदानों के अधिकारियों और स्टॉफ ने तो उन गैर-कानूनी खदानों में भी ठेके ले लिए थे और वहाँ का काम भी ड्यूटी छोड़कर करने जाने लगे थे। विडम्बना तो यह थी कि टाटा कम्पनी की वेस्ट बोकारो कोलियरी घाटो तथा एन.सी.डी.सी. जैसी सरकारी खदानों के ऊंची कैटेगरी के मजदूर भी इन अवैध खदानों में ठेके लेने की होड़ लगाए हुए थे। यहाँ तक कि अगल-बगल के चेनगड्डा, बड़गाँव, करमा, रतवै, चितरपुर पतरातू, तोपा, तोयरा, कुजू, पुंडी, हैस्सागढ़ा, बोंगहारा, मांडू, चरही, दुन्नी, सिरका, तापिन, चुम्बा, कनकी, हैस्सालौंग, माईल, गिधनिया आदि गाँव के लोगों ने गैरकानूनी खदानों में जोर-शोर से काम भी पकड़ लिया था और ठेकेदारी भी करने लगे थे। इस विषय पर मेरी उच्चस्तरीय अधिकारियों से प्रायः चर्चा होती रहती थी और मैं उन्हें इन सारी गतिविधियों की रिपोर्ट देती थी ताकि वे प्रशासन पर दबाव डालें पर वे उल्टे मुझे या दुबेजी को ही मदद करने के लिए कहते थे। मैंने राष्ट्रीयकरण अधिनियम में एक संशोधन तत्कालीन खान मन्त्रा श्री के.सी. पन्त को लिखकर भेजा था और इन्दिरा गांधी जी को भी उसकी एक प्रति दी थी। मेरा सुझाव था किµ”देश में किसी भी स्थान पर कोयले का खनन सरकारी कोयला कम्पनी छोड़कर अन्य कोई न करे, ऐसा करने पर उसे दंडनीय अपराध माना जाए।“ देश में उस समय के प्रचलित कानून में गैर-कानूनी खनन पर सुरक्षा और श्रम कानून तो लागू होते थे पर गैरकानूनी खनन पर सजा का कोई प्रावधान नहीं था। कानून में अवैद्य खनन क्रिमिनल केस नहीं माना जाता था।

मेरा संशोधन था कि देश में कोयला खनन का कार्य कोल इंडिया को सार्वजनिक क्षेत्रा की कम्पनी है, को छोड़कर कोई अन्य नहीं कर सके। इस संशोधन के साथ मैं श्री के.सी. पन्त से मिलने दिल्ली भी गई थी। के.सी. पन्त मेरा काफी आदर करते थे क्योंकि उन्हें सरकारी खदानों में विकास हेतु मेरे सहयोग की खबर मिल चुकी थी। मैंने कोयला खदानों में शर्त के साथ प्रबन्धन के साथ सातों दिन खनन का समझौता कर लिया था जिसमें यह शर्त रखी थी कि यदि कोलियरी में सातों दिन खनन का कार्य चलाया जाएगा तो सभी मजदूरों को बाई-रोटेशन छुट्टी मिलेगी। साथ ही यह भी तय करवाया था कि प्रबन्धन को सातवें दिन की जरूरत के लिए नए मजदूर बहाल करने होंगे ताकि रोजगार बढ़े। उस दशा में रविवार छुट्टी का दिन नहीं माना जाएगा। मेरे इस समझौते के विरोध में दामोदर पांडे और दास गुप्ता थे, जबकि बिन्देश्वरी दुबे मेरा समर्थन कर रहे थे। मेरा अभिप्राय था कि सात दिन काम चले पर सातवें दिन के लिए नए मजदूरों को बहाल किया जाय। ओवरटॉइम के बारे में भी मेरा यही रवैया था कि ओवरटॉइम देने की बजाए अधिक आदमी बहाल कर काम किया जाए, ताकि रोजगार की संख्या बढ़े और अगल-बगल के ग्रामीणों को काम मिले। दरअसल कोलियरियों में तो ओवरटॉइम का एक रैकेट ही बन गया था। जान-बूझकर समय पर काम खत्म न करके ओवरटॉइम लेकर काम किया जा रहा था और प्रबन्धन ज्यादा वेतन पानेवाले कतिपय मजदूरों के साथ मिलकर अतिरिक्त घंटों के काम का पैसा बाँट लेता था। ये रैकेट ऊपर के तबके के टाइम-रेडिड मजदूर करते थे। पीस-रेटिड मजदूर इसमें शामिल नहीं थे। वे तो हमेशा अधिक काम करने के, नहीं तो कम-से-कम पूरा काम करने के लिए लालायित रहते थे, जो उन्हें उपलब्ध नहीं कराया जाता था। पूरा काम देने के लिए भी ऊँची कैटेगरी के ऑपरेटर उनसे पैसा लिया करते थे। दरअसल खदानें सरकारी हो गई थीं, मजदूरों में उत्साह था, लेकिन मैनेजर व मुंशी प्रायः ठेकेदारी के जमानेवाले ही थे, जिनकी मानसिकता कल्याण से अधिक शोषण की भी। इसलिए जब कभी अधिकृत खदानों में एन.सी.डी.सी. के ऑफिसर स्थानान्तरित होकर आ जाते, मजदूरों को बहुत राहत मिलती, क्योंकि वे उन्हें कानून से छुट्टी, सिक लीव तथा मेटरनिटी लीव जैसी सुविधाएँ आदि देते थे और समय के अनुसार ही काम लेते थे।

खैर, इन सब कठिनाइयों को झेलते हुए मजदूर सरकारी खदानों को कामयाब कराने के लिए डटे थे और हमारी यूनियन इसके लिए कटिबद्ध थी।

मैं दिल्ली पहुँची और के.सी. पन्त से मिली और पूछाµ‘‘वह संशोधन जो मैंने भेजा था उसकी स्थिति क्या है ?’’

उन्होंने कहाµ‘‘इस विषय पर आप इन्दिराजी से बातचीत करें या जगजीवन राम जी से अथवा संजय से। केबिनेट में ये कई बार ले जाया गया पर लोगों ने इस पर आपत्ति की है।’’ ‘‘संजय क्यों ?’’ मैंने पूछा।

वे मुस्कुरा दिए पर बोले कुछ नहीं। मैं अगले दिन सीधे प्रधानमन्त्रा निवास पर इन्दिराजी के पास पहुँची। मुझे वहाँ सब लोग पहचानते थे। शेषन और धवन दोनों मुझे जानते थे। सुबह का समय इन्दिरा जी के खुले दरबार का होता था। मेरी बारी जल्दी ही आ गई। इन्दिराजी मुझे व्यक्तिगत तौर से भी जानती थीं। वे मेरी मौसी निर्मल मल्होत्रा जो एन.डी.एम.सी. दिल्ली की उपाध्यक्ष थीं, को भी जानती थीं। निर्मल मल्होत्रा इन्दिरा जी को ‘इन्दिरा’ कहकर पुकारती थीं। इन्दिराजी उन्हें ‘दीदी’ बोलती थीं। मैंने इन्दिरा जी से गैर-कानूनी खदानों में हो रही चोरी और मजदूरों के शोषण का हाल बयान किया और एक्ट में किए जानवाले संशोधन की एक प्रति भी उन्हें दी। वे मेरी बातों से सहमत हुईं। मैं जब भी मिलने जाती तो वे प्रायः बिहार के बारे में पूछा करती थीं, खासकर सरकार में शामिल मन्त्रियों के बारे में।

वे बोलीµ‘‘मैं जानती हूँ कि वहाँ यह सब गलत हो रहा है पर कैसे बन्द किया जाए ये सब ? तुम जाओ संजय से मिलो।’’

मैंने आश्चर्य जताते हुए कहाµ‘‘संजय से ? उनका क्या वास्ता है खदानों से ?’’

वे झटपट बोलीµ‘‘नहीं-नहीं, के.सी. पन्त से मिलो।’’

मैंने कहाµ‘‘के.सी. पन्तजी से मैं मिलकर आ रही हूँ, वे ही तो आपके पास मुझे भेजे हैं। अब आप मुझे फिर उनके पास भेज रही हैं। मामला तो केबिनेट में आया था पर पता नहीं इस पर कुछ मन्त्रियों ने आपत्ति क्यों की। सुना है जगजीवन बाबू ने भी इसका विरोध किया था। इसलिए जब तक आप हस्तक्षेप नहीं करेंगी, तब तक न तो यह चोरी रुकेगी और न ही यह शोषण। जिन कारणों से आपने खदानों का राष्ट्रीयकरण किया है, उस सब किए-कराए पर पानी फिर जाएगा।’’

इन्दिराजी ने कहाµ‘‘ठीक है, तुम जाकर पन्त से मिलो और उन्हें मुझसे बात करने के लिए कहो।

मैं कुछ आशा और कुछ हताशा लिए हुए लौटी और पन्तजी को सारा किस्सा सुना दिया। इसके बाद ही मैंने संजय से मिलने की ठानी और उनसे बात की जिसका ब्योरा इस अध्याय के शुरू में ही दिया जा चुका है।