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साक्षात्कार

साक्षात्कार

रमणिका गुप्ता, सम्पादक : युद्धरत आम आदमी, मेन रोड, हजारीबाग (बिहार) से जयन्त परमार की बातचीत,

जयन्त परमार : आपका नाम व साहित्यिक नाम और जन्म की तिथि व वर्ष क्या है?

रमणिका गुप्ता : मेरा नाम रमणिका गुप्ता है। साहित्यिक नाम भी यही है। मेरा जन्म सन् 1930 में 22 अप्रैल को सुनाम में हुआ जो उन दिनों पटियाला रियासत में था और अब पंजाब में है।

जयन्त परमार : क्या आप अपनी घरेलू ज़िन्दगी के बारे में बता सकती हैं?

रमणिका गुप्ता : मेरा विवाह मेरे भाई के यहां वेद प्रकाश गुप्ता से 24 नवम्बर 1948 को सिविल मैरेज अधिनियम के तहत रोहतक, जो उन दिनों पंजाब में था अब हरियाणा में है हुआ। वे वहां उन दिनों एम्प्लायमेन्ट अधिकारी के पद पर थे। यह अन्तर्जातीय प्रेम-विवाह था। इस पर मेरी मां तथा मामा का कट्टर विरोध था।

जयन्त परमार : आपने कविता लिखने की शुरुआत कैसे की...लेखन की प्रेरणा के बारे में बताएं ?

रमणिका गुप्ता : चौदह-पन्द्रह वर्ष की आयु में ही मैंने कविता लिखनी शुरू कर दी थी। मुझे प्रकृति से शुरू से ही प्रेम था। मैं भावुक भी बहुत थी। पहले पत्रा और लेख लिखती थी। कविता, कम्पीटीशन, डिबेट में भाग लेती थी। मुझे कविता के लिए अपने प्रेम-प्रसंग से भी प्रेरणा मिली।

जयन्त परमार : मसरूफ़ रहते हुए भी लिखने का वक़्त आप कैसे निकाल लेती हैं? वह कौन-सी ऐसी चीजें़ रहीं जिन्होंने आप को तमाम दूसरी तरह के कामों के बीच कविता लिखने के लिए प्रेरित किया ? संक्षेप में यह कि आपकी कविता का सरोकार कैसे बना ?

रमणिका गुप्ता : कविता जब आती है तब मैं अपने को रोक नहीं पाती। ऐसे यात्रा में, फील्ड में, कार, रेल, हवाई जहाज़ में आम तौर से लिखती रही हूं। घर पर भी जब लिखती हूं तो कितना भी शोर होता रहे कविता लिख लेती हूं। मैं अपने ब्रेन का स्विच बाहरी दुनिया से ऑफष् कर लेती हूं और मन का स्विच ऑन कर देती हूं। रेडियो-टी.वी. चलता रहे अथवा वार्ता या बहस, चाहे मंच पर रहूं अथवा कॉन्फ्रे़ंस मेंµकविता जब आती है तो मैं उस समय उस भीड़ में भी अकेली हो जाती हूं और जो मिले या हाथ लगे उस पर ही लिख लेती हूं। तिथि ज़रूर लिखती हूं। अंधेरा हो जाय तो भी बस सादा पन्ना मिलना चाहिए, तो अंदाज़ से भी बड़े अक्षरों में लिख लेती हूं जिसे अगले दिन रोशनी होने पर फेअर कर लेती हूं।

दरअसल बचपन से ही घर में मुझे ज़िद्दी लड़की, बदसूरत लड़की कहा जाता था। बचपन से ही मैं हमेशा किसी न किसी विचार से घिरी रहती थी। घर और परिवार सामन्ती था। मां और पिता जी का आपसी प्यार इतना था कि हमारे लिए उनके पास समय ही नहीं बचता था। पिता जी भी मां के लिए कविताएं लिखते थे। मेरी मां के आगे उनकी एक नहीं चलती थी। मां मुझे गालियां बहुत देती थीं, मारती भी बहुत थीं। फिर भी मैं घर के हर निषेध का, हर परम्परा का विरोध करती थीµबग़ावत की हद तक। मेरी पिटायी भी बहुत होती थी। परदा लगे तांगे में मैं बैठने से इन्कार कर देती थी। पापा जी की साईकिल चलाती थी। स्कूल में ड्रामा तथा नृत्य कार्यक्रमों में भाग लेती थी। नृत्य का शौक़ थाµजबकि हमारे घरों में यह सब वर्जित था। छिप-छिप कर उपन्यास और कविताएं भी पढ़ती थी। भावुक थी। प्रेम और मृत्यु दो शब्दों ने शुरू में मेरी कविता को घेरा। नृत्य नाटिकाएं तथा नाटक भी लिखती थी। अभिनय का बड़ा शौक़ था और सिनेमा देखने का भी। मैं कॉलेज कम्पीटीशन में प्रथम आती थी। डिबेट में मैं हमेशा आगे रहती थीµचाहे वह धर्म पर होµआज़ादी परµया औरतों पर। रूढ़ि तोड़ना एक मिशन थाµकिसी का कहना न मानना, अपने मन की करना, यह जिद थी, जो आदत बन गयी थी। घर में प्यार से भर कर मुझे देखती किसी की आंखेंµजो प्यार व्यक्त नहीं कर सकती थीं चूंकि ख़तरा थाµमुझे आकर्षित करती थीं। ऐसी परिस्थितियों में मैंने कविता लिखनी शुरू की। पिताजी भी लिखते थे। कृष्णा जो भाभी की सहेली थी और मेरे ताऊ के बेटे से प्रेम करती थी, जिनसे बाद में उनका विवाह भी हो गया था, भी कविता लिखती थीं। उनको एक मास्टर पढ़ाने आतेµवे उर्दू में नज़्म, ग़ज़ल लिखते थे और अंग्रेज़ी में कविताएं। वे मेरे आकर्षण का केन्द्र रहे। उनसे भी मैंने कविता लिखने की प्रेरणा ली। मैंने अनाम प्रेमी के नाम पत्रा लिखने भी शुरू किये, एक तरफ़ा प्रेम के पत्रा! डर के मारे प्रेम व्यक्त नहीं कर सकती थी--तो बस लिखती रही कविताएं और पत्रा तथा डायरी। मेरे बचपन में ही मेरा एक तरह से शोषण शुरू हो गया थाµयह भी लिखने का कारण बना। उसके बाद जब मैं संघर्ष में उतरी और राजनीति में आयीµतो मैं मुक्त हुई। कई मित्रा बने। उनसे प्रेरित होकर प्रेम-गीत भी लिखे। नारी मुक्ति पर भी लिखा। प्रकृति पर भी बहुत लिखा मैंने। अपनी कुंठाओं को भी काग़ज़ पर उतारा और रोष को भी और निराशा, हताशा, कुण्ठा और उत्साह, लक्ष्य और इच्छाशक्ति को भी। फिर जब ट्रेड यूनियन आंदोलन के माध्यम से मैं मज़दूरों से जुड़ी तो मेरे प्रेम के पात्रा बदल गये। वह व्यक्ति से बढ़कर जन से जुड़ गया। तब 1978 में मैंने जनगीत लिखने शुरू किये। ऐसे इसके पहले भी मैं औरतों तथा देश प्रेम पर लिखती थीµपर प्रेम और प्रकृति ही मुझे अधिक आकर्षित करते थे। 1966-67 से छपाने की इच्छा पैदा हुई। पहले बस लिखती ही थीµछपने-छपाने की सोची ही नहीं थी कभी। 1968 ई. में मेरी पहली कविता पुस्तक कानपुर से छपी जिसमें मेरे छन्दबद्ध गीत भी हैं। ‘गीत-अगीत’ धनबाद पहुंचने तक लिखे मेरे गीतों का पहला कविता-संकलन था।

जयन्त परमार : कविता और गद्य के आपसी संबंध के बारे में कुछ कहें।

रमणिका गुप्ता : जीवन इतना जटिल हो गया है कि कविता भी गद्यमय होती जा रही है। ऐसे में मैं यह मानती हूं कि अगर छन्दबद्धता की बात छोड़ दें तो गद्य भी कवितामय हो सकता है। एक कवि सहजता से गद्य भी लिख सकता है, पर गद्य लेखक यह कार्य आसानी से नहीं कर सकता। गद्य और कविता का अन्तर लयबद्धता और भावनात्मकता का है। वैसे गद्य भी कवितामय होता है और कविता भी गद्य समान हो सकती है।

जयन्त परमार : दलितों द्वारा, दलितों के बारे में, दलितों के लिए लिखा गया साहित्य ही दलित साहित्य है? दलित साहित्य की व्याख्या क्या यह हो सकती है ?

रमणिका गुप्ता : मेरा मानना है कि दलितों द्वारा दलितों के बारे में लिखा साहित्य ही दलित साहित्य है चूंकि वह भोगे हुए यथार्थ पर आधारित होता है। ग़ैर दलित संवेदना से लिखते हैं। पता नहीं ग़ैर दलित क्यों अपने को दलित लेखक सिद्ध करना चाहते हैं! संवेदना का साहित्य भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। दलितों को लिखने का मौक़ा और समय देना चाहिए। दलित साहित्य के माध्यम से दलित अपना भोगा हुआ सच लिखते हैं। उसे वे अपनी पहचान का प्रतीक मानते हैं। इसमें ग़ैर दलितों का अतिक्रमण उचित नहीं लगता। दलित साहित्य केवल दलितों के भोगे हुए सच की अभिव्यक्ति है और उसके माध्यम से वे अपनी पीड़ा, विद्रोह, प्रतिकार, आक्रोश और संकल्प व्यक्त करते हैं परिवर्तन हेतुµपरिवर्तन पूरे समाज के दृष्टिकोण का और परिवर्तन अपने समाज का भी।

जयन्त परमार : साहित्य की अनेक विधाएं होने पर दलित साहित्य की क्या ज़रूरत है?

रमणिका गुप्ता : दलित साहित्य को साहित्य की एक विधा कहना न उचित है ना ही सही। ये तो समानान्तर साहित्य है। साहित्य की विधाएं तो कविता, नाटक, कहानी, उपन्यास, निबंध आदि हैं। दलित साहित्य अपने में एक अलग साहित्य ही है। यह एक वर्ग विशेष जो बहुजन है की पीड़ा, आक्रोश पर आधारित साहित्य है, जिसे उसने भोगा है। इसे साहित्य की किसी भी विधा में लिखा जा सकता है और इसकी अपनी एक अलग विधा भी है जो ‘आत्मकथा’ के रूप में विकसित हुई है। यह विधा पहले इस तरह और इतनी मात्रा में प्रचलित नहीं थी। थी तो अपवाद स्वरूप थीµवह भी विशिष्ट लोगों द्वारा लिखी हुई। यह विधा काफ़ी सक्षम और सार्थक सिद्ध हुई दलित साहित्य में। जैसे जनवादी और प्रगतिशील साहित्य मुख्यतः वर्ग संघर्ष को लेकर लिखा गया और वह वर्ग-समस्याओं से जुड़ा साहित्य है, उसी प्रकार वर्णवादी व्यवस्था द्वारा जन्मना जातीय भेद-भाव समाज पर थोपे जाने के कारण सदियों से जो अपमान दलित समाज ने झेले हैं, उसके खि़लाफ़ आक्रोश और विद्रोह की अभिव्यक्ति दलित साहित्य है। यह उस साहित्य से निश्चित रूप से भिन्न है जिस साहित्य ने उसकी चर्चा भी वर्जित कर रखी है। दलितों और स्त्रियों को सवर्णों की भाषा में संवाद करने तक का अधिकार भी नहीं था, यह सर्वविदित है।

जयन्त परमार : क्या आप मानती हैं कि साहित्य के द्वारा समाज को बदला जा सकता है?

रमणिका गुप्ता : साहित्य पूरे समाज को बदल नहीं सकता पर ये समाज को बदलने की प्रेरणा देने के साथ-साथ वैचारिक मुहिम छेड़कर काफ़ी हद तक समाज की मानसिकता बदल सकता है। किसी भी समाज को बदलने का एकमात्रा कारगर हथियार होता है उसकी मानसिकता बदलना। यह जड़-संस्कृति को नकार कर उसे भी उसी प्रकार त्याज्य बना सकता है जैसे उस संस्कृति ने इतनी बड़ी जमात को त्याज्य बना दियाµअस्पृश्य बना दिया था। आप हिन्दी साहित्य को ही देखें। पहले औरतों के प्रति क्या दृष्टिकोण था। फिर बंगला साहित्य में किरण-कमल जैसी पात्राएं आईं और हिन्दी में चित्रालेखा-मृणाल और सुनीता जैसी। तब से स्त्रा-शुचिता की धारणा जन-मानस में पूरी तरह न सही, पर आंशिक तौर पर कुछ हद तक प्रबुद्ध और बुद्धिजीवी वर्ग में ढीली हुईµटूट गयी ऐसा मैं नहीं कहूंगी। खुद स्त्रियों में बदलाव आया और उन्होंने अपने यौन संबंधों समेत खुल कर आत्मकथाएं लिखीं। क्या यह साहित्य का करिश्मा नहीं था ? प्रेमचंद की ‘निर्मला’ ने बेमेल-विवाह के प्रति नफ़रत पैदा की और भगवती प्रसाद वाजपेयी की ‘चित्रालेखा’ के नारी-शुचिता भंजक रूप को प्रतिष्ठा मिली स्नेह मिला।

जयन्त परमार : दलित साहित्य की शुरुआत कब और कैसे हुई?

रमणिका गुप्ता : ऐसे तो लोग सिद्धों और नाथों तक दलित साहित्य के òोत की खोज में पहुंच जाते हैं। दरअसल उस साहित्य को आज के दलित साहित्य की पृष्ठभूमि को मज़बूत करने वाला साहित्य कहा जा सकता है जिसमें उन दिनों की व्यवस्था के खि़लाफ़ अपने सीमित दायरे में विद्रोह किया गया था, पर उसे वे बदल नहीं पाये थे चूंकि वह ख़ुद भी धर्म और वर्ण के दायरे के बाहर नहीं आ पाये थे। आज का दलित साहित्य डॉ॰ अम्बेडकर के विचारों से प्रेरित है और उसी दिशा में अग्रसर है। महाराष्ट्र में दलित साहित्य डॉ॰ अम्बेडकर से आरंभ हुआ। हालांकि हिन्दी में हीरा डोम ने 1914 ई. में ही पहली कविता लिखी थी और कंवल भारती के अनुसार उनसे भी पहले आर्य समाज के प्रचारकों के साथ उत्तर भारत में दलित नेता भी कविता में वर्ण व्यवस्था और मनु पर चोट करते हुए प्रचार में घूमते थे। शंकरानन्द जी गाते थेµ‘‘मनु जी तूने वर्ण बनाए चार’’। वहां से ही इसकी शुरुआत मानी जा सकती है। आज ऐसे तो स्वामी अच्युतानन्द जी तक भी पहुंचते हैं शोधकर्ता। सही अर्थों में दलित साहित्य प्रेरित हुआ डॉ॰ अम्बेडकर से। भले यह पहले ही जन्म ले चुका थाµहीरा डोम की शिकायत अथवा शंकरानन्द के वर्ण-विरोधी गीतों में।

जयन्त परमार : दलित साहित्य का नई नस्ल पर क्या प्रभाव रहा ?

रमणिका गुप्ता : अगर दलित साहित्यकार रचना के स्तर पर अधिक लिखें और अपना स्वतंत्रा प्रकाशनतंत्रा बनाएं और नये लेखकों को स्थापित लेखकों के साथ जोड़ें, उन्हें प्रोत्साहित करें तो नयी दलित पीढ़ी जो आज पढ़-लिख कर दलितों में आ रही है उनका साहित्य भी प्रकाशित होगा। पहले दलित केवल आई.ए.एस. या अन्य नौकरियों में जाने को ही लालायित रहते थे। अब उनमें पढ़े-लिखे लोग इतिहास, दर्शन, साहित्य और शोध के शैक्षणिक कार्यक्रमों के अतिरिक्त समाज सेवा से भी जुड़ रहे हैं। साहित्य उनके विवेक, अस्मिता के निर्माण में सहायक हुआ है और होगा। दलितों की नई नस्ल आज शिक्षित हो रही है। अभिव्यक्ति की ताकष्त मिलने पर वे अपने बारे में लिखना चाहते हैं और अपने बारे में पढ़ना भी चाहते हैं।

जयन्त परमार : क्या आप मानती हैं कि नज़दीकी भविष्य में दलित साहित्य तथाकथित ‘मेन स्ट्रीम लिट्रेचर’ के साथ जुड़ जायेगा ?

रमणिका गुप्ता : अगर छपास की भूख ने रचनाकृति पर प्रभाव नहीं डाला और यह धड़ल्ले से लिखा जाता रहा तो बहुत नये लोग इसके साथ जुड़ेंगे और लिखेंगे। कम्पीटीशन भी ख़ुद-ब-ख़ुद होगा। फिर जब 80-85 प्रतिशत यही लिखने वाले होंगे तो 15-20 प्रतिशत उन्हें कैसे रोक पायेंगे? यह साहित्य मूल धारा से जुड़ेगा या नहीं मैं नहीं बता सकती पर यह स्वयं ही मूल धारा बन जा सकता हैµअगर शिक्षा का प्रचार बढ़ा। ऐसा मेरा अनुमान है।

जयन्त परमार : क्या आपने शब्दों को एक हथियार के रूप में लिया है या सिर्फ़ अपने अन्दर की आग को काग़ज़ पर उतारा है? मेरा मतलब मास-मूवमेंट (जन-आन्दोलन) से है।

रमणिका गुप्ता : मैंने मुख्यतः साहित्य को हथियार के रूप में ही लिया है। शब्द को हथियार बनाकर आंदोलन भी करती रही हूं। काग़ज़ पर उसे उतार कर आगे के संघर्ष की ऊर्जा भी प्राप्त करती रही हूं। हां, अब आयु बढ़ जाने के कारण मेरे आंदोलन का स्वरूप कुछ बदला है। पहले मैं जन-आंदोलन से शब्द के लिए ऊर्जा हासिल करती थी तो वह काग़ज़ पर उतरता था, उसी प्रकार शब्द से ऊर्जा हासिल कर मैं मैदान में कूद जाती थी। अब शब्द से मैंने आन्दोलन के रूप में एक वैचारिक मुहिम छेड़ी है। यह अख़बार, पत्रिका, गोष्ठी, सेमिनार, सम्मेलन आदि में बहस के माध्यम से शब्द को नयी परिभाषा, नये अर्थ से लैस कर दलित चेतना का हथियार बनाने की कोशिश है।

मेरी रचनाओं में मार्क्स के साथ-साथ डॉ॰ अम्बेडकर और बुद्ध की विचारधारा भी है। मैं वर्ग और वर्ण दोनों लड़ाइयों को सामानान्तर चलाने में विश्वास रखती हूं। दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरी हैं। वैसे मैं डारविन और फ्रायड के सिद्धांतों की क़ायल भी हूं। वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण में विश्वास रखती हूंµनिरीश्वरवादी हूं। सापेक्षता के सिद्धान्त को मानती हूं। शाश्वतता को एक आदर्शवाद यानी यूटोपिया मानती हूं। चार्वाक मेरे ज़ेहन में हैं। बुद्ध ने मुझे काफ़ी प्रभावित किया है लेकिन मैं उनके प्रति धार्मिक विश्वास नहीं रखती और ना ही इनमें से किसी के भी प्रति अंधभक्ति रखती हूं। मैं अपने ख़ुद के विचार और तर्क को भी बरकरार रखती हूं। सारा जीवन मज़दूरों में, दलित आदिवासियों में बिताया है मैंने। मेरे विश्वास अनुभव की कसौटी पर निर्मित हुए हैं, केवल पढ़ कर नहीं। मेरी रचना के नायक-नायिकाएं इसी समाज और जमात से आते हैं जो अन्याय सहते रहे हैं, जो अन्याय के खि़लाफ़ खड़े होने के लिए संकल्पित हैं, आक्रोश से भरे मुट्ठियां भींचते, ललकारने को उद्धत हैं और बढ़ रहे हैं चरैवेति-चरैवेति का उद्घोष करते।

जयन्त परमार : आपकी रचनाओं में आपके नायक सिर्फ़ डॉ. अम्बेडकर हैं या कोई और भी है? आक्रोश और माज़ी के इन आवेगों के पीछे आपके निजी जीवन की भी कोई विशेष स्मृतियां हैं?

रमणिका गुप्ता : मेरे अपने जीवन की बहुत निजी स्मृतियां भी हैं जिनसे मेरा अतीत प्रभावित हुआ, जो मुझे आज भी आक्रोश से भर देती हैं। वह उपेक्षा-अवहेलना-अनादर और न जाने औरत को देखने के लिए एक ख़ास अंदाज़ और जाने कैसी-कैसी नज़रों का एक लम्बा सिलसिला है जिसने मेरे मन में आक्रोश भरा है। इसी अतीत की याद मुझे उस परजीवी जमात सेµव्यक्तियों से जोड़ देती है जो एक समाज के रूप में बहिष्कृत कर दिये गये थे। मैं उनसे एकात्म महसूस करती हूं। ये एक विडम्बना है। जितनी उपेक्षा मुझे संभ्रान्त, सभ्य समाज से मिलीµउतना ही अधिक प्यार मुझे इस मेहनतकश, दबी-कुचली, दलित, आदिवासी जमात से मिला। अपना इतना विश्वास उन्होंने मुझे दिया कि मैं इनके बेहद जोखि़म भरे आंदोलनों को चला सकी और इनका साथ लेकर इनकी मुक्ति की लड़ाइयों में कामयाबी हासिल कर सकी। डॉ. अम्बेडकर से मैं प्रभावित ज़रूर हुई। मार्क्स से भी प्रभावित हुई पर इनमें से कोई व्यक्ति नहीं बल्कि उनके विचार मेरी रचनाओं का केन्द्र बने। वैसे लोहिया, नेहरू और इन्दिरा गांधी पर आरंभ में मैंने कविताएं लिखी थीं उनके मरने पर। इनके प्रति आक्रोश भी कुछ कविताओं में उभरा है।

जयन्त परमार : दलित साहित्य का मापदण्ड क्या है ?

रमणिका गुप्ता : दलित साहित्य का मापदण्ड है, उसकी विषय वस्तुµजिसमें उसकी पीड़ा, उत्पीड़न, शोषण, आक्रोश, विद्रोह, प्रतिकार, प्रतिशोध और बदलाव का संकल्प निहित है एवं उसकी प्रमाणिकता, उसकी मन को छू लेने की शक्ति और मानसिकता बदलने की इच्छा और उसकी समाज के प्रति प्रतिबद्धता है।

जयन्त परमार : दलित साहित्य एक आन्दोलन है। आप इस आन्दोलन में कैसे आईं?

रमणिका गुप्ता : वैसे तो दलितों के आक्रोश, विद्रोह और संघर्ष की समर्थक और उनकी पीड़ा के प्रति संवेदनशील और भागीदार तथा उनके उत्पीड़न के विरुद्ध मैं अपने घर में बचपन से ही झण्डा उठाती रही हूं। उन दिनों स्वामी दयानन्द के आर्यसमाज और महात्मा गांधी द्वारा अछूतोद्धार का कार्यक्रम चलाया जा रहा था जिससे मैं भी प्रभावित हुई थी और मैंने अपने परिवार में भी उसको लागू करने की मुहिम छेड़ दी थी। लेकिन समाजिक रूप से इस आन्दोलन से मैं 1960 के बाद से जुड़ी, धनबाद में। वहां मैंने कई सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से कुछ करने की चेष्टा की।तब तक मैंने धड़ल्ले से कविताएं लिखनी शुरू कर दी थीं। मेरी कविताओं का देश-प्रेम, प्रकृति, प्रेम, भावना, दर्शन एवं तत्कालीन सामयिक समस्याओं के साथ-साथ, दलित उत्पीड़न भी विषय था। तब दलित साहित्य की चर्चा अलग से नहीं थी या यूं कहें मैं उससे परिचित नहीं थी। 1967 में मैं सक्रिय राजनीति में आई। सोशलिस्ट पार्टी में आने के बाद मेरा परिचय ‘पिछड़े पावें सौ में साठ’ के नारे से हुआ। तब दलितों और पिछड़ों पर मेरी राजनीतिक सोच का विकास हुआ जो मेरे भीतर बचपन से ही एक ‘द्वंद्व’ के रूप में मौजूद थी।

1968 में मज़दूर आन्दोलन से सीधे जुड़ जाने के बाद मुझे दलित आदिवासी, पिछड़े जिनमें औरतों की संख्या बहुत अधिक थी को संगठित कर संघर्ष में कूद जाने का मौक़ा मिला। इसमें मुझे जोखि़म भी उठानी पड़ी। उस समय दलित आदिवासी और महिला मज़दूरों तथा वहां के ग्रामीण विस्थापितों के लिए किये गये अपने संघर्षों के दौरान मुझे उनकी आर्थिक तथा ज़मीन की समस्या के साथ-साथ उनकी सामाजिक समस्याओं से भी रू-ब-रू होने का मौक़ा मिला। इन्हीं दिनों मुझे हजारीबाग ज़िला के खेतिहर मज़दूरोंµजिनमें 90 प्रतिशत दलित और आदिवासी होते हैं और स्त्रियों की संख्या भी अधिक होती हैµतथा किसानों की लड़ाइयां भी लड़ने का मौक़ा मिला। इनकी ज़मीनों पर लोगों ने नाजायज़ ढंग से क़ब्ज़ा कर लिया था। मुझे दलितों के वासगीत के परचां और उन्हें सरकार द्वारा अथवा भू-दान द्वारा मिली ज़मीनोंµजिन्हें ज़मींदार या अन्य दबंग जातियों के लोग हथिया लिये थेµके क़ब्ज़े तथा उनकी न्यूनतम मज़दूरी की लड़ाइयां भी लड़नी पड़ीं। इसी दौरान जंगल तथा बीड़ी मज़दूर जो आदिवासी दलित या एनेक्स्चर वन के पिछड़े ही होते हैं, के शोषकों से भी दो-दो हाथ होना पड़ा। यह शोषक सामन्त, बड़े किसान, ठेकेदार, नेता, जंगल के सिपाही रंगदार और पुलिसµजो प्रायः उच्च जाति के होते हैंµकी आपस में मिली-भगत होती है। औरतें इनके यौन शोषण की शिकार होती हैं।

इन्हीं संघर्षों के दौरान मुझे दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों के भीतरी अंतर्विरोधों और सामाजिक विकृतियोंµजैसे भूत-डायन और अंधविश्वास के साथ-साथ, सवर्ण सामन्तों के अतिरिक्त अपने सवर्ण साथियों की मानसिकता से भी जूझना पड़ा। विशेषतया औरतों के प्रति पुरुष मानसिकता के खि़लाफ़ तो मुझे सर्वहारा, दलित, आदिवासी, पिछड़ा अथवा सवर्ण में कोई ख़ास अन्तर नज़र नहीं आया। औरत होने के नाते राजनैतिक और सामाजिक स्तर पर मेरे कटु अनुभवों में तो इज़ाफ़ा हुआ ही पर एक आशा की किरण जो मुझे हौसला बंधाती रही और मुझे मर मिटने की हद तक ले गयी वह थी दलित, आदिवासी, पिछड़ों और औरत जमात का प्यार और उनकी एकता तथा कुछ हासिल करने की, लड़ाई जीतने कीµइच्छा-शक्ति। इन्हीं परिस्थितियों ने दलित, आदिवासी और औरत के साथ लाकर मुझे खड़ा किया और मेरी कविता का विषय बदल गया।

मैं कहानियां नहीं लिखती थी। मैंने कहानियां भी लिखनी शुरू की। वह सब इसी वर्ग पर आधारित हैं जो आर्थिक ही नहीं सामाजिक बराबरी या कहें मनुष्यता का हक़ पाने का उतना ही हक़दार है जितना अमीर, मध्यम वर्ग या ऊंची जाति के लोग। इन संघर्षों के दौरान मैंने जातीय विभाजन को क़रीब से देखा और हक़ीक़त को पहचाना। मैंने दलित आदिवासी और स्त्रा समाज में व्याप्त एक हीन-ग्रंथी का साक्षात रूप देखा और देखी उनकी अकूत बहादुरी। मैंने इस हीन-ग्रंथी से उन्हें मुक्ति दिलाने के लिए मुहिम चलायी। मैंने हर प्लेटफार्म पर, हर मंच पर एवं सभाओं में इनके सवाल उठाने शुरू किये। बिहार में कर्पूरी ठाकुर और रामविलास जी ने अस्सी के दशक में दलित सेना का निर्माण किया और पेरियार के साथीगण बिहार में आये। मुझे भी उनके साथ बिहार में दलित सेना के संगठन का और सभाओं को संबोधन करने का मौक़ा मिला और हजारीबाग में एक विशाल आयोजन भी तीन दिनों तक मैंने चलाया, जिसमें हजारीबाग ज़िले (पुराने ज़िले) के लगभग तीन हज़ार आदिवासी और दलित लोग भी जुटे थे। गांधी मैदान, पटना की सभा में मुझे पेरियार के साथियों के भाषण का अंग्रेज़ी में अनुवाद करने का मौक़ा मिला। इससे भी मुझे पेरियार और डॉ. अम्बेडकर की विचारधारा को गहन रूप से जानने में मदद मिली। मैंने पेरियार की किताबों का अनुवाद भी किया और उन्हें पढ़ा भी। ये लगभग सन् 78-80 के बीच की बात है।

इसके बाद महाराष्ट्र में डॉ. अम्बेडकर के नाम पर विश्वविद्यालय के नाम के विवाद और दलितों के संघर्ष की ख़बरों ने भी मुझे इस विचारधारा के और नज़दीक ला दिया। मैंने उस समय महाराष्ट्र के इस काण्ड पर एक व्यंग्य लेख भी लिखाµ‘‘सरकारी ठप्पा’’। गुजरात में मेडिकल में अनुसूचित जाति, जनजाति के आरक्षण को लेकर हिंसक विरोध हुए। उसके बाद विधानसभा और लोकसभा में राजनैतिक आरक्षण को लेकर बुद्धिजीवियों और मीडिया का विरोध गहराया। तत्पश्चात मंडल कमीशन को सवर्ण जातियों, बुद्धिजीवियों तथा मीडिया का हिंसक, विद्वेषपूर्ण विरोध झेलना पड़ा। इन सभी ने मुझे दलित विचारधारा का पक्का समर्थक बना दिया। मैं तब बिहार विधान परिषद की सदस्या थी और 1979 में चुनाव जीतकर विधायक बन गयी थीµमांडू क्षेत्रा से। वहां पर भी मज़दूर, विस्थापित, दलित उत्पीड़न, आदिवासियों की ज़मीनों का अधिग्रहण और दिकुओं द्वारा उन पर क़ब्ज़ा, ताना भक्तों की समस्या, महिलाओं के साथ बलात्कार और डायन कहकर मार दी गयी औरतों के सवाल, दलितों को भूदान और सरकार द्वारा आवंटित ज़मीनां के क़ब्ज़े तथा वासगीत परचों के वितरण के विवाद, सामंतों द्वारा दलितों को खदेड़ने के सवाल, छोटानागपुर के इलाक़े में महुए के गाछों पर सवर्णों का क़ब्ज़ा करना और दलितों को महुआ चुनने से रोकना, खेतिहर मज़दूरों को पूरी मज़दूरी न देकर खेसारी का सत्तु देना, ज़मींदारों के द्वारा सीमा से अधिक ज़मीन रखना और खदानों के कारण हुए विस्थापन के कारण ज़मीन के बदले दी जानेवाली नौकरियों में ज़मीन की निर्धारित सीमा कम कर के नौकरी देने के सवाल तथा अन्य विकास संबंधी सवाल जैसे पानी बिजली, सड़क, पुल-पुलिया आदि एवं भ्रष्टाचार ख़ास कर अवैध कोयला खनन और उसके माफिया के खि़लाफ़ आवाज़ को मैं ज़ोरदार त़रीके से मैं विधान सभा के भीतर और बाहर उठाती रही। 1985 में मैं कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) में विधिवत आ गयी। वैसे मैं 1978 में ही इसकी उम्मीदवार सदस्यता का फार्म भर चुकी थी।

1985 में हमने अपनी पत्रिका ‘युद्धरत आम आदमी’ का प्रकाशन शुरू किया। 1987 में पहली दलित कहानी प्रह्लाद चन्द्र दास की ‘लटकी हुई शर्त’ इसमें छपी।

1992 में हजारीबाग में हमने जनवादी लेखक संघ बिहार राज्य का चौथा सम्मेलन आयोजित किया जिसमें साम्प्रदायिकता के मुद्दे के साथ दलित और महिला के प्रति लेखकों की भूमिका का विषय भी जोड़ा गया। इस सम्मेलन पर हमने ‘युद्धरत आम आदमी’ का विशेष अंक भी छापा जिसमें दलित मुद्दे पर आलेख भी छपा। तब तक मैं हिन्दी के दलित साहित्यकारों से अधिक परिचित नहीं थी। मराठी के बारे में जानकारी थी। संभवतः 1993 में जनवादी लेखक संघ बोकारो के यूनिट द्वारा कहानियों पर एक बहस आयोजित की गयी थीµउसी गोष्ठी में प्रह्लाद चन्द्र दास और सत्येन्द्र कुमार की कहानी पर बहस हुई थी जिसमें पहली विशुद्ध दलित चेतना की कहानी थी और दूसरी दलित चेतना के साथ-साथ वर्ग चेतना पर भी आधारित थी। वहीं दयानंद बटोही जी से मेरा परिचय हुआ। 1994 में डॉ. पुरुषोत्तम सत्यप्रेमी द्वारा आयोजित ‘अस्मितादर्श’ सम्मेलन में मुझे उज्जैन बुलाया गया। इस सम्मेलन में मैंने दोनों कहानियों का विश्लेषण करते हुए प्रह्लाद चन्द्र दास की कहानी को गांधीवादी तरीके से वर्ण समस्या के विरुद्ध संघर्ष पर आधारित दलित कहानी की संज्ञा दी थी। मैंने सत्येन्द्र की कहानी को वर्ग के साथ-साथ वर्ण के विरुद्ध संघर्ष की कहानी इसलिए कहा था क्योंकि दलित नायक को सवर्ण राजनीतिक साथियों द्वारा सवर्ण ज़मींदार के खि़लाफ़ बटायीदारी के हक़ के लिए इसलिए साथ न दिया जाना चूंकि नायक एक दलित था, दलित ग्रामीणों के एकताबद्ध होने की प्रेरणा बना था। उनकी प्रेरणा से बटायीदारी की ये लड़ाई दलितों की प्रतिष्ठा की लड़ाई बन गयी थी। सवर्ण और दलित मानसिकता का भेदभाव और बटायीदारी का हक़ दोनों ही इस कहानी के विषय वस्तु थे।

इस सम्मेलन में बटोही जी भी मेरे साथ उज्जैन गये थे। वहां मेरा दलित साहित्य और दलित साहित्यकारों से परिचय हुआ। वहीं पर आपसी वार्ता में मैंने दलित चेतना कविता अंक की घोषणा की थी। इसके बाद मुझे दिल्ली में गांधी शांति संस्थान में हुई दलित लेखकों की गोष्ठी में, राजेन्द्र यादव जी और ओमप्रकाश वाल्मीकि जी के साथ अध्यक्षता करने का मौक़ा मिला। फिर तो दिल्ली, नागपुर, उज्जैन आदि कई स्थानों में जाने का सिलसिला ही बन गया। दलित आंदोलन से मुझे परिचित कराने में दयानंद बटोही और डॉ. एन.सिंह ने अहम भूमिका निभायी। वैसे 1993 से पहले ही राजेन्द्र यादव जी की मारफ़त भी मुझे ओमप्रकाश वाल्मीकि और परदेशी राम वर्मा का परिचय मिल चुका था और हम उनको हजारीबाग बुलाने के लिए योजना भी बनाये थे जो सफल नहीं हो पायी। इस प्रकार मैं दलित आंदोलन से जुड़ी और चार दलित विशेषांकों को मैंने अंजाम दिया। मुझे इस कार्य में तीन वर्ष लगे।

जयन्त परमार : विद्रोह तो नक्सलबाड़ी में भी हुआ था। दलित साहित्यकारों के बीच क्या चर्चाएं थीं ?

रमणिका गुप्ता : दरअसल उन दिनां हिन्दी पट्टी यानी उत्तर भारत में दलित साहित्य और साहित्यकार चर्चा में नहीं थे या ये कहें कि उनका हस्तक्षेप राजनीति में नहीं था, ख़ासकर हिन्दी पट्टी में। दलित नेता ज़रूर थे पर वे जिन-जिन पार्टियों से जुड़े थे उनके पैरवीकार अधिक थे, विद्रोही कम। जब तक ये विद्रोही तेवर दलितों के विभिन्न वर्गों ने नहीं अपनाया, उनका साहित्य भी सामने नहीं आया। हिन्दी पट्टी में नक्सलवादी आंदोलन का प्रभाव इस क्षेत्रा के नौजवानों पर काफ़ी पड़ा। इससे प्रगतिशील और जनवादी लेखक भी प्रभावित हुए। इस आंदोलन के साथ दलित-पिछड़े भारी संख्या में जुटे चूंकि ज़मीन, मज़दूरी और बेदख़ली की लड़ाई उन्हीं की थी, जो इस आंदोलन ने चलायी। नक्सली साहित्य से जुड़े लेखकों ने दलित पात्रों, दलित महिलाओं के उत्पीड़न और शोषण की कहानियां भी लिखीं पर उनमें महिला उत्पीड़न के साथ-साथ वर्ग शोषण प्रधान होता था। वर्ण-शोषण की चर्चा गौण थी। हां, सवर्णों द्वारा किये गये उत्पीड़न की चर्चा उस साहित्य में भी कहीं-कहीं काफ़ी मुखर थी। ऐसे बिहार में रामविलास पासवान जी द्वारा चलायी गयी दलित सेना की मुहिम प्रदर्शन, जुलूस, सभा, रैली सरकारी राहत के कार्यक्रम तक ही सीमित रह गयी, जबकि नक्सलवादी आंदोलन तत्काल फलदायी, अन्याय के खि़लाफ़ प्रतिकार या बदला लेने के कार्यक्रम अथवा आतंकित करने वाले ज़मींदारों को आतंक द्वारा हतोत्साहित करने और दबी-कुचली जनता को आत्मविश्वास से लैस करने में ज़्यादा सार्थक सिद्ध हुआ। दलित सेना संसदीय प्रणाली वाली राजनीतिक पार्टी का एक हिस्सा बन गयी और गांवों में और सुदूर जंगलों में किये जा रहे अत्याचार, उत्पीड़न जो बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में प्रायः सवर्णों द्वारा ही किये जाते थे (अपवाद स्वरूप कुछ पिछड़ों को छोड़कर हालांकि आज पिछड़े भी दलितों का जुल्म ढाने में पीछे नहीं हैं।)µमें वह सीधा हस्तक्षेप नहीं कर पायी। इसका एक कारण सोशलिस्ट पार्टी का, जो बिहार में अधिक प्रभावशाली था, उन दिनों बार-बार टूटना और फिर जनता पार्टी, लोकदल, दमकिपा आदि में से होते हुए-बनते बिगड़ते, जनता दल बनना और सत्ता में आनाµफिर टूट जाना भी हो सकता है। इनका कैडर जो कभी कन्धे पर झोला टांग कर पांव-पैदल गांव-गांव घूमता था और जो साईकिल पर प्रचार कर चुनाव जीतता थाµपैरवीमुखी बन गया था। वह लोहिया या कर्पूरी ठाकुर की तरह नहीं रहा और आंदोलन से हट गया। बिहार का दलित वर्ग नक्सलवाद के अलावा कम्युनिस्ट पार्टियों से भी जुड़ा हुआ है चूंकि ये पार्टियां भूमि आंदोलन को लेकर काफ़ी सक्रिय हैं। ये उन्हें आर्थिक आधार भी देती हैं। कुछ वर्षों से कम्युनिस्ट पार्टियों ने भी दलित उत्पीड़न के मुद्दों में सार्थक हस्तक्षेप करना शुरू किया है। हालांकि उनका नेतृत्व सवर्णों के हाथ में अधिक है जबकि नक्सलवादी आंदोलन में ऊपर का नेतृत्व जो भी हो लेकिन उनके कमांडर और कैडर उसी दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग से तथा अल्पससंख्यक वर्ग से ही आते हैं। इसलिए दलित आंदोलन अथवा दलित साहित्य इन क्षेत्रों में अधिक चर्चित नहीं हो पाया जैसा कि दिल्ली, मध्यप्रदेश, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब आदि में हुआ।

बिहार में दलित साहित्य की शुरुआत मुख्यतः जनवादी लेखक संघ की पत्रिका ‘युद्धरत आम आदमी’ ने ज़ोरदार तरीके़ से शुरू की। ऐसा नहीं कि अकेले हम ही ने यह किया। बिहार में अम्बेडकर मिशन के दलित पासवान जी तथा रमाशंकर आर्य, दलित अकादमी के पारसनाथ एवं स्वतंत्रा रूप से मैकू राम जी, ए. के. विश्वास और जियालाल आर्य तथा कई अन्य ने भी, दलित साहित्य के छोटे-मोटे आयोजन किए और संस्थागत अथवा व्यक्तिगत रूप से लेखन कर दलित साहित्य के विकास में योगदान किया। ये आयोजन संस्थागत रूप में साहित्य से उतना सार्थक रूप से नहीं जुट पाये जितना ‘युद्धरत आम आदमी’ द्वारा राष्ट्रीय पैमाने पर दलित साहित्यकारों की रचनाओं के कहानी, कविता, आलेख एवं साक्षात्कार आदि विधाओं में साहित्यिक रचनाओं पर आधारित चार विशेषांकों के माध्यम से सम्भव हो सका। पिछले दो वर्षों से बिहार के सभी साथियों को लेकर हमलोग पटना में राष्ट्रीय स्तर पर एक दलित साहित्य लेखक सम्मेलन करवाना चाह रहे थे ताकि इसे मीडिया का आधार भी मिले। इस विचार को बल देने के लिए दलित साहित्य पर मेरे (रमणिका गुप्ता), प्रेम कुमार मणि तथा कई अन्य लेखकों के लेख राष्ट्रीय/स्थानीय अख़बारों में भी आये। गै़र दलित साहित्यकारों तथा राजनैतिक खे़मों के जातीय अहम् से पीड़ित बंधुओं ने काफ़ी नाक भौं भी सिकोड़ी। 1996 से शुरू हुई इस चर्चा तथा बहस को हम अक्टूबर 1997 में दलित लेखक साहित्य सम्मेलन हजारीबाग में करवा कर एक साकार रूप दे पाये। वैसे इस सम्मेलन से पहले सितम्बर 1997 के अंत में पटना में राजद के नेताओं द्वारा अवर्ण साहित्यकार सम्मेलन भी आयोजित किया गया था। लेकिन हजारीबाग में हमने इस सम्मेलन को दलित साहित्य तक ही सीमित रखा। सामाजिक मुद्दों, सामाजिक परिवर्तन और डॉ. अम्बेडकर द्वारा दी गयी दलित की परिभाषा के अनुरूप दलित साहित्य की अवधारणा और उसके सौंदर्यशास्त्रा के साथ-साथ भारतीय मानसिकता बदलने के लिए (दरअसल जो हिन्दू मानसिकता है) दलित साहित्य को पाठ्यक्रम में निर्धारित करने के विषयों पर हमने बहस चलायी जो अब एक मुहिम का रूप ले चुकी है और पूरे बिहार में साहित्यिक राजनैतिक और सामाजिक ख़ेमों में इसकी चर्चा तो हो ही रही है, वहµराज्य की सीमाएं पार कर पूरी हिन्दी पट्टी में भी फैल रही है।

जयन्त परमार : दलित साहित्य के सौंदर्यशास्त्रा पर आप क्या कहना चाहती हैं?

रमणिका गुप्ता : दलित साहित्य का मूल्यांकन साहित्य के सदियों पुराने सौंदर्यशास्त्रा के आधार पर नहीं किया जा सकता इसलिए उसे अलग होना ही है चूंकि बाक़ी सब साहित्य उन लोगों द्वारा लिखा गया है जिन्होंने दलितों से मनुष्यता का हक़ छीना और उन्हें साहित्य में भी चर्चा के दायरे से बाहर रखाµअगर रखा भी तो घृणा के पात्रा बना कर रखा। उनका सौंदर्यशास्त्रा सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम् पर आधारित है लेकिन उनका सत्यम् वही है जो उच्च जातियों ने कहा, उनका शिवम् वही है जो उच्च जातियों के लिए कल्याणकारी हो चाहे वह दलित जातियों की हत्या कर या उन्हें उत्पीड़ित कर ही क्यों न हासिल होता हो। उनका सुन्दरम् वही है जो उच्च जातियों का मनोरंजन करे, जिसे वे भोगें। ऐश्वर्य उनका अभीष्ट है। उसकी परिधि में न दलित आते हैं और न उनकी पीड़ा।

ठीक इसके विपरीत दलितों का सत्यम् उनका शोषण है जो उच्च वर्णों द्वारा किया जाता हैµउन्हें अशिक्षित, धन जमा करने से वंचित और भाग्य के सहारे पिछले जन्म के पाप और पुण्य पर आधारित रख करµजन्म जन्मांतर का अपराधी घोषित कर पशु-तुल्य ज़िंदगी व्यतीत करने पर मजबूर कर के किया जाता है। दलित अब इस शोषण के खि़लाफ़ विद्रोह करने को खड़े हो रहे हैं। इसलिए आज दलितों का सत्यम् है शोषण से मुक्ति, अभिव्यक्ति की आज़ादी, ज्ञान, शिक्षा और उसके लिए संघर्ष और विद्रोह करना। दलितों का शिवम्µआत्मसम्मान और स्वाभिमान निर्मित करना है और सवर्णों ने उनमें जो हीन-भावना भर दी थी, उसे त्याग कर सवर्ण मानसिकता का विनाश करना भी है। उनका शिवम् जातीय भेदभाव से मुक्ति है, समानता है, बंधुत्व है और है जातीय दंभ और वैशिष्ट्य का विनाश।

दलितों का सुंदरम् न मनोरंजन है न ऐश्वर्य। उनका सुंदरम् तो उस ग़रीबी गलाज़त, कुरूपता जो उन पर मढ़ी गयी, गंदगी--जिसमें उन्हें रहने के लिए सवर्णों द्वारा मजबूर किया गया, से निजात पाना है। अस्पृश्यता सेµजिसने उनकी परछायी को भी अछूत बना दिया था, को नकारना है, उसे अपनी पीड़ा और वेदना के माध्यम से अभिव्यक्ति देना है। कुरूपता को मिटाना है जिसे सवर्णों ने उन पर थोपा ताकि वे स्वयं स्वच्छ रह सकें और सौंदर्य भोग सकें। दलितों की दासता सवर्णों का ऐश्वर्य है, इनके दुःख से सवर्णों का सुख पैदा होता है, इनकी गंदगी उन्हें स्वच्छता देती है। इसी विरोधाभास को ख़त्म करना दलितों का सुंदरम् है जो मनोरंजनकारी क़तई नहीं हो सकता। वह क्रांतिकारी हो सकता है, इन्क़लाबी हो सकता है, वह दर्द दे सकता हैµकरुणा जगा सकता हैµव्यवस्था पर ग़ुस्सा दिला सकता है, वह विद्रेह, प्रतिरोध और आक्रोश का रूप ले सकता है, वह बदलाव के लिए विद्रोह के संकल्प की प्रेरणा दे सकता है, पर वह मज़ा नहीं दे सकता, दिल नहीं बहला सकता। वह अंतर को कचोट सकता है, मानस को बदल सकता है इसलिए सवर्णों का सुंदरम् दलितों का सुंदरम् नहीं हो सकता और न ही दलितों का सुंदरम् जातीय दंभ से परिपूर्ण सवर्णों का सुंदरम् हो सकता है। ऐसे भी सवर्णों के साहित्य सत्यम शिवम सुन्दरम् का श्रोत ईश्वर है और लक्ष्य भी ईश्वर है जबकि दलित साहित्य का केन्द्रबिन्दु और लक्ष्य मनुष्य हैµमानवता है, ईश्वर क़तई नहीं।

दलितों का सौंदर्यशास्त्रा उनकी रचनात्मकता एवं कृतियों के साथ-साथ ही निर्मित हो रहा है। वे अपने नये प्रतीक, नये बिम्ब, एवं मिथक गढ़ रहे हैं। इतना ही नहीं वह नये मिथक गढ़ने के साथ-साथ पुराने मिथकों को भी अपने अनुरूप परिभाषित कर रहे हैं, इसलिए रामायण के राम का मर्यादा पुरुषोत्तम रूप का मिथक तोड़ कर उसे शम्बूकहंता, पत्नीत्यक्ता घोषित कर रहे हैं। दलित साहित्य में युधिष्ठिर सत्यवादी धर्मराज नहीं रहाµवह पत्नी को दांव पर लगाने वाला जुएबाज़ है। आज बहादुरी के प्रतीक के रूप में फूलन देवी उभर आयी है जो बलात्कारियों को सज़ा देने की हिम्मत और क़ुव्वत दोनों रखती है और आज सावित्रा जो अपने पति के प्राण एवं अपने लिए पुत्रा और परिवार के लिए धन का वरदान लेने के लिए निकली थी, मिथकीय पात्रा नहीं रही। आज तो सावित्रा बा फुले महान हैं जिन्होंने सारे विरोधों के बावजूद शिक्षा ग्रहण की और महिलाओं को पढ़ाना शुरू किया, यहां तक कि सवर्णों की विधवाओं की अवैध संतान को भी बचाया, जिं़दा रखा, पाला-पोसा और पढ़ाया, संतान का वर उन्हें दिया जो इस देवता कही जाने वाली जाति के हाथां मार दिये जाने वाले थे। उन्होंने विधवाओं को जीने की राह दिखायी, पढ़ाया, उन्हें वेश्या बनने से बचाया और दिया एक सामूहिक परिवार के सुख का वरदान। सावित्रा के वरदान उसके अपने लिए थे, लेकिन सावित्रा बा फुले के वरदान पूरे समाज के लिए थेµजिसमें महिलाएं भी शामिल हैं। इसलिए दलितों का सौंदर्यशास्त्रा अलग होगा ही, यह मेरा मत है।

जयन्त परमार : दलित साहित्य और वामपंथी आंदोलन के आपसी संबंधों को आप किस तरह देखती हैं ?

रमणिका गुप्ता : दरअसल दलित साहित्य और वामपंथी आंदोलन में जो मतभेद दिखता है वह कुछ तो प्रायोजित हैµकराया गया है, कुछ भ्रम-वश है और कुछ सचमुच विचारधारा के विभेद पर आधारित है।

दलित साहित्यकार डॉ. अम्बेडकर की विचारधारा से प्रभावित हैं। वे उनकी प्रेरणा से लिखते हैं और उनकी विचारधारा पर आधारित साहित्य को ही दलित साहित्य मानते हैं।

मुख्यतः ये विभेद तीन तरह की सोच पर आधारित हैंµ

1. प्रथम वह जो वामपंथियों को अपना शत्रा मानती है।

2. दूसरी वह जो वामपंथी आंदोलन और दलित साहित्य को दलित साहित्य की पृष्ठभूमि मानती है।

3. तीसरी वह सोच जो दलित साहित्य और वामपंथी आंदोलन को एक-दूसरे का पूरक मानती है यानी कि समन्वय की आकांक्षा रखती है।

ठीक ऐसे ही वामपंथियों में भी सोच के स्तर पर कुछ विभेद हैं, जैसेµ

1. एक वो जो दलित साहित्य को वामपंथी आंदोलन का विरोधी मानते हैं और उसे जातिवादी और वर्ग एकता को तोड़ने वाला कहते हैं।

2. एक वो जो दलित साहित्य को प्रगतिशील मानते हैं और जनवादी लेखन की तरह ही वर्ग की बजाय वर्ण पर आधारित साहित्य मानते हैं। कोई-कोई उसे जनवाद का विस्तार भी कहते हैं।

3. एक वे हैं जो वर्ग-संघर्ष करने के साथ-साथ, वर्ण आधारित उत्पीड़न के मुद्दे को जोड़ कर समन्वय की बात करते हैं। अभी हाल में लगभग सभी वामपंथी पार्टियों के एजेन्डा में सामाजिक स्तर पर दलित उत्पीड़न के विरुद्ध हस्तक्षेप करना और उनके आत्मसम्मान की लड़ाई को भी शामिल ही नहीं करना बल्कि प्राथमिकता देना इस समन्वयवादी सोच का प्रतीक है।

4. एक चौथी सोच भी है जो मार्क्स और एंगेल्स के विचारों को हिन्दुस्तानी संदर्भ में देखते हुए दस्तावेज़ों के आधार पर एंगेल्स द्वारा लिखे गये इस वाक्य कोµ‘‘किसानों की मुक्ति के लिए सुपर स्ट्रक्चर को तोड़ना होगा’’µनये ढंग से परिभाषित कर रहे हैं। उनका मानना है कि भारत के संदर्भ में जातीय ढांचा ही वह सुपर स्ट्रक्चर है जो सीढ़ीनुमा है। उनके अनुसार भारतीय संदर्भ में जाति ही वर्ग है। यहॉं गांव में या भूमि संबंधों में कुछ अपवादों को छोड़कर सभी भूपति सवर्ण हैं और खेतिहर मज़दूर तथा सीमांत किसान दलित अथवा पिछड़े हैं यानी कि शूद्र हैं। इस ढॉंचे में इन शूद्रों को जाति के कारण ग़रीब एवं सेवक बने रहने के लिए एक योजना के तहत सामाजिक और शास्त्राय नियम रचे गये थे जिनके अनुसार इन्हें धन जमा करना, शिक्षित होना, अपना पेशा बदलना या उसे मन से चुनना वर्जित है। इस व्यवस्था में ये पूरा इंतज़ाम है कि ये कभी ग़रीबी रेखा से ऊपर न उठ सकें। इनके पेशों में अपराध करना भी शामिल है जिसे इनके जन्मजात पेशे के रूप में निर्धारित किया गया था तथा इसके प्रशिक्षण की व्यवस्था भी की गयी थी ताकि वह कभी इससे मुक्त न हो सकें। इन पेशों को उन्हें उनके पूर्व जन्म का फल कहकर स्वीकार करने को बाध्य किया गया था। ये कहलाने को तो सामाजिक व्यवस्था है और लोग इसी रूप में आज इसे मानते भी हैं लेकिन वास्तव में ये वर्गीय व्यवस्था ही है। बड़ी चालाकी और बारीकी से आर्थिक स्तर को जाति से जोड़ दिया गया है। इसलिए इस सोचवालों के अनुसार जाति के कारण एक अस्सी वर्ष के दलित बूढ़े को एक पांच वर्ष का ब्राह्मण लड़का ‘रेकार’ पड़ता है यानि ‘रे’ कह कर पुकारता है या पांच वर्ष के राजपूत के बेटे को ‘सलाम बाबू साब’ और ब्राह्मण बच्चे को ‘पॉयलगूं बाबा जी’ कहता है। यहां वर्ग और जाति एक हो जाती है। इस परिभाषा या सोच को मानने वाले लोग भारतीय संदर्भ में वर्ण को भी वर्ग की ही लड़ाई मानते हैं यानी वे भारतीय संदर्भ में वर्ण को वर्ग से और वर्ग को वर्ण से भिन्न नहीं मानते, या यूं कहा जाय कि वे वैसा मानते हैं कि वैचारिक, आर्थिक और सामाजिक तीनों स्तर पर एक साथ लड़े बग़ैर वर्गीय समानता संभव नहीं। वर्णवादी, मनुवादी व्यवस्था में केवल जातीय, समाजिक प्रतिबन्ध ही नहीं होता उसमें आर्थिक निषेध को शास्त्राय करार कर, वर्गीय गै़र बराबरी में बने रहने का स्थायी प्रावधान भी है। इसलिए वर्ण की लड़ाई वर्ग से भिन्न नहीं है, दोनों एक ही हैं।

विचारात्मक स्तर पर वामपंथी आंदोलन और दलित आंदोलन में मुख्यतः निम्न बातों पर मतभेद दिखता है। पहलाµमार्क्सवाद के अनुसार सर्वहारा की तानाशाही की व्यवस्था से ही लक्ष्य की प्राप्ति हो सकती है, जबकि डॉ. अम्बेडकर प्रजातंत्रा के हिमायती थे। मार्क्सवाद हिंसा के माध्यम से भी क्रांति का समर्थक है, जबकि डॉ. अम्बेडकर हिंसा के समर्थक नहीं थे। दूसरा, मार्क्सवाद पूंजीपति ढांचे को बिल्कुल ख़त्म करने का पक्षधर है, वह साम्यवादी व्यवस्था चाहता है और निजी सम्पति का विरोधी है, लेकिन डॉ. अम्बेडकर भूमि संबंधों में ज़मीन का राष्ट्रीयकरण एवं मूल उद्योग में राजकीय हस्तक्षेप वाले सार्वजनिक क्षेत्रा के समर्थक तो थे पर वे मिश्रित व्यवस्था के ही हिमायती थे। वे निजी उद्योग भी चलने देने के पक्षधर थे। एक मतभेद और रहा जो दरअसल भारतीय मार्क्सवादियों के दृष्टिकोण के कारण ही पैदा हुआ था। भारत में मार्क्सवादी नेतृत्व में जातीय उत्पीड़न एवं वर्ण भेद-भाव को महत्व नहीं दिया गया, आर्थिक यानी वर्ग संघर्ष की कामयाबी के बाद सत्ता में आने पर जातीय भेदभाव स्वतः ही समाप्त हो जायगा, वे इस तर्क पर ही ज़ोर देते रह गये। जबकि डॉ. अम्बेडकर का मानना था कि वर्ग संघर्ष ही केवल भारत में सामाजिक समानता नहीं दे सकता। सामाजिक समानता एवं सामाजिक न्याय का मुद्दा, यानी जातीय असमानता समाप्त किये बिना भारत में वर्गीय समानता भी नहीं आ सकती। दरअसल भारत की कम्युनिस्ट पार्टियों में भी सवर्ण जातियों का वर्चस्व बने रहने के कारण जातीय समस्या को दलितों के नज़रिये से या यूं कहा जाए समाजशास्त्राय नजरिये से नहीं देखा गया, जिसका एहसास उन्हें नवें दशक में हुआ। उनकी जमात दलितों की ही जमात थी जिसके सहारे वे संघर्ष करते थे। हालांकि लड़ाई भी दोनों विचारकों की शोषण के खि़लाफ़ ही थी--सवाल केवल प्राथमिकता का था। पहले सामाजिक लड़ाई लड़ी जाय या आर्थिक और राजनैतिक यानी पहले वर्ण की लड़ाई लड़ी जाये या पहले वर्ग की।

समन्वयवादी लोग इन दोनों लड़ाइयों को एक साथ लेकर चलने के पक्षधर हैं क्योंकि दोनों ज़रूरी हैं। दलितों को मनुष्यता का दर्जा दिलाने के लिए बाबा फुले ने भूमि की लड़ाई को भी उतना ही महत्वपूर्ण माना है जितना जातीय भेदभाव के विरुद्ध संघर्ष को। इसलिए भूमि सुधारों पर उन्होंने ज़ोर दिया।

मेरा मानना है कि दलित साहित्य और वामपंथी आंदोलन समानता, भाईचारा और आज़ादी की लड़ाई को, वर्ग और वर्ण को, एक साथ जोड़कर ही लड़ पाएगा। लेकिन यह नियम दोनों यानि वर्ग वादियों और वर्ण वादियों पर लागू होता है। जैसे अकेले वर्ग की लड़ाई समानता नहीं ला सकती ठीक उसी प्रकार अकेले वर्ण की लड़ाई भी एकांगी और अधूरी रह जाएगी यदि वर्ग संघर्ष को साथ नहीं जोड़ेगी। पिछली सदी में हुए अनुभव यह सिद्ध करते हैं।

मैं दलित और वाम आंदोलन को एक दूसरे का विरोधी नहीं मानती। वामपंथियों की जमात तो दलित ही हैं। वामपंथी आंदोलनों के कारण ही दलितों ने संगठनबद्ध होना शुरू किया था। दोनों साथ-साथ चलें तो समानता, भाईचारे और आज़ादी की लड़ाई सफल हो सकती है।

जयन्त परमार : आजकल आप क्या लिख रही हैं ?

रमणिका गुप्ता : ‘युद्धरत आम आदमी’ पत्रिका का सम्पादन ही आजकल काफ़ी समय ले लेता है। फिर दलित और स्त्रा मुद्दों पर आलेखों की मांग भी बढ़ जाने से वह भी तैयार करने होते हैं। हां, कविता लिखना जारी है। जीवनी भी लिख रही हूं। यात्रा संस्मरण, महिला-साहित्य का आयाम, विकास एवं महिला मुक्ति तथा महिला कामगार आदि विषयों पर भी कई आलेख, पुस्तकें तैयार कर रही हूं तथा कई कविता संकलनों की सामग्री लिखी पड़ी है, उन्हें भी समेटने का काम गाहे-बेगाहे करती हूं। अग्निदीक्षा नाम से मैंने ट्रेड यूनियन एवं राजनीति के संस्मरण भी लिखे हैं और कुछ लिख रही हॅू। कई स्तरों पर काम करना पडता है दरअसल मुझे। ज़िंदगी का समय भी अब कम ही बचा है। देखें कितना समय छीन पाती हूं और उसे काग़ज़ पर उतार पाती हूं। अभी जद्दोजहद जारी है।

जयन्त परमार : नीग्रो साहित्य का दलित साहित्य पर कैसा प्रभाव रहा है ?

रमणिका गुप्ता : दलित लेखक ने नीग्रो साहित्य से हर स्तर पर प्रेरणा के साथ-साथ, बल भी पाया है और उनके द्वारा अपनाये गये स्वतंत्रा प्रबंध, स्वतंत्रा मीडिया, भाषा, लेखन के तरीक़ों को भी उन्होंने विशेषतया महाराष्ट्र में अपनाया है। उससे उनकी प्रगति तो हुई ही विचारधारा में भी ढृढ़ता आई है। नीग्रो साहित्य से डॉ. अम्बेडकर द्वारा चलाये गये अभियान को भारतीय समर्थकों को अम्बेडकर विरोधी राजनीतिज्ञों एवं साहित्यकारों को भी जबाव देने के लिए एक सम्बल मिला। हांलाकि इन दोनां पीड़ितों की कई परिस्थितियां समान हैं पर उनमें भिन्नता भी है। इस पर साहित्यकारों में काफ़ी बहस चली है, जिसने दलित विचारधारा को पुष्ट किया है।