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कहानी

कहानी

दाग दिया सच

‘‘महावीर... महावीर ऽऽऽ ...! ”मालतीµमाल ऽऽऽ ...ती! फिर एक वंशी की धुन हृदय को चीरती हुई गूंज गई-। अचानक तासा की आवाज़-ढोल की आवाज़-और फिर-मालती ऽऽऽ महावीर ऽऽऽ-।“

दो बरस बाद मैं हेंदेगड़ा की तरफ जा रही थी कि रास्ते में ही इन आवाज़ों ने मेरा रास्ता रोक लिया। मैंने गाड़ी रूकवाई। नीचे उतर कर टार्च से चारों तरफ देखा तो एक दुबला-सा बूढ़ा लडखड़ाते हुए, बंसी बजाते चला आ रहा था। गाड़ी देख कर वह नजदीक आ गया और मुझे देखते ही बोला-”अगे मैय्या तू ठीक वखत पे आ गई, देख महावीर और मालती एही जंगल में कहीं लुक्का-छिप्पी खेल रहे हैं - तू देख न, ऊ एक दूजे को हंकाय (बुला) रहे हैं। ई मोर महावीर के वंशी है मैय्या। देख कैसन रोय-रोय के याद करे है महावीर के और देख मैय्या ई ढोल!“ उसने ढम-ढम ढ़ोल को पीटते हुए फिर कहना शुरू किया - ”ढ़ोल मालती के खबर देने खातिर महावीर बजाता रहा कि मैं आ रहा हूँ - मिलो आ के।“ देख मैय्या ई तासा। मोर महावीर के तासा पार्टी फस्ट आई रही हजारीबाग में ! मैय्या मोर महावीर हेन्हे ही केने भुतला (खो) गया। उसको खोज दे मैय्या! मालती भी कहां तो चल गई!“ - कह कर फिर वह कुछ देर चुप रहा। फिर एकाएक खुद ही अपनी आवाज बदल कर कभी मालती के कण्ठ से पुकारने लगा- ‘महावी ऽऽऽ र’ तो कभी महावीर के कण्ठ से कातर हो पुकारता - ‘माल ऽऽऽ ती’।

मैंने पहचान लिया था कि वह महावीर का पिता धोकर रविदास है जो शायद अपना दिमागी संतुलन खो चुका है। मैंने बीच में ही उसे रोकते हुए कहां“ क्यों धोकर तुम्हारी डयूटी नहीं है क्या आज। यहां क्यों घूम रहे हो? ”वह गरज पड़ा“- साला हम डयूटी करेगा! नहीं मैय्या हमनी सब के तो मर जाय के चाही। ओ देख मैय्या ”कह कर वह ऐसे एक तरफ झुक गया जैसे किसी चीज से बचना चाहता हो। फिर चिल्लाया- ”अरे - रे -- ई पूरा पहाड़ ही हमर ऊपर गिरे जात है। मैय्या --- बच-बच! ... पत्थर मार रहा है आकास! देख एही पत्थर हमर छाती पर पड़ा है मैय्या-इसके नीचे हमर महावीर दबा है। देख! देख मैय्या! पत्थर का पहाड़ लग गया है! अरे... रे-बाप रे बाप-बचाओ-बचाओ, कोई हमर महावीर के बचाओ ई राक्षसन से।“ फिर वह हाथ जोडते हुए कहने लगा- ”नहीं ! हमर महावीर कोई कसूर नहीं किया बाबू -ऊ मालती संग ब्याह करले है। मालती और महावीर में प्यार हले बाबू। मैं आपनी बहु पर सब वार दूंगा। घर-बार सभै कुछ! छोड़ दे हमर महावीर के। तुम सब के सबके पांव पड़ता हूं- छोड दो इसको।“

मैं हतप्रभ हो उसे देख रही थी। मैंने उसका हाथ पकड़ कर उसे अपनी गाड़ी में बिठाते हुए कहा-”चलो धोकर तुम्हारे घर चलते हैं, वहीं कर सब बातें करेंगे और सुनेंगे।“ वह चुप-चाप मेरे साथ आ बैठा। पर उसके चेहरे को कभी दहशत और निराशा ,तो कभी खुशामद और याचना की परछाइयां घेर लेती थीं, तो कभी उस पर प्यार और कभी उम्मीद की चमक फैल जाती थी।

गाड़ी जैसे ही पंचायत भवन के पास से गुजर रही थी तो वह चिल्लाया-”ओ देख-देख मैय्या- महावीर को बांध दिया है ऊ सबे ने।“ मैं उसकी बात सुन कर भी चुप रही। वह चिल्लाता रहा। अब हम उसके घर के समीप पहुंच रहे थे। उसे गाड़ी से नीचे उतारते हुए मैने कहा-”नहीं कुछ भी तो नहीं है धोकर कहीं भी, मुझे तो कुछ नहीं दिखाई दिया। देखो अब महावीर-मालती नहीं आयेंगे। तुम अपने घर में जाओ।“ वह रोने लगा-”मैय्या तुझे भी जुल्म होता नहीं दिखेगा तो कैसे दूर होगा इन सब का जुल्म हम पर। काहे नही आएंगे मालती महावीर अब? तनि तूं ई भारी पत्थरा हटा दे। देख तुरतै महावीर उठ खड़ा होगा। ऊ चपा (दब) गया है पत्थरवा के नीचे। सुन मइया मालती चिल्ला रही है-अरे - रे, बाप रे बाप! अनर्थ हो गया। देख मोर बहु के अंचरा उतार दिया है! हे रैदास बाबा! रछा कर! सड़िया खींच लिया हैं। मैय्या अर्जुनवा उसे जलती लुकाठी से दाग रहा है। बचा मैय्या मोर बहु के बचा दे।“

फिर वह जैसे सामने वाले किसी से बात कर रहा हो, एसे बात करने लगा-”ए बुधन तैं तो आपन बेटी के बचा ले। तोर बेटी ही न है मालती। ई पंच है कि दुर्जोधन हैं सभे। देख तोर बेटी के नंगा कर रहे हैं। तू काहे नहीं बोलता?“ फिर वह ”नहीं-नहीं“ करता एसे झपटा जैसे किसी सामने वाले के हाथ से कुछ छींन रहा हो। फिर वह धड़ाम से जमीन पर गिर पड़ा जैसे धक्का देने पर कोई गिर जाता है। मैंने उसे उठाया। तब तक उसने घर के लोग भी बाहर आ गये थे।

उसकी पत्नी मुझे देख कर जोर-जोर से रोने लगी और बोली ”एही रकम रोज-रोज दुहराता है ई, उस रात जो -जो हुआ मैय्या। बेटा भी गया और अब इन महतवन के चलते हमर मरद भी पगला गया है।“ पत्नी की बात सुन धोकर चिहुँक कर बोला-”ए सरपंच जी! बकस दे मोर महावीर के। मैं पांव पडता हूँ तुमरे, ले मुझे मार दे, इसे मत मार! रोक-रोक ऊ सोहना महतो के सरपंच जी।“ फिर वह दूसरी तरफ जमीन पर लेट गया जैसे किसी के पांव पड़ रहा हो ।

”ए मुखिया जी सारी जिनगी (जिन्दगी) तेरी चाकरी करते रहे हैं हम सभै परिवार। हमर बेटा के छुड़ा दे इन जुल्मियों से। अच्छा अपनी बेटी लौटा लो आप लोग। हमरे बेटा के छोड़ दो। मैं आप सभै का कसूरवार हूँ। बहुत मार लिया। अब लाठी मत न चलावो। हमनी दस घर तो हइये हैं तोर बस्तिया में। कैसन बैर करब तोर संग?“ फिर तर्क करते हुए वह अपने आप से बतियाने लगा-”भला चार सौ घर की बस्ती में हम दस घर की क्या गिनती? जो आप लोग कहोगे वही हम करेेंगे आप कहो तो हम टोला छोड़ के चले जाते हैं! हमर महावीर के जान मत मारो!“

थोडी देर वह बेसुध-सा पड़ा रहा। उसकी पत्नी ने मुहँ पर पानी छींटा। कुछ होश आया ते वह आँखें फाड़-फाड़ कर देखने लगा। ऐसा लग रहा था कि उसकी आँखे बाहर निकल आएंगी।

वह चिल्लाया-”अरे - रे- रूक-रूक। पत्थर छोड दे- मत मार पत्थर से ए अर्जुन। ए नकुल बचा ले उकरा - तोरा दोस्त हले महावीर!“ फिर वह जमनी पर लोट माथा पटक-पटक कर, विलख-विलख कर रोने लगा।

”बरबाद हो गये हम। आठ हजार रूपइया भी ले लिया हम से और एक क्विंटल चावल दाल भी। हमरी खिचड़ी खात रहे और हमरे ही सामने हमरे बेटा के पत्थर से कूच दिया।“ फिर छाती पर हाथ मार कर बोला-”हम ही गुनाहगार हैं मैय्या। हम ही गाड़ी भाड़ा दिया चार दिन का, तेल खुराकी समेत और आपन लछमनवा के भेज के आपन महावीर के मरवाय खातर खोजवा के मंगाय दिया। हम ही ने कह दिया पंचायत में“ हम तोहनी के कसूरवार हैं-ई महावीर भी तुम सब का कसूरवार हैµअब जे सजा तोहनी ठीक समझो देदो इसको। ”हमरा नाय मालूम रहा मैय्या ऊ इसका जान मरा देंगे।“

उसका प्रलाप बन्द ही नहीं हो रहा था। वो बार-बार कभी अतीत से वर्तमान और वर्तमान से अतीत में आ-जा रहा था और दोहरा रहा था वही सब जो उस रात उसकी आंखों के सामने घटा था... दो वर्ष पहले जब 400 लोगों की जमात ने जातीय अहम् के उन्माद में उसके बेटे को पत्थरों से कूच कर मार दिया था और उससे जबरन कागज कर अंगूठा लगवा लिया था, जिसमें लिखा था कि अपने बेटे को उसी ने मारा है। उसके घर के लोग उसे उठा कर घर में ले गये और बाकी लोग मेरे साथ बैठ कर महावीर हत्या-काण्ड के केस पर बातचीत करने लगे। वे उसकी प्रगति जानने को उत्सुक थे। रात देर गये मैं लौटी ।

रास्ते भर मैं सोचती आ रही थी - ! कब होगा इस जातीय पागलपन का अंत ? कब होगा इस पुरूष वर्चस्व का खात्मा ? कब होगा करोड़ों लोगों के मन से डर का खात्मा- कब महावीर और मालती मुक्त घूमेंगे स्वछन्द किसी रोक-टोक बिना ? कब महावीर की वंशी बजेगी बिना भय के ? मैं इन विचारों में डूबती-उतरती जा रही थी कि एकाएक मुझे एहसास हुआ कि जैसे महावीर -मालती कहीं मेरे आस-पास हैं। मुझे उनके प्यार की बतकही के बीच एकाएक चीखें सुनाई पड़ती जान पड़ीं। मैं -- अतीत में -- उन घने जगंलों में -- ऊबड़-खबड़ रास्तों में - कच्चे-पक्के गावों में पहुंच गई...।

मालती महावीर का प्यार पेंगें ले रहा था ऊँचाइयों पर --- उनके प्यार के चर्चे खेतों और सरना के पेड़ों से निकल कर, कच्चे-पक्के घरों के अन्दर बाहर होते हुए गांव की गलियों में आ पहुंचे थे, जहां उनकी मुलाकातें अब स्कूल के बाहर नहीं- पिताओं के डयूटी चले जाने के बाद उनके अपने घरों में होने लगी थीं - ! महावीर की तासा पार्टी में उसके मित्रों में कानाफूसी होनी शुरू हो गई थी और घर के लोग जानबूझ कर इन कनफुसकियों से अनजान बने हुए थे - यानि दोनों के मां-बाप को कोई खास आपत्ति न थी।

लेकिन एक दिन गांव के एक रंगदार महतो ने उन्हें देख लिया। फिर तो ववंडर मच गया गांव में।

“कुर्मी महतो की लड़की और साला चमार का लड़का उससे आंख लड़ाता है - ये हिम्मत उस बेटी चो... की” चिल्ला रहे थे गांव के नवधनाड्य कुर्मी नौजवान। यह वही नौजवान थे जो तासा पार्टी में महावीर के साथ थे। वे कोयला डिपो में भी उस के साथ मुंशी भी थे और उसके दोस्त भी। लेकिन जात के आगे दोस्ती की क्या औकात ? “कुर्मी तो शिवाजी के वंशज हैं - शिवाजी कुर्मी, क्षत्रा थे-राजा थे- सरदार पटेल भी कुर्मी थे। फिर किसकी मजाल है कि कुर्मी लड़की से नीच जात वाला प्रेम करे ?” पूरा गांव काफी उबल रहा था। कोयला डीपो से इस गांव को, खासकर कुर्मियों को काफी आमदनी हो जाती थी। कई लोग मुंशी थे -कई मजदूर सरदार। कुर्मियों को हफ्ते में चार दिन काम मिल ही जाता था। फिर कभी वे मांझी और रविदासों के बदले भी खट आते थे घूस देकर - कभी जबरन रविदास और मांझी की पारी छीन कर। कुछ ने ट्रेकर खरीद लिए थे। उससे भी भाड़ा आता था। पैसे की कमी नहीं थी। इस बार तो अपनी ही जाति यानी कुर्मी जाति का ही विधायक भी जीता था इस क्षेत्रा से लाल झंड़े को हरा कर। फिर क्या था ? अपराध करो - रंगदारी करो - कौन पूछेगा। इन्सपेक्टर भी तो थाना में कुर्मी ही है। तब क्या है ?

“इन सालों की ये हिम्मत ? हम चार सौ घर -इन दस घर वालों की ये जुर्रत ? कोलयरी में साले को नौकरी क्या मिल गई, पक्का घर क्या बना लिया कि दिमाग सिर पर चढ़ गया है। साला मैट्रिक में अच्छे नम्बर लाया है तो सोचता है बुद्धि का भंडार उसी के पास है ! जैसे हम सब तो मूरख हैं ! हीरो बनता है ! इसकी तासा पार्टी है तो क्या है ? हम भी तो ढोल तासा इसके साथ में बजाते हैं। मजा चखाएगें साले को मजनूं बनने का।” नौजवान जगह-जगह यही सब कहते फिरने लगे।

बुजुर्गों को खबर हुई। उन्होंने मालती के पिता बुधन महतो को बुला कर डांटा और कहा “क्या मरजी है। बेटी चमार के साथ ब्याहनी है क्या ? बिरादरी में रहना है या नहीं ? दस दिन के अन्दर ब्याह कर दो इस का लड़का खोज के, नहीं तो हमसे बुरा और कोई नहीं होगा। बिरादरी की इज्जत बरबाद करवा रहे हो - दोस्त है तो दोस्त सा रहे, समधी तो नहीं बन सकता न वह तुम्हारा। मालती का घर से निकलना बन्द करो। फिर दोनों को साथ देखा तो जिन्दा गाड़ देंगे जमीन में।”

‘बुधन गिड़गिडाया - “इतनी जल्दी कैसे ‘कुटुम्ब’ मिलतै बाबु ! फिर धोकर का बेटा भी तो लायके ही है। के देखे है आज कल जात-पात। हमर पास पैसा-कौड़ी भी तो नाय है। आज-कल जात वाला सब जो कोलयरी की नौकरी पाया गया है मोटर साइकल और टी.वी. मांगो है - हमर ठिन (पास) कहां से इतनी रकम आवेगी। आप सब भी तो कोई तैयार न है हमर घर शादी करे खातर । हमर घर पर खपड़ा भी पूरा नही है - तुरंते कैसे सब जुगाड़ होतै ?”

“हम ई सब नाय जानत ! कर्ज कर, जमीन बेच, पर बेटी के हाथ पीले कर दे आपन जात का लड़का खोज के। कंवारा न मिले तो अधवै खोज ले या फिन कोई बुतरू मिल जाये तो ब्याह दे। जंगल तरफ के लड़का का रेट कम है, होन्हे ब्याह दे बेटी के !”

“नहीं आपन ऐसन सुन्दर बेटी के जंगल में ब्याह दूँ या बेमेल संग भेज दूँ, ई कैसे होतै ? फिर हमर बेटी पढ़-लिख गई है। ऊ नहीं मानतो ई सब अन्याय।” बुधन रोने लगा था। पर कोई सुनवाई नहीं थी। बेटा को लेकर निकल पड़ा बुधन मालती के लिए वर खोजने। मालती 16-17 बरस की हो गई थी। लड़का मिला 10 बरस का। वह भी ‘बिमरईया’ । मालती का बाहर आना-जाना बन्द कर दिया गया था। आमने -सामने ही घर था महावीर और मालती का। उनका मिलना बन्द था।

सांझ को कुटुम्ब आना था और रिश्ता पक्का हो जाना था। मालती बेचैन थी । वह जानती है उसका बाप और भाई महावीर को चाहता है, पर बिरादरी के डर के मारे उसकी हिम्मत नहीं हो पा रही यह बात गछने की। क्या करे मालती ? पिता ड़र रहा है। चार दिन से ड्यूटी भी नहीं गया। दस दिन की मोहलत है चार दिन बीत चुके हैं। “ ‘कुटुम्ब’ (लड़के वाला) सांझ के आयेगा। खस्सी (बकरे का मांस) बनेगा। रिश्ता पक्का होगा। फिर ? फिर क्या होगा मेरा ? बुतरू (बालक) के साथ ब्याह ?” -सोच कर मालती रोने लगी । मां भीतर-भीतर रो रही थी ! पर क्या करे?

“बड़े बुजुर्ग तो फिन बी हमर रिश्ते के मान लेते -जादा से जादा हमें टोले से बाहर कर देते ऊ लोग ! लेकिन ई लड़कवन ? ई तो अपने को राजपूत बामन के बाप समझत हैं। उन्हीं की नकल कर रहे हैं। ओही रकम दहेज मांग रहे हैं। आज -कल कौन माने है जात-पात? कैसे पढ़े लिखे लडकवन हैं ई सब ? पढ़ लिख के तो जात-पात टूटे के चाही - ई तो बढ़ गेल है। स्कूल के मास्टरनी जी तो कहत रहीं - “सब जात बरोबर होवे है।” फिन हमनी सब के बी तो नीमाडीह के राजपूतन सब छोट जात कहे हैं। उनकी लड़की के कोई कुर्मी ब्याह के देखे तो ? उनसे नहीं लड़ेंगे ये लोग - खाली आपन से छोटन पर रौब छांटेगे।” मालती मन ही मन बहस कर निश्चय कर रही थी -- कैसे भी हो वह कुटुम्ब के आने तक इन्तजार नहीं करेगी। वह ब्याह करेगी तो महावीर के साथ।

रात को खस्सी पका -- दारू चली। सब दारू पी कर मस्त थे। उसी समय चुपके से मालती महावीर के कमरे में चली गई। महावीर ने उसे हाथ जोड़ते हुए कहा-“ चली जा मालती ई बियाह नाय हो सकत है। मैं छोट जात हूँ। तुम अपने तो मरबे करेगी, मुझे भी मुसीबत में डालेगी। जा मत रूक हेन्हे (यहां)।”

मालती ने उसे उलाहना देते हुए कहा- “इतना जल्दी डर गये - तू जे कसम खाया रहा दुर्गा थान पर, करमा के नाच बखत ऊ याद नई खे तोरा। जे तु बोला रहा हमर के -“हम मर जायब पर तुमरा नई छोडब, कि ऊ सब झूठै था ? देख मैं जनी हो के भी आ गई हूँ तोहरा ठिन (पास) अपना घर-बार छोड़ के। अब तू हमर के भगा के ले चल। मैं ऊ बुतरू (बच्चे) संग बिआह नहीं करूगीं। तू भगा के नहीं ले जाएगा तो मैं हेन्हे (यहीं ही) फांसी लगा के मर जाउँगी।”

बहुत समझाने पर भी मालती जब टस से मस नहीं हुई तो महावीर ने अपने अन्दर के कापुरूष को खदेड़ दिया और वह मरने-मिटने के लिए तैयार एक योद्धा की तरह बोला - “ठीक है मालती कल के तूं दस बजे घर से बहाना बना के आ जाना, मैं चरही मोड़ पे मिलूँगा। वहीं से ट्रेकर धर के हम लोग रजरप्पा चले जायेंगे मेरी मौसी के यहां और ब्याह कर लेंगे। मेरे दोस्त भी साथ में रहेंगे।” अगले दिन दस बजे मालती सहेली से मिलने का बहाना बनाकर निकली और फिर वे दोनों नहीं लौटे।

साझं तक मालती नहीं आई तो घर में खुसर-पुसर शुरू हुई। खोज-खबर ली गई । किसी ने उसे महावीर के साथ तो नहीं देखा था ? पूछताछ हुई। महावीर भी नहीं लौटा तो गांव वालों का सन्देह पुख्ता हो गया कि दोनों साथ-साथ भागे हैं। पंचायत बैठी। नौजवानों ने बुजुर्गो से कहा - “आप लोग बस बैठो और देखो। फैसला हम लोग करेंगे।आप लोग बूढ़े हो गये हैं, सठिया गये हैं। इज्जात आबरू की बात नहीं समझते। लाठी ले लेकर नौजवान जुटने शुरू हुए। चार सौ घर की कुर्मी की बस्ती में दस घर रविदासों के और पच्चीस तूरी लोगों के है।

धोकर के पूरे परिवार को बांधकर पेश किया गया। उनकी आठ साल की बच्ची को भी पकड़ कर छप्पर के खूटें से बांध दिया गया। बुधन महतो के परिवार को भी बुलाया गया। चारों तरफ रात के सन्नाटे में लालटेन और ढ़िबरी की रोशनी में लोग बैठे। बीच में अलाव जला दिया गया। आग की लपेटों की रंगत और चार सौ कुर्मियों की आंखों की रंगत एक जैसी थी। सफेदी छा गई थी रविदासों की आंखों में। “मार दो इन सालो को ! धोकर की बेटी को ले जाओ और सब मिलके चो...! तब इस साले को समझ आयेगा कि किसी की बेटी की इज्जत क्या होती है ?”

“बाबु हम कुछ नहीं जानते हैं। बुधन और हम दोनों डयूटी से संगे-संग आ रहे है।” धोकर गिडगिडाने लगा

“झूठ बोलता है साले। तुम ही भेजे हो प्लान बना के ऊ दोनों के । हाजिर करो उन दोनों को नहीं तो जिन्दा गाड़ देंगे।” कई आवाजे उठीं।

“देखो तुम दोनों पांच-पांच हजार रूपईया यहां रखो और एक-एक क्विंटल चावल-दाल लाआें। खिचड़ी बनेगी। हम सब रात-दिन यहीं पर रहेंगे। हम भाड़े पर गाड़ी ला देते है-हमारे आदमी भी तुम्हारे साथ जायेंगे-महावीर मालती को खोजकर लाओ, तब तक तुम्हारा परिवार यही बांध कर रखा जायेगा। केवल तुम साथ में साथ जाओ धोकर। और देखो- खबरदार जो किसी को कुछ कहा। चुपचाप आओ उन्हें लेकर, किसी को खबर की -थाना पुलिस या नेता को - तो तुम्हारा पूरा परिवार खत्म हो जायेगा और इस बचिया के साथ जो होगा वह तुम सात जनम तक याद रखोगे” - अर्जुन महतो बच्ची की तरफ हाथ से गन्दा इशारा करते हुए बोला।

धोकर ‘रविदास’ सहम गया। कोई चारा नहीं था। महाजन से गाय और सुअर बंधक रख कर पांच हजार रूपया और एक क्विंटल दाल-चावल ला दिया। बुधन को भी यही दण्ड दिया गया। पूरी बिरादरी से कैसे बैर मोल लेता बुधन या धोकर ? थाना का चौकीदार रसूल मियां गांव में ही रहता था- उसे भी धोकर के परिवार के साथ बांध दिया गया- ना बाहर जायेगा- न थाना को खबर होगी। आखिर चार सौ घर की बस्ती -- दस घर की क्या मजाल ?

बुधन को भी हिदायत दी-‘‘सारा परिवार यहीं बैठो- उठ के गये तो खैर नहीं।’’ गांव के बूढ़े-बुजुर्ग महतवन तटस्थ आंखों से सब अन्याय देख रहे थे -- भीस्म पितामह की तरह -- कैसे बोलते ? खाना तो यही औलाद देती है। सरपंच की बोली नहीं निकल रही थी। जात का मुखिया चुप्पी साधे बैठा था-‘‘मुझे क्या-मेरी मुखियागिरी कायम रहे’’µवाले अन्दाज में। रात को ही टै्रकर में 13-14 आदमी भरकर महावीर और मालती की खोज में निकले पर अगले दिन सांझ को खाली हाथ लौट आये। कोई नहीं मिला।

फिर सब रात में जुटे। “ क्यों बे हरामखोर कहां-कहां गाड़ी घुमाता रहा साले। तू सब जानता है कहां छिपे हैं वे दोनों। बता नहीं तो तेरी इस बेटी को हम सभै जन...।’’

धोकर सचमुच नहीं जानता था वे कहां थे। महावीर का छोटा बेटा जो वहीं बंधा हुआ था, जानता था वे कहां जा सकते हैं। वह इस डर से चुप था कि आने पर उनको लोग जिन्दा नहीं छोड़ेगें। लेकिन जब देखा कि उनके नहीं आने से पूरा परिवार ही खत्म हो जाएगा तो वह उठा -“मैं जाऊँगा खोजे खातिर और ऊ लोग जहां भी होगें वहीं से उनको ले के आऊँगा। आप लोग मेरी बहन और मां को छोड़ दो। बप्पा को मत मारो।”

“देख साला-अब बके लगा है। ये लोग सब जानते हैं। यही लोग उन्हें भगाये हैं। तो ठीक है, एक-एक क्विंटल चावल दाल और रखो हेन्हे दोनां पार्टी, 5-5 हजार टका भी और जमा करो गाड़ी घोड़ा और हमनी सबका खर्चा। जाओ साले, अबकी बार खाली हाथ लौटे तो कोई जिन्दा नहीं बचेगा।”

“इत्ता पैसा कहां से पावो बाबू। हमर घर द्वार तो हेन्हे ही है तोहनी सब बंधक रख के पैसा दे दे।”

“बहुत बनता है। कोलरी में इतना कमाता है, कहां जाता है ?” अबकी बार धोकर ने घर का सब गहना गिरबी रख के तीन हजार रूपये जमा किये, चावल दाल तो गांव के बनिये ने बड़ी उदारता से एहसान जता कर उधार दे दिया कि कहां जायेगा, पैसा वसूल तो हो ही जायेगा। बुधन महतो ने भी रो-धो कर पैसा भरा।

इस बार ट्रेकर में नौजवानों की टीम बैठी थी। महावीर का भाई साथ में गया। वह सीधे रजरप्पा मौसी के यहां पहुचां। पता लगा दोनों शादी कर के गोला चले गये हैं। गोला पहुंचे सब लोग । महावीर और मालती आने को तैयार नहीं थे। इसपर महावीर का भाई लक्ष्मण बोला - “चलो महावीर घर ! नहीं तो तुम्हारी बहन को बर्बाद कर देगें ये लोग। बप्पा मैय्या के भी मार-मार के मोरा देगें। हम सब भी नहीं बचेगें।”

“तो तुम लोग हमें मरवाने के लिए लिये जा रहे हो ?” महावीर ने व्यंग्य भरी हताशा से पूछा।

इस पर महतो में से कुछ होशियार लड़के बड़े ही मीठे बन कर महावीर से बातें करने लगे। उसमें कुछ लड़के उसकी तासा पार्टी में थे जो डीपो पर मुंशी भी थे।

नकुल महतो बोला - “महावीर, यार हमनी पर बी विश्वास नही खे। हम तोर दोस्त हैं। हम जिम्मा लेते हैं तेरा बाल बांका नहीं होगा ! पंचायत के संतोस खातर चल। जादा से जादा टोला बाहर के दण्ड लगाय देगें। पंचायती पहले भी तो ऐसने ही होती है। भरोसा रख यार हमनी सब पर। हम तेरे दुश्मन नहीं हैं।” महावीर उनकी बातों में फंसने लगा तो मालती बोल उठी-“नहीं मैं नहीं जाऊँगी मार खाये खातर। हम जानो है कुर्मी की पंचायत में कैसे लड़का-लड़की के पिटाई होती है औरत-मरद छोड़ा-छोड़ी के मामले में - फिन हम तो भाग के आये हैं। उ सब जालिम हैं, मैं नहीं जाऊँगी।”

फिर वह कुर्मी लड़कों को सम्बोधित कर बोली - “ तुम ही सब तो कहते थे न मुझे कि मैंने तुम सब की नाक कटा दी और तुम सब में से एको को पसंद न करके चमरवा सगं दोस्ती करली ? अब तुम सब हम से बदला लेने के लिए हमें ले जाने आये हो ?”

महावीर दुविधा में था। सब लोग बड़ा प्यार भरा दबाव दे रहे थे। बस चुप था तो लक्ष्मण - महावीर का भाई। वह जानता था कि वह अपने भाई को कसाइयों के हाथ सौंपने जा रहा है। पर वह कुछ कह नहीं सकता था। केवल रटा-रटाया बोलता था। “चल कुछ नई होगा तोहनी के। नहीं जाने पर तो हम सब कोई नहीं बचतै।” वह आंखों ही आंखों से अपने भाई को आगाह भी करना चहता था कि वह जाने को तैयार न हो, पर नजर पकड़ा जाने के डर से वह भाई की नजर से नजर नहीं मिला रहा था। मालती की ना जाने की जिद उसे अच्छी लग रही थी।

महावीर समझते हुए भी अनजान बन रहा था। वह जाने को तैयार होने लगा। मालती न चाहते हुए भी गाड़ी में जा बैठी। सांझ में वे हेन्देगढ़ा पहुँचे। पंचायत बैठी हुई थी। खिचड़ी पक रही थी। आग जल रही थी।

महावीर और मालती के पहुँचते ही पहले तो सन्नाटा छा गया। फिर शुरू हो गई गालियों की बौछार। गांव की औरतें भी जुट गई थीं, मालती के आने की खबर सुनकर। ‘छिनाल-रण्डी’ न जाने क्या-क्या कहा जा रहा था मालती को। लड़कों को इस बात का मलाल था कि मालती ने गांव के इतने बड़े कुर्मी समाज में से किसी लड़के को पसन्द क्यों नहीं किया ? इस के चलते वे और अधिक बदला लेने पर तुले थे। वे भी तो हीरो थे-तासा पार्टी में थे-उनमें कई मुंशी भी थे डीपो पर। उनके पास जमीनें भी थीं-पैसा भी। कुर्मी की बेटी होकर चमार के साथ क्यों फंसी वह ? गुस्सा इस बात का भी था।

खैर पंचायत ने बयान लेना शुरू किया। “तुझे महावीर भगा कर ले गया था न मालती ?“ - लगभग धमकाते हुए उसे स्वीकर करवाने के नियत से तेजन महतो ने पूछा।

“नहीं हम ही उकरा के कहे रहे की हमरा ले के भाग चल। हम अपने मन से गये रहे। हम बुतरू से ब्याह नहीं करेंगे।“

“कैसे फटर-फटर पुतरी-सी बतियावे है ई छोरी ? कि तू नहीं जानती है कि महावीर चमार है, छोट जात है। हमनी सब भी रहे हल- हमनी में से किकरा के काहे नहीं चुना लिया तूने ?”

“जात-पात आज के माने है ? तोहनी भी तो छोट जात की औरत के रखनी रख लिये हो। मोहना तो ब्याहता औरत के भगा के ले आया है। हमर के महावीर अच्छा लगे है हम ऊकरा संग ब्याह करले है। प्यार जबरन थोड़े होत है कि हम तोहनी में से चुन लेती किसी के।” मालती ने तड़ाक से उत्तर दिया। वह तब तक डरी नहीं थी।

“पढ़-लिख के बड़की नेता बन गई है। ऐसन बेटी के जिन्दा गाड़ देना चाहिए।”

किसी से सहा नहीं जा रहा था मालती का सच। पूरी पंचायत पचा नहीं पा रही थी मालती का सच। चार सौ घर वाली बस्ती की लड़की दस घर की बस्ती का सच बोले - ये कैसे हो सकता है ? चार सौ घर ......... दस घर ....... ! इसे तो चार सौ घर का सच बोलना चाहिए पर ये उलटा बोल रही है।

उधर किशुन महावीर से बयान लेने लगा। महावीर कह रहा था -“हमने ब्याह कर लिया है- अब हम लोगों को जाने दो। जो हो गेले सो हो गेले ! तोहनी सब कहे तो हम गांव छोड़कर चल जायब पन मालती के ना छोड़ब !”

“इतनी हिम्मत इसमें कि दस घर का हो कर चार सौ घर की हिम्मत रखे ? ये कैसे होगा। साला चमार चोट्टा।”

अर्जुन जलती हुई लुकाठी लेकर उठा और मालती की साड़ी खीचकर नंगा कर उसकी जांघों में दाग दिया। “ले ई महावीर के... ले! यह लुकाठी तोहर सबक सिखायब।” और उसने दाग दी मालती की कोख... मालती का सच... औरत का सच...!

एक चीख - “मायगे - बप्पा गे - बचाव-” और फिर लप्पड़-थप्पड़ पड़ने लगे मालती पर। उसके बाप और मां उस पर गिर गये - “छोड़ दे! मत मार मोर बच्ची के। अब तो ई घर आ गई है-जान मार देगा क्या ?” मालती बेहोश हो गई थी।

उधर चिल्लाए कुछ नौजवान - “खत्म कर दो इस चमरवा को। ऐसी सजा दो कि फिर कोई कुर्मी लड़की की तरफ नजर न उठा सके दूसर जात।”

दोनों हाथ पांव दो खूंटों से बांध कर, महावीर को बैठा दिया गया था। एक बड़ा सा पत्थर लेकर दौड़ा था नकुल महतो उसकी तरफ !

“तुम न कहे थे मैं तुम्हारा दोस्त हूं-गांव चलो कुछ नहीं होगा-मैं तुम्हारी बात पर आया था नकुल- तुम भी दगा दे रहे हो।” महावीर ने नकुल की हिंò नजरों में अपनी नजर गड़ाते हुए पूछा। एक क्षण को नकुल का हाथ रूक गया।

“ऊहँ ! काहे की दोस्ती-वो तो तुझे लाने के लिए नाटक था।”

बात खत्म भी न हुई थी कि अर्जुन ने पीछे से आकर एक बड़ा सा पत्थर महावीर के सिर पर दे मारा। महावीर चीख भी नहीं सका।

फिर पत्थरों से महावीर का चेहरा कूच-कूच कर उसे मार डाला गया। बस वह अपने पांव और हाथ पटकते रहा जब तक प्राण रहे। ‘दाऊ? टू ब्रूटस?’ (ज्ीवन जवव ठतनजने घ्) की कथा एक बार फिर घटी हेन्देगड़ा में। कहां फर्क है रोम और हेन्देगड़ा में ? कहां फर्क है राजा और प्रजा में? छल-कपट, धोखे या र्बबरता पर उतारू मनुष्य चाहे राजा हो या प्रजा - ‘ब्रूटस’ बनता रहा है ! वह आज ‘नकुल’ बन गया था। महावीर ने न यह नाटक पढ़ा था और ना ही शायद सुना था कभी। उसने तो दोस्ती के कुछ नियम जाने थे बस - लेकिन आज ‘ब्रूटस’ घट गया था उसके साथ ‘नकुल’ बन कर।

धोकर रो-रोकर कह रहा था- “छोड़ दे बाबू जान मत मार !” महावीर का चेहरा पहचान के बाहर हो गया था। उसके ओंठ जो वंशी में स्वर फूंकते थे-धुनें निकालते थे चिथड़ा-चिथड़ा हो गये थे। उसकी आंखें जो तासे के साथ घूमती थीं --जो ढोल की थपक के साथ नाचती थीं --मांस के लोथड़ों में कहीं दब गई थी ! बस केवल हाथ हरकत कर रहे थे या पांव -- जो बंधे थे ! हाथ -- जो वंशी को थामते थे ! कंधे -- जिन पर ढोल लटकता था - लटक गये थे ! तो कौन बोलता ? कौन प्रतिकार करता ?

सच लोथड़े-लोथड़े कर दिया गया था -- कूच दिया गया था !

चौकीदार नहीं बोला--जान प्यारी थी न !

धोकर नहीं बोला -उसी गांव में उन्ही के बीच रहना था न उसे !

बुधन नहीं बोला - बेटी ब्याहनी थी न ! कौन ब्याहेगा उसे अब बिरादरी से अलग होकर ?

बोल रहे थे वही जो हत्यारे थे ! भेड़िये चिल्ला रहे थे !

रात भर लाश पड़ी रही महावीर की। सबने जशन मनाया। खिचड़ी खाई-चबेना आया। दारू चली रात भर ! पत्थरों से कूचने वाला उस रात नायक था पूरी जमात का। वीर योद्धा -- एक निहत्थे को मार कर, एक बंधे हुए को कुचल कर, फूले न समा रहे थे। इज्जत बच गई थी उनकी--उनके समाज की और उनकी औरतों की ! इज्जत औरतों की -- जो पुरूषों ने दे रखी थी औरतों को ताजिन्दगी गुलाम बने रहने के एवज में। कुर्मी की बेटी के आशिक को मार दिया गया था। सब औरतें खुश थीं ! समाज खुश था। भला बाड़े के नियम को तोड़ कर भेड़ बकरी बाहर जा सकती है कभी? समाज ने बाड़े की सुरक्षा दी थी क्या ये कम था उनके लिए ?

डर रही थी भीतर ही भीतर मालती की माँ। लेकिन वह जोर से रो भी नहीं सकती थी। बस रो रही थी महावीर की माँ जोर-जोर से। अब क्या बचा था गंवाने को--जो न रोती। धोकर ने सब्र कर लिया थाµसब्र करना उसे विरासत में मिला था पुरखों से--जिसे उन्होंने सदियों से सीखा था!

“बेटे की लाश को घर ले जाने दो बाबू” वह गिड़गिड़ाता रहा था रात भर। घुड़की देकर उसे चुप करवा दिया गया।

सबेरे हुक्म हुआ “जाओ-दफना दो महावीर को।”

“कफन लाने दो बाबू।“

“हाँ कफन तो जरूरी है ! हिन्दु है न । विध तो करनी ही पड़ेगी” - सरपंच ने कहा।

अब मोरा दिये हो तो ठीके है- मरे बाद तो विध करे दे बाबू !” धोकर याचना सा कर रो पड़ा। रात भर की दहशत का बांध जैसे अब फूट रहा था उसके आंसू बन कर।

पंचायत फिर बैठी। क्या किया जाय ! इसी बीच तूरी टोला का मनकू तूरी धोकर को कह गया था चुपके से - “थाना खबर कर दे धोकर, नहीं तो हम भी तोहनी के खिलाफ यही बयान देंगे कि तुम्हीं ने मार दिया है महावीर को।”

अब क्या करे धोकर ? कुर्मियां की सुने तो भी मौत-फाँसी का फंदा ! तूरियों की सुने तब भी मौत !

“तो ठीके है बेटे के हत्यारे पकड़ाने पर ही मरना ठीक है।” धोकर का मन कहने लगा था। पंचायत ने उसे कफन लाने की इजाजत दे दी थी। पांच आदमी निकले-जरबा की ओर। गांव का सीमाना पार करते ही वे भागने लगे -। गरमी के दिन -- लू चल रही थी ! जंगल में भागते-भागते थाना पहुंचे। धोकर तो रास्ते में बेहोश होकर गिर पड़ा था उसकी सुध लेने का भी वक्त नहीं था बाकी साथियों के पास।

थानेदार हरिजन था। झट से उठ कर उनके साथ आ गया। एफ. आई. आर. लिखाने में समय जाया नहीं किया उसने। महावीर की लाश वही रखी थी पंचायत घर में। सब बैठे थे। मालती को सबेरे ही उसके बाप-माय और भाई के साथ दूसरे गांव भेज दिया था। सब लाश के गिर्द बैठे थे। धोकर रविदास के बेटे - माँ और वह छोटी बच्ची जो बहन थी महावीर की।

“पुलिस ! पुलिस” चारों ओर से पुलिस को लोगों ने धेर लिया - थानेदार से बन्दूक छीन ली औरतों ने। आखिर चार सौ घरों वाली बस्ती की औरतें थी न। इस पर भी गोली नहीं चलाई थानेदार ने। वह जानता था गोली चलेगी तो महावीर की हत्या गौण हो जायेगी और ग्रामीणों पर गोली चलाने के जुर्म में एक हरिजन दारोगा कटघरे में खड़ा होगा। फिर महावीर के हत्यारे कभी नहीं पकड़ाएंगे। कुछ लोगों ने टांगी से वार किया दारोगा पर भी -किन्तु वह बच गया। टांगी से बैंच का वह हिस्सा जहां से थानेदार हट गया था वार होते देख कर चार इंच गहरे तक कट गया था।” इस पर भी दफनाने नहीं दी थानेदार ने लाश। उसने हजारीबाग एस. पी. को वायरलेस से घटना की खबर कर दी और मदद मांगी। थाना में खबर करले वाले साथी डर के मारे थानेदार के साथ नहीं आए थे। वे बाद में अनजान-से बने कफन ले कर पहुंचे। उन्हे बाद में भी गांव में ही रहना था ना। हर वक्त तो पुलिस नहीं आएगी ना। खैर एस. पी. को खबर दी थानेदार ने। महावीर की मौत के चौथे दिन खबर लगी बाहर की दुनिया को - “कुर्मियों ने एक चमार लड़के को कुर्मी लड़की से

प्रेम विवाह करने के आरोप में पत्थरों से कूच-कूच कर मार ड़ाला।”

दरअसल तीसरे दिन अखबार के रिर्पोटरों को साथ लेकर हेन्देगड़ा पहुंचने वाले व्यक्तियों में मैं पहली बाहरी व्यक्ति थी और हम सब के सामने गांव के रविदास लड़कों तथा महावीर के भाई और चाचा ने बयान दिया था। धोकर उस दिन तक भी नहीं मिला था और ना ही किसी अभियुक्त की गिरफतारी हो पायी थी उस दिन तक।

जाति के अहम् ने मानवता का गला घोंट दिया ! धोकर उस दिन गांव नहीं लौटा- लोग खोज में निकले वह जंगल में ही पड़ा मिला । उसे घर लाया गया। महावीर दफनाया जा चुका था-। धोकर महावीर को खोज रहा था। मालती को खोज रहा था। गांव में हल्ला हो गया धोकर पर बेटा का भूत सवार है। तब से धोकर ड्यूटी नहीं जाने लगा। हर रोज ठीक रात आठ बजे घर से निकलता है वह, फिर पंचायत घर के आस-पास घूमता है- और वही सब बोल-बोल कर दोहराता है- जो उस रात घटा था। रात भर महावीर ......... मालती ..... की आवाज गांव के लोग सुनते हैं। वंशी की धुन और ढ़ोल की धमक सुनते हैं।

कुर्मी औरतें धोकर को, पुलिस को, सरकार को और मालती महावीर को गरियाती। कुर्मी मर्द गुस्से से लाल झण्डे वालों को, खास कर मुझे कोसते -चूंकि मैंने ही ये मामला उजागर कर उनके गांव के 45 लोगों को गिरफ्तार करवाया।

गांव के रविदासों की औरतें आंसू बहाती हैं। कुछ तूरी गुंझू और आदिवासी युवक रविदासों की कायरता पर गुस्साते और झुझंलाते हैं तो कुछ - “क्या करते ऊ लोग - दस घर ही तो थे न - चार सौ घरों में ? कैसे मुकाबला करते ?” कह कर सब्र कर लेते। कुछ कहते “हमें एक होकर इस जुल्म के खिलाफ लड़ना होगा” - और वे एकता के प्रयासों की योजना मन ही मन बनाते। बड़े-बूढ़े कहते - “ जाय दे जो हो गेल से हो गेल - रहना तो आखर उन्हीं लोगों में है। हम छोट जात हैं - फिर हमर के तो काम ओहे देत हैं।” फिर कुछ दूसरी जाति के दलित तटस्थ अंदाज से बोलते “हमनी दूसाध है - गंझु हैं - हमनी का दरकार पड़ी है दूसर जात खातर लड़े के ?” तो तत्काल कोई नौजवान प्रतिक्रिया में बोल उठता - “क्या तेरी बहन - बेटी की इज्जत नहीं लूटते हैं ऊ लोग ? कल हमनी पे पड़ी तो के मदद करी ? हमनी के ऐसन न सोचे के चाही। सब दलित के एक करके पंचायत करे के चाही।” तब बूढ़े दुसाध और गंझू मटिया जाते।

तरह-तरह की योजनाएं, तरह-तरह की तिकड़में, तरह-तरह की खबरें, तरह-तरह की रणनीतियां रोज बनती बिगड़तीं - कुछ सरंजाम होती, कुछ मने-मन रह जातीं।

आज फिर से महावीर और मालती की कहानी को धोकर के मुह से सुनकर मैं बेचेन हो उठी थी। धोकर ने देखा ही नहीं था वह सब -- भोगा था। महावीर को मारा गया एक-एक पत्थर महावीर के चेहरे पर नहीं -- जैसे उसी के चेहरे पर लगा हो - उसी ढंग से उसने पूरा प्रकरण दोहराया था मेरे सामने। मैं स्वयं उसी रात के प्रकरण में जब ये घटना घटी थी, कहीं गुम होती चली गई थी -- कि वंशी की धुन गूंज उठी ! वंशी की धुन मद्धम पड़ती जा रही थी और कोई बोल उठा- “मालती ..” जबाब मिला - “महावीर .... !”

गांव के लोग कहते हैं - धोकर पर महावीर का भूत सवार है। हां महावीर का भूत सवार है धोकर पर चूंकि धोकर एक मनुष्य है ! ऐसा हादसा देखने वाले किसी मनुष्य पर भूत सवार हो सकता है - उस घटना का भूत- हत्यारों का भूत- मृतकों का भूत - अगर वह संवेदनशील मनुष्य है! और धोकर मनुष्य है - मनुष्य था और मनुष्य रहेगा।

‘‘पर उन चार सौ मरद-औरतों की पहचान क्या है ?’’ महावीर मालती की आवाज पूछ रही है!

‘‘वो आदमी थे या जात ! वो मनुष्य थे या कुर्मी ?’’ धोकर की लड़खड़ाती जबान पूछ रही है।

हां ! वो मनुष्य नहीं, जात थे।

मनु की बनाई जात ! जात जो मरने के बाद ही जाती है।

‘‘वो हिन्दू थे - मनुष्य नहीं थे !’’ तासा झनका !

‘‘वो कुर्मी थे - आदमी नहीं थे !’’ ढ़ोल धमधमाया !

‘‘वो जानवर भी नहीं थे चूंकि जानवरों में ऐसी जातीयता नहीं होती।’’ तासा पार्टी के सब वाद्य एक साथ कोरस में बज उठे।

वंशी की धुन सरगम का सप्तम स्वर छू रही थी।