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आलेख

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दलित स्त्री का कब्जाकरण

डॉ. धर्मवीर का लेख ‘अस्मिता बनाम वर्चस्ववाद’ आपकी पत्रिका ‘कथादेश’ के बहस-खंड में पढ़ा। धर्मवीर जी का मैं बहुत आदर करती हूं। उन्होंने दलित आंदोलन को कई मायनों में आगे बढ़ाया है, खासकर आलोचना के माध्यम से कबीर पर शोध करके कबीर को दलित दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया है।

उन्होंने पुरुषोत्तम जी के लेख के जवाब में बहुत कुछ और लिखा है। मैं इन विषयों पर अलग से लिखना चाहूंगी। महिलाओं का प्रश्न छोड़ कर धर्मवीरजी ने जो भी लिखा है उसमें इस सत्य को कोई नहीं नकार सकता कि ब्राह्मणवादी वर्चस्ववाद था और है तथा आज भी वह दलित अस्मिता के प्रश्न पर बौखला जाता है। गैरदलितों को भी सोचना होगा कि इस प्रतिक्रया, प्रतिरोध या घृणा के लिए कौन जिम्मेवार है? इन विभेदों को मिटाने के लिए गैरदलित समाज सिर्फ़ दलित समाज से ही क्यों सवाल-जवाब करता है? क्या समाज में विभेद खत्म करना उनका दायित्व नहीं है। वे अपने समाज में क्यों बदलाव नहीं ला पाए? इसलिए न कि उनकी कथनी और करनी में अंतर है। दलित तो गैरदलित व्यवस्था की साजिश के शिकार हैं। अभी-अभी समझे हैं कि वह अस्पृश्य नहीं, नीच नहीं, बल्कि मनुष्य हैंµजो ग़ैरदलितों से किसी मायने में कम नहीं है, उन्हें कम बनाया गया है। ये स्मृतियां, आख्यान और उनका अतीत, उन्हें आक्रोश से भर देते हैं वास्तव में यही गुस्सा तो उन्हें गैर दलितों की घृणा का मुकाबला करने के लिए तैयार करता है। ये सच है कि वह उस व्यवस्था के खिलाफ खड़ा होकर जब तक बराबरी करने के काबिल नहीं होगा, तब तक गैर दलित मानस अपना रवैया नहीं बदलेगा चूंकि उसे इससे लाभ है। उसी तरह महिलाओं के प्रति गैरदलितों का दृष्टिकोण भी मनु का दृष्टिकोण है और दलित समाज भी अभी इस दृष्टिकोण से मुक्त नहीं हुआ है। पर दलित आंदोलन के नेताओं का दृष्टिकोण तो स्पष्ट होना चाहिए ताकि वे आंदोलन को स्पष्ट दिशा दे सकें।

पुरूषोत्तम अग्रवाल जी ने महिलाओं के बारे में धर्मवीर जी के आलेख से जो टिप्पणियां उद्धृत की हैं, वे धर्मवीर जी के अपने पारिवारिक कटु अनुभवों की कुंठा स्वरूप कही गईं लगती हैं। ये उनकी अपनी सोच हो सकती है पर यह डा॰ अम्बेडकर द्वारा चलाए गए दलित चिन्तन की सोच नहीं है। महिलाओं, खासकर दलित महिलाओं के बारे में अपनी ऐसी टिप्पणियों पर जे. एन. यू. में हुई एक सभा में पहले भी धर्मवीर जी दलित महिलाओं का मुखर विरोध झेल चुके हैं। अब वे पुनः अपने पूर्वसंस्कारों के प्रभाव में, जो मनुवादी व्यवस्था और मध्यम वर्गीय समाज की देन है, से ग्रस्त हो गए लगते हैं। अपने व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर उन्होंने पूरे दलित स्त्रा समाज को न सिर्फ घृणा, भय, उपेक्षा के लायक और कुलटा-कलंकनी तक के दायरे में लाकर खड़ा कर दिया है बल्कि दलित समाज को दलित नारी पर काबू पाने के लिए भी ललकारा है । यह तो डा॰ अंबेडकर की विचारधारा पर ही प्रश्न लगाने जैसा प्रयास है।

धर्मवीर जी एक दलित चिंतक हैं और वे डॉ. आंबेडकर के दर्शन को आगे बढ़ाने की इच्छा भी रखते हैं पर वे स्वतन्त्रा विचारक भी हैं। इसलिए उनके विचारों को डॉ अंबेडकर के विचारों की कसौटी पर कसकर ही परखा जा सकता है, गैरदलितों की कसौटियों पर नहीं, चूंकि महिलाओं के संदर्भ में गैरदलित समाज की सोच भी वही है जो धर्मवीरजी की है। अपवाद आचरण घटनाएं या हादसे समाज का प्रतिनिधित्व नहीं करते। हमारा बुद्धिजीवी अभी तक समाज पर प्रभावी नहीं हो पायाµवह तो बस अपवाद मात्रा बनकर रह गया है। वहां भी भारी छद्म है। बाहर कुछµघर में कुछ। धर्मवीर जी द्वारा दलित-दर्शन को आगे ले जाने की उनकी मुहिम के सिलसिले में यह जानना-समझना भी जरूरी है कि वे बाबा साहब के छोड़े हुए काम को पूरा करने हेतु अपने शोध या चिंतन के माध्यम से एक क्रांतिकारी दिशा देकर दलित अवधारणाओं को समृद्ध बना रहे हैं या अपनी स्वतंत्रा विचारधारा रखकर बाबा साहब की दी हुई दिशा के विपरीत चल रहे हैं। यदि वे दलित चिंतक के नाते ‘स्त्रा’ अथवा दलित मुद्दों पर अपने विचार प्रकट कर रहे हैं तो उन्हें बाबा साहब की दी हुई दिशा पर खरा उतरना होगा चूंकि दलित आंदोलन ने ये माना है कि दलित साहित्य की प्रेरणा का òोत बाबा साहब की विचारधारा ही है। इसलिए मैं गैरदलितों की विचारधाराओं, मान्यताओं या अवधारणाओं पर नहीं बल्कि बाबा साहब की अवधारणाओं पर ही उनकी सभी टिप्पणियों को कसना चाहूंगी।

उन्होंने अपने आलेख में कई मुद्दों पर अपना नज़रिया रखा है और पुरूषोत्तम जी के विचारों को चुनौती दी है। यहां यह भी देखना जरूरी होगा कि यह चुनौतीपूर्ण टिप्पणियां दलित आंदोलन के मान्य मापदंडों के अनुरूप हैं, जो तर्क आधारित होती हैं अथवा ये उनकी शंकाओं अथवा ग़ैरदलितों के अतीत में किए छल-कपटों के संदर्भ में आक्रोश या प्रतिक्रिया में की गई टिप्पणियां हैं। यह क्यों की गईं हैं या यह क्यों हो रहा है, उसे समझने के लिए जरूरी है कि गैरदलित इस आंदोलन के प्रति अपने दृष्टिकोण को दलित दृष्टि के साथ-साथ उनके प्रति मनोवैज्ञानिक विश्लेषण का दृष्टिकोण भी अपनाएं।

स्मृति या आख्यान का प्रभाव मनुष्य की पूरी कांशस पर बचपन से पड़ता है। दलितों के संदर्भ में तो उनके पूरे के पूरे समाज की कांशस को ही ऐसी हीन-ग्रंथियों से जकड़ दिया गया कि वह खुद को मनुष्य ही नहीं समझने लगा। अब आम दलित व्यक्ति या कार्यकर्त्ता के लिए एक रणनीति के तहत इससे उबरने के लिए आक्रोश के सिवा कोई तात्कालिक हथियार क्या हो सकता है? तर्कशील ब्राह्मण या अभिजात समाज तो अपने समाज को अब तक सुधार नहीं पाया, अब वे दलितों से उम्मीद करते हैं कि वे अपने समाज तथा खुद को तत्काले सुधारें। कैसे सुधारें? जातीय अहम् को तो बिना बल के तोड़ना संभव नहीं। गैरदलित आज अपने आक्रोश के जरिए बलवान बनने की कुव्वत हासिल करने के प्रयास में है। गैरदलित भी तो अपने पूर्वाग्रहों और संस्कारों से अभी पूर्णतयाः मुक्त नहीं हुए हैं, इसलिए वे अपनी सोच को उनपर लादने का सतत् प्रयास करते रहे हैं या कर रहे हैं। यही हाल दलित लेखकों, बुद्धिजीवियों या उनके नेतृत्व वर्ग का भी है। वे भी हिंदुवादी, पुरुषवादी सोच से मुक्त नहीं हो पाए हैं, इसलिए वे आज भी गैरदलित सोच की संकीर्णता को दलित आन्दोलन के बटखरों पर नहीं बल्कि गैरदलितों के संकीर्ण बटखरों पर ही तौलते हैं। गैरदलितों को धैर्य रखना पड़ेगा। दलितों का पांच हजार वर्षों के धैर्य का बांध अब टूटा है। जब बांध टूटते हैं तो विध्वंस होता ही है। इसके लिए तो सवर्ण समाज को ही पहल करनी चाहिए थी कि वे अपनी जातीय रूढ़िवादिता खत्म कर उनके लिए द्वार खोल देते, पर ऐसा हुआ नहीं। शायद ऐसा संभव भी नहीं था अपने संकीर्ण समाज को वे पहले दुरुस्त कर सकते थे चूंकि वह चैतन्य भी है और संख्या में कम भी। वह समाज पूरी आबादी का कुल दस प्रतिशत है पर जस का तस है। नब्बे प्रतिशत समाज पिछड़ा अज्ञानी, अस्पृश्य, दलित, अछूत व मलेच्छ के दर्जे पर रखा गया है। अब आप उससे उम्मीद करते हैं कि वह एकाएक उदार बन जाए! कैसे? इसके लिए दलितों का विश्वास जीतना होगा, उसे उपदेश देकर नहींµबल्कि उसे नेतृत्व में आगे बढ़ने में मदद देकर उसे अपनी दिशा खुद तलाश करने की छूट देनी होगी। गल्तियां कर करके वह अपना रास्ता स्वयं बना लेगा। दलित समाज कम से कम पूर्णतः डॉ अंबेडकर की अवधारणा को अपना सके, इसे सुनिश्चित करना होगा। गैर दलित इन अवधारणाओं को खुद पर लागू करके प्रेरित कर सकते हैं।

एक और मुद्दा जो आजकल धर्मवीर जी को बहुत प्रिय है वह है कि दलितों का भी एक अपना धर्म और भगवान होना चाहिए चाहे वह सौ पूंछ वाला हनुमान जैसा ही कोई भगवान क्यों न हो। इस विषय पर उन्होंने दिल्ली में एक गोष्ठी भी बुलाई थी। मैं उसमें नहीं जा पाई (हालांकि आमंत्रित थी) लेकिन उसकी पूरी रपट मुझे मिल गई थी। बाकी दलित लेखकों में इस विषय पर सहमति नहीं हो पाई और बिना निर्णय लिए ही बैठक समाप्त हो गई।

खैर, मैं पहले धर्मवीर जी की स्त्रा संबंधी टिप्पणियों पर अपनी बात रखना चाहूंगी, चूंकि ये टिप्पणियां बाबा साहब की अवधारणा के अनुरूप तो हैं ही नहींµवे अमानवीय और पुरुष मानसिकता की विकृतियों की प्रतीक भी हैं। श्री अग्रवाल द्वारा फरवरी-2002 के ‘कथादेश’ में छपे आलेख ने (1994, वाणी प्रकाशन) राजकिशोर द्वारा संपादित पुस्तक जिसमें ‘स्त्रा के लिए जगह’ वाला उनका आलेख भी शामिल है से चार उद्धरण पेश किए हैं, जिन्हें पढ़कर सचमुच बहुत ही दुख हुआ, क्योंकि उन जैसे बुद्धिजीवी दलित नौकर-शाह से ऐसे स्त्रा-विरोधी सिद्धांतों के प्रतिपादन की अपेक्षा नहीं थी। उनके तथाकथित सिद्धांत को डॉ. आंबेडकर के दलित आंदोलन का सूत्रा या हिस्सा तो कतई नहीं माना जा सकता। धर्मवीर जी की इन टिप्पणियों पर विश्लेषण करने के लिए हमें बाबा साहब द्वारा दिए गए दलित आन्दोलन के सूत्रों, मूल्यों और सिद्धांतों को समझना जरूरी है।

दलित की अथवा दलित साहित्य की परिभाषा, दलित आंदोलन के शिरोमणि (उनके समेत) जब करते हैं, तो वे उस परिभाषा का स्रोत बाबा साहेब आंबेडकर की विचारधारा को ही मानते हैं, जिसमें कतिपय निम्न सूत्रा महत्वपूर्ण और मुख्य हैं। (और भी सूत्रा हैं)

(क) समानता, भाईचारा, आजादी।

(ख) बाबा साहब की बाईस प्रतिज्ञाएं जो दीक्षा के समय उन्होंने सामूहिक रूप से लीं।

(ग) गौतम बुद्ध का ‘अप्प दीपो भवः’।

(घ) शिक्षा, संघर्ष और संगठन।

(ङ) गुलाम को यह अहसास करा दो कि वह गुलाम है तो वह मुक्त हो जाएगा।

(च) भारत के संदर्भ में वर्ग संघर्ष की बजाय वर्ण-संघर्ष के, प्राथमिकता देना यानी जाति-प्रथा से मुक्ति पाना जरूरी है।

(छ) जाति विहीन समाज की स्थापना के बिना स्वराज प्राप्ति का कोई महत्व नहीं।

(ज) जब हम दूसरे से छुआ-छात और भेदभाव मिटाने की बात करते हैं तो यह हमारी भी जिम्मेवारी हो जाती है कि हम अपने समाज में फैली जात-पात मिटा दें।

(झ) याद रखो हम अपने संघर्ष में तब तक सफल नहीं हो सकते जब तक हमारी महिलाएं उसमें भाग नहीं लेंगी।

(त) कानून लोगों के हित के लिए होता है और धर्म-निरपेक्ष होता है।

(थ) जमीन जोताने वाले की ही होनी चाहिए।

हम धर्मवीर जी की स्त्रा संबंधी टिप्पणियों को डॉ. अंबेडकर के सिद्धांतों पर परख कर ही यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि उनके ये विचार अपने हैं या दलित आंदोलन के हैं। जब धर्मवीर जी का स्त्रा के अधिकारों को कतरने की बात करनाµ वह भी दलित स्त्रा केµउन पर मनुवादी संकीर्ण सोच व मध्यम वर्गीय विकृतियों के प्रभाव के कायम होने का लक्षण है।

दलित आंदोलन किसी एक व्यक्ति की पाकेट में नहीं है, वह पूरे समाज की थाती है और मानवाधिकारों हेतु चलाया गया एक सामूहिक आंदोलन है बल्कि ये कहा जाना चाहिए ये राष्ट्रीय अभियान है। जो इसका विरोध करता है वह समाज या व्यक्ति आज की मानवीय परिभाषा में सभ्य नहीं कहला सकता।

क्या धर्मवीर जी बाबा साहब की इस विचारधारा को नकार नहीं रहे हैं? धर्मवीरजी ने पूरे दलित स्त्रा समाज को अनपढ़, गंवार, कुलटा, बेवफा या दगा देने वाली परजीवी, जिम्मेदारी न निभाने वाली, पति को भ्रष्टाचारी बनाने वाली, वेश्या बनकर मर्दों के घर उजाड़ने वाली, निकम्मी या यौन क्रिया के लिए आतुर कामुक स्त्रा के रूप में पेश किया है। वे स्त्रा के चरित्रा व नैतिकता को उसकी शुचिता, पति परायणता और वफादारी, व स्वामिभक्ति की शर्तों पर परिभाषित करते नजर आते हैं। उनकी नजर में स्त्रा एक वस्तु हैµया मिट्टी का लांदा है, जिसे पुरूष के अनुरूप ढलना होगा। सवर्णों के पुराणों, शास्त्रों, धर्मग्रन्थों व मनु की आचारसंहिता में भी धर्मवीर जी द्वारा कही गई बातों का प्रावधान पहले से ही मौजूद है। तो क्या धर्मवीर जी मनु द्वारा निर्धारित स्त्रा संबंधी इस संहिता को लागू कराना चाहते हैं कि स्त्रा पर पिता, पुत्रा, भाई और बेटों का ताजिन्दगी अधिकार और वर्चस्व कायम रहना चाहिए, वह कभी स्वतंत्रा नहीं रह सकती? क्या तुलसी का यह दोहाµ

‘शूद्र, गंवार, ढोल पशु नारी ये सब ताड़न के अधिकारी’µ

धर्मवीर जी को स्वीकार्य है? इस प्रकार क्या वे हिंदू धर्म की ‘माया, कुटनी’; ईसाई धर्म की ‘आदम की पसली’ और इस्लाम की, ‘दो औरतों की गवाही एक पुरुष के बराबर’; मनु की संहिता किµ ‘सौ औरतें मिलकर भी एक पुरुष के बराबर नहीं होतीं’ की अवधारणा की पुष्टि नहीं करते हैं।

विश्व के पुरुष समाज ने सैक्स का समान अधिकार मांगने वाली या प्यार का अधिकार मांगने वाली स्त्रा को कुतिया (ठपजबी) कहकर तो पुकारा ही है, साथ ही सभी गंदी गालियां भी औरतों के यौन अंगों को लेकर गढ़ रखी हैं। क्या धर्मवीर जी उसी सोच में इजाफा नहीं कर रहे?

क्या ये सब ब्राह्मणवादी और पुरुषवादी सोच का समर्थन नहीं है? क्या उनका कथन बाबा साहब के इस सिद्धांत को भी चुनौती नही कि ‘‘किसी भी समाज के विकास का मापदंड उस समाज में स्त्रा की स्थिति और अधिकारों के प्रावधानों से ही मापा जा सकता है’’ अथवा यह उक्ति किµ ”याद रखो हम अपने संघर्ष में तब तक सफल नहीं हो सकते जब तक हमारी महिलाएं भाग नहीं लेंगी?’’ भारतीय मानसिकता और संस्कृति के सदंर्भ को देखते हुए तो यह मानना पड़ेगा कि स्वतन्त्राता हासिल किए बगैर या अपनी अस्मिता का स्वयं निर्माण किए बिना सशक्त हो कर स्वयं निर्णय की शक्ति और समझ प्राप्त किए बगैर स्त्रियां किसी भी राष्ट्रीय व सामाजिक अभियान में नेतृत्व तो क्या भागीदारी भी नहीं कर पातीं। पुरूष उसे इसकी इजाजत ही नहीं देता। कामगार महिलाओं के क्रोध से कुछ तबके ट्रेड यूनियन के माध्यम से जरूर मुखर हुए हैं पर सामाजिक स्तर पर अपवाद स्वरूप कुछ महिलाओं को छोड़कर वे अपनी स्वतंत्रा अस्मिता बनाने में वे भी सफल नहीं हो पाएं। पुरूष के ‘कब्जे या वर्चस्व’ में रहने वाली औरत पर बाबा साहब की उपरोक्त उक्ति कैसे लागू होगी? कौशल्या बैसंत्रा के ‘दोहरा अभिशाप’ आत्मकथात्मक उपन्यास में ऐसी कई दुःखद स्थितियों का वर्णन है जहां दलित पति या पुरूष ने दलित महिला एक्टीविस्ट को भी स्वतंत्रा होने से रोका है और उसके यौन शोषण का प्रयास भी किया है। बाबा साहब के आन्दोलन के दौरान ऐसी त्रासदियां, आंदोलनरत दलित महिलाओं ने भी झेली है। यह पुरुष मानसिकता का फल है।

धर्मवीर जी के तर्कानुसार बाबा साहब का समानता, आजादी और भाईचारे का सूत्रा औरतों पर लागू नहीं होगा। हिन्दू धर्म में भी तो स्त्रा के प्रति यही सोच व्याप्त है।

उनके इस तर्क के अनुसार तो दलितों का लक्ष्य सवर्ण समाज से मुक्ति पाने के दायरे से औरत को बाहर करना हो जाएगा।

क्या औरत के एशो-आराम के समान के लिए पति पर आर्थिक दबाव डालना ही क्या भ्रष्टाचार का एकमात्रा कारण है? क्या तहलका काण्ड के बंगारू लक्ष्मण या हवाला कांड के नरसिंह राव, चीनी घोटाला के स्व. कल्पनाथ राय, सूटकेस कांड के हर्षद मेहता या यू. टी. आई. घोटाले के भाजापाई मंत्रा अथवा टेलीफोन घोटाले के सूत्राधार सुखराम जैसे सभी नेता अपनी पत्नियों के चलते भ्रष्टाचारी बने थे अथवा राजनीति पर अपना कब्जा जमाने, वर्चस्व बढ़ाने हेतु धन जमा करने के चलते? पैसे की हवस भी एक कारण हो सकती है। यह तो सर्वविदित तथ्य है कि भ्रष्टाचार पूंजीवादी या सामंती व्यवस्था के कारण ही पनपता है और इस सोच की जद में पूरा समाज आ जाता है। उसमें भी पुरूष ज्यादा जिम्मेदार है। स्त्रा को तो पति की अनुगामिनी बन कर ही रहना होता है। इस भ्रष्टाचार के पीछे दूसरा सबसे बड़ा कारण है हिंदू धर्म। भारतीय संस्कृति व मानसिकता भी भ्रष्टाचार की जनक और जिम्मेवार है क्योंकि उसकी सोच में ‘लाभम् शुभम्’ का फार्मूला या सिठ्ठांत सर्वोपरि है। पूंजीवाद का सिठ्ठांत भी यही है। भारतीय हिन्दू सोच में भगवान का एजेंट ब्राह्मण पुजारी स्वर्ग चाहने वाले हिंदू भक्तों को अपनी मार्फत भगवान को भेंट, चढ़ावा व उपहार के रूप में घूस दिलवाकर प्रसन्न रखने में विश्वास रखता है समाज के हित का कोई प्रसंग ही नहीं है उस पूजा अर्चना में।

क्या औरत का रोटी, कपड़ा और मकान की सुरक्षा मांगना भ्रष्टाचार का प्रेरक कहा जा सकता है? इस भ्रष्टाचार के लिए औरत कैसे जिम्मेवार है? पुरुष इतना कमजोर तो नहीं होता कि वह बहकावे में आ जाए। दूसरों को फुसलाने व बहकाने की आदत तो पुरुषों की आदत रही है। यह तो मात्रा उसका बहाना है। ऐसे भी, अपवाद कभी प्रमाण नहीं माने जाते।

धर्मवीर जी से मेरा नम्र निवेदन है कि वे अपने निजी जीवन में पति के नाते अपने साथ हुए कड़वे अनुभवों व कुंठा के आधार पर अपने दृष्टिकोण को सम्पूर्ण दलित स्त्रा समाज पर न लादें। वे अभिव्यक्ति की आजादी अथवा किसी व्यक्ति की आजादी चाहे वह स्त्रा हो या पुरूष का हक छिनेन का प्रयास न करें बाबा साहब ने इसी स्वतंत्राता की तो मुहिम चलाई थी जिससे दलित स्त्रा व दलित समाज को वंचित कर रखा था ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने। धर्मवीर जी ने शायद इन सिठ्ठान्तों को अपने अनुरूप अपनी सुविधा हेतु गढा़ है।

मैं उनके परिवार का उदाहरण इसलिए नहीं दे रही कि उनके परिवार की औरतों को मैं दोषी मानती हूं। मैं ये उदाहरण महज इसलिए दे रही हूं कि मुझे ऐसा लगता है कि धर्मवीर जी के ऐसे रवैये के ही कारण उनके परिवार के लोगों ने उनके विरुठ्ठ विद्रोह किया होगा। अगर ऐसा हुआ है, तो यह सरासर ठीक और सही है। मुझे तो इस पूरी बहस में लगता है कि पक्ष और विपक्ष के पुरुष अखाड़ों में भैंसे की तरह औरत को विषय बनाकर भिड़ रहे हैं और उन्होंने औरतों को पूछना भी मुनासिब नहीं समझा कि उनकी राय क्या है? इस बहस में औरतों का शामिल होना, खासकर दलित औरतों की भागीदारी बहुत जरूरी है चूंकि सवर्णवादी औरतें भी अधिकतर अपने सवर्ण पुरुषों की सवर्ण सोच की अनुगामिनी होती हैं। वे प्रायः पुरातणतावादी सोच को मानती हैं और उसे कायम रखने में भागीदार भी होती हैं। दलित स्त्रा के प्रति उनका दृष्टिकोण केवल लिंग साम्यता का न होकर जातीय आधार पर भी होता है। दलित औरत मरद से पिटने के बावजूद भी परिवार को पालती ही नहीं बल्कि उस पीटने वाले पुरुष को भी पालती है और जरूरत पड़ने पर वह उसके विरोध में खड़ी भी हो जाती है। अपवाद स्वरूप ही स्वर्ण या अभिजात स्त्रियां ऐसा कर सकतीं हैं, वह भी शहरों में।

पतिव्रता की मांग के साथ क्या पत्नीव्रता की मांग नहीं उठेगी? पता नही धर्मवीर जी कितने पतिव्रत हैं? औरत की शुचिता की गारंटी तो वे चाहते हैं फिर पुरुष की शुचिता को भी तो उन्हें स्वीकारना होगा। इस पर वे कितने खरे उतरेंगे ये तो वे ही जानें। उन परµ‘पर उपदेश, कुशल बहुतेरे’ की उक्ति भी लागू हो सकती है। पुरुष कृष्ण कन्हैया बना रहे या राजा महाराजा की तरह रनिवासों या हरमों में स्त्रियों का इजाफा करता रहे अथवा शर्मा की तरह नैना साहनी को आग में जला दे और औरत उसके खिलाफ बोले भी न, ये बात तर्कसंगत तो है ही नहीं, न ही स्वीकार्य है। धर्मवीर जी औरत के संदर्भ में अथवा दलित आन्दोलन को संकीर्णता के दायरे में लाकर हिन्दुत्व की वर्चस्ववादी सोच का प्रतिपादन कर रहे हैं और औरत से अभिव्यक्ति की आजादी भी छीन रहे हैं। उनकी इस सोच में समानता या भाईचारे का तो सवाल ही नहीं उठता।

धर्मवीर जी ने अच्छी दलित नारी की भी चर्चा की है। अब पुरूष दृष्टिकोण में तो अच्छी नारी वही हो सकती है जो ‘पिया के मन को भाए’। जो न भाए वह बुरी या कुलटा। क्या यह एकतरफा सोच नहीं है अर्थात औरत का मानदण्ड उसका ‘पिया’ ही हैµउसका सामाजिक या राष्ट्रीय दायित्व नहीं।

धर्मवीर जी ने बार-बार बा्रह्म-विवाह के संदर्भ में व्यभिचार का प्रश्न उठाया है। व्यभिचार शब्द शास्वत नहीं है संन्दर्भों में देश-काल में, इतिहास में इसके अर्थ बदलते रहे हैं। यह हर एक देश में ‘राजा’ और सामन्ती व्यवस्था का और उसके विस्तार का एक सशक्त हथियार भी रहा है। बाहरी देशों में यह केवल लिंग और आर्थिक विभेद पर आधारित थाµसामाजिक विभेद पर नहीं। हां, भारत में सामाजिक वर्ण व्यवस्था भी इसके दायरे में ले आई गई है। कोई भी विचारधारा कभी शाश्वत नहीं होती। वह तो समय के साथ विकसित और बदलती रहती है। वह सापेक्षिक होती है और ‘बहुजन हिताय’ विचारधारा को ही प्रायः समाज लागू करता है, भले उस विचारधारा के प्रवक्ता या पिता के मरने के बाद उसे लागू करे, जैसे प्रायः हर धर्म खासकर इसाई धर्म के साथ हुआ है।

दरअसल अलग-अलग देशों में ‘व्यभिचारी’ शब्द पुरूषों ने औरतों के सन्दर्भ में ही गढ़ा है। उन्होंने खुद को इस दायरे से बाहर रखा है। मातृसत्ता की समाप्ति के बाद स्त्रा की गुलामी पितृसत्ता का परिणाम है। विवाह उस गुलामी की शुरूआत है तो परिवारिक बन्धन उसका पिंजड़ा है, जिसमें वह केवल वह सदियों से अनुशासन के नाम पर कैद है। विभिन्न समाजों मेंµधर्मों में, पुरूष समाज ने स्त्रा के लिए बनाई गई आचार संहिताओं पर धर्म की मोहर लगा दी लेकिन पुरूष वर्ग को उस धार्मिक अनुष्ठान से मुक्त रखा। पूरी हिन्दू फिलास्फी में केवल ‘राम’ को एक पत्नी वाला दर्शाया गया है बाकी सब तो बहुपत्नीक कृष्ण कन्हैया रहे हैं। उसी के अनुरूप द्विजों ने अपने पुरूष हित के लिए जिसे धर्मवीर जी केवल औरत के संदर्भ में जारकर्म मानते हैंµ(हालांकि मैं इसे नहीं मानती चूंकि ये एक तरफा केवल स्त्रा के संदर्भ में लागू होता है) उसकी छूट दे रखी थी। यह तो बहुत बाद में भारतीय कानून में इस छूट पर रोक लगी, जो सवर्ण और दलित दोनों पर लागू है। ऐसी छूट केवल हिन्दू समाज में नही बल्कि विश्व भर के समाजों में व्याप्त थी और अब भी है। उसमें दलित वर्ग भी शामिल है। आज भी मध्यप्रदेश की एक जाति विशेष में बड़ी लड़की को पांव में घुंघरू बांध कर वेश्या बनाने के लिए उसके दलित माता-पिता ही प्रेरित करते हैं।

धर्मवीर जी को यह चिन्ता भी सता रही है कि सवर्ण स्त्रा पति के साथ रहते हुए भी व्यभचारिणी रह सकती है चूंकि उसे तलाक की सुविधा नहीं हैं। दलित स्त्रा को चूंकि तलाक देने की सुविधा है इसलिए उसका पति उसे तलाक दे कर सजा दे सकता है। वे यह अच्छी तरह जानते हैं कि आज के कानून में तलाक की यह सुविधा दलित स्त्रा को सवर्ण स्त्रा के समान ही प्राप्त है, भले दलित समाज ने अपनी स्त्रियों को पहले से ही सम्बन्ध विच्छेद की छूट दे रखी है। वे ये कहना भूल जाते हैं कि सवर्ण स्त्रा जहां पुरूष के व्यभिचारी होने पर भी उसके खूंटे से बंधे रहने को मजबूर होती रही है वही दलित स्त्रा पति के आचरण से तंग आकर दलित समाज के नियमों के अनुरूप उससे फारख़ती (सम्बन्ध विच्छेद) करने को स्वतंत्रा है। दलित नारी को मिली यह छूट तो दलित समाज की स्त्रा के अधिकारों के प्रति संवेदनशीलता तथा समानता का प्रतीक है। क्या वे व्यभिचार के नाम पर हिन्दू धर्म में व्याप्त स्त्रा के प्रति किए गए अन्याय को दलित स्त्रा पर थोपना चाहते हैं?

दरअसल व्यभिचार शब्द ही भ्रामक है। डा॰ लोहिया ने कहा था कि ”बलात्कार से बेहतर व्यभिचार होता है चूंकि उसमें दोनों की सहमति होती है।“ व्यभिचार को आधार बना कर अधिकतर ऐसे पुरूष ही स्त्रा को तलाक देते हैं जो या तो अपनी पत्नी से किसी न किसी क्षेत्रा या हर क्षेत्रा में उन्नीस होने के कारण सदैव हीन-भावना से ग्रसित होते हैं अथवा अपनी नपुंसकता का दोष अपनी पत्नी पर मढ़ कर उसे कामुक-कुलटा कह कर अपने पुरूषार्थ का डंका पीटते रहने से सन्तुष्ट होते हैं।

ऐसे भी यदि दो व्यक्तियों या मित्रों का आपस में एक साथ रहना संभव न हो तो उन्हें अलग होने का अधिकार व्यक्ति-स्वतन्त्राता के दायरे में आता है, जिसका पुरूष समाज उपयोग भी करता है। पुरूष समाज में तो सम्पत्ति के सवाल पर पिता-पुत्रा, भाई-भाई, चाचा-भतीजा, मामा-भग्ना तक में बंटवारा होता है। कभी-कभी बंटवारे का या अलगाव का विवाद हत्या की हद तक भी पहुंच जाता है। यह प्रवृत्ति सवर्ण और दलित समाज ही नहीं बल्कि विश्व भर के समाज में चाहे वह कितना भी उच्च सभ्यता का दम भरता है, प्रचलित है। तब मन न मिलने पर या पति द्वारा जुल्म किए जाने पर केवल स्त्रा के संदर्भ में ही सम्बन्ध विच्छेद की छूट को व्यभिचार बढ़ाने वाले या उसके लिए सजा का प्रतीक कैसे माना जा सकता है? अलग होने का अधिकार तो दोनों के लिए समान होना चाहिए, स्त्रा के लिए ही नैतिकता की दुहाई देकर हम उसे इससे वंचित करने की मुहिम क्यों चलाएं? बाबा साहब अम्बेडकर ने स्त्रियों के हक के लिए ही नेहरू से मतभेद होने पर कैबिनेट से त्याग पत्रा दे दिया था?

फिर द्विजों में व्याप्त बुरी प्रवृत्तियों की मिसाल देकर हम दलित समाज की तुलना क्यों करें? दलित आन्दोलन का लक्ष्य तो उसे हीन-भावना और द्विज मानसिकता से मुक्ति दिलाना है, उनके अनुरूप बनाना नहीं। औरत के व्यभचारिणी होने की संभावना पर धर्मवीर जी इतना तिलमिला रहे हैंµपर पुरूष के व्यभिचार पर चुप क्यों हैं? बहु विवाह की प्रथा सवर्ण-दलित दोनों ही समाजों में प्रचलित है। यह सामाजिक समस्या है केवल स्त्रा पर दोष मढ़ना उचित नहीं है। उन्हें नहीं मालूम कि 99» महिलाएं पुरूषों के व्यभिचार की शिकार होती हैं और पुरूष समाज (पिता, भाई, बेटा समेत) उसे विरोध भी नहीं करने देते। पिता तक के भी अपनी बेटी से व्यभिचार के किस्से कम नहीं हैं। पति अपनी पत्नियों को अपनी तरक्की के लिए ऊंचे अफसरों के यहां ले जाए तो व्यभिचार नहीं, औरत अपने विकास के लिए किसी पुरुष से सहयोग ले या सहवास करे तो व्यभिचार? वाह क्या न्याय है! नयना साहनी बनकर तंदूर में जले औरत?

धर्मवीर जी ने खुद माना है कि ब्राह्म-विवाह के कारण तीन हजार वर्षों से सवर्ण स्त्रा जारकर्म करती रही है। पर वे सीता सावित्रा का दृष्टांत भूल जाते हैं। सीता एक ठ्ठिज स्त्रा थी जिसे झूठे आरोप के कारण जमींदोज होना पड़ा था। क्या धर्मवीर जी दलित आन्दोलन को केवल स्त्रा व्यभिचार को रोकने की मुहिम ही समझते हैं? या मनुष्य मात्रा की मुक्ति कीµविशेषकर दलितों कीµजिसमें स्त्रा भी शामिल है?

व्यभिचार मनुष्य की प्रवृत्ति हो सकता हैµकई समाज उसमें बाधक होते हैं, कई उसे बढ़ावा देने वाले। उसे रोकना या न रोकना, न तो धर्म का ठेका है और न ही केवल पुरूष समाज का। वह तो स्त्रा और पुरूष दोनों की परस्पर समझदारी, संवेदनशीलता या समझौते का अंग हो सकता है। यह दोनों पर लागू होता है। फिर औरत की इच्छा के बिना उसे किसी एक खूंटे से बांधे रखना कहां तक उचित है? यह भी तो अन्याय है।

पुरुष का दस जगह मुंह मारना और फिर भी कलंकित न होना जायज ही नहीं उसके पौरुष का प्रतीक माना जाता है! अच्छा होता यदि धर्मवीर जी व्याभिचारी प्रवृतियों पर पुरुष व स्त्रा दोनों की कमजोरियों को मनोवैज्ञानिक और मुनष्य की आदिम प्रवृत्तियों के संदर्भ में खोज के कोई समाधान पेश करते, और फ्रायड को विकसित करते, न कि सामाजिक स्तर पर देते एक कठमुल्ला की मानिंद फतवा। इस बात को धर्मवीर जी नकार नहीं सकते कि मनुष्य मात्रा के भीतर सैक्स की प्रवृत्ति कोई नई बाहरी वस्तु नहीं है। यह भी भूख व नींद की तरह ही स्वभाविक है। मनुष्य के अस्तित्व में आने के साथ ही ये प्रवृत्ति आई है तभी सृष्टि का सृजन हुआ है। यह उसका गुण है विकृति नहीं। सभ्यताओं ने इसे अनुशासित करने की चेष्टा की और इसी क्रम में मनुष्य की वर्चस्ववादी प्रवृत्ति के तहत पुरूष समाज ने धर्म का सहारा लेकर केवल औरत पर ही सब निषेध लागू कर स्वंय को इस अनुशासन से मुक्त रखा है आज इसी पर विवाद है।

बलात्कारी पुरुष, बलात्कार को पौरुष की निशानी मानता है और समाज का एक बड़ा प्रभावशाली पुरुष तबका भी उसे मौज मस्ती कह कर टाल देता है या हंस देता है। लेकिन वही समाज (स्त्रियों समेत) चूंकि वे भी उसी पुरूषवादी सोच के प्रभाव में हैंµबलात्कृत औरत को दोषी ठहराता है, पुरुष को कुछ नहीं कहता। धर्मवीर जी भी दलित औरतों पर काबू पाने की बात इसी पुरूष शाऊनिज्म तथा मनुवादी अचारसंहिता के तहत कहते नज़र आते हैं। यानी हिंदू समाज जिस वर्चस्ववादी, अधिकारवादी और नीत्से की सुपर ह्यूमन की अवधारणा तथा डार्विन का ‘समर्थ ही जिएगा’ के सिद्धांत को प्रतिपादित करता है, धर्मवीर जी भी उसी तर्क को पुष्ट करते हैं। दलित विचारधारा का ‘समानता का सूत्रा’ स्त्रा के संदर्भ में न जाने वे कैसे भूल गए, मुझे उनकी इस समझ पर आश्चर्य हो रहा है। औरत का अस्तित्व ही गायब है। कहीं है ही नहीं औरत। शायद धर्मवीर जी औरत को मनुष्य भी नहीं मानते होंगे क्योंकि उनके जैसी ऐसी सोच वाले धर्म-पुरूष भी औरत को मनुष्य नहीं मानते। उसे कुटनी, माया, न जाने क्या-क्या कहते हैं। औरत के प्रति अपनी ललक, लालसा व हवस या आकर्षण के लिए भी वे औरत को ही दोषी ठहराते हैंµ पुरूष को नहीं। दलित औरत का विश्लेषण करते समय धर्मवीर जी ये भूल जाते हैं कि जितना दलित औरत अपने मरद के साथ कंधे से कंधा मिलाकर बराबर काम करती है और घर को कमाकर देती है वैसा दूसरे समाज की औरतें नहीं करतीं।

क्या वे ब्राह्यणवादी सोच के अनुरूप खटने कमाने वाली, श्रम के महत्व को परखने वाली, स्वावलम्बी औरत के दलित समाज प्रदत्त अधिकारों को महज इस तर्क पर समाप्त करना चाहते हैं कि द्विजों द्वारा प्रदत्त ब्राह्म विवाह के चलते सवर्ण स्त्रियां सदियों से पति के साथ रहकर जार कर्म कर आनंद उठाती रही हैं। उनके अनुसार वे तलाक तो नहीं ले सकतीं थी, इसलिए वे तालाक की सजा भी नहीं भोगती थीं। उनके अनुसार दलित समाज की स्त्रा का व्यभिचारी होने पर तलाक हो जाता हैµजिसे वे उस स्त्रा के लिए सजा मानते हैं। उनका ये कथन प्रथमदृष्या असत्य है। मनु ने किसी स़्त्रा को इसकी छूट नहीं दी थी। मेहनतकश समाज ने खुद अपनी छूटें लीं या ढीलें दीं है, एक व्यवहारिक व उदार समानतापरक दृष्टिकोण अपनाने के चलते। ये तो आज के कानून में तलाक का प्रावधान है जो सवर्ण और दलित दोनों स्त्रियों पर लागू होता है। मनु ने तो इसका प्रावधान ही नहीं किया था। दलित समाज में औरत के आत्मनिर्भर होने की इन विशिष्टताओं ने ही औरत को मतभेद अथवा मनभेद होने पर या जुल्म किए जाने पर पुरुष के साथ वैवाहिक संबंधों को तोड़ने की आजादी भी दिलवाई, जिसका वह उपयोग करती है। दलित औरत विधवा होने पर सती न होकर पुरूषों की तरह ही अपनी नई जिन्दगी शुरू कर सकती है। क्या ऐसी छूटों को धर्मवीर जी अनुचित मानते हैं? ये छूटें सवर्ण समाज की औरतों को प्राप्य नहीं है। क्या वे उस हिन्दू सोच को सर्टिफिकेट नहीं देते जिसे सदियों से हिन्दुओं का समाज खासकर मध्यवर्गीय या सामन्ती समाज गौरवान्वित करता आया है और औरतों पर जुल्म ढाता रहा है? वह समाज उसे जिंदा जलाता रहा है या वेश्या बना कर बेचने में जिम्मेदार ही नहीं, भागीदार भी रहा है। इसमें दलित समाज भी शामिल है। हां दलित समाज की औरतें आर्थिक तंगी के चलते इस पेशे में आती हैं या परिवार द्वारा बेची जाती हैं अथवा वेश्यागिरी करती हैं सवर्ण औरतों की तरह सामाजिक जुल्मों या बंधनों के चलते नहीं।

बलात्कार के संदर्भ में सवर्ण औरत और दलित औरत ही नहीं पति समेत उसके परिवार का नजरिया भिन्न होता है। दलित औरत बलत्कृत होने पर बलात्कार को जुल्म मानती है और अपनी सहमति के नकार को पुरूष द्वारा जबरन लादा हुआ यौन संबंध मानती है। न वह और न ही उसका पति व परिवार उसकी शुचिता के भंग होने के कारण अपवित्राता या अपराध-बोध से ग्रसित होते हैं। हां ‘इज्जत’ जाने की बात वे भी करते हैं, पर इस ‘इज्जत’ में केवल शुचिता या अपवित्राता का बोध नहीं है। इस ‘इज्जत’ के अहसास में स्त्रा की इच्छा-मर्जी यानी अस्मिता के नकार का दुःख ज्यादा मुखर होता है। वे ‘इज्जत’ लूटने वाले को जुल्मी कहते हैं, जिसकी इज्जत लुटी उसे बहिष्कृत नहीं करते। इसलिए दलित समाज में ‘इज्जत’ शब्द में स्त्रा की अस्मिता भी शामिल है केवल पुरुष, परिवार या पति की नहीं।

सवर्ण समाज में, ‘स्त्रा’ संपत्ति मानी जाती है इसलिए उनकी नजर में स्त्रा की ‘इज्जत लुटना’ पति या पुरुष की ‘इज्जत’ लुटना ही समझा जाता है। सवर्ण समाज में औरत ही अपराधी व अपवित्रा मानी जाती है। केवल पुरुष अस्मिता तिलमिलाती है। स्त्रा तो अस्मिता-हीन, बेनाम, भाई, पति, बेटा, पिता या गांव के नाम से जानी जाती है। दलित समाज संगठित होता है तो उसका विरोध करता है लेकिन अधिकांशतः हिन्दुवादी भाग्यवादी सोच के प्रभाव अथवा बलात्कारियों के डर के कारण वह इसे नियति मानकर चुप्पी भी साध लेता है। पर अब वह समाज जागृत हो रहा है और उसका संगठित विरोध करने लगा है।

सवर्ण समाज की महिला के बलात्कार का मामला मीडिया खूब उछाल कर उसे न्याय दिलाता है लेकिन दलित समाज की महिला पर या तो चुप्पी साध लेता है या उसे ही दोषी कहता है। देओल और भंवरी बाई के दृष्टांत जग-जाहिर हैं, जब न्याय पालिका ने भी सवर्ण मानसिकता से ग्रस्त होकर दो तरह के फैसले दिए। बलात्कृत दलित औरत के लिए छिपकर घर में बैठ कर बिसूरना न ही संभव है, न व्यावहारिक ही। उसे तो घटना के दूसरे-तीसरे दिन ही कमाने खाने के लिए जाना पड़ता है तभी घर का गुजारा चलता है। शुचिता या पवित्राता आधारित विकृत और लग्ज्यूरियस सोच तो सवर्ण या मनु महाराज का पुरुषवादी तथा मध्यमवर्गीय समाज ही अफोर्ड कर सकता है जो औरत को संपत्ति या नुमाइश की चीज मानता है, स्वावलम्बी या संगी नहीं।

जहां तक नाजायज़ संतान का सवाल है तो क्या नाजायज बच्चा मनुष्य नहीं है? उसके पिता या माता ने किसी समाज के कानून या आचार संहिता के विरूठ्ठ कोई आचरण किया तो क्या टैस्ट करवाकर यह बताया जाना जरूरी है कि वह नाजायज है? क्या यह बच्चे के प्रति अन्याय नहीं होगा? क्या इस संतान को जीवन भर के लिए हेय बना दिया जाना सही होगा? उसे अपनी नजरों से गिरा दिया जाना जायज है क्या? कम से कम शरण कुमार लिम्बाले की ‘अक्करमाशी’ पढ़कर तो धर्मवीर जी ने सबक ले लिया होता। उन्हें यह मालूम होना चाहिए कि पितृत्व मात्रा विश्वास पर आधरित है लेकिन मातृत्व एक सत्य होता है। वह बच्चा अपनी मां की संतान हैµक्या इतना प्रमाण काफी नहीं है पुरुष के लिए? उस पर पिता की ही मोहर क्यों लगे? क्या वह पुरूष जो दूसरी स्त्रियों के गर्भ में अपना बीज डालते हैं, दोषी नहीं हैं? पुरुष ने क्यों किया संभोग? संस्कृति के केन्द्र में केवल जारकर्म, व्यभिचार जैसी छद्म नैतिकताएं मात्रा ही नहीं हुआ करतीं। उसमें प्रेम मुख्य होता है। दरअसल प्रेम के ही विरोध में पुरूष प्रभुत्व ने स्त्रा के लिए व्यभिचार का शब्द गढ़ा होगा, चूंकि वे स्त्रा से प्रेम नहीं बल्कि उस पर केवल अपना वर्चस्व बनाए रखना चाहते थे। सच्चा प्रेम करने वाले कई प्रेमी जोड़ों के नाम आज भी जनमानस में गूंज रहे हैं। चरित्रा का अर्थ ईमानदारी, दयानतदारी, निष्ठा, वीरता-बहादुरी, लगन, प्रतिबठ्ठता, संवेदनशीलता के गुण होना तथा ठगी या धोखेबाजी आदि न करना होता है और होता है सिठ्ठांतों के साथ समझौता न करने का दम। यौन सम्बन्धों को ही चरित्रा मानना तो विकृत पुरूष समाज की देन है चूंकि वह स्वभाव से ही स्वार्थी और वर्चस्ववादी होता है।

एक औरत 10-20 बच्चे पैदा करके पति परायण बन कर देश, समाज व गांव से विमुख व अनजान होकर सजी संवरी बैठी रहे और एक वेश्या समाज के हित में अपना सर्वस्व लुटा कर कुर्बान हो जाएµइसमें किसे बेहतर माना जाएगा? मेरी नजर में उस जागरूक वेश्या को, जो समाज पर सर्वस्व न्यौछावर करने को उद्यत है। उसे पुरूषों ने ही वेश्या बनाया होता है। यदि पुरूष वेश्या के पास न जाएं तो औरत वेश्या बन ही नहीं सकती। क्या उन्हें वेश्याएं घर से बुला कर ले जाती हैं या वे स्वंय दलालों और कॉलों के माध्यम से उन्हें बुलाते हैं। फिर इस एकतरफा नैतिकता का क्या अर्थ? क्या इस संहिता को भी धर्मवीर जी पुरूष समाज पर अपने समेत लागू कर सकते हैं या करते रहे हैं? एक ब्रह्मचारी, धर्मावलम्बी, कीर्तनवादी धर्म भीरू पुरूष सामने पडे़ घायल व्यक्ति को अनदेखा कर चल दे और एक शराबी-कवाबीµआपकी नज़रों में व्यभिचारी व्यक्तिµउस बच्चे को दवा-दारू-करवाकर उसकी मां को सौंप दे तो कौन बेहतर होगाµब्रह्मचारी या व्यभिचारी? मनुष्य की प्रवृत्तियों के आधार पर सारे समाज को कटघरे में खड़ा करना उचित नहीं है, चाहे वह स्त्रा हो या पुरूष। किसी एक के आचरण के कारण पूरे समाज, जाति या वर्ग को दोषी या अपराधी सिद्ध नहीं किया जाता। यह तानाशाही तर्क होगा। दलित समाज के सामने और भी बहुत बड़े-बड़े सवाल हैं, के बदले मेरा धर्मवीर जी से पुनः निवेदन हैं कि वे औरतों पर निरर्थक व मिथ्या दोषारोपण करने में शक्ति खर्च करके उन सवालों को नहीं उलझाएं, तो समाज उनका आभारी होगा विशेषकर दलित एवं स्त्रा समाज।