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टुकड़े-टुकड़े सफर (आत्मकथा-अंश)

टुकड़े-टुकड़े सफर (आत्मकथा-अंश)

प्रिय,

मैं सोचती हूं कहां से शुरू करूं ? आज जो घटा है- या पहले जो घट चुका है। बरस दो बरस पहले ही नहीं-- पचास बरस पहले-- जब मैं पेदा हुई थी? कहां से?

तुम्हारा और उसका मुकाबिला करूं, या करूं उनका जो मेरी जिन्दगी में आ चुके हैं, या उसका जो तुम्हें छू गई है या खुद अपना मुकाबला करूं? किनका किससे मुकाबला करूं? यह तय कैसे करूं मैं?

जो भी हो, एक बात मैंने पहले ही, जेल के मेन गेट से अपने वार्ड तक लौटते हुए तुमसे कही थी कि तुम जिससे भी प्यार करते हो उसकी इज्जत-प्रतिष्ठा की चिन्ता नहीं करते। अपने प्यार, आनंद, वासना या सुख, जो भी नाम दूं, तुम दूसरे की बात तो दूर- अपनी छवि की फिक्र भी नहीं करते। पर बेहद चतुर भी हो। खूब होशियार हो। अपने क्षेत्रा में दूरी बरतते हो। वहां एसा आचरण नहीं करते कि तुम्हारी जन-नेता की छवि बिगड़े। पर जिससे प्यार का नाटक रचाते हो उसके यहां खुलेआम - सब जाहिर कर देते हो सबके बीच, कुछ ढंका नहीं रहने देते।

पर ‘उसमें’ - जो तुमसे ठीक पहले था - यह बात नहीं थी। वह मेरी इज्जत की चिन्ता करता था - अपने आचरण और प्रेम के प्रति - अपनी आसक्ति पर अंकुश रखकर दूसरों के सामने मेरे जीवट और मेरी बहादुरी की मिसाल रखकर वह मेरा गौरव बढ़ाता था।

पर तुम हो कि अपने से बड़ा किसी को समझते ही नहीं। प्यार में भी इतने अधिक आदिम हो कि जानवर की हद तक पहुंच जाते हो! अपने व्यवहार में भी आदिम-सा स्वछन्द व्यवहार करते हो। शायद सभ्यता छू नहीं गई है तुम्हें और इसीलिए - न आचरण पर अंकुश है, न भावना पर, न प्यार पर, न ललक पर न आसक्ति पर। अकेले में तुम्हारा यह व्यवहार मुझे अच्छा लगता है। अनगढ़-सा, आदिम-सा, वहशी-सा। पर सबके बीच भी वही व्यवहार? मैं तुम्हें रोक भी तो नहीं सकती - और छोड़ भी नहीं....! शायद मेरी इस कमजोरी को जानते हो तुम ! इसीलिए तो जेल से छूटने के बाद अपने इसी स्वभाव के कारण तुम आज दिन के दस बजे तक सोते रहे थे उसके साथ- खुलेआम ! लोगबाग बाहर हंस रहे थे, ऐसा आज मुझे बताया गया। चूंकि बात कानाफूसी से आगे बढ़ गई थी इसलिए मुझ तक जेल में यह सूचना पहुंचाई गई। एक बार तो आवेश में आकर मैंने तुम्हें और उसे पत्रा लिखने की सोची। पर फिर संभल गई। आंदोलन तो चलाना है न! और उसके लिए फिलहाल तुम जरूरी हो! तुम बाहर हो! मैं जेल में हूं! यही मेरी मजबूरी है। सब अपमान पीकर भी तुम्हें रास्ते पर लाना होगा।

तुम्हें कितनी बार समझाया था मैंने-- ”राजनीतिक आचरण करो - भावना में मत बहो - प्यार करो पर लक्ष्य को प्यार के ऊपर मानों। व्यक्तिगत रिश्तों से बड़ा है लक्ष्य।“ पर आज स्वयं मैं ही विचलित हो उठी हूं। जलन से धधक उठी हूं। नहीं धधकना चाहिये न मुझे ऐसे! प्यार मेरा व्यक्तिगत मामला है - आंदोलन सामूहिक है। समूह बड़ा है। अभी अपमान पीना ही पड़ेगा।

मुझे याद आ रही हैं आज अपने आचरण की भी कुछ घटनाएं। मैं भी शायद तुम्हारी तरह ही पेश आती थी। प्यार की अंतिम सीमा, सान्निध्य की ललक, अधिकार की पराकाष्ठा अक्सर मुझे अव्यवहारिक बना देती थी। तुमसे बहुत पहले - जब मैंने राजनीति में आगे बढ़ना शुरू किया - मेरी शोहरत - जोखिम उठाने की हिम्मत - जनता को जुटाने की अथक लगन और क्षमता - चर्चा का विषय बन रही थी - तो राजनैतिक प्रशंसकां, खुशामदी टट्टुओं की भीड़ के साथ-साथ मेरी जन-नेता की छवि को भंजाने वाले नेता भी मेरे आशिक बन कर घूमने लगे थे मेरे गिर्द। उन्हें मेरी जरूरत थी और शायद मुझे उनकी। कई मुझे अच्छे भी लगते थे। मैं स्वयं उन पर मुग्ध थी। शायद इतनी भीड़ के विश्वास, प्रेम और श्रद्धा के बीच भी मैं कहीं अकेली थी और जब कोई मुझसे-- बस मुझसे प्यार करता नजर आता-- तो मैं स्वयं उसे प्यार करने लगती थी। हां एक असुरक्षा - सी बनी रहती थी मन में कि कहीं वह छोड़ न दे मुझे। इसलिए मैं बहुत ही पोसेसिव हो जाती थी।

संभवतः वे लोग भी मेरे इस व्यवहार से तंग आ जाते होंगे, जैसे मैं तुमसे परेशान हो उठती हूं। बिना जरूरत, सभी जगह, सभी के साथ अपने होने का अहसास जताने के लिए शायद मैं भी तुम्हारी तरह जिद किया करती थी- अड़ जाती थी - नहीं तो टोका-टोकी जरूर करती थी या रूठा-रूठी किया करती थी।

अब जब तुम वैसा सब करते हो, जैसा कि मैं भी कभी करती थी तो मन करता है कि तुमसे रिश्ता तोड़ दूं। शायद वे लोग भी तंग आ जाया करते होंगे मुझसे। पर फिर भी मैं तुमसे रिश्ता तोड़ नहीं पाती। संभवतः वे लोग भी ऐसे ही मुझसे रिश्ते तोड़ न पाते होंगे। अधिक खींचातानी बढ़ने पर, रोज के झगड़े जो पहले आपस में ही होते थे बाहर होने लगते थे। फर्क इतना है कि तुम इन आपसी झगड़ों को सड़क पर ले जाते हो और मैं खुद सह लेती थी। हां कभी-कभी कॉमन मित्रों के सामने हमारे झगड़े बाहर भी आ जाते थे।

शायद ऐसी ही खींचातानी की अवस्था में मुझे किसी दूसरे मित्रा की संवेदना मिल जाती थी और मेरा पूर्व मित्रा के प्रति खि्ांचाव और अनुराग हट कर उस दूसरे मित्रा के प्रति हो जाता था। लगाव का बिन्दु बदल जाता था। ‘कृ’ से मेरा रिश्ता ऐसे ही टूटा था। ‘कृ’ मेरा उपयोग तो करते थे पर अपने मित्रों से यह रिश्ता छिपाते थे। मेरे मित्रों के बीच वह प्रेम का इज़हार करने से नहीं झिझकते थे। शुरू-शुरू में मैं इसे समझ न पाई थी। उन पर इतना विश्वास था कि मैंने उनसे शादी तक करने का निर्णय ले लिया था। मैंने अपने पति से तलाक लेने और उन्होंने अपनी पत्नी से तलाक लेने का आपस में वायदा भी किया। पर यह बात वे अपने मित्रों की बीच नहीं स्वीकारते थे। न ही राजनीति में वे मुझे अपना राजदां बनाते थे। मेरे क्षेत्रा में अपना नेतृत्व जरूर बढ़ाने का प्रयास करते थे। मैंने उनके मित्रों के बीच बात खोलनी शुरू कर दी थी। एक दिन वे मुझे अपने घर ले गये और अपनी पत्नि के सामने ही उन्होंने दूसरी शादी का प्रस्ताव रखा। यह मेरे और उसकी पत्नि दोनों के लिए असहनीय था। उसकी पत्नि का निचुड़ा हुआ चेहरा मुझे कचोट गया। वे तीसरा ब्याह भी कर सकते हैं इसी तरह मुझे नकार कर! एकाएक मेरे मन में उठकर यह प्रश्न मुझे सालने लगा और मैंने उनसे रिश्ता ही तोड़ लिया! बहुत दुःख हुआ! इतने दिनों की मित्राताµइतना लगावµइतनी आसक्ति इतनी सुरक्षा ! ‘कृ’ के साथ रहने से दूसरे लोगों की भूखी नजरें मुझ पर पड़नी बन्द हो गईं थीं। यह भाव मुझे सुरक्षा देता था। उनके अंतरंग मित्रा मुझसे नफरत करते हुए भी उनके भय से मेरी इज्जत करते थे। लेकिन वे स्वयं मेरे नेतृत्व की क्षमता से भयभीत थे। वे अपना प्रभाव-क्षेत्रा बढ़ाने में मेरा उपयोग करते रहे थे- और इसलिए मुझे खोना भी नहीं चाहते थे। वे भंजाना चाहते थे मेरी शोहरत को, मजदूरों पर मेरे प्रभाव को, उनको मोड़ने की मेरी शक्ति को, इसलिए वे मेरी इज्जत करते थे और अपने मित्रों से मेरी इज्जत करवाते भी थे। संभवतः ये सब नाटक था एक!

रिश्ता टूट गया था उनसे आसक्ति का - पर राजनैतिक रिश्ता बाकी था। यूनियन का रिश्ता बाकी था। उन्होंने अपने मित्रा ‘र’ को मेरी यूनियन में रखवा दिया था एक पद पर। वास्तव में उनकी नियत थी मजदूरों की वफादारी अपने प्रति मोड़ने की ताकि उनके आदेशों पर हड़ताल हो और टूटे। मेरे आदेश पर नहीं। वे हड़तालों को भी भंजाना चाहते थे अपने या अपने जातीय ठेकेदारों के हित में जिनके नाक में मैंने दम कर रखा था।

मैं अपनी व्यथा और ‘कृ’ छलावे की कथा ‘र’ से कहती। वह मेरे साथ पूरी संवेदना रखने लगा। दरअसल ‘र’ उनके एक निजी मित्रा का मित्रा था। जातियां तो उनकी प्रतिद्धंदी थी, पर अजीब-सा अप्राकृतिक लगाव था उनके मित्रा का ‘र’ के प्रति। ‘र’ भूमिहार था और वे तथा उनके मित्रा राजपूत थे।

मेरे आंसू पोंछते-पोंछते वह स्वयं उन्हें पीने लगा था। रफ्ता-रफ्ता ‘कृ’ से हट कर मेरा लगाव ‘र’ से हो गया। इसीलिए जब हड़ताल वापिस लेने के मुद्दे पर ‘कृ’ और मुझमें विवाद हुआ तो ‘र’ ने मेरा साथ दिया। मुझे एक दूसरा सुरक्षा-कवच मिल गया था - एक ढाल जिसे ‘कृ’ का वार झेलने के लिए मैं सामने करने लगी थी।

आज शायद तुम भी उसी तरह खिंच गये हो मुझसे और बंधते जा रहे हो उससे। बस अपना ‘वचन’ या ‘कौल’ निभाने भर ही मुझ से नाता निभाने की बात दोहराते रहते हो। कल रात मुझसे अलग होते ही, जेल से बाहर निकलते ही, पहला मौका मिलने पर तुमने खूब जी भर कर-- खुलेआम उसे भोगा। इतना तल्लीन थे तुम उसमें कि भूल गये कि दिन भी चढ़ता है- दिन के दस भी बजते हैं - तुम्हें जेल से छूटने के बाद घर भी जाना है। भूल गये तुम कि तुम जेल से इसलिए छूटे थे कि तुम्हें बाहर निकल कर आंदोलन को फिर से तेज करना है। तुम भूल गये कि जिन्हें लाठियां लगी हैं - जो घायल हुए हैं - वे भी तुम्हारी प्रतिक्षा कर रहे हैं और दो संवेदना के शब्द तुम्हारे मुंह से सुनने के लिए तुम्हारी राह अगोर रहे हैं।

तुम्हें खोने का मुझें दुःख तो बहुत है - पर सबसे बड़ा अफसोस इस बात का है कि तुम सही रास्ते पर चलना अभी तक नहीं सीख पाए! मेरे साथ इतने लम्बे अरसे तक रह कर भी प्राथमिकता किसे दी जानी चाहिये यह आज तक नहीं जान पाए।

देखो ! वह कुंआरी है ! तुम्हारी इज्जत का सवाल हो सकता है केवल तुम्हारी अपनी राजनीति के लिए। लेकिन उसका क्या होगा? उसका परिवार भी है - जिसका उसी ने भरण-पोषण करना है।

और फिर ज्यादा बात बढ़ने से मेरी बदनामी का भी तो सवाल है। आखिर वह मेरे यहां काम करती है - मेरी स्टैनो है। उसका इस तरह तुम्हारे हाथों में खेल जाना - चर्चा का विषय हो जाएगा! मैंने पहले क्यों नहीं रोका - लोग पूछेंगे। हालांकि सब जानते हैं कि मेरे क्या खुदा के रोकने से भी, न तुम रूकते, न वो। उम्र के बन्धनों को तोड़ कर तुमने मुझे प्यार किया - यही हीन-भावना शायद मुझे तुम्हारा अपमान भरा व्यवहार सहने को बाध्य करती रही है।

तुम तो आजाद हो गये हो - शायद मुझे बांध गये हो। मैं - जो कभी बंधी नहीं थी आज तक। अब सीमित-सी हो गई लगती हूं। खैर! कभी-कभी हंसी आती है यह सोच कर कि तुमने मेरा और मैंने तुम्हारा रास्ता कैसे अपना लिया? यानि तुमने खूंटे तोड़ दिये और मैं खूंटे में बंध गई। पर कब तक? नहीं कह सकती! अभी तुम्हारा मोह बाकी है - इतने अपमान और उपेक्षा के बाद भी! शायद ढलती उम्र की कमजोरी है यह।

ऐसे यदि पुरुषों का विश्लेषण करूं तो कई मित्रा तैर रहे हैं नजरों के सामने याद की किरचों पर! ऐसे तो जिन्दगी की चित्रापटी बड़ी लम्बी है जिस पर अनेकों प्यार के हादसे लीके हुए हैंµकई चेहरे उकेरे हुए हैंµकई-कई रंगों मेंµशेडस में! बचपन से यौवन तक का समय धब्बों से पटा पड़ा है। पर राजनीति में आने के बाद ऐसे मित्रा जिनके प्यार में मैं स्वयं उलझ गई... इस चित्रापटी पर बहुत मुखर हैं। वही चेहरे तैर रहे हैं तेजी से याद की किरचों पर। सुबह-सुबह रोशनदान से एक रोशनी की धार-सी बहती नजर आती है जिसमें चमकते कण अलग-अलग तैरते दीखते हैं। फिर सब चढ़ती धूप के साथ पूरे कमरे में फैल जाते हैंµधार का वजूद खत्म हो जाता है।

तुम्हारे मुकाबिल खड़ा कर के तौल रही हूँ न अपने को - अपने आचरण को - अपने मित्रों को। कैमरे के पूरे फोकस में साफ-साफ उभरे चले आ रहे है सब के सब रोशनी की धार पर तैरते...!

तो चलो कच्छ के आन्दोलन से ही शुरू करती हूं। हां! कच्छ-आन्दोलन! कितने कटिबद्ध थे हम सब - कितने प्रतिबद्ध! ‘वह’ एक आजाद पंछी की तरह था- जो कभी बन्धा नहीं था किसी से, प्यार-प्रेम-आसक्ति सब शब्द नये थे उसके लिए, पता नहीं क्यों मेरे पहुंचने से पहले ही क्यों ‘वह’ मेरा इन्तजार करता रहा था। हर मीटिंग में हमारे नजदीक पहुंचने की चर्चा करता था ‘वह’। जनता के सामने वह संजय की तरह हम लोगों की यात्रा का एक-एक दिन का ब्योरा देता था। पूरा कच्छ हमारा इंतजार में था। जब हम लोग वहां पहुंचे तो उस दिन वह शहर में नहीं था। प्रचार में कहीं बाहर गया था। रात को 12 बजे हमारे कैम्प में पहुंचा। कितने प्यार से - अनुराग से वह देखता रहा था हम सब को। मेरे पास आकर रूका रहा कुछ देर ! मैं भी बहुत सुन चुकी थी उसके बारे में - कैसे उसके भाषण पर औरतें गहने न्योछावर कर देती थीं आन्दोलन चलाने के लिए? मुझे लगा वह मुझे अपनी आंखों के रास्ते अन्दर ही अंदर खींचे चला जा रहा है। रात भर वह हमारे कैम्प में रहा और हमसे पूछता रहाµ”पांव दुखते हैं तो दबा दूं।“ हम लोग पांव दुःखने पर भी ‘नहीं दुखते’ कहते रहे। पता नहीं क्यों उस रात भर में ही- उसका मेरे प्रति इतनी फिक्र दिखानाµमुझे उससे कैसे बांध गया? मैं उसके प्रति भरपूर आस्था से ओत-प्रोत हो चुकी थी।

इसी आस्था, श्रद्धा, स्नेह, अनुराग और अपने प्रति उसकी चिन्ता ने मेरे मन में कहीं ऐसे प्रेम का बीहन रोप दिया था जो शायद उसके मन में अंकुर बन कर फूट भी चुका था। वह लगातार मुझे ताकता जाता जब अकेले में पाता। कभी-कभी तो सबके बीच भी उसी एकटक नजर मुझ पर ऐसे टिक जाती कि अंदर तक भेद जाती मुझे और मैं लजा जाती। वह मुझसे बंध गया! पर अपने पुरुषवत स्वभाव या जमींदाराना सामंती अन्दाज और संस्कार के अनुरुप ही अथवा सतत् सम्पर्क एवं सानिध्य के कारण उसकी मित्राता एक और स्त्रा के साथ भी हो गई, जो आंदोलन में मददगार थी। वह उससे इतना बंधता जा रहा था कि उसे मेरी मौजूदगी का अहसास भी भूल जाने लगा। ‘वह’ बालू तट पर बैठता उसके साथ सांझ को। मुझे भी साथ ले जाता। रेगिस्तान में चांद लटका हुआ सा नजर आता है और बहुत नजदीक लगा करता है। उसकी नयी दोस्त बहुत सुन्दर थी। पर अभिव्यक्ति की इतनी ताकत होने के बावजूद भी पता नहीं ‘वह’ उस स्त्रा के सामने गूंगा क्यों बन जाता था। ‘उसकी’ पूरी वाणी उसकी आंखों के ताल में तरल सी तैरती रहती थी, जिसमें उसे पूरा का पूरा पढ़ा जा सकता था। पता नहीं ‘उसकी’ वह प्यास मुझे अपनी प्यास ही क्यों लगती थी। पर ‘उसका’ लगाव दूसरी औरत से इतना अधिक बढ़ रहा था कि मुझे लगने लगा कि मैं उसकी आंखों की तरलता में कहीं नहीं हूं। यह मुझे सह्य नहीं था। मैंने प्रतिरोध किया। वह नकारता रहा उसके प्यार को मेरे सामने। पर मैं पढ़ सकती थी उसे - वह एक खुली किताब था। एक दिन तो उसके विरोध में मैं बाहर गाड़ी में ही बैठी रह गई और मीटिंग में भाषण देने भी नहीं गई। ‘ज’ ने कई बार मुझे बुला भेजा। ‘ज’ हमारे बड़े नेता थे। मैंने सांझ से ही प्रोटेस्ट में उसे दिखा-दिखा सिगरेट पीना शुरू किया, तो देर रात गये तक पीती ही रही।

फिर औरत के स्वाभाविक जलन के गुण के अनुरूप मैं रूठ गई उससे, पर औरत के स्वभाव के विपरीत जो एक खूंटे से ही बंधा रह कर सुरक्षित महसूस करती रहती है - मैं अगले ही दिन चल दी एक प्रेमी की तलाश में ताकि वह भी ईष्या और जलन के रूबरू हो। अभी तक मुझे तलाश नहीं करनी पड़ी थी प्यार करने वालों की। वह ही मेरे गिर्द स्वयं घूमते थे। इस बार चूंकि सभी उसके और मेरे रिश्ते को जानते थेµकोई प्रस्ताव ही नहीं रखते थे। कोई अपने प्यार का मुझसे इजहार ही नहीं करते थे। कुछ उसके प्रति श्रद्धा, कुछ उसका लिहाज, कुछ मेरा - किसी को मुझसे अंतरंग रिश्ते बनाने में बाधक था। उसके, मेरे और ‘ज’ के दो तीन मित्रा थे जो राजनीति में सीधे नहीं थे पर वे लोग हमारे आन्दोलन के समर्थक थे, प्रशंसक थे और सहानुभूति रखने वाले थे। इसी नाते वे उसके और मेरे भी कायल थे। आन्दोलन में वे हमारा उग्र रूप देख चुके थे। आंदोलन के बाद वे हम लोगों को संगठित कर एक नयी मुहिम की तैयारी में जुट गये थे। यह ‘ज’ की योजना थी। हम चार पांच लोगों को इसे सरअंजाम करने की जिम्मेवारी मिली थी। मुझे छोड़ बाकी सब लोग गिरफ्तार हो गये थे और उन्हें जेल भेज दिया गया था। मुझे गिरफ्तार कर छोड़ दिया गया था। कच्छ के लोगों को तैयार करने के साथ-साथ मैंने वहां के वकीलों की एक कमिटी बना दी थी हमारा मुकदमा लड़ने के लिए। सारा काम मैं ही देखती थी।

उन्हीं में से एक वकील मित्रा थे हमारे, जिनके यहां कुछ फौजी अफसर भी आते थे। वह भीतर-भीतर हमारे प्रशंसक और समर्थक बन गये थे। ‘वह’ जेल में था। मैं उसे मिलने जाती थी पर अपनी रूष्टता भी उस पर जाहिर करती रहती थी। उन्हीं वकील साहब के घर एक दिन उस फौजी मित्रा ने अपने कैम्प में मुझे आमंत्रित किया। मैं गई। मेरे प्यार का निमन्त्राण उसने मेरी आंखों में पढ़ लिया था शायद। उसने उसे स्वीकार भी कर लिया था। मैं वकील मित्रा को बता कर उसके फौजी कैम्प में गई। रात भर रहने की नीयत से मैं अपने बैग में नाइटी भी लेती गयी थी। पुरुष के सान्निध्य से - वह भी अकेले में - और वह भी एक दो पैग विहस्की ले लेने के बाद-- एक भूख सी जग जाती है, पर लाजमी नहीं कि वह प्यार हो। उस रात वैसी ही भूख जगी थी। प्यार नहीं था शायद हम दोनों में। बाद में धीरे-धीरे हो गया था। एक समझौता - एक समझ पनप गयी थी। शायद यही प्यार का स्वरूप था हम दोनों का। संभवतः राजनीति की भागदौड़ में व्यस्त स्त्रा के प्यार का ऐसा स्वरूप ही हो सकता है।

अगले दिन जेल में उसे खबर दे दी गयी थी। मैं भी मिलने गई तो उसने एक टक देखते हुए मुझसे पूछा -

”क्या सच है सब? तुम स्वतंत्रा हो मैं तुम्हारा बाधक नहीं बनूंगा - पर मेरा कसूर क्या है?“

”कसूर! क्या बताना पड़ेगा कसूर? नहीं जानते तुमने कितना सताया है मुझे, मेरे सामने उस स्त्रा से प्यार जता कर। तुम्हें दुःख लगा है न जब मैंने किसी और से प्यार करना शुरू कर दिया है ! बस वैसे ही मैं भी तड़पी थी। तुम जेल में हो ! तड़पो अब ! मैं भी कहां बाधक बनी थी तुम्हारे और उसके प्यार में ? तुम जो भी करते मुझे मंजूर था - बस मेरी उपेक्षा नहीं करते।“ ‘ज’ ने बड़ी कोशिश की जेल में हमारी सुलह करवाने की। ऐसे उन्होंने मुझे स्वतंत्रा छोड़ दिया था चूंकि उन दिनों पार्टी में औरतों की आजादी की काफी चर्चा होती थी और उसे गंभीरता से लिया भी जाता था। डा. लोहिया का दृष्टांत दिया जाता था। मैं स्वयं भी पूर्ण आजादी की पक्षधर थी। वह भी था। इसलिए टोक नहीं सकता था वह मुझे और फौजी दोस्त से मेरे मिलने का सिलसिला चलता रहा।

कभी झील के किनारे तो कभी उसके कैंप में - कभी कैंप के बाहर चांदनी रात में - हम दोनों आदिम से नंगे अपनी परछाईयों को लिपटा देख उत्तेजित हो उठते थे। वह कह उठता था-

”मैं तुम्हारा मित्रा हूं - तुम्हारा प्रेमी, पुत्रा, पिता, भाई सभी कुछ मैं ही हूं। तुम मेरी सब हो - मां, प्रेमिका, पत्नि, बेटी, बहन, सब कुछ।’’

उसका यह वाक्य मुझे बहुत छू जाता था। मैं भूल जाती थी वह उपेक्षा जो ‘उससे’ मुझे मिली थी। ‘उसे’ मैंने छोड़ तो दिया था पर फिर भी मन में कही कसक बाकी थीµघाव को मैने टांके जरूर लगा दिये थेµपर टांकों का उभार बार-बार चुभता था।

फौजी अफ्सर और मैं, हम दोनों शिकार को निकल जाते थे - वह खुद जीप चलाता थाµसाथ में अर्दली को नहीं लेता थाµजंगल में जाकर हम कभी नंगेµकभी अधनंगे होकर शिकार की खोज में चल देते थे। मैं उसे ‘आदम’ कहती, ‘वह’ मुझे ‘ईव’। अपनी विशाल बाहों में समेट ‘वह’ मुझे उठा कर चल देताµघूम जाताµमैं फाहे-सी हलकी हो उठती उसकी बांहों में। मैं भूल जाती उन सभी उपेक्षाओं का दर्द जो मैंने झेलीं थीं आज तक अपने पहले मित्रों के हाथों। एक उपेक्षा को भुलाने के लिए ही मैंने प्यार का यह समझौता किया था। पर अब तो सचमुच प्यार, अगर प्यार से भी आगे कुछ हो सकता है, तो वही हो गया था मुझे उस ‘फौजी’ मित्रा से।

दो माह ऐसे ही बीत गये। मैं बीच-बीच में अहमदाबाद, सूरत, बड़ोदा, धनबाद आदि स्थानों पर आंदोलन के सिलसिले में आती-जाती रही। जब भी कच्छ लौट कर आती तो ‘उससे’ जरूर मिलती। ‘वह’ भी जेल से छूटकर आ गया था सभी के साथ। मुकदमा हमने जीता था। ‘वह’ छूटते ही पहले मेरे पास आया। बहुत रोया- गिड़गिड़ाया! वह तैयार ही नहीं था मुझे छोड़कर कहीं जाने को। ‘ज’ ने मध्यस्थता की। मेरे फौजी मित्रा को मैंने उसके बारे में सब कुछ बता दिया था। फैसला हुआ हम दोनों माउंट आबू एक सप्ताह बिता कर आएं, फिर सब लोग दिल्ली जायेंगे नए अभियान में।

हम दोनों गये माउंट आबू। रास्ते में लड़ते भी रहे और प्यार भी करते रहे। दरअसल उसने प्यार करना सीखा ही नहीं था। पहली बार मैंने सिखाया था उसे प्यार करना एक रात भुज में चांदनी रात में मकान की छत पर ही, जहां हम लोग सोते थे, संभवतः पहली बार औरत का वह वर्जित फल मैंने उसे चखाया था। उसका पुरुष जो कभी जगने का अर्थ ही नहीं जानता थाµजो जगा ही नहीं था कभी - जो संघर्षों में कहीं उपेक्षित सा सुला दिया गया था - या सोया रहा था - जगा था मेरे संसर्ग में आकर ! नया-नया सा था यह जगना उसके लिए। इसलिए उसका मन भरता ही नहीं था। कई-कई बार वह जगता ! मुझे लगता था कि मैं किसी बच्चे से प्यार कर रही हूं। उसकी हर जिद निभाती मैं। पर वह कभी मुझ पर हक नहीं जमाता था! याचक - सा कुछ पाने के लिए बस मुझे एकटक लगातार देखता रहता था। उसकी आंखों में वह याचना.... वह भूख.... वह ललक.... बहुत कोमल.... बहुत नाज़ुक अंदाज़ से टपकती, जो मन में एक सिहरन के साथ-साथ ममत्व भी पैदा करती! एक मनुहार- एक फिदा होने की अदा - एक! क्या नाम दूं ? नहीं कह सकती - वह क्या थी ? पर जो भी थी - बहुत प्यारी थी! उसकी ललक - उसकी भूख बहुत मोहक थी!

तुम भी तो बच्चे की तरह ही मुझसे लिपट कर प्यार करते हो! किन्तु तुम में और ‘उसमें’ बहुत फर्क है। वह न ऊंचा बोलता था - न गुस्सा होता था - न अपशब्द कहता था ! गलती होने पर सरेण्डर कर देता था वह - एक याचक-सा। वह पूरे आकाश की उदारता लिए था ! धरती की फर्टिलिटी-सा (उपजाऊ) उदात्त था वह। हालांकि तब मुझे उसका इतना अधिक समर्पण भी अच्छा नहीं लगता था। उसकी उदारता ही शायद मुझे सबसे अधिक खलती थी। मैं खीज उठती थी ”कभी तो हक जमाओ - गुस्साओ! कभी तो मुझे अपने से छोटा कर आंको - इतना बड़ा क्यों बना देते हो कि मैं कभी औरत होने के तुम्हारे आरोपित बड़प्पन के पैडेस्टल से नीचे उतर कर, तुमसे बात करने में लज्जित होने लगूं ?“ मैं उससे कहती। शायद यह पुरुषों का तरीका है, औरत को देवी बना कर उसे बांध देने का।

एक तुम हो कि जिद्दी बच्चे की तरह हर बात मुझसे मनवाते रहते हो। मेरे न चाहने पर भी मुझे तंग करते हो। मेरा बड़प्पन दो कौड़ी का नहीं है तुम्हारे आगे। इतना हक जमाते हो कि तर्क भी सुन नहीं सकते। इतना छोटा कर देते हो मुझे कि मैं तुमसे नफरत करने लगती हूँ।ं पता नहीं मेरा ऐसा कौन सा स्वार्थ है जो इतना अपमान सहन करवाता है मुझसे।

हां तो हम लोग माउंट आबू से लौटे दिल्ली। मेरा फौजी दोस्त भी उसी समय अपनी पत्नि के साथ दिल्ली पहुंचा। हमारी पार्टी में मेरे और ‘उस’ के रिश्तों पर खूब विवेचना और बहस-मुंबासे हुए। खूब चर्चा चली। हम दोनों शादी करने का फैसला करके लौटे थे। काफी तर्क विर्तक भी हुआ इस पर। मैं अपने पति से तलाक ले लेना चाहती थी। इससे पहले ऐसी स्थिति एक बार ‘कृ’ को लेकर हुई थी पर ऐन वक्त पर मैं रूक गई थी। इस बार भी सभी ओर से तलाक के प्रस्ताव को नकारा गया - पर मेरे तलाक के प्रस्ताव से ज्यादा नापसंद किया गया ‘उसका’ विवाह-सूत्रा में बंधना। तय हुआ कि ‘वह’ आजाद है ‘उसे’ आजाद ही रहने दिया जाय। ‘उसका’ बंधना ठीक नहीं होगा। ”दोस्ती रक्खो। पर बांधो नही।“ सभी की यही राय थी। यानी जो फार्मूला मैं आज तक दूसरों पर लागू करती रही थी वह इस बार मुझ पर लागू हुआ तो लगा जैसे यह निर्णय मुझ पर थोपा जा रहा है। खैर ! पार्टी और देश के हित के लिए मैंने सर झुका दिया।

फौजी मित्रा अपनी पत्नि के साथ आया मुझे मिलने। ‘वह’ मुझे जयपुर ले गया- ‘उसके’ बच्चे जैसे मेरी इंतजार ही कर रहे थे। मैंने अपना रिश्ता ‘इससे’ भी नहीं तोड़ा था। ‘इसके’ बारे में ‘उसे’ मालूम था। पर उसे कोई एतराज नहीं था। औरत की स्वच्छन्दता का मामला था। मैं भी जब ‘उसके’ साथ होती तो ‘इसे’ भूल जाती - ‘इसके’ साथ होती तो ‘उसे’ भूल जाती। कभी दोनों की आपस में तुलना नहीं करती थी। तुलना केवल उपेक्षा के व्यवहार की करती थी। प्रेम के ढंग दोनों के अलग थे ! दोनों को उनके अपने रूप में स्वीकार करती थी मैं। किसी को किसी से नीचा या बड़ा करके नहीं आंका मैंने। ये प्रवृत्ति शायद पुरुषों में अधिक होती है। वह खुलेआम एक औरत की तुलना दूसरी से करके, कभी इसका तो कभी उसका पलड़ा उठाते-झुकाते रहते हैं। इससे जलन-ईर्ष्या होती है। पर औरत तो सदियों तक एक साथ, हरमों में, महलों में रानी, दासी और गुलाम बन कर - कबीलों और घरों में सौत और कॉनक्यूबाइन, बनकर रहती रही है। वह एक दूसरे को सहने की आदि है। उसके एक साथ रहने को गौरवान्वित करने में न समाज पीछे रहा - न साहित्य ही!

‘उसके’ बच्चों ने मेरा स्वागत किया। पत्नि ने प्यार और आदर दिया इतना कि मैं एक अपराध-बोध से दब गई। रात को मेरा फौजी मित्रा मेरे पास आया अपनी पत्नि के साथ और उसी के सामने मुझसे प्यार करने लगा। मैं हक्की-बक्की। मैंने झटके से उसे अलग कर दिया। मैं किसी औरत की भावना को ठेस नहीं पहुंचा सकती थी। ‘उसकी’ पत्नि ने पता नहीं दबाव से या पति का मन रखने के लिए मुझे कहा कि उसे कोई आपत्ति नहीं है अगर उसका पति मुझे प्यार करे। मुझे लगा सोलहवीं सदी के किसी राजघराने की दो बान्दियों या दो रानियों में यह वार्तालाप हो रहा है, राजा को खुश रखने के लिए। यह बीसवीं सदी है और यह मित्रा मुझे घसीट कर कहां ले आया है? मैं जानती हूं औरत का अंतरंग मन हर सदी की औरत का मन! वह कभी भी चाह नहीं सकती मन से किसी औरत का उसके पति की जिंदगी में आना। बर्दाश्त करना, चुप रहना - प्रतिकार न करना और अपने आपको कुर्बान होने देना आदि भावों से महिमामण्डित होते रहने की ग्रंथि भले हो उसमें, पर उसकी इच्छा नहीं होती। सो मैंने नहीं माना उसका प्रस्ताव।

अगले दिन सबेरे से ही फौजी मित्र की पत्नि को दौरे पड़ने लगे, बेहोशी के। पता नहीं उस औरत ने कितना जब्त किया होगा! कितना मनाया होगा मन को ! पर मन नहीं माना ! तर्क नहीं चला - तो दिमाग ही बेहोश होने लगा। मैं उसके पास बैठी रही, उसके होश आने तक और मैंने एक मुस्कराहट से उसे आश्वस्त किया- ”कुछ नहीं होगा - वह तुम्हारा है तुम्हारा ही रहेगा। तुम्हारा अपमान नहीं होगा।“ उसने आंखे नीची कर आभार प्रकट किया। फिर हम सब दिल्ली आ गये। दिल्ली के अपने फलैट में फिर एक बार उसने अपनी पत्नि के सामने ही मुझे बाहों में भर कर चूम लिया। मैं बौखला उठी। ‘कम से कम मेरे सामने ही मेरी ही जात का अपमान तो मत करो।’ मैंने कहा और मैं उसके घर से सामान उठा कर चल दी। मैंने उसके घर आना-जाना, उससे मिलना-जुलना बंद कर दिया। लगता था कोई बादशाह अपने हरम में आई एक नई बेगम को, अपनी पुरानी बेगमों के बीच बिठा कर, उसका मुजरा देख कर जश्न मना रहा था। मुझे बाहों में ले कर बड़ी बेगम को जला रहा था और अपनी मर्दानगी का इजहार कर रहा था। अपने पौरुष पर इतरा रहा था - नाज़ कर रहा था ! मेरी औरत मुझमें सिकुडी जा रही थी।

मैं सब सह सकती हूं पर किसी की गुलामी नहीं। ना ही किसी दूसरी औरत के साथ किसी को अपने सामने गुलामों का सा व्यवहार करते देख सकती हूं। मैं किसी दूसरी औरत के साथ अपनी तुलना भी बर्दाश्त नहीं कर सकती चाहे वह तुलना मेरी मां के साथ ही क्यों न करे कोई ! मैं हूं कोई दूसरी क्या है इससे मुझे क्या मतलब ? मेरी उससे तुलना क्यों ? मैंने कभी भी किसी पुरुष की तुलना दूसरे पुरुष से नहीं की। हां - आज तुमसे कर रही हूं। पर यह तुलना केवल तुम्हारी नहीं है। मैं अपने आचरण को भी तौल रही हूं ! मैं खुद भी तराजू के एक पलड़े पर चढ़ बैठी हूं ताकि अपनी औकात - अपनी हकीकत जान सकूं - आंक सकूं।

दरअसल मुझे खुद ही मुक्त होना है अपने से। मैं अपनी ही कमजोरी का शिकार हो कर फिसल जाती रही हूं - जिन कमजोरियों के खिलाफ मैं झण्डा बुलन्द करती रही हूं - उन्हीं की शिकार मैं खुद भी होती रही हूं। दरअसल औरत को खुद अपने को ही मुक्त करना है पुरुष से। पुरुष ग्रन्थि है उसकी। वह उसकी दुखती रग भी है। या तो यह रिश्ता सहज हो जाय - या दोनों की एक दूसरे के प्रति मानसिकता सहज हो जाए तो यह ग्रंथि टूट जा सकती है। पर मानसिकता केवल मेरी ही बदलने से नहीं - समाज को भी बदलनी होगी!

खैर भटक गई न मैं। वह दोनों मित्रा समय के समुद्र में खो गए। कभी-कभी ज्वार-भाटे पर चढ़ कर वह फौजी मित्रा मिल जाता, तो कभी बालूही तटों पर यादों की सीपियां बीनता ‘वह’ भी भेंटा जाता। ज्वार-भाटा उठने का समय लंबा होने लगा - बालू तट पर मेरी तलाश का समय भी अनिश्चित हो गया। मुलाकातें बंद-सी हो गईं - उनका रूप बदल गया।

फौजी मित्रा और मैं अब एक अच्छे दोस्त बन गये। अन्तरंग रिश्ते खत्म हो गये। बस बाकी रह गयी मित्राता। वह भी जो मुक्त आजाद था पूर्ववत कहीं गुम हो गया। दूसरे आकाश में चला गया- शायद दूसरे नभ में उड़ने ! किसी बड़ी योजना को अंजाम देने के लिए दूसरे प्रदेश में ‘वह’ जूझने लगा ! उसके भीतर एडवैंचर का आकर्षण मेरे आकर्षण से अधिक बलवान था। वह उससे बिंध गया। मैं भी एक योजना को सरअंजाम देने में मशगूल हो गई - और उसी में लग गई जम कर। प्रेम के बिंदु बदल गए। आर्कषण के कोण बदल गये। सब भूख - सब ललक - सब आसक्ति और प्यार जैसे कहीं गुम हो गए। केवल शरीर को राहत देने के लिए गाहे-बगाहे कभी प्रेम या प्यार का जोश आ टपकता अकेला देख कर। पर योजना को सरअंजाम देना प्राथमिकता बन गई। मैं राजनैतिक ऊंचाईयों तक पहुँच गई थी। सामूहिक प्रेम - श्रद्धा विश्वास हावी हो गए थे, व्यक्तिगत प्रेम पर। या यूं कहूं कि मैंने खुद को समूह का अंग मान लिया था।

फौजी दोस्त मिलता तो खूब हंसता बहुत खुश होता! वह मुझसे मिलता अपने परिवार से मुझे मिलवाता। दोस्तों से मेरा परिचय करवा कर खुश होता - गौरवान्वित होता मुझसे मिल कर। बस इतना ही। पुराने रिश्तों को हमने फिर दोहराया नहीं। उसने भी कभी याद नहीं कराया अपना रिश्ता, ना ही हक जमाया पुराने रिश्ते का। मैत्रा का यह नया रिश्ता मुझे अच्छा लगता था। यह बराबरी का रिश्ता लगता था। राजनीति में जैसे समीकरण बदलते रहते हैं, संभवतः वैसे ही राजनीति करने वालों के प्रेम के रिश्ते भी बदलते हैं।

‘उसके’ समाचार मिलते। उसकी ऊंचाइयों की खबर मुझे ऊंचा कर देती। ‘वह’ भी शायद मेरी खबरें पा कर मन ही मन मुस्कुराता। एकाध पत्रा भी मिला - बेहद स्नेहयुक्त-संक्षिप्त लेकिन एक-एक शब्द मेरे प्रति अहसासों से ओत-प्रोत! तुम तो पत्रा लिखना ही नहीं जानते ! गहन क्षणों में मुझसे छोटा लगने वाला वह आदमी- राजनीति में मुझे हमेशा बौना ही मानता रहा, यह मैं जानती थी। इसी बात पर मेरी ‘उससे’ तकरार भी होती थी। ‘वह’ मेरी औरत को ही बड़ा मानता था मुझसे। एक स्वछन्द औरत समझ कर प्यार और आदर देता था - कभी बराबर की राजनैतिक स्पर्धाµअहमियत वाला साथी नहीं मानता था मुझे ‘वह’। मेरी राजनैतिक मान्यता के लिए की गई जिद पर ‘वह’ हंस देता था या टाल जाता था मेरा सवाल। ‘उसका’ यही रुख मुझे कचोटता- सालता- और पुरुषों को चुनौती देने के लिए उकसाता था।

फौजी मित्रा मेरी राजनैतिक ऊंचाइयों से गौरवान्वित होता था। वह प्रेम में दक्ष होने और उसमें मुझसे बड़ा होने के बावजूद भी, कभी मुझे छोटा करने का दम्भ नहीं पालता था। वह मन से मेरा प्रशंसक था। लेकिन ‘वह’ अजाद पंक्षी मेरी राजनैतिक प्रगति पर नाक भौं सिकोड़ता थाµमेरी उपलब्धियों को स्वीकारता नहीं था - यहीं पर मुझे उससे नफरत होती थी। तुम मेरी राजनैतिक ऊंचाई से चिढ़ते नहीं हो, यह मैं जानती हूं। पर तुम ‘चित्त भी मेरी पट्ट भ्ी मेरी’ चाहते हो, जो एक स्वछंद औरत के लिए असहनीय स्थिति है। मैं स्वछंद शब्द को स्वतंत्रा से बेहतर मानती हूं औरत के लिए, हालांकि भाषाविद् स्वच्छंदता को हेय मानते हैं। पर उनके ऐसा मानने से क्या? मैं स्वच्छंद होना श्रेयस्कर समझती हूं चूंकि इसमें छद्म नहीं हैµदंभ भी नहीं है।

इसी बीच हवाओं के चक्रवात मेंµएक राजनैतिक कार्यक्रम में मेरा दक्षिण राज्यों का दौरा हुआ। रास्ते में मद्रास पहुंचने से पहले मेरा सामान चोरी हो गया। ‘उसके’ सब पत्रा और मेरी कच्छ में लिखीं सब कविताएं जो मेरी डायरियों में थी भी चोरी हो गईं। शायद वह भी चोरी हो गया मेरी यादों में से- जिसके यह पत्रा थे।

मैं किसी तरह बैंगलोर पहुंची। वहाँ मुझे मिला ‘वी’। कैसे बयान करूं कौन मिला ? उसने मेरे पूरे नारीत्व को झकझोर दिया। उसके पास वाणी थी - साहस था - आदर था - प्यार था - सैक्स का धनी भी था ‘वी’। लगता था पौराणिक कथाओं का कोई देव - या अरेबियन नाइट का कोई शहजादा या ब्रिटिश नाइटहुड परंपरा का कोई नाइट हो!

बैंगलोर में मेरे बहुत कार्यक्रम हुए - कामयाब कार्यक्रम। मेरे भाषणों का वह अंग्रेजी अनुवाद करता। पता नही हम कैसे दोस्त भी बन गये एकाएक, जैसे ‘वी’ मेरी ही इंतजार में था और मैं उसकी!

‘वी’ अपने घर ले गया मुझे। एक बहुत बड़ी इस्टेट। काफी और काजू उत्पन्न होते थे। केरल में बड़ा लोकप्रिय था ‘वी’। पर उसने कभी भी अपनी पत्नी के सामने ऐसी हरकत नहीं की जिससे औरत का अहम् अपमानित हो। मेरे साथ रातें भी बितायी पर वे मेरी ही रातें थीं। उसने अपनी पत्नि की रातों को कभी बेचैन नहीं होने दिया। ‘उसके’ परिवार नेµ‘उसकी’ पत्नि ने पूरा प्यार और आदर मुझे दिया।

मैंने उसके साथ पूरे दक्षिण भारत का दौरा किया - कर्नाटक, मैसूर, केरल और, मद्रास ! वह मुझे कहता डल ंहमसमे (मेरी व्यातीत) . डल जपउमसमे (मेरी समयातीत) . डल ेचंबमसमे (मेरी आकारातीत) ! उसी ने मुझे रात का सही प्रयोग सिखाया। ऐसे बहुत पहले ‘आ’ ने मुझे ऐसा ही सुख दिया था ! असीम सुख ! जिन्दगी का सही और सच्चा मतलब इन्हीं दोनों ने सिखाया था!

पर तुम तो केवल सैक्स से मतलब रखते हो न ! मेरे भीतर के जानवर को तुष्ट करते हो, मुझे नहीं- मेरी औरत को नहीं ! तुम्हारे पास शब्द ही नहीं हैं कि कुछ कह सको - प्यार को व्याख्यायित कर सको - परिभाषित कर सको या मुझे विश्लेषित कर सको ! वाणी ही नहीं है - अभिव्यक्ति की ताकत ही नहीं है - तब शब्द कहां से आएंगे ! शब्द तो विचारों से पैदा होते हैं न और विचार अभिव्यक्ति की शक्ति के गर्भ से। विचारों से नहीं संचालित होता तुम्हारा प्यार, इसलिए तुम सीधे रमते थे रात में। रात से खेलते नहीं थे कभी। भावनाओं से तुम्हें कभी मतलब ही नहीं रहा। कोरी सलेट रहे तुम। बस भूख ही भूख है तुममें ! इस लिए टूट पड़ते हो ! कभी आनंद नहीं लेते उसका। खा कर भी भूखे ही रहते हो !

संभवतः तुमसे प्यार करना एक प्रयोग ही था मेरा अथवा एक प्रयोग के तौर पर ही मैंने प्यार किया हो तुम्हें, कह नहीं सकती। पर तुम ठहरे अनगढ़! कितना गढ़ूं तुम्हें ? कितना गढ़ती आखिर ? ऐसे तुम्हारा यह अनगढ़पना भी पसंद रहा मुझे। पर यह उम्मीद हमेशा थी कि मैं तुम्हें तराश लूंगी। शायद तुम्हारे प्यार की जरूरत थी मुझे। पर दोनों संभव नहीं था। इसलिए तुम पर मेरा यह प्रयोग, अब मुझ पर ही बूमरैंग कर रहा है! कोमलता से तुम्हें वास्ता नहीं। कठोरता तुम्हारा स्वभाविक गुण और दोष दोनों है। तुम्हारी कठोरता से मैं प्यार करती रही - तुम्हारी कोमलता के लिए तरसती रही ! खैर !

अपने दक्षिण भारत के दौरे पर मैंने बहुत कुछ लिखा ! सीखा भी बहुत कुछ। राजनीति भी सीखी !

मुझे याद नहीं हैं अपने प्रेम करने वालों की संख्या। वह सब अपने में एक-एक अनुभव थे मेरे। हादसे तो कई घटे, जो याद पर दबाव डालने से याद आ सकते हैं। पर कुछ एसे हादसे भी हैं जो अपनी चकाचौंध छोड़ गये हैं - अपने चिह्न छोड़ गये हैं। ऐसे तो बचपन की किलाकारियों में पुरुष की सीत्कारों से परिचय हुआ अनजाने में। गोदी में बैठती तो कुछ अटपटा से लगता - कुछ गड़ता। पिता भी बाहों में भर कर प्यार करते थे तो मेरा वक्ष दबने पर मुझे लगता था जैसा दबाया गया है। पर ऐसा तभी होता था जब वह लज्या (दूर के रिश्ते की एक लड़की जो हमारे घर रह कर पढ़ती थी) को बांहों में भरने के बाद हमें बाहों में भरते थे। तभी महसूस होता था। शायद उस लड़की के प्रति उनकी कमजोरी बाद तक बनी रहती थी। एक मास्टर तो मेरा यौवन ही नहीं, मेरा बचपना भी पी गया था। मैंने उसे कभी स्वीकारा नहीं था।

पता नहीं क्यों लिख रही हूँ ये सब। राजनीतिक पन्ने पलटूं तो किसका नाम छोडूं किसका जोड़ूं- दुविधा खड़ी हो जाती है। देश के शीर्ष स्थान पर बैठने वालों से लेकर प्रदेश पर राज कर चुके कई नेताओं तक सभी तो हैं उन पर अंकित। अब लगता है शायद इंदिरा गांधी ने भी त्रास्त होकर संजीवा रेड्डी का विरोध किया था। और उस समय कांग्रेस के बड़े-बूढ़े व अधेड़ नेता जो प्रधानमंत्रा की गद्दी पर अपनी नजरें गड़ाए बैठे थे - इंदिरा गांधी को औरत जान कर उसे पचा लेना चाहते थे। पर इंदिरा गांधी के पास एक जबरदस्त युवा लॉबी थी उनके फैन्स की, जिन्होंने बूढ़े अजगरों की चलने नहीं दी। मैं नितांत अकेली थी - एक दूसरे प्रदेश की औरत - जिसके पास ‘जन’ तो था पर गुट नहीं था। और राजनीति गुटनिरपेक्षता पर नहीं चलती, शायद मैं मिसफिट थी।

ये सब हादसे क्षण भर में न जाने कैसे घट जाते थे, कभी मेरी सहमति से, कभी विरोध करने के बावजूद भी। योजनाबद्ध कभी कुछ नहीं घटा। हो सकता है कभी राजनैतिक लाभ के मोहवश या कभी डर या शर्म के कारण मैं प्रतिरोध न कर सकी। कभी जबरन, तो कभी मन सेµपर होता जरूर था कुछ-न-कुछ।

कभी-कभी तो ऐसे रिश्तों के बाद यह भी एहसास होने लगता था कि- देखो अमुक बड़ा नेता भी मेरा मोह संवरण नहीं कर सका और ऐसे रिश्तों से लाज-शर्म नहीं, उलटे गौरव का एहसास होता था। ”एक एहसास कि- आखिर वह भी झुका मेरे आगे।“ कुछ इस अंदाज का अहम्। अब पुरुषों की तरह मेरे प्रसंगों की चर्चा होने लगी थी। इससे कुछ फर्क पड़ता हो ऐसा नहीं लगता था। राजनीति में आई सभी महिलाओं की एक सी ही स्थिति थी। कईयों की तो बदतर- खास कर कम पढ़ी-लिखी और बिना सोर्स-पैरवी वाले परिवार से रिश्ता न रखने वाली महिलाओं की। प्रायः इनके पति-पिता या भाई अथवा माँ नेताओं से उनके संपर्क कराने में सहायक होते थे। कभी-कभी वे बाहर पहरा भी देते थे। संभवतः ऐसी स्थितियों को औरतें अपनी पुरुष पर विजय पाने के मनसूबे की एक उपलब्धि के रूप में मानती हों ! लेकिन पुरुष पर शासन की एक छिपी लालसा से संभवतः अनिभज्ञ रहने के कारण अथवा किसी हीन-भावना के कारण मैं प्रायः पुरुषों के साथ उलझ जाया करती थी। कभी-कभी किसी से इतनी नफरत कि झगड़े पर उतारू हो जाती थी तो कभी-कभी इतना लगाव भी हो जाता था कि अपने को बलि कर देने की ग्रन्थी पैदा हो जाती थी। ऐसी दशा में मैं अपने को दया का पात्रा मानने लगती थी। सबसे दया खोजती, अपनी दया के लिए भी लालायित, सूली पर चढ़ने को आतुर, अपने को शहीद साबित करने और दूसरों को आतातायी - बर्बर - बेवफा कहने को उद्दत मैं।

आत्मग्लानि की ग्रन्थी से उत्पन्न इन भावनाओं के ज्वार के साथ चढ़ती-उतरती रहती थी मैं। आत्मग्लानि या कहूं अपराध-बोध ;ळनपसज ब्वउचसमगद्ध, यानी अपने हर काम पर पछताती, अपने को हरदम अपराधी मानती और प्रायश्चित, स्वरूप अपने को कुर्बान करने के लिए तत्पर रहती-- मैं! मनोविज्ञान में वर्णित हर ग्रंथी के सकार रूप-सी मैं! फिर भी पराजय स्वीकार करने को तैयार नहीं! परास्त नहीं हुई मैं! मैं जीती रही। इसके पीछे मेरे बड़े भाई का कहा ये वाक्य- ”जो करती हो करो पर छिपा कर नहीं, अगर ठीक समझती हो तो दुनिया क्या कहेगी यह सोच कर मत डरो और खुले आम करो! गलत समझती हो तो मत करो-- भले सारी दुनिया चाहे कि तुम वैसा करो। लेकिन दुनिया को यह दिखाने के लिए भी कि देखो मैं क्या नहीं कर सकती - कुछ मत करो“-- मेरा प्रेरणा स्रोत बना।

तभी से मैंने अपने प्यार के रिश्ते छिपाने बंद कर दिए। और आश्चर्य है कि तब से कनफुसकियां भी बंद हो गईं। मैं संघर्ष में जुटी रहती - राजनीतिक उठा-पटक में भाग लेती - यूनियन की राजनिति में अगुवाई करती, लोमहर्षक घटनाओं में घटित होती मैं - एडवेंचर के लिए खतरे मोल लेती मैं। खतरे मोल लेना मेरी आदत हो गयी थी जिसके तहत मैं प्रेम का खतरा भी मोल लेती रहती थी। बचपन से प्यार से वंचित रहीं मैं प्रेम की न खत्म होने वाली तलाश में लगी रही। मेरी राजनैतिक महत्वकांक्षाओं के साथ-साथ - सामानांतर- मेरी प्रेम कथाएं भी चलती रहीं - सच्ची भी, झूठी भी! पर मैंने उन्हें कभी अपनी राजनीति में बाधा बनने नहीं दिया। बल्कि मुझे उनसे बल मिला। जहां जरा-सा भी लगता कि कुछ बाधक है या जरा भी अंदेशा होता तो मैं रिश्तों के धागे ढीले कर देती या कस देती जरुरत के अनुसार।

पर तुम हो कि एक पूरी की पूरी दीवार बन कर खड़े होने लगे हो मेरी राजनीति में। मेरे रास्तों में ठोकरें बन कर बिछ गए हो। मैं केवल तुम्हारी ही नहीं हूं, इस तथ्य को समझो। मेरी भी जिम्मेवारियां हैं। मैं भी जवाबदेह हूं उस जनता के प्रति जिसने मुझे चुनकर भेजा है, मैं भी जवाबदेह हूं उन मजदूरों के प्रति जो मेरे विश्वास पर जोखिम उठा कर संघर्ष छेड़ते हैं। तुम हो कि प्रेम के चक्कर में ऐन मौके पर जिम्मेवारी भूलने का आग्रह करते हो और नहीं मानने पर सबके सामने मुझे जलील करते हो।

देखो मैं दस लोगों के बीच तुम्हारा हाथ पकड़ कर तुम्हें उठा कर ले जा सकती हूं - कोई लोक-लाज मेरे आड़े नहीं आएगी यह सच मानो। पर मेरी मर्जी के खिलाफ तुम अकेले में भी कुछ चाहो तो वह संभव नहीं होगा। तुम ‘रार’ करो - मैं विचलित हो जाऊं, मान लूं अपनी कमजोरी के कारण यह हो सकता है- पर जबरन तुम कुछ भी नहीं कर सकते। इसलिए अब तो मुझे तुमसे दूर ही हो जाना पड़ेगा। न तुम अकेले में मिलोगे न ‘रार’ करोगे - न मैं कमजोर बनूंगी। इसीलिए तो मैंने जाने दिया शायद तुम्हें उस लड़की के पास, ताकि तुम मुझे छोड़ दो और मैं अपना आंदोलन जारी रखूं जिसमें तुम बाधक बन सकते हो। वरन् क्या तुम्हें मैं छोड़ कर ऐसे जाने देती?

पर अब जाओ तुम ! तुम्हारा रास्ता अलग - मेरा अलग ! एक लक्ष्य है मेरे सामने जिसे पूरा करना है ! हो सकता है इस लक्ष्य की प्राप्ति में यश-प्राप्ति का स्वार्थ जुड़ा हो ! पर इससे क्या ? एक लक्ष्य तो है ही न!

देखो! शरीर के लिए सहारा कोई न कोई मिल ही जाऐगा। मन के लिए ही कठिन है सहारा मिलना। तुम मेरी देह के लिए थे बस ! अब तुम्हें दूसरी देह मिल गयी - तुम चले गए। शायद मुझमें जरूर एक असुरक्षा की - एक हीनता की भावना भर गई होगी कि इस उम्र में कौन प्यार करना चाहेगा मुझे-- वह भी तुम जैसा? एक गुमान था और है भी कि अभी भी तुम जैसा युवा फिदा है मुझ पर! ये एहसास मेरी औरत की तुष्टि तो करता है किंतु यह मेरी मन की संवेदना के तारों को छू नहीं पाता था, संवेदना - जो मुझे जानवर से अलग करती है। यह सान्निध्य कहीं न कहीं चोट करता है मेरे अहम् पर - मेरे सत्य पर - भावना पर- मूल्यों की परिभाषा पर।

इसलिए जाओ अब तुम ! जाओ ! कभी दोस्त बन कर रहने की सोचो तो याद रखना ! मैं तुम्हारा अहित नहीं करूंगी। बदला भी नहीं लूंगी - यह तुम भली-भांति जानते हो। तुम भी ऐसा कुछ नहीं करोगे, ऐसा मैं भी जानती हूं ! इसलिए आओ अब हम दोस्तों की तरह अलग हो जाएं ! हां ! उस लड़की का ख्याल रखना ! बेसहारा मत छोड़ देना उसे। उसका पूरा परिवार उस पर आश्रित है। तुम्हारी चकाचौंध उसे मोह सकती है। लेकिन वह लड़की मात्रा देह नहीं है। वह पूरे परिवार का आश्रय है - विधवा माँ, छोटे भाई-बहन, इन सब की भूख का निवाला है। एक कौर है ! एक रोटी ! केवल एक अदद देह नहीं है वह, केवल वर्जित फल भी नहीं है वह ! उस फल से उसे पेट भरना है, इसलिए उसका शोषण मत करना ! उसे प्यार करते हो तो करते रहो, लेकिन उसे नौकरी जरूर दिलवा देना और ब्याह भी करवा देना ताकि उसकी जिन्दगी प्रयोग करने की प्रयोगशाला न बने। वह अकेली रह कर जीवन जीना चाहे तो जीने देना ! अपने को उस पर थोपना मत, जबरन लादना भी मत, उसी को फैसला करने देना।

अभी तो जाओ! आंदोलन की तैयारी करो ! दुबारा साथियों को लेकर जेल आओगे तब मुलाकात होगी, इससे पहले मिलने आये मुलाकाती बन कर तो नहीं मिलूंगी। कोई खास बात हो मुझसे करने लायक तो अपने भाई के हाथ कहला भेजना। उसी के साथ आंदोलन की योजना और रूपरेखा पर विचार हो जाएगा। कम से कम दो हजार लोग के साथ जरूर जेल आना! मुझे खुशी होगी। मैं जानती हूं अभी भी तुम मुझे खुश देखना चाहोगे - पीड़ा देकर भी खुश देखना - जोखिम उठा कर भी खुश देखना।

जी चाहता है पत्रा के अंत में अपना नाम लिखूं ‘अणि’। जानते हो मेरा एक मित्रा मुझे अणि कहता था। बहुत मधुर रिश्ता रहा मेरा उसके साथ। एक बार मैं उसके घर गयी तो उसकी पत्नि भी मिलने आयी। एक कागज पर लिख कर उस मित्रा ने मुझे दो पंक्तियां थमा दी- ”राधे आयी रूकमणी धाम !“ मुझे बहुत प्रिय लगीं ये पंक्तियां और ऐसे सुख का एहसास हुआ जिसे मेरी आंखों ने उजागर भी कर दिया और मैं बड़ी गर्म जोशी से उसकी पत्नी से गले लगा कर मिली। वह बाद में अरविन्द आश्रम चला गया था। बड़ी शेवरलेट गाड़ी में वह मुझसे मिलने आया करता था- जैसे प्रेम करने ही आता हो, बस। बहुत ही कोमल था वह व्यवहार में। प्रेम, प्यार आदर झरता-टपकता रहता था उसकी आंखों से, उसकी बातों से। रात भर बिना छुए ही वह उदित कर देता था मुझे अपनी बातों से। कोमल मीठी बातें, जैसे एक सुगन्ध सी फैल रही हो मेरे कमरे में- ऐसा लगता था कहीं अश्लीलता नहीं कोई दबाव नहीं, तब कहीं भोर में जाकर वह मेरी उष्मा में अपने को डूबो देता था- और मैं आनन्द के अंतिम बिन्दु को छू आती थी। हम रात भर धीरे-धीरे पीते भी रहते थे। पर कभी ‘आउट’ नहीं होते थे। मुझे याद नहीं कभी भी मैं प्यासी रही उसके साथ। शायद वह अपने शब्दों से, अपने प्यार और प्रणय के अंदाज से मेरी प्यास ही पी जाता था। कितना सुखद था वह सब! जब तक वह रहा मेरे साथ, मैंने अपने सभी प्रेमी मित्रों के नाम अपनी सूची से काट दिए थे। जब तक वह रहा मैंने कोई समानांतर रिश्ता नहीं रखा किसी भी मित्रा के साथ।

खैर ! अब बंद करती हूं फिर कहती हूं! तुम से आग्रहपूर्वक कि जाओ आंदोलन करो! घर में तुम्हारी पत्नी भाई-बंधु भी इंतजार में हैं! आंदोलन के साथी भी प्रतीक्षारत हैं कि कब तुम बाहर आओ और उनका अह्वान करो! तुम्हारे जाते ही सब सड़कों पर निकल आयेंगे। माहौल तैयार है बस ललकार की दरकार है! देखो इस लड़की का ख्याल कुछ दिनों के लिए भुला देना। आंदोलन के बाद सोचना, जो भी सोचना हो या करना हो करना इसके बारे में।

तुम्हारे फिर से हजारों के साथ जेल में आने की इंतजार मेंµ

तुम्हारी

अणि