Welcome to Ramnika Foundation


कविताएं

कविताएं

कैसे गुनगुनाऊँ
  • कैसे गुनगुनाऊँ
  • गीत की वह धुन
  • कि गा उठें अफ्रीका के काले-काले
  • जंगल-
  • मुक्ति के गीत

  • कैसे आँकूँ
  • रेखाओं के
  • वृक्ष
  • कि उभर आएँ पोर-पोर में-
  • पिकासो के चित्रा

  • कैसे टाँकू
  • सितारों के झुण्ड
  • कि ब्रह्माण्ड के गोशे-गोशे में
  • लटक जाए
  • गगन-गंगा की लड़ियों का सच

  • कैसे पाऊँ
  • समय-शिल्पी से वह हुनर
  • कि हवा की हरकत-सी
  • पानी की हथौड़ियों से
  • तराश दूँ
  • विश्व के हर तट पर
  • नार्वे और स्वीडन के
  • कटावों-का कौतूहल

  • कैसे पढ़ूँ
  • सदियों से पगे मँत्रा कि
  • वनस्पति समेटे
  • हव्वा-सी मुग्धा धरती
  • या बन जाए
  • क्यूबा का
  • ‘कार्लोल्यूगा’1
  • या
  • ‘माया सँस्कृति’ को सदियों से ढाँपे बैठा
  • मैक्सिको का
  • काई भरा काला-काला
  • आदम-सा
  • जंगल!

  • कैसे धरूँ
  • दो लाख वर्षों का धैर्य
  • कि रच दूँ
  • ‘ग्रैण्ड कैनियन’ 2 की घाटी
  • शिला-शिला पर
  • नक्काशी
  • हवा से खींच दूँ लकीरें
  • पानी से बुत
  • तराश दूँ
  • धार से काट दूँ

  • पहाड़
  • बूँद-बूँद पत्थर फोड़
  • सुरँग- सी
  • समय को
  • लाँघ लूँ
  • गति को बुतों में बाँध दूँ
  • कैसे गुनगुनाऊँ
  • कैसे गुनगुनाऊँ?
(तिल-तिल नूतन )

पीठ पर बच्चे
  • पहाड़ों ने
  • कंधे पर बादलों को
  • ऐसे चढ़ा लिया
  • ज्यों गोरे चिट्टे बच्चे को माँ ने
  • कंधों पर बैठा लिया

  • पहाड़ियाँ
  • बादलों को पीठ पर बिठा
  • चढ़ने लग° आकाश
  • ज्यों मजदूरिन माँ
  • पीठ पर लादे बच्चा
  • चढ़ रही पहाड़ !
(तिल-तिल नूतन )

यात्रा-बिम्ब
  • यह यात्रा
  • ज़िन्दगी की उन रंगीन घड़ियों के नाम
  • जिनमें रमती रही मैं
  • उन क्षणों के नाम
  • जो बिताए मैंने कभी
  • प्यार में भ°ग-भ°ग
  • तेरे साथ
  • उस प्यार के नाम
  • जिसे भरपूर जिया मैंने
  • प्यार से
  • यह सड़क
  • यह उफनती-उमगती धुन्ध
  • यह खिलखिलाती धूप
  • यह हरियर हरियाली
  • यह हहराती हवा
  • यह तांबई पीली नीली बैंगनी
  • फरहर मिट्टी
  • यह छन-छन पल-पल
  • रूप बदलती वनस्पति
  • यह चित्तकबरी मनमोहनी
  • वेष बदलती आकृति
  • यह पल-पल परिवर्तित
  • नित-नव-सुन्दर प्रकृति

  • उन्ह° जीवन्त लमहों की
  • आवृति
  • सृजन के रू-ब-रू
  • जो जिए हमने

  • सुनहली घास में भागती
  • भैसों-सी पहाड़ियाँ
  • पेड़ों के पीछे-पीछे दौड़त°
  • काली भूरी चट्टानों की बाछियाँ
  • क्यू में लगे-लगे पेड़ों से
  • गलबहियाँ भरती डगालियाँ
  • हर आने-जाने वाले बटोही को
  • हाथ हिला-हिला पास बुलाते पत्ते --
  • बड़े-बड़े गाछों के
  • छातों से छत्ते
  • फुनगियों के गिर्द मँडराते
  • अनगिन यादों की
  • चिड़ियों के चहचहाते जत्थे
  • अतीत को वर्तमान के रू-ब-रू खड़ा करते

  • यकायक
  • चट्टानें उतर° घाट में
  • ऊबती-डूबती लहरों में
  • उचक-उचक कर झाग
  • चढ़ गई चट्टानों पर
  • फिसल-फिसल बालू पर
  • खेल रही है फाग
  • हवा की पिचकारी उड़ाती
  • बूँदों की फुहार
(तिल-तिल नूतन )

‘एकले’ ही हम रहे पर ज़िन्दगी भर
  • संग तो यूं कारवाँ ही चल रहा था,
  • ‘एकले’ ही हम रहे पर जिन्दगी भर
  • स्नेह का विश्वास लेकर
  • वायदों का ‘पास’1 लेकर
  • और चिलकती धूप से मृदु
  • परस के एहसास ले कर
  • हाथ तो पकड़े रहे सब कारवाँ में
  • बेसहारा हम रहे पर जिन्दगी भर

  • दृष्टियों की यवनिकाएँ शत
  • सुप्त-स्मित की उलझनें नत
  • प्रीत डोली संग थिरकती
  • हास-नूपुर की सधी गत
  • गीत तो गाते रहे सब सप्त स्वर में
  • बेसुरे ही हम रहे पर जिन्दगी भर

  • दर्द के चीन्हे न साये
  • पीर के परिचय न पाये
  • फूल-खुशियों की महक के
  • रूप दामन में सजाये
  • हास तो देता रहा जग नन्दनों का
  • अश्रु पीते हम रहे पर जिन्दगी भर

  • कल्पना की डोर नापी
  • स्वप्न की सीमा न बाकी
  • गगन धरती पर झुका कर
  • स्नेह भरती सांध्य-साकी
  • चाव से भरता रहा निज अंक में जग
  • छिटकते ही हम रहे पर जिन्दगी भर

  • दृढ़ इरादे बांटते हम
  • दूरियों को पाटते हम
  • पर्वतों-सी मुश्किलों को
  • चुटकियों से काटते हम
  • पास तो खुद मंजिलें ही आ गईं थीं
  • नापते पथ हम रहे पर जिन्दगी भर

  • रात की बेहोश पलकें
  • दिवस की बाहोश परतें
  • काल के पग डगमगाते
  • सृष्टि-सम्पुट सरस ढलते
  • जाम तो यूँ खुद नशे ने ही भरे थे
  • होश बाकी ही रहे पर जिन्दगी भर

  • आस का आकाश बांधे
  • श्वास में शत गान साधे
  • इन्द्रधनुष-सी जिन्दगी के
  • खोलती पट प्राण-राधे
  • दे दिया दामन तो अपना जिन्दगी ने
  • कफन सीते हम रहे पर जिन्दगी भर!!

  • कल्पना की डोर नापी
  • स्वप्न की सीमा न बाकी
  • गगन धरती पर झुका कर
  • स्नेह भरती सांध्य-साकी
  • चाव से भरता रहा निज अंक में जग
  • छिटकते ही हम रहे पर जिन्दगी भर

  • दृढ़ इरादे बांटते हम
  • दूरियों को पाटते हम
  • पर्वतों-सी मुश्किलों को
  • चुटकियों से काटते हम
  • पास तो खुद मंजिलें ही आ गईं थीं
  • नापते पथ हम रहे पर जिन्दगी भर

  • रात की बेहोश पलकें
  • दिवस की बा-होश परतें
  • काल के पग डगमगाते
  • सृष्टि-सम्पुट सरस ढलते
  • जाम तो यूँ खुद नशे ने ही भरे थे
  • होश बाकी ही रहे पर जिन्दगी भर

  • आस का आकाश बांधे
  • श्वास में शत गान साधे
  • इन्द्रधनुष-सी जिन्दगी के
  • खोलती पट प्राण-राधे
  • दे दिया दामन तो अपना जिन्दगी ने
  • कफन सीते हम रहे पर जिन्दगी भर!!
(पातियां प्रेम की)

पटरी के पत्थर
  • पटरियों के बीच
  • बिखरे पत्थरों-सा
  • रोज जलता-पिसता मेरा प्यार
  • अनकहा रह गया
  • जिसे
  • सुनाने के लिए
  • जन्म-जन्म से मैंने
  • चुन रखे थे शब्द
  • वहाँ नहीं था वह

  • मेरे शब्द--
  • पटरी के पत्थरों सँग लिपट-लिपट
  • रोये
  • उनके क्रन्दन को
  • समय की गाड़ी की
  • गड़गड़ाहट ने लील लिया
  • सुन न सका कोई
  • उनका रोना

  • मेरे शब्दों को लोगों ने
  • पटरी का पत्थर ही समझा
  • कविता के फूल नहीं!!
(पातियां प्रेम की)

आदिवासी ने तीर क्यों चलाया
  • पहला खण्ड
  • आदिवासी ने तीर क्यों चलाया?
  • आदिवासी ने तीर चलाया
  • हवा में पसर गया एक वक्तव्य
  • आखिर आदिवासी ने तीर क्यों चलाया?
  • टै्रक्टर के ड्राइवर को ही
  • निशाना क्यों बनाया?
  • ड्राइवर था सर्वहारा किसान का ही बेटा
  • तीर-सा एक प्रश्न उठा
  • वक्तव्य से टकराया

  • उठा एक बवंडर
  • चक्करघिन्नी-सा
  • पुर्णियां से पलामू
  • पलामू से पटना
  • पटना से पाटन और
  • फिर देश के हर जंगल में
  • गाँव के बहिष्कृत टोलों में
  • नगर के स्लम्स में
  • छिड़ गई बहस-
  • ‘‘आखिर आदिवासी ने तीर क्यों चलाया?’’
  • प्रश्न से प्रश्न टकराए
  • बहस-मुबाहिसे बन भिड़ गए
  • टोला-टोला, गाँव-गाँव
  • नगर-नगर गर्माने लगे
  • और लाल-लाल खून बिखर कर धरती पर
  • तीर के भेद खोलने लगा
  • ‘‘ड्राइवर लुटेरों का पक्षधर और
  • हथियार था उसी के वर्ग का
  • उसी की जमात का
  • पर जात और मजहब में जकड़ा
  • ड्राइवर वह एक गुलाम था’’
  • माटी-सी हकीकत धरती के वक्ष पर निखर गई

  • लुटेरे जमींदार ने
  • सलाह लेकर अपनी जमात से
  • बुलायी थी अपनी जात-
  • उसी जमींदार पर आश्रित जो
  • रोज लुटती थी उसी के हाथों
  • वह गरीब भूमिहीन-वंचित जात
  • उठ खड़ी हुई थी उस दिन
  • जात और मजहब के नाम पर
  • चल पड़ी थी अपनी ही जमात को जिन्दा जलाने

  • एक पैला धान या एक बोतल दारू के बदले
  • हथियायी थी जमींदार ने या
  • उसके बाप ने
  • या उसके बाप के बाप ने जो जमीन
  • वापिस माँग रहे थे आदिवासी
  • आज अपनी चुराई जमीन
  • वापिस माँग रहे थे वे अपनी ठगी हुई फसल
  • और मांग रहे थे सूद के पैसों का हिसाब!

  • पर कौन सुनता उनका तर्क?
  • आमने-सामने जमींदार नहीं
  • थे एक ही जमात के लोग
  • कि गोली चली
  • और फिर तीरों की रफ्तार बढ़ गई
  • गोली से भी ज्यादा!

2

  • कचहरी के हाकिम ने
  • कोर्ट के कारिन्दे ने
  • पंचायत के मुखिया-सरपंच ने
  • कोर्ट में गवाही दी
  • जमींदार के पक्ष में

  • कोर्ट में
  • जमींदार के वकील ने
  • उड़ा दिए थे परख़चे सच्ची गवाही के
  • धुनिये-सा धुन दिया था वकील ने-
  • रूई-सा बेदाग सच/और
  • जमीनी हकीकत की
  • कर दी थी बोलती बंद
  • गूंगा /हक्का-बक्का/गुम-सुम हतप्रभ चुप
  • सरकारी वकील
  • कौन जाने चुप्पी की कितनी कीमत
  • चुकाई थी जमींदार ने
  • न्याय के तराजू के पलड़े में
  • झूठ का वजनदार बटखरा
  • भारी पड़ गया था
  • पारदर्शी सच पर

  • जहाँ न्याय अंधा हो
  • और कानून बहरा
  • कोर्ट-कचहरी खड़ी
  • झूठी गवाही की नींव पर
  • कौन देगा न्याय?
  • उस दिन भी
  • झूठ बन गया था सच
  • और सच झूठ
  • हमेशा की तरह उस दिन भी
  • हारा था एक मासूम और निर्दोष
3

  • पर
  • जिस दिन कोर्ट ने सुनाया फैसला
  • उसी दिन
  • हाँ उसी दिन
  • हकीकत की कलम ने लिखा था
  • एक और फैसला
  • हवा की कलम से
  • खेत के गजट में
  • सरे-जमीन के पृष्ठों पर-
  • ‘‘कि बहेगा खून
  • खून-
  • दोनों ओर के गरीबों का
  • क्योंकि सरकार और उसके कारिन्दे
  • समाज और उसके ठेकेदार
  • जात और बिरादर
  • कोर्ट-कचहरी और उसके साक्ष्य
  • प्रशासन और उसकी बन्दूक
  • सब के सब आदी हैं
  • झूठ के’’
  • इकतरफा फैसला सुनने
  • मरने या मार दिए जाने को अभिशप्त
  • हैं आदिवासी

  • होकर भी
  • बेटी/बहन के बलात्कार का
  • चाक्षुस-गवाह
  • गवाही के कायदे से अनजान
  • सच बोलता है केवल सच
  • पर गवाही तो हमेशा से
  • झूठ पर आश्रित है
  • कानून केवल गवाही
  • सुनता है
  • जो उसे देनी नहीं आती

  • जब बोल नहीं पाता आदिवासी-
  • जब शब्द हो जाते हैं गूंगे
  • जुबान हो जाती है जड़
  • तो उसका गुस्सा
  • जुबान पे नहीं
  • हाथों में उतर आता है
  • हाथ
  • थाम लेते हैं तीर
  • तीर की नोक उसके बोले शब्दों को
  • एतराशती
  • देती आकार
  • और फिर कमान से छूटते सरसराते तीर शब्दों से
  • अन्याय के खिलाफ
  • दर्ज कराते प्रतिवाद!
  • पहल की प्रक्रिया कहां से शुरु होगी ?
दूसरा खण्ड
1.
  • आदिवासी वाकिफ है
  • दोस्ती की भाषा से
  • पर दोस्त बने दुश्मनों के हाथों
  • मारा जाता है वह
  • वह बोलने लगता है तब
  • शब्दों से भी तेज
  • तीर की भाषा

  • पूरा सरकारी तंत्रा
  • पूरा समाज
  • पूरी संगठित शक्ति सरकार की
  • टूट पड़ती है मिलकर
  • उसकी पूरी जमात पर
  • हत्यायें घटती हैं
  • मगर
  • कषनून की नज़र में
  • वे अपराध नहीं होतीं
  • होती हैं फष्कत ला-एण्ड-आर्डर का सवाल!
2.
  • मुन्सिफ
  • बार-बार उठाते हैं सवाल
  • ‘‘पहल किसने की?’’

  • ‘‘आदिवासी ने’’
  • मिलता है एक ही जवाब!

  • सच गुहार लगाता है-
  • ‘‘पहल जमींदार ने की
  • जब जमीन लूटी थी उसकी
  • पहल जमींदार के बाप ने की
  • जब उसके बाप से ठगी थी जमीन!’’
  • पर कानून और समाज दोनों ही
  • फेर लेते हैं मुँह-
  • अप्रासांगिक कह कर
  • नजरअंदाज कर देते हैं सच का तर्क
  • सच चिल्लाता है-पूछता-
  • ‘‘झूठी गवाही की पहल
  • किसने की?
  • किसने की थी पहल
  • आदिवासी के खिलाफ?’’
  • सब के सब मुस्कुराने लगते हैं
  • कहने लगते हैं !
  • सच को मूरख-पागल-सेन्टीमेंटल!
3.
  • पहल-?
  • हाँ पहल!
  • किसकी पहल का इतिहास कब लिखा किसी ने
  • इतिहास किसी की पहल का?
  • दर्ज होते आए जरूर अंजाम-दर-अंजाम
  • सवह भी इसलिए कि
  • विजयी होता रहा है झूठ
  • अंजाम?
  • सच की आने वाली पीढ़ियों को
  • धमकाता आया है बरसों से
  • सावधान करता रहा है सदियों से
  • और कहता रहा है -
  • ‘‘फिर जुर्रत मत करना।’’

  • पर आदिवासी के कंठ में
  • बैठा सच
  • पूछ रहा है बार-बार
4.
  • कहाँ से शुरू होगी प्रक्रिया ?
  • ‘‘पहल को पकड़ने की
  • कब शुरू होगी ?
  • अंजाम से या-
  • आगषज से?
  • परिणाम से-
  • या कारण से
  • जिस दिन तीर चला-
  • खून बहा
  • या जिस दिन छीना था खेत जमींदार ने
  • या जिस दिन कोर्ट ने गलत फैसला सुनाया था ?
  • किस दिन से?’’
  • पर
  • उत्तर नहीं दिया किसी ने अभी तक उस सवाल का
  • चुप हैं सभी
  • शायद उत्तर नहीं है
  • या देना नहीं चाहते वे उत्तर
5.
  • आज
  • अभी तक घूम रहा है
  • चक्करघिन्नी-सा
  • चक्रवात बन कर यह
  • सवाल!
  • पर उत्तर नहीं आया?
  • चूँकि उत्तर देने का अर्थ
  • होगा परिवर्तन!

  • इसलिए बैताल
  • विक्रमादित्य के
  • कंधे से उड़ कर
  • फिर-फिर उलटा
  • लटक जाता है
  • पेड़ की शाख पर!

  • तीर निकलता ही रहेगा कमान से
  • जब तक जवाब देता नहीं
  • विक्रमादित्य बैताल को
  • ‘‘प्रक्रिया की पहल
  • कहाँ से शुरू होगी
  • अंजाम से
  • या आगषज से
  • परिणाम से या
  • कारण से?
  • कहाँ से?
  • कहाँ से?
  • कहाँ से...?’’
(‘जनकविता’ : प्रकाश्य)

प्यार का अस्तित्व
1.
  • प्यार बद्दस्तूर जारी है
  • जारी था-
  • जारी रहेगा !
  • पर बिना देह
  • प्यार का अस्तित्व
  • सच नहीं!

  • यह सच है कि-
  • मन की अतल गहराईयों से
  • रिसती है प्यार की ‘सोती’
  • बनती है नदी
  • पर
  • ‘सोती’ को भी चाहिए
  • पहाड़ की ‘खोह’
  • नदी को ‘धरती’
  • और प्यार को देह-यष्टि
2.
  • निषेध संहिता संयम
  • फतवा ‘हुकुम’ आदेश
  • भले रोक लें पलभर
  • प्यार की गति
  • कोलन-कौमा या डैश बनकर

  • पर उस पर लगा दे कोई
  • पूर्णविराम
  • नहीं है संभव

  • चाहे पंच हो या पंचपरमेश्वर
  • चाहे पहाड़ हो या पत्थर
  • कुंआ, बावली या पोखर
  • नदी- नद- समुद्र
  • सब के सब हैं छोटे
  • पुरूष-प्रकृति
  • की आकर्षण-शक्ति से।
(पातियां प्रेम की)

इतनी जिजीविषा
  • अब बन्द आँखों में ही
  • किरणों की किरचें चमक-चमक
  • रचने लगी हैं
  • रोशनी का गोला
  • आँखें खोलकर उन्हें देखूँ
  • तो शायद जलने लग जाए सूरज
  • लोे
  • रोशनी की ये लकीरें
  • डायरी में उतर आई हैं

  • साँझ की जद्दोजहद
  • रात भर इन्तज़ार करती है
  • सुबह की विजय का
  • पर हारती नहीं
  • रात से
  • इतनी जिजीविषा
  • इतनी आस
  • इतना विश्वास
  • अदम्य हौसला
  • सूखने नहीं देता
  • कलम की स्याही

  • रात की स्याही लेकर मैं
  • सुबह का गीत लिख लेती हूँ
  • तारो की कणियाँ ले कर
  • सुबह की रोशनी रच लेती हूँ
  • टेसू की चिंगारी से जला देती हूँ
  • अंधेरे के जंगल

  • पर हारती नहीं हूँ
  • न हारूँगी मैं
  • हारना मेरी नियति नहीं !!
(तुम कौन)

कविता मुझे खोजती फिरने लगी है
  • अब कविता को मैं नहीं
  • कविता ही मुझे
  • खोजती फिरने लगी है
  • कि कम-से-कम

  • मैं उसे बाँध लूँ
  • अपने शब्दों में ही
  • कि आँक लूँ उसका
  • बिम्ब
  • अपनी डायरी में
  • छंद-
  • वह तो अब
  • बीते समय की बात है

  • कि सनद रहे यह भी
  • समय की गिनीज़-बुक में-
  • दर्ज रहे दस्तावेज़
  • याद रहे यह
  • स्मृतियों के सैलाब-सा
  • कि कविता भी है
  • या थी कभी

  • शायद
  • वह जान गई है
  • कि लगने वाली है उसकी बोली
  • मण्डी में
  • वह बिकने वाली है विज्ञापन बन कर
  • बाजार में
  • शायद वह डरने लगी है
  • कहीं कल्पना राकेट न बन जाए
  • या उसकी तेज गति कोई रूप न ले ले
  • उसका यथार्थ न बन जाए कहीं-
  • ‘हमाम का सच’
  • प्रैशर कुकर की ‘सीटी’
  • कम्प्यूटर की ‘बीप-बीप’!
(तुम कौन)

भागना तो मौत होगी
  • मेरे बुलंद हौसले
  • संग-दिल संकल्प
  • अफष्रात् स्वप्न?
  • उम्मीदों की ढेरियाँ
  • विश्वासों की गाँठें
  • आस्थाओं का विस्तार
  • सबको एक साथ
  • समेट नहीं पाया मेरा दिल
  • कि दरक गया
  • बुलंद हो
  • तनिक-सा
  • हौसलों को ललकारने को होती हूँ
  • कि कम्बख़्त
  • यह दिल
  • जो धड़कता रहता है हरदम
  • रुकने लगता है
  • थरथराता है
  • टसकने लगता है सीने में एक दर्द

  • दीवारों के नीचे से खिसकने लगती है
  • मिट्टी
  • धसकने लगती हैं दीवारें
  • खपरैल छत
  • जिसे अभी मरम्मत करना बाकी था
  • बैठने लगती है
  • एक तीखा दर्द उठता है
  • जैसे कोई घर की नींव में सेंध लगा
  • खिसका रहा हो नींव का पत्थर

  • घर गिरने के पूर्वाभास से
  • घर छोड़ कर भाग जाते हैं
  • घर के लोग
  • पर भागकर मैं कहाँ जाऊँ ?
  • भागना तो मौत होगी
  • उसी में रहते
  • उसे बचाने की कोशिश में
  • दबकर मरना कहीं अच्छा है
  • बनिस्पत भाग कर मरने के !!
(तुम कौन)

क्यों मलाल मुझे
  • नहीं उकेर पाऊँगी कागज पर
  • अनुभव अपने
  • क्यों मलाल मुझे ?
  • प्रकृति ने जो उकेरा
  • वह भी तो छिपा है जग से

  • जब अतीत में जाने की ईजाद होगी
  • मशीन
  • या मस्तिष्क पढ़ने का
  • कम्प्यूटर
  • तो जान पाए या
  • पढ़ पाए दुनिया शायद
  • मेरे अनुभव

  • वर्तमान के कोलाहल में
  • अतीत का क्या मोल ?
  • विश्व के फलक पर
  • मेरे मस्तिष्क का
  • मन का क्या रोल ?
  • मेरे इर्द-गिर्द की -
  • मेरी दुनिया ही
  • इतनी छोटी
  • पर नापने में इन्हें जायेंगी सदियाँ बीत
  • जाने दो
  • जीने के कड़वे-मीठे क्षण
  • तीते-तीखे अनुभव
  • नहीं लिख पाई गर

  • ललक तो है बरकरार
  • जीने की

  • जो नकारती रही है पराजय
  • जो नकारती रही है हार
  • जो रुकती नहीं कभी कहीं
  • जरूरी नहीं दूसरे भी
  • पालें ललक
  • मेरे अनुभव का विषय बनने की !!
(तुम कौन)

अन्धा-युग
  • फर से
  • एक अन्धे-युग में
  • प्रवेश करने लगा है विश्व
  • राजनीति और धर्म
  • मंडियों के--
  • तानाशाही के
  • गुलाम हथियार पैरोकार !

  • युद्ध का भय युद्ध का तेवर
  • युद्ध का अंदाज
  • रूप दे रहा
  • विश्व के दादा को
  • तानाशाह को,
  • बढ़ा रहा
  • दादा का कद,
  • सौंप रहा
  • विश्व की बागडोर
  • दादा के हाथ,
  • खाड़ी का अंजाम!
  • नाग सा फन उठाकर
  • विद्रोही तेवर को
  • कर रहा चूहेदानी में बन्द
  • समुद्र में फेंकने की योजना
  • हो रही तैयार!
  • अपने ही कुओं में आग लगाते
  • मजबूर लोग
  • कर्ज के फंदे में फंसे लोग
  • दादा के शिकंजे और कसते जा रहे
  • बढ़ता जा रहा कर्ज़ का भार,
  • अब एक ही सिक्का चलेगा!
  • जो मनमानी कीमत कूतेगा
  • खरीद लेगा छोटे-छोटे लोगों का
  • अथक पसीना
  • खरीद लेगा
  • उनके काम के घंटे
  • आराम की घड़ियाँ
  • सोचने की शक्ति
  • सवाल करने की औकात
  • बना देगा उन्हें
  • मशीन का एक पुर्जा
  • एक पेचकस,
  • फिट करने के लिए
  • अपने मनसूबों के पुर्जे-
  • या फिर एक चाकू-
  • काटने के लिए पेट
  • काटने के लिए विश्वास
  • काटने के लिए देश
  • काटने के लिए इन्सान
  • साग-भाजी की तरह!
(आदिम से आदमी तक)

कौन लिखेगा
  • अब कौन लिखेगा
  • मूल्य लौटाने के गीत
  • कौन रंगेगा फलक को
  • अन्ध्ेरे के खिलाफ
  • रोशनी का विद्रोह
  • किरणों के रथ पर चढ़कर
  • कौन सूरज खड़ा करेगा?
  • कौन? कौन?

  • कबूतर की उड़ान के रास्ते में
  • कौन गढ़ेगा मील के पत्थर
  • जो घटाए
  • धरती की दूरी,
  • पृथ्वी का इतिहास !

  • सुनाएगा बार-बार
  • कौन कवि? कौन कवि?
  • पृथ्वी का भूगोल आँकेगा
  • ब्रह्माण्ड के फलक पर
  • कौन चितेरा? कौन चितेरा?
  • कौन शिल्पी गढ़ेगा
  • विकास के बुर्ज
  • पृथ्वी की विकास-यात्रा पर?

  • न जाने कब शिल्पी
  • छेनी से
  • पृथ्वी के अर्ध-गोलाकार रूप को
  • ऐसी पहचान देगा
  • विश्व का
  • जाग जाय पत्थर-युग
  • आदिम-सा चल दे जो
  • अर्द्ध गोलाकार पृथ्वी-सी टोकरी को
  • माथे पर लाद
  • मेहनत का मूल्य
  • कुतने लगे!
  • अँकने लगे!
  • गुणने लगे!
  • गूंजने लगे!
(आदिम से आदमी तक)

अभिजात और औरत
  • तीर तलवार त्रिशूल के सहारे
  • फैलता धर्म,
  • भय के बल...
  • धर्म का पालन!
  • पालन करवाने वालों की जमात...
  • नियम गढ़ने और मनवाने वालों की जमात से
  • जन्में अभिजात !
  • धर्म के संरक्षण में पनपे अभिजात !
  • दुष्कर मर्यादाएं उभरीं
  • दुर्लभ मूल्य उगे,
  • राजनीति उनकी दासी,
  • अपने लिए अभिजात ने
  • औरत इनकी सम्पदा...
  • इनकी ज़र-आबरू-उपयोगी वस्तु !

  • धर्म और अभिजात इक-दूजे के पूरक...
  • दोनां में टक्कर
  • दोनों में गठबन्धन
  • समझौता भी !
  • शीत युद्ध वर्चस्व का...
  • भीतर ही भीतर चलता !
  • कभी धर्म का पलड़ा उठाता
  • कभी अभिजात का,
  • पर दोनों की नज़र में आदमी बेकार था
  • गौण था... हीन था... अधिकार-विहीन था!

  • अभिजात जमात में
  • कवि चितेरे शिल्पी
  • कलाकार-साहित्यकार
  • सबने मिल औरत को खूब निखारा
  • सजाया और संवारा,
  • औरत की गुलामी को कहा मर्यादा
  • हत्या को कुर्बानीµमौत को मुक्ति
  • जल जाने को ‘सती’
  • सौन्दर्य को ‘माया-ठगनी’
  • उसकी खुद्दारी को कुल्टा-नटनी-कुटनी
  • न जाने क्या-क्या कहा?
  • औरत को तौला
  • सम्पदा के बटखरों से
  • हीनता के तराजू पर
  • मर्यादा की डण्डी मार...
  • सतीत्व की कसौटी पर परखा !
  • उसे रोने की मनाही
  • हँसना वर्जित !
  • बोली ! तो लग गए कौमे,
  • पूछी ! तो...
  • तन गए प्रश्नवाचक,
  • उठ खड़े हुए एक साथ सब विस्मयबोधक,
  • उसने तर्क दिया
  • तो पूर्णविराम के दण्ड अड़ गए !
  • ज्ञान उसके लिए वर्जित
  • इसलिए किताबें कर दीं गईं बन्द
  • उसकी पहुँच के बाहर !

  • वह
  • केवल शृंगार की पात्रा
  • भोग्या
  • देवी के रूप में दासी,
  • न-बोलने वाली गुड़िया-
  • बस सिर हिलाती कठपुतली-
  • किसी अदृश्य डोर से बंधी
  • पिता-पति भाई-पुत्रा में बँटी
  • किसी एक खूँटे से बँधी
  • थिरकती सीमा के भीतर
  • चलती दायरे के अन्दर
  • ठुमकती घर के आंगन
  • सोती-उठती-बैठती
  • न लाँघती परिधि
  • बन्धन को अपने ही
  • बन्धन को अपना श्रंगार-भाग मानती
  • मानती सुहाग !
  • बँधे पाँव-चलने में असमर्थ
  • लड़खड़ाती-लड़खड़ाती
  • कर गई सदियाँ पार !
  • ‘किमोनो’1 से घिरी
  • गाउन सम्भालने में व्यस्त
  • जकड़ी-अकड़ी औरत
  • कमर करधनी से कसे
  • चारदिवारी में कैद
  • मीनारों से ताकती
  • झरोखों से झाँकती
  • घूँघट से बाट जोहती
  • पति के अदृश्य खूँटे से बँधी
  • चुप्पी साधती
  • तन्वंगी कोमल-कोमल मूर्ति-सी औरत
  • पल-पल में कुम्हलाती औरत
  • बात-बात में लजाती
  • शर्माकर भाग जाती !
  • औरत-
  • बन गई मूल्यों की प्रतिमूरत
  • मर्यादा का रूप !

  • तर्क करती
  • उन्मुक्त भागती
  • हँसती-गाती
  • जोर-जोर से चिल्लाती
  • जी-भरकर
  • रोती-हँसती
  • बतियाती वाचाल औरत,
  • मेहनतकश
  • मशक्कत के पसीने से लथ-पथ
  • आज़ाद औरत
  • ‘सभ्य-औरत’ के दायरे से
  • बाहर कर दी गई।
  • ‘सावित्रा’ की ‘सीता’ की
  • ‘यार्ड-स्टिक’ पर-
  • छोटी करार कर दी गई,
  • मर्यादा के पलडे़ पर
  • हल्की हो गई-
  • संस्कारों की कसौटी पर
  • ठहरा दी गई पीतल !
  • 1- जापान में स्त्रियों के पहनने का परिधान।
(आदिम से आदमी तक)

जब अपनी बात कही थी
  • समाज-सभ्यता-संस्कृति का
  • चितेरा शिल्पी कवि
  • रंगता रहा वही
  • गढ़ता रहा वही
  • जो धर्म ने कहा
  • राजा ने चाहाµ!
  • अपनी बात नहीं कहीं उसने
  • कहीं भी-
  • कभी भी-

  • जब अपनी बात कही थी
  • तो उसने
  • सृजीं थी ऋचाएं,
  • ऊषा और सूर्य के रथ खींचते
  • शब्द गढ़े थे,
  • आकाश को लीपते
  • लालिमा को लजाते
  • सागर से होड़ लगाते
  • मेघों को घेरते
  • अर्थ भर डाले थे !
  • धरती के पोर-पोर में-
  • ‘हँसों’ऽकी कतार की कतार
  • भाषा की पाँत-पाँत से सज गई !
  • धूमकेतु टूटने की सूक्ष्म ध्वनि
  • शब्द को दे
  • व्यंजना की शक्ति अर्थ में भर
  • शब्द-कोश का विस्तार कर डाला,
  • दौड़ती-हहराती
  • शान्त-सौम्य बहती
  • नदियों की लय में
  • स्वर बांधा,
  • ऋचाओं का समवेत गान
  • गगन में गूँज उठा !
  • उसने सागर को मथ कर
  • विष और अमृत नहीं निकाला
  • उसने लक्ष्मी और विष्णु के जोड़े को
  • कमल के आसन पर नहीं बिठाया !
  • उसने प्रातः की लालिमा के रंग को
  • रूप दिया-
  • नाम दिया ऊषा !
  • उसने रोशनी के पुंज को आकार दिया
  • कहा सूर्य !
  • किरणों के रथ को बदल डालाµ
  • बादलों के घोड़ों में !
  • उसने अग्नि को इन्द्र से
  • दामिनी को मेघ से
  • धरा को बिरवे से
  • नदी को सागर से
  • जोड़
  • मिटा डाली
  • मनुष्य और प्रकृति का विभेद,
  • कर डाली
  • रिश्तों की नई परिभाषा!
(आदिम से आदमी तक)

मैं कमल की नाल हो गई
  • घर आवे मोरा मलकट्टा
  • रांधू झट से साग और घट्टा
  • करते मिल कर हंसी और ठट्टा
  • दारू का पीकर अधकट्टा

  • मुन्ना को पलने में डालूं
  • मुनिया को गोदी में घालूं
  • बड़ी रात गए मुंशी-मनेजर
  • की बतिया सब
  • इक-इक करके मैं कह डालूं
  • भूल के दिन की थकी दुपहरिया
  • रात के सुख की नींद मैं सूतूं
  • सपने में मैं पोखरिया में
  • एक कमल की नाल सी दीखूं

  • सिर पे धरा झोड़ा बन जाता
  • एक कमल का फूल निगोड़ा
  • कोयले के बदले फिर उसमें
  • कमल-गट्टा भर जाता थोड़ा
  • पत्थर पे बैठे ही बैठे
  • जिसे खाता फिर मेरा मुन्ना
  • चुपके-चुपके तक-तक मोहे
  • मुस्काए मने-मन
  • मलकट्ट मोरा।
  • शर्म के मारे देखो तो मैं
  • रक्त कमल-सी
  • लाल हो गई
  • रात सपन में कामिन से मैं
  • लाल कमल की नाल हो गई!
(भीड़ सतर में चलने लगी है)

वरमाला रौंद दूंगी
  • एक
  • बड़ी बारादरी में
  • सिंहासनों पर सजे तुम
  • बैठे हो
  • कई चेहरों में
  • वरमाला की इंतजार में!

  • बारादरी के हर द्वार पर
  • तुमने
  • बोर्ड लगा रखे हैं
  • ‘बिना इजाजत महिलाओं को बाहर जाना मना है!’
  • परंपराओं की तलवार लिएµ
  • संस्कार पहरे पर खड़े हैंµ
  • संस्कृति की
  • वर्दियां पहने!

  • मैं
  • वरमाला लिए
  • उस द्वार-हीन बंद बारादरी में
  • लायी गयी हूं
  • सजाकर
  • वरमाला पहनाने के लिए
  • किसी भी एक पुरूष को!

  • मुझे
  • बिना वरमाला पहनाए
  • लौटने की इजाजत नहीं
  • मेरा ‘इनकार’-
  • तुम्हें सह्य नहीं
  • मेरा ‘चयन’
  • तुम्हारे बनाए कानूनों में कैद है!

  • वरमाला पहनानी ही होगी
  • चूंकि बारादरी से निकलने के दरवाजे
  • मेरे लिए बंद है
  • और बाहर भी
  • पृथ्वीराज मुझे ले भागने को
  • कटिबद्ध हैं!
  • मेरा
  • ‘न’ कहने का अधिकार तो
  • रहने दो मुझे!

  • मेरा
  • ‘चयन’ का आधार तो
  • गढ़ने दो, बनाने दो मुझे!

  • पर
  • तुम-जो बहुत-से चेहरे रखते हो
  • मुखौटे गढ़ते हो
  • स्वांग रचते हो
  • रिश्ते मढ़ते हो
  • संस्कृति की चित्रापटी पर
  • केवल
  • एक ही चित्रा रचते हो
  • मेरे ‘समर्पण’ का
  • ‘मेरे इनकार का नहीं।

  • और
  • आज मैंने इनकार करने की हठ ठान ली
  • वरमाला लौटाने का व्रत ले लिया
  • ‘न’ कहने का संकल्प कर लिया है।

  • इसलिए
  • हटा लो
  • संस्कारों के पहरेदारों को
  • दरवाजों पर से
  • नहीं तो
  • मैं
  • तुम्हारे मुखौटे नोच लूंगी
  • चेहरे खरोंच दूंगी
  • होठों से सिली मुसकानें उधेड़ दूंगी
  • ललाट पर सटा भाग्य उखेड़ दूंगी
  • हाथों से दंभ के दंड छीन लूंगी
  • हावों से अधिकार की गंध खींच लूंगी
  • आंखों में चमकते आन के आइने फोड़ दूंगी
  • और तेरी आकांक्षाओं में छिपे
  • शान और मान के पैमाने तोड़ दूंगी।
  • तेरी नज़र के भेड़ियों को रगेदकर
  • दरवाजों पर खड़े पहरेदारों को खदेड़कर
  • वरमाला रौंद दूंगी
  • पर
  • नहीं पहनाऊंगी
  • तुम्हारी सजी हुई कतार में से किसी को;
  • क्योंकि
  • इस व्यवस्था में
  • ‘चयन’ का मेरा अधिकार नहीं है।
(खूंटे)

खूंटे
  • समर्पित उसे
  • जिसने मुझे ‘मैं’ बना दिया
  • जो अनाम था
  • पर ‘नाम’ बन गया
  • समर्पित उन खूंटों को
  • जिन्होंने कभी मुझे बांधा था
  • पर जिनसे मैंने पगहे तुड़ लिए
  • क्योंकि खूंटों से बंधना मेरी आदत न थी
  • या खूंटे ही उखड़ गए
  • क्योंकि मुझे बांधने की उनमें क्षमता न थी!

  • समर्पित उसे
  • जिसने आकाश बन
  • मुझे घेरने का प्रयास किया
  • और मुझे धरती बना दिया!

  • समर्पित उसे
  • जिसने प्यार के अंबारों का ढेर लगा दिया
  • लेकिन उनके गिर्द घूम
  • उन्हें छोटा नहीं किया!

  • समर्पित उस घोंसले को
  • जो मुझे समा न पाया!
  • उस उड़ान को
  • जो मेरे इरादों से छोटी पड़ गयी!

  • समर्पित उन दूरियों को
  • जिन्हें मैं नापती रही!
  • सपर्पित उन मंजिलों को
  • जिन्हें मैं लौटाती रही
  • समर्पित उन प्रेरणाओं को
  • आसंगों को - ग्रंथियों को - उलझनों को
  • जिनसे जूझने में
  • मैं जिंदगी के कफन
  • को कवच-सा
  • ओढ़ती रही।

  • समर्पित उस रमणिका को
  • जिसने मुझे ‘रमणिका’ बना दिया!
(खूंटे)

तोड़ देती हूं
  • मैं घोंसले बनाती हूं
  • बवैये की तरह
  • और उन्हें जुगनुओं से
  • रौशन करती हूं!
  • लेकिन
  • जब उन पर
  • मिट्ठी की परतें
  • जमने लगती हैं
  • और वे महलों-सा
  • उठने लगते हैं
  • तो मैं उन्हें तोड़ देती हूं
  • क्योंकि
  • उनसे शोषण की गंध
  • आती है।
(खूंटे)

न माना
  • मैनें आगे बढ़ना चाहा
  • पुरुष ने हाथ थाम लेने को कहा
  • मैंनें मना कर दिया !
  • तो-
  • उसने ठोकरें लगायी!
  • मैं लड़खड़ाकर गिरी
  • ...... उठी
  • और आगे बढ़ी
  • उसने आगे बढ़कर रास्ता रोक लिया।
  • मैनें हौले से हल्के से उसका हाथ हटा दिया
  • और आगे बढ़ी!
  • उसने
  • जोड़ से थप्पड़ लगाया!
  • मैनें आंखों में आंसू भरकर उसे देखा
  • और
  • आगे चल दी अकेली!
  • वह सह न सका मेरी स्वतंत्राता!
  • मुझे बाहों में बांध लेने को
  • प्यार और चुंबनां का
  • ताना-बाना बुना
  • बुनकर जाल बनाया
  • और मेरे उपर फेंका
  • ताकि उम्र भर के लिए उसके भीतर
  • मेरी बेबस आत्मा चक्कर काटती रहे,
  • उसकी सिलवटों में लिपट-लिपट
  • घुट-घुट कर मर जाए!
  • मैनें उस वार को भी
  • झेला!
  • और व्यूह से बाहर निकल पायी!
  • तब उसने
  • आरोपों के दलदल मेंं
  • मुझे धकेल दिया!
  • ताकि उसका,
  • उस पुरुष का,
  • उसके पौरुष का,
  • जिसने आज तक अपनी ‘सुप्रिमेसी’
  • संसार में रखी है-
  • का-
  • मैं लोहा मान लूं!
  • पर मैनें उसे
  • न माना
  • न माना
  • न माना!
(खूंटे)

बलात्कार
  • दो नंगे स्तन उभरे
  • वक्ष पर फटे चिथड़ों में से झांकते
  • हुए
  • दो सख्त हाथ उन्हें मचोड़ते,
  • एक नन्हा-सा हाथ उठाµ
  • प्रतिकार में
  • हटा दिया गया-

  • एक बदचलन हंसी
  • एक भयभीत सिसकी
  • एक भगदड़
  • एक पकड़
  • एक फड़फड़ाहट-छटपटाहट
  • एक लपक
  • एक झपक
  • एक गले से चीख़ी
  • मुंह में घुटी चीख़
  • दांतों में भिंची जीभ
  • हांफती हवस
  • ठण्डी देह
  • गर्म सांस
  • मृत्यु के साथ
  • बलात्कार!
(पूर्वांचल एक कविता यात्रा)

ब्रह्मपुत्रा हूं मैं
  • ब्रह्मपुत्रा हूं मैं
  • इतिहास का साक्षीµभूगोल का गवाह
  • सभ्यता ने किताब के पन्ने
  • लिखे मेरी लहर पर
  • विपल्व से विकास का आधार मेरा ही वक्ष
  • प्रलय ने पर्वत मेरे सामने गढ़े
  • एवरेस्ट का अंकुर
  • फूटा मेरे समक्ष
  • गंग-सिन्धु से धरती को
  • मैंने देखा है छनते
  • राम के पूर्वज
  • महाभारत के सृष्टा
  • लांघे मेरा तट-बन्ध!
  • लेकिन मेरा पानी कभी खून से सना नहीं!
  • पर आज
  • मेरी आंखों का पानी
  • कहीं बचा नहीं!
(पूर्वांचल एक कविता यात्रा)

‘सन्दक-फू’
  • मैं ऊँचाइयों की एक चट्टान हूँ
  • पर गहराइयों की पहचान हूँ
  • जिस पर
  • समय की सीलन
  • काल की काई
  • हवाओं की परछाई
  • जमी है

  • मेरी परतों में
  • इतिहास के कफन ओढ़़ कर
  • समय के कंकाल दबे हैं
  • और इन्सान के सृजन के चिन्ह
  • मेरे वक्ष पर लिखे हैं
  • मेरा आकार मेरा रूप नह°
  • मेरे प्रकार मेरी पहचान नह°
  • मेरा रंग मेरा अपना नह°
  • मेरा रूप कोई सपना नह°

  • मेरे आकार सदियों की पदचाप ने गढ़े हैं
  • मेरे प्रकार जीवन्त क्षणों की अनगिन सिहरनों
  • से बने हैं
  • वनस्पति ने जल-जल कर
  • अपने दाहक दागों से मुझे दागा
  • आकाश ने जग-जग कर
  • बरखा ने रो-रो कर
  • अपनी बून्दों से
  • मेरे अंग-अंग गढ़े हैं
  • मैं बिछी हूँ
  • उठ बैठी हूँ
  • खड़ी रही हूँ
  • पर चली नह°
  • चूँकि मेरी गति
  • समय ने छीन ली
  • धरती ने ख°च ली

  • मैं पड़ी हूँ कफन-सी
  • प्रकृति के
  • जीवन के
  • वनस्पति के
  • शवों को लपेटे
  • साँसों का गला
  • मैंने सदियों पहले घोंट दिया था
  • धड़कनों की लय
  • मैंने कभी सुनी नह°
  • सृष्टि के बाद से ही
  • जिन्दगी के अहसास
  • जल कर ढेर हो गये
  • और उसके अम्बार ही
  • मेरा रूप हो गये

  • मैंने सागर की
  • गहराइयों को
  • तनहाइयों को
  • छुआ है

  • उसकी लहरों ने मुझे
  • चूमा है
  • धरती के लावाओं की आग ने
  • उगला है मुझे
  • बन्दर ने आदमी बनना सीखा है
  • मेरे ही सामने
  • और आदमी का आदमियत खोना
  • भी
  • मैंने सुना है
  • हिरोशिमा के वाल्केनिक कंपनों से !

  • सभ्यता की पगडंडी पर
  • मैं मील पत्थर-सी पड़ी रही हूँ
  • संस्कृति की हर डगर
  • मेरे पास से होकर गुजरी है
  • पर मुझे छुआ नह°
  • मैं अछूती ही रही
  • व्यवस्था की गिरती मुंडेर
  • बदलाव की जकड़ती न°व
  • सब मेरे ही रूप हैं
  • पर मैं सरकती नह°
  • लोग मेरे पास से गुजरते हैं
  • मुझ पर चलते हैं
  • केवल देखती हूँ मैं !

  • मेरी परतों में कह°-कह°
  • पौधे उग आये हैं--
  • शायद शव मर गये
  • और प्राण जी उठे हैं
  • पर ये उगे पौधे
  • यह रेंगती काई भी
  • एक दिन पत्थर बन जाएगी
  • पत्थर
  • जो कभी मरता नह°
  • क्योंकि वह कभी जिया ही नह°
  • जो केवल है
  • कस्मै के ‘क’-सा
  • अस्ति के ‘अ’-सा
  • नास्ति नह° !

  • मैं टूटती हूँ मरती नह°
  • बढ़ती हूँ फैलती हूँ सिमटती नह°
  • मुझे केवल धरती निगल सकती है
  • केवल लावा के ही होंठ
  • पी सकते हैं मुझे
  • हवाएँ गढ़ती हैं मुझे शिल्पी नह°
  • मेरे पाँव में सभ्यताएँ दबी हैं
  • मेरे माथे पर आकाश मढ़ा है
  • मैं अजन्मी अ-मरी
  • एक चट्टान हूँ
  • ‘संदक-फू’ की !!
(पूर्वांचल एक कविता यात्रा)

मितवा
  • मैं ड्यूटी पर नहीं जाऊँगा रे मितवा
  • मैं ड्यूटी पर नहीं जाऊँगा !
  • वहां मुझे ‘काकाई देव’ पर गोली चलानी पड़ेगी
  • आज जब वह वोट के विरोध में
  • मेरे कैम्प के पास आएगा !

  • मैं आज काम पर नहीं जाऊँगा रे साथी
  • मैं आज काम पर नहीं जाऊँगा
  • वहाँ मुझे सड़कों पर जाती
  • बसों में चढ़ती
  • बाजार करती सीतामाय, योगमाया, गंगा, पारु को
  • बेतों से पीटना पड़ेगा!

  • मैं इस वर्दी को नहीं पहनूंगा रे मीताµ
  • मैं इस वर्दी को नहीं पहनूँगा
  • मुझे इसमें कफन नज़र आता है!
  • इसे ढाँप कर मेरी रूह
  • दफना दी गई है
  • इसे पहन कर
  • मैं एक ज़िन्दा लाश बन
  • सरकार नाम की प्रेतात्मा के हुक्म पर
  • अन्धा बहरा गूँगा बन
  • अपनी ही औलाद को गोलियां से भून देता हूँ !
  • मैं इस वर्दी को नहीं पहनूँगा रे मीता
  • मैं ड्यूटी पर नहीं जाऊँगा रे मितवा
  • नहीं साथी नहीं-मैं काम पर नहीं जाऊँगा !
(पूर्वांचल एक कविता यात्रा)

एक दुर्द्धर्ष औरत
  • आज जब
  • मैं रह गई अकेली
  • जग गई मेरे भीतर की
  • एक दुर्द्धर्ष औरत
  • मुकाबले की सब शक्ति जुटा कर
  • तन गई मैं
  • अकेली लड़ने के लिए
  • विषमता मिटाने के लिए
  • अड़ गई मैं

  • भाग चुके थे वे

  • वे जान गये थे
  • अब बचाव नहीं प्रहार करूंगी मैं
  • तत्क्षण दुबक गये थे
  • मौके की तालाश में
  • वे
  • अब तलाश रहे हैं
  • मेरी कमजोरी

  • पारे-सी दीवारें हैं
  • उनके और मेरे बीच
  • जिनके आर-पार देख सकती हूं --
  • मैं उन्हें और वे मुझे
  • हाथ भर दूरी है
  • उनके और मेरे बीच
  • पर है एक अन्तरिक्ष-सा विशाल
  • संकल्प

  • बढेंगे वे तो काट दिये जायेंगे

  • वे
  • जो आज तक मुझे
  • बकरी और शेर के न्याय की
  • याद दिलाते रहे
  • वे
  • जो मुझे मत्स्य-न्याय की
  • कथा सुनाते रहे
  • अब मैंने उन्हें दिखला दी हैं
  • उनकी दरिन्दगी की सीमाएं
  • दिखा दिये हैं वे बटखरे
  • जो
  • तराजू पर सबको
  • बराबर-बराबर तौलते हैं
  • छुला दी है
  • उस तेग की धार उन्हें

  • जो सबको बराबर-बराबर काटती है !
मैं आजाद हुई हूं !

तुम तो घर बन गये
  • काश !
  • तुम मेरा पड़ाव बन पाते
  • मैं पल भर जहां रूक
  • सांस ले
  • चल देती फिर से
  • अपनी मुहिम पर

  • पर
  • तुम तो घर बन गये
  • जिसमें मेरा
  • दम घुटने लगा

  • तुम तो
  • खूंटा बन गये
  • जिसे देख रूह कांपती है मेरी
  • इसलिए
  • मैं रूकती नहीं कभी
  • कह° भी !
मैं आजाद हुई हूं !

तुमने अपनी ईजल समेट ली
  • तुमने एक सपना रचाया था
  • सजाया था
  • उसके गिर्द
  • तुमने कल्पनायें रची थ°
  • प्यारी-प्यारी बातें सिरजी थ°

  • पौराणिक कथाओं से बिम्ब
  • परियों से शब्द
  • पंखों से रंग
  • पत्थरों से आकार
  • लेकर
  • एक चित्रा रचा था तुमने
  • तुम्ह° चितेरे
  • तुम्हीं चित्रा-पटी
  • उस पर तुम अपने ही सपनों का
  • अपना ही चित्रा आंक रहे थे
  • अपनी ही
  • सीरत भर रहे थे
  • ‘उसका’ नाम धर कर

  • चित्रा पूरा हुआ
  • रूप साकार
  • तुम्हारी उम्मीद के विरुद्ध
  • वह उस पर उकिर आई थी
  • यह तुम्हारी समझ और सहन
  • दोनों के बाहर था

  • तुम
  • अपने को देखने के अभ्यस्त
  • उसकी पुतलियों में
  • खोज रहे थे अपनी नजरें
  • तुम
  • अपनी मुस्कान पर मोहित
  • उसके होठों में खोज रहे थे
  • अपनी हंसी
  • तुम
  • अपना चेहरा देखने को व्याकुल
  • उसके मुंह पर टटोल रहे थे
  • अपनी छवि
  • तुमने
  • सपने गढ़े थे अपनी ही खातिर
  • पर
  • तुम्हारी कूचियों से वह उभर आई
  • तुम्हारी कल्पना की उड़ान में
  • तुम्हारे पंखों पर
  • वह कह° लदक गई

  • तुम्हारी बातें
  • तोता-मैना की कथा-सी
  • रोज एक ही इबारत दोहरात°
  • जीवन-कथा के बाहर की चर्चा-सी
  • तुम्हारे शब्द परियों से पारदर्शीध्
  • पारे से तरल
  • ठोस मिट्टी के रंगों की पकड़ से बाहर
  • पहचान से दूर
  • पौराणिक कथाओं के बिम्ब-से
  • महलों के खण्डहरों में भटकते
  • समय के अभिलेख थे
  • जो
  • नहीं ढँक पा रहे थे वर्त्तमान

  • वर्त्तमान ढँकने के लिए
  • चाहिए ताजा रंग
  • जो खून से ही मिल सकता है
  • मुर्दा यादों से नहीं
  • और
  • तुम यादों से ही
  • तस्वीरें रचने में पटु
  • रूप देने में माहिर
  • यादों को ढोने के आदी
  • अपनी सूरत न देखकर
  • घबड़ा उठे

  • तुमने रंगों से भरा प्याला
  • मुंह पर दे मारा उसके
  • वह रंगीला था
  • कोमल था वह प्याला
  • पर चोट करने में घातक था
  • तस्वीर -
  • हिल गई थी इस बार
  • रेखाएँ -
  • हट गईं थ°
  • घूम गईं थ°
  • तुम जिधर कूची फेंकते रंग भरी
  • लकीरें सरक जात°
  • तुम रंग उंड़ेलते खीझ कर जिधर-तिधर
  • लकीरें -
  • धब्बों के नीचे से चू जात°
  • देह का कोई न कोई कोना
  • उभरा ही रह जाता
  • उघड़ा ही रह जाता
  • मिट नहीं पाता

  • ऊब कर
  • तुमने कैन्वस ही फाड़ डाला
  • यह कह कर
  • कूची तोड़ डाली
  • ”यह मूरत तो अपना ही रूप उकेरती है
  • आपहुदरी है
  • बोलती है - डोलती है
  • सपनों में सशरीर जागती है
  • जड़ नह° - चलती है
  • मिट्टी का लोंदा नह°
  • कि जैसे चाहो ढाल लो“

  • और तुमने अपनी कूचियां समेट ल°

  • तुमने
  • एक-एक कर
  • चित्रा का अंग भंग करना शुरू किया
  • तुमने
  • सबसे पहले उसके पांवों को मिटाया
  • उसकी गति जकड़ी
  • एक बड़ा सा -
  • घृणा का धब्बा
  • उसकी जांघों पर पोता
  • उसकी कोख पर मथा
  • फिर उसके दूध में घोल दी स्याही
  • एकब-एक कर
  • उसके होंठ-
  • आंखें
  • पुतलियां
  • पलकें
  • भवें
  • केश कान माथा
  • गोया कि -
  • पूरे चेहरे पर कूची फेर
  • गोद दिया चेहरा
  • अपनी पुरानी आदत के अनुसार

  • गढ़ना-तोड़ना
  • खेलना-मिटाना तुम्हारी आदत है
  • वह ही पागल थी
  • जो अपना रूप अंकवाने बैठती रही
  • बारम्बार
  • तुम्हारे सामने नंगी होकर

  • पर इस बार
  • तस्वीर की रेखाएं
  • उसकी भंगिमाएं
  • जिंदा हो गईं थ°
  • आत्मा डोल गई थी
  • फितरत कांप गई थी प्रतिकार में

  • तुमने अपनी ईजल समेट ली
  • कूचियां तोड़ द°

  • तुम उसे और वह तुम्हे
  • अपने आप को प्यार करने का
  • दोष मढ़ते रहे
  • तुम्हारे रंग चूक गये
  • उसकी लकीरें फीकी पड़ गय° ...
मैं आजाद हुई हूं !

जीवन्त-क्षण
  • मैंने तो चन्द लम्हे तुमसे प्यार के माँगे थे--
  • उन्हीं की याद जीवन भर के लिए
  • काफी रही

  • मैं न खूंटों से बंधी हूँ कभी--
  • न बाँधा है मैंने किसी को
  • मैं अतीत को तोड़
  • वर्तमान से खेलने को
  • मचलती रही हूँ
  • मैंने जिन घड़ियों की
  • चाह की
  • मैं उन्हीं में तब तक के लिए
  • समा जाने की
  • राह ताकी हूँ
  • जब तक उनको जिया
  • उन्ही क्षणों को
  • जीने की साध में
  • सपनाती रही

  • तुम्हें देख ताजा हो गईं
  • आज पुरानी यादें
  • वह क्षण फिर उभर आए
  • जो कभी जिये थे
  • तुम्हारे साथ मैंने
  • जीवंत क्षण--

  • चाहे पल भर के लिए ही क्यों न हो
  • जिये थे हमने

  • प्यार में पगे
  • स्नेह में सने
  • जीवन से रंगे
  • स्वपनों से लदे
  • परिणय और प्यार की रेखाओं से लिपटे
  • छण-

  • जिये थे मैंने
  • जिये थे तुमने
  • साथ-साथ--
  • जीवन से भी लम्बे वे क्षण !!
(अब और तब )

तर्क
  • नहीं चाहिए मुझे तुम्हारा तर्क
  • चूंकि सदियों से तुम्हारे तर्क ने मुझे कुचला है,
  • और कैद कर लिया है मेरी सोच को पिंजड़े में
  • इसलिए नहीं मानूँगा तुम्हारा कोई भी तर्क
  • तुम्हारे तर्क ने
  • बेतरतीब-तर्क-हीन
  • ज़िन्दगी जीने को मजबूर किया है मुझे
  • इसलिए बिना तर्क जीना सीखूँगा
  • कि जन्म ले सके नई सोच!
  • तर्क-हीन होना नितान्त आवश्यक है
  • बदलाव के लिए
  • वरना राहत की मकड़ी क्रांति को
  • लपेटती रहेगी अपने तर्क जाल में!
  • तुम्हारी सोच आक्टोपस-सी
  • मुझे-मेरे मन-प्राण को
  • मेरे दिल-दिमाग को
  • लपेटती रही है अपनी कुलाचों में
  • अपनी अष्ट भुजाओं में
  • न जाने कित्ती सदियों से
  • कि मैं सोचना भूल चूका हूं।

  • मकड़ी को माँ-
  • आक्टोपस को बाप
  • और तुम्हारे बाघ-नख को भाग्य मानता रहा हूं मैं।
  • इसलिए भी बन्द कर देना होगा सोचना।
  • कि सोच सकूँ खुद मैं-
  • खोल सकू गांठे अपनी मुटि््ठयों से
  • अपनी पाँव से मंजिल तौल सकूँ
  • भर सकूँ बाहों में आकाश

  • तुम्हारे सब तर्क तुमने गढ़े थे अपने लिए
  • न्याय ?
  • न्याय की मत करो बात µ
  • उसकी परिभाषा भी तुम्हारी अपनी ही हैµ
  • और मर्यादाµ?
  • वह ठगनी हैµचेरी तो तुम्हारी है
  • इसलिए तुम्हारे लिखे मिटा दूँगा सभी अदेश
  • चूंकि मैं ही खुद निर्मित कर सकता हूँ अपना पिता
  • इसलिए तुम्हें नहीं कहूँगा पिता
  • खुद ही कर सकता हूँµअपनी माँ का सृजन
  • नहीं मानूँगा तुम्हें माँµ
  • मुझे कबूल नहीं है तुम्हें खुदा कहना
  • खुदा तो मैं हूँ
  • मैं स्वयं परम-ब्रह्म !
  • मैं रचूँगा नये-नये नियमµ
  • नये मूल्य

  • याद रखना
  • मैं सबको दूँगा बराबर का हिस्सा
  • तुम्हें भीµ
  • चूँकि मेरे हाथ रोटी से पले हैंµ
  • मिट्टी से बने हैं।
(प्रकृति युद्धरत है)