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संस्थापक के बारे में - सृजन-पक्ष

संस्थापक के बारे में - सृजन-पक्ष

संस्थापक की मूल कृतियां

रमणिका गुप्ता एक जुझारू नेता के साथ-साथ एक संवेदनशील साहित्यकार भी हैं। इन्होंने अपने जीवन के अनुभवों, भावनाओं और विचारों को अपने साहित्य में शब्दबद्ध किया है। त्रासदीपूर्ण जीवन व्यतीत करने पर बाध्य दलितों, आदिवासियां के जीवन को अपने साहित्य में उकेरकर समाज को इन लोगों के प्रति संवेदनषील बनाने हेतु एक संवाद कायम करने का प्रयास भी किया है। रमणिका जी ने अनगिनत कविताएं, कहानियां, उपन्यास और आलेख लिखे हैं जो वंचित एवं दलित जीवन का एक आइना हैं। उनके साहित्य में सहजता, स्पष्टता, सत्य और समाज की रूढ़ियों के खिलाफ विद्रोह साफ झलकता है। उन्होंने जिन विधाओं में लिखा उसका कई ब्यौरा नीचे दिया जा रहा है।

कविता

रमणिका गुप्ता बचपन से ही राजनैतिक, साहित्यिक माहौल में पली व बढ़ीं। वे बचपन से ही बहुत भावुक व संवेदशील थीं। शायद इसी कारण उन्होंने अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति के लिए कविता को माध्यम चुना। राजनीति से जुड़ने के बाद उनके सृजन को दिशा भी मिल गई। उन्होंने अनेकानेक विषयों पर कविताएं लिखीं।

प्रकाशित कृतियां

‘भीड़ सतर में चलने लगी है’, ‘तुम कौन’, ‘तिल-तिल नूतन’, ‘मैं आजाद हुई हूं’, ‘अब मूरख नहीं बनेंगे हम’, ‘भला मैं कैसे मरती’, ‘आदम से आदमी तक’, ‘विज्ञापन बनता कवि’, ‘कैसे करोगे बंटवारा इतिहास का’, ‘प्रकृति युद्धरत है’, ‘पूर्वांचल : एक कविता-यात्रा’, ‘खूंटे’, ‘अब और तब’, ‘गीत-अगीत’।

प्रकाशनाधीन कृतियां:

‘प्रेम-पाति’, ‘जन-गीत’।

उपन्यास

रमणिका जी के ही शब्दों में -‘‘मैंने साहित्य को मुख्यतः हथियार के रूप में ही लिया है। मैं शब्द को हथियार बना कर आंदोलन भी करती रही हूं और कागज पर उसे उतार कर संघर्ष के लिए ऊर्जा भी प्राप्त करती हूं। हां ! अब आयु बढ जाने के कारण मेरे आंदोलन का स्वरूप कुछ बदला है। पहले मैं जनआंदोलन से शब्द के लिए ऊर्जा हासिल करती थी जो कागज पर उतरता चला जाता था और ठीक उसी प्रकार उस शब्द से ऊर्जा हासिल करके मैं मैदान में कूद जाती थी। अब मैंने शब्द से आन्दोलन के रूप में एक वैचारिक मुहिम छेड़ी है। ये मुहिम अखबार, पत्रिका, गोष्ठी, सेमिनार, सम्मेलन, वर्कशॉप आदि में बहस के माध्यम से शब्द को नई परिभाषा, नए अर्थ से लैस कर दलित और आदिवासी चेतना का हथियार बनाने की कोशिश है। मेरी रचनाओं में मॉर्क्स, डॉ. अम्बेडकर और बुद्ध की विचारधाराएं मिलजुल कर चलती हैं चूंकि मैं वर्ग और वर्ण, दोनों लड़ाईयों को समानान्तर चलाने में विश्वास रखती हूं। ऐसे मैं डार्विन और फ्रायड के सिद्धान्त की कायल भी हूं। इसलिए वैज्ञानिक और मनोंवैज्ञानिक विश्लेषण में विश्वास रखती हूं। निरीश्वरवादी हूं मैं सापेक्षता के सिद्धान्त को मानती हूं और शश्वतता को यूटोपिया। मेरे जहन में चारवाक हैं। इसलिए मेरी कृतियों में भावना, कल्पना और संवेदना के साथ-साथ तर्क, सत्यतता, प्रमाणिकता, तथ्यात्मकता का भी पुट रहता है। मेरे उपन्यास, मेरे अनुभवों के प्रतीक हैं। मेरी नायिकाएं प्रायः जंगलों, वनों, खदानों, पोखरियों, सड़कों व बाजारों में जूझते हुए सामने खड़ी मिल जाया करती हैं।

प्रकाशित कृतियां

मौसी-1997, सीताµ1996, (आदिवासी कामगार स्त्रियां पर आधारित )

(पंजाबी में ‘मासी’ नाम से श्रीमती सोमासबलोक द्वारा तथा तेलुगू में डॉ. वी. कृष्णा द्वारा ‘पिन्नी’ नाम से अनूदित)

निबंध/अन्य

रमणिका जी की ओजपूर्ण लेखनी ने दलित आदिवासी और महिला तथा साम्प्रदायिक सद्भाव के मुद्दों को बेबाकी से प्रस्तुत किया। उन्होंने उनकी खोई हुई अस्मिताओं की निर्मती एवं इतिहास की खोज के लिए विभिन्न भाषाओं के साहित्य और इतिहास को खंगालकर तथ्यों को उजागर करने का प्रयास भी किया है।

प्रकाशित कृतियां

‘स्त्रा-विमर्श : कलम और कुदाल के बहाने’, ‘दलित हस्तक्षेप’ (रमणिका गुप्ता द्वारा लिखित आलेखों का संकलन), ‘दलित सपनों का भारत और यथार्थ’, ‘निज घरे परदेसी’ (झारखंड के आदिवासियों पर केंद्रित आलेख), ‘सांप्रदायिकता के बदलते चेहरे’, ‘दलित-चेतना : साहित्यिक और सामाजिक सरोकार’ (आलेख), ‘असम नरसंहारµएक रपट’,।

आत्मकथाएं

प्रकाशित कृतियां

‘हादसे’ (राजनीतिक एवं ट्रेडयूनियन संघर्षों की गाथा)।

प्रकाशनाधीन :

‘टुकड़ा-टुकड़ा सफर’ (जीवन की व्यक्तिगत संघर्ष स्मृतियां)

यात्रा-संस्मरण

प्रकाशनाधीन

‘समुद्र की वीथियां और चट्टानां के पड़ाव’ (रमणिका गुप्ता के विदेश यात्राओं के संस्मरण जो पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। पुस्तक रूप में आने बाकी हैं)।

रमणिका गुप्ता की संपादित कृतियां

रमण्कि गुप्ता ने अपना जीवन सामाजिक उत्थान के लिए समर्पित कर दिया है। अपने विचारों को जन-जन तक पहुँचाने और सामाजिक जागृति लाने हेतु उन्होंने साहित्य को अपना माध्यम बनाया । इस कार्य के लिए उन्होंने कई लेखकों की कृतियों का संपादन कर उन्हें सशक्तता प्रदान की और कई काव्य-संकलन, कहानी-संग्रह, एवं आलेख-संग्रह प्रकाशित करने की पहल की। उन्होंने रमणिका फाउंडेशन स्थापित की और उसके माध्यम से दलित, आदिवासी व स्त्रा लेखकों को प्रोत्साहित किया और दलित एवं आदिवासी साहित्य को अपनी राष्ट्रीय पहचान तक पहुँचाने की मुहिम चलाई। फाउंडेशन द्वारा अनेक दलित व आदिवासी लेखकों को पुस्तक-रूप में प्रकाशित किया गया है। यह फाउंडेशन आदिवासी, दलित, स्त्रा, साम्प्रदायिक सद्भाव एवं जनवादी रचनाकारों की उत्कृष्ट कृतियों को सम्मान भी प्रदान करती है।

कविता

प्रकाशित कृतियां

‘दलित चेतना-कविता’ (दलित तथा सामाजिक मुद्दों पर अनुसूचित जाति एवं जनजाति के कवियों की कविताओं का संकलन), ‘नया मिज़ाज’ (उर्दू और हिन्दी गजलों का संग्रह), ‘बोनेक बोल’ (छोटा नागपुर की खोरठा जन-भाषा का काव्य-संकलन), ‘आधुनिक महिला लेखन-कविता’, ‘आखिरी दशक की लंबी कविताएं खंड-1 और 2’ (कविता-संग्रह), ‘रोशनी की लकीरें’ (कविता-संकलन), सभी नवलेखन प्रकाशन द्वारा प्रकाशित।

कहानी

प्रकाशित कृतियां

‘आदिवासी : शौर्य एवं विद्रोह’µइतिहास बोध प्रकाशन (इसमें भारत के आदिवासी लेखकों द्वारा लिखित आदिवासी शौर्य की गाथाएं सम्मिलित हैं), ‘दलित कहानी संचयन’µसाहित्य अकादमी दिल्ली (छः भाषाओं की कुल 48 दलित कहानियाँ संकलित), ‘दूसरी दुनिया का यथार्थ’µनवलेखन प्रकाशन (दलित तथा सामाजिक मुद्दों पर अनुसूचित जाति एवं जनजाति के कथाकारों की कहानियाँ संकलित), ‘आधुनिक महिला लेखन-कहानी’µनवलेखन प्रकाशन (13 महिला कथाकारों की कहानियां संकलित) तथा ‘समकालीन कहानियाँ’µनवलेखन प्रकाशन(जनवादी कहानियाँ)।

निबंध/आलेख/विविध

प्रकाशित कृतियां

‘आदिवासी स्वर और नई शताब्दी भाग-1’ (केवल आदिवासियों द्वारा रचित नाटक, आत्मकथाएं, संस्मरण, मिथक, किंवदंतियां, उपन्यास-अंश, लोक-कथाएं, लोक-गीत एवं आदिवासियों का विस्तृत इतिहास, लघुकथाएं तथा कविताओं के हिन्दी अनुवादµकुछ रचनाओं की मूल भाषा के देवनागरी लिप्यान्तर सहित अनुवाद। इस खण्ड में भारतीय भाषाओं के अतिरिक्त ग्यारह जन-भाषाओं से हिन्दी में अनूदित रचनाएं शामिल हैं।)

‘पंजाबी साहित्य में दलित कदम’ (पंजाबी दलित लेखकों के नाटक, आत्मकथा-अंश, उपन्यास-अंश, कहानियां, कविताएं, आलेख एवं साहित्यकारों के व्यक्तित्व एवं कृतित्व के मूल्यांकन एवं आकलन संबंधी लेख तथा साक्षात्कारµहिन्दी अनुवाद),

‘गुजराती साहित्य में दलित कलम’ (गुजराती दलित लेखकों के नाटक, कहानियां, उपन्यास-अंश, कविताएं, लेख तथा साक्षात्कारµहिन्दी अनुवाद),

‘तेलुगू साहित्य में दलित दस्तक’ (तेलुगू दलित लेखकों की कहानियां, कविताएं, लेख एवं साक्षात्कारµहिन्दी अनुवाद),

‘दलित-चेतना : साहित्य’ (हिन्दी, मराठी भाषी दलित लेखकों के दलित-साहित्य तथा दलितों की सामाजिक समस्याओं पर आधारित लेखों और साक्षात्कारों का संग्रह),

‘दलित-चेतना : सोच’ (धर्म, साहित्य, संस्कृति, आर्थिक नीतियों, महिलाओं, राजनीति, अम्बेडकरवाद, दर्शन एवं पत्राकारिता के साथ-साथ सरकार द्वारा भारतीय प्रशासनिक सेवा में नियुक्ति हेतु किया गया भेदभाव तथा मुस्लिम एवं राष्ट्रवाद इत्यादि पर अनुसूचित जाति, जनजाति के हिंदी, मराठी, बंगला, अंग्रेजी के लेखकों, आलोचकों, अर्थशास्त्रियों तथा दर्शनशास्त्रियों द्वारा लिखे गए लेखों का संकलन हिन्दी में। इसमें सुशीला टाकभौरे का ‘एक अस्पृश्य द्वारा गांधी को लिखा पत्रा’ भी संकलित है)।

प्रकाशनाधीन :

आदिवासी : लोक, आदिवासी : अदेखा भारत, आदिवासी : विकास से विस्थापन, दलित-दर्शन (गेलओम्वेटकी पुस्तक ‘दलित विज़न’ का हिन्दी अनुवाद),

युद्धरत आम आदमी

सन् 1985 से ‘युद्धरत आम आदमी’ (त्रौमासिक हिन्दी पत्रिका) का संपादन जारी है। युद्धतर आम आदमी के साधारण अंकों के अतिरिक्त 21(इक्कीस) विशेषांकों का प्रकाशन भी हो चुका है।