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उपन्यास-अंश

उपन्यास-अंश

सीता
एक

सीता, प्यारी, रनिया और सरस्वतिया, चार बहनें--सुमित्रा की चार बेटियाँ-शुकरा करमाली की बेटों जैसी औलाद। चारों बेटियाँ अपने माँ, बाबा और चाचा के साथ राँची जिला के खूँटी गाँव से राजा की खदान केदला में खटने आईं । 1958 में। राजा साहब नई-नई खदानें, नई-नई पोखरियाँ खोल रहे थे। राजा साहब जिनका नाम पूरे छोटानागपुर मे मशहूर था। जिनका राज हजारीबाग-राँची के मांडर तक फैला था। जिनकी रानश्ी अंग्रेजों के जाने के बाद से हर पाँच वर्ष में प्रजा को सिन्दूर-दान करने निकलती थी और अपने सुहाग और प्रजा के भाग के लिए वोट माँगती थी। आखिर जनता से तो कुछ नहीं वसूलती थी रानी। बेचारी एक कागज के टुकडे़ पर, कभी साइकिल कभी शेर पर मुहर लगाने को ही तो कहती थी! वरना उसे क्या दुःख था! पूरे राज-पाट, जमीन-जंगल-आकाश, आग-पानी सभी तो राजा साहब के वश में था। देखो, आकाश में उड़ते हैं राजा साहब, गगन उनके वश में है। जंगल की आग और बादल की गाज दोनों पर उनका वश है। इसलिए हैलीकाप्टर में राजा साहब चलते तो नीचे जंगलों में, रास्तों पर खेतों में आदिवासी प्रजा धरती पर लेटकर उन्हें साष्टांग प्रणाम करती है, फिर खडे़ होकर हाथ माथे तक ले-जाकर जोर-जोर से ‘जुहार-जुहार’ कहते सब लोग। बच्चे माँ को खींचकर झोंपड़े से बाहर ले-आते ‘राजा आया....राजा आया’ चिल्लते।

इन विश्वासों को पाल रही प्रजा-इन मान्यताओं को सँजो रही जनता के, उसी राजा की धरती में कोयला निकला था। खटने के लिए बुलाया था। दलाल पूरी श्रद्धा से राजा को प्रणाम करते, हाथ आकाश की तरफ उठाकर आदिवासी मजदूरों को अपने साथ चलने के लिए कहते। ‘‘खेती का क्या भरोसा? वर्षा नहीं हुई तो भूखे मरने की नौबत आ जाएगी। खदान में तो नगद ‘टटका ’ पैसा मिलेगा। ‘औरो ’(और भी ) जमीन किन सकते हो गाँव में। अभी वक्त हे चलो, नहीं तो दिकू (गैर-आदिवासी) लोग काम हथिया लेगा। फिर खेती के समय घर आने की, खेती करने की तो छुट्टी मिलबे करेगी। अरे मन न माने तो घर के चल आना । कोई भाड़ा थोड़े लगना है अभी । खट के भाड़ा भी उतर जैईते।’’ वह कहते।

लालच, स्वार्थ और पैसे की चमक दिखाका, दलाल मजदूरों को पोट-पोट लाने लगे। अगल-बगल के ग्रमीण खदान में नही उतरे थे, इसलिए दूर-दराज से मजदूर लाने के लिए आदमी छोड़े गए थे। सीता के पिता को दंगल सरदार का रुतबा मिला। सरदार माने-मजदूरों के दल का मुखिया, जिसे दल के प्रत्येक मजदूर की कमाई में से रुपए में दस पैसा बिना खटे मिलता है। वह उनके लिए मालिक से औजार और खदान में बढ़िया काम का स्थान, भरपूर काम और वक्त पर विस्फोट कराने का ‘जुगाड़’ करेगा। काम भी देखेगा ताकि कोई खाली न बैठे । हालाँकी शुंकरा का परिवार ही काफी संख्या में था, सीता ओैर प्यारी के मर्द को जोड़कर लेकिन फिर भी उसने गाँव के और चार नौजवान जोड़ों को साथ ले लिया ताकि ‘मर-बिमारी बखत’, और ‘चोट-चाट बखत’ काम में हरजा न हो। इसी काम और कमाई पर शुकरा का कमीशन भी घटना-बढ़ना था।

सबको 10 नम्बर पोखरी के ऊपर वाली पहाड़ी पर टिकाया गया। बाँस ,रोला, खपड़ा ठेकेदार ने दिया। मजदूरों ने दिया। मजदूरों ने मिलके धौड़ा छान लिया, जो राँची धौड़ा कहलाने लगा (बाद में यह स्थान सेन्टर कहलाया) । पी. डी. अग्रवाला के ठेकेदार की पोखरी में सबको काम मिला। सुरेन्द्र सिंह, द्वारिका बाबू, निरंजन सिंह, पी.डी. के स्टाफ थे और यासीन मियाँ ठेकेदार और मुंशी दोनों था। तिहरी व्यवस्था लागू थी इन पोखरियों (खुली खदानों को पोखरी कहते हैं) में। सारा परिवार खटने लगा। सरस्वतिया छेटी थी, पर उन दिनों खदानों में कोई नियम-कानून नहीं था। ना कोई ऑफिसर कानून करवाने के लिए देखभाल करने के लिए आता था खदान में। खास कर राजा साहब की खदान मे आने की हिम्मत या दम किसी अफसर या यूनियन-नेता में न था । मजाल है कोई पूछ-ताछ करने के लिए घुस सके खदान में! परेज बंगला से ही सब लौटा दिए जाते थे। माँ-बाप के साथ 12-13 वर्ष के बाल-मजदूरों को खटाना आम बात थी। रात को भी औरतें लोडिंग करती थीं मरदों के साथ। बगल में कुजू फील्ड में तो हेसागढ़ा कोलयारी में अण्डरग्राउण्ड खदान तक में औरतें खटती थीं। लगभग चार सौ औरतें। पर कोई टोकने वाला न था।

ऐसे ही पोखरी का काम बड़ा जोखिम-भरा होता है। फिर सुरक्षा-नियमों के अनुसार बेंच न रखें जाएँ, रास्ते न बनाए जाएँ, या माटी-पत्थर-कोयला न कटाया जाय, अथवा ब्लासि्ंटग न की जाय तो हरदम जान का खतरा बना रहता है। बरसात के बाद अक्टूबर से अगली बरसात आने तक, खास कर मार्च-अप्रैल माह तक कमाने के सीजन में कोयला की नोचा-चोथी शुरू हो जाती हैं बरसात-भर पत्थर टिता है। सीजन में ‘बर्टिकल कर्टिग’ (सीधी कटाई) शुरू कर कोयला निकालने की फिक्र होती है ठेकेदारों को। कानूनन तो जितनी सीम की ऊँचाई हो उतना ही चौड़ा बेंच रखना होता है। पर दो फिट से ज्यादा कोई बेंच कैसे रखता? उन्हें मुनाफा करना है, मजदूरों की सुरक्षा नहीं । और मजदूर भी कमाने के चक्कर में स्वयं की सुरक्षा की अनदेखी करते। ऐसे उन्हें मालूम भी नहीं था कि नियम क्या है? खड़ी कटाई करने के कारण भी कभी-कभी खदानें धँस जाती थीं । मिट्टी हो तो भसक जाती थी। शुरू-शुरू में समझ न होने के कारण कितने ही मजदूर मिट्टी में दब गए थे, पर कौन पूछता था! लाश भी नहीं निकालता था कोई। थाना-पुलिस तो राजा साहब की रखैल ही थे।

ठेकेदारां की दासी था थाना। पुलिस के लिए तो ये खदानें लक्ष्मी थीं उनकी। कोई मरता तो पैसा मिलता, फिर तहकीकात करने की जहमत क्यों उठाएँ, इसलिए चारों तरफ मची पैसे की लूट में मजदूर की जिन्दगी की क्या कीमत हो सकती है भला? हाँ, आपस में दारू पीकर लड़ जाते थे मजदूर ,तो थाना के प्रिय-पात्रा हो जाते थे। क्योंकि दोनों पक्ष पैसा देते थे। सुलह होने पर भी थाना में पैसा भरना जरूरी था और केस लड़ने से तो चाँदी काटता थाना-ठेकेदार ही अपनी तरफ से पैसा भरकर, उनकी मजदूरी से थाना-खर्च काट लेता था। बिन माँगे दिए गए कर्ज पर ठेकेदार को मनचाहा सूद तो मिलता ही था।

पाँव रखने-भर बेंचों पर पाँव धरते मजदूर, कुओं की तरह खतरनाक ढंग से कोड़ी गई खदानों में जोखिम उठाकर खटते थे, बिना प्रतिवाद किए। भट्टों का धूआँ उनके धौड़ों के गिर्द रात-दिन फैला रहता था और वे धुआँ पीते थे। धूल से उड़े कोयले के कण उनके फेफड़ों में बैठ जाते थे। उस दिन जो चैता मुण्डा साँप काटने से मरा था न, पोस्टमार्टम हुआ तो उसके फेफड़ों में कोयला निकला था!

सोनगढ़ा एक बस्ती है बगल में ही। वहाँ रेलवे-साइडिंग है जहाँ से कोयला वैगनों में लोड होकर जाता था। अगल-बगल पोड़ा कोयला (जलाकर बुझाया हुआ कोयला जो चूल्हे में जलाया जा सकता है) बनाने के लिऐ बड़े-बडे भट्टे लगते थे। काला-काला धुआँ हमेशा आकाश को छूने के लिए घिरनी सा-चक्कर काटकर उठाता रहता था। आँखें तो जलने लगती ही थीं उस रास्ते पर जाने से, पर गला भी फँसने लगता था। गाँव वालां और मजदूरों को आदत पड़ गई थी। उस गाँव में प्रायः फसल मारी जाने लगि थी। गाँव वालों ने काफी आन्दोलन किया इन भट्टा लगाने वालों, रेल वालों तथा कोलयरी वालों के खिलाफ, जिसमे मैने अगुआई की थी। वहाँ भी ग्रामीण मरते तो फेफड़ो में कोयला मिलता। सत्त आन्दोलन करने के बाद गाँव में तो भट्टा लगाना रुक गया, पर कोलयरी में कैसे रुकता? यहाँ तो मजदूरों की जीविका से जुड़ा था। भट्टा बन्द तो काम बन्द । जीना है तो जलना ही होगा। कोयले की धुल फाँकनी ही होगी आँखों की रोशनी गँवानी होगी। यह पेट का सवाल था। जरूरत का सवाल था। जरूरत? किसकी जरूरत? मजदूरों की जरूरत? उन्हें रोजगार चाहिए ना! देश की जरूरत ? उसे जनता के चूल्हों में जलाने के लिए कोयला चाहिये। इसलिए ‘पोड़ा ’ बनाना हैं। पोड़ा बनाना है तो मजदूरों को कोयला फाँकना है, चूँकी ठेकेदार-मालिक-सरदार मजदूरों को अलग सुरक्षित स्थान पर रहने की सुविधा देकर अपना मुनाफा कम नहीं कर सकते थें । उनके झोपड़े दूर होंगे तो बारह घंटे काम कैसे करेंगे? आने-जाने में ही समय बीत जाएगा। ऐसे घाटा लग जाएगा पूरा का पूरा। फिर थकान के कारण काम करने की क्षमता घटेगी । आखिर मजदूरों को भी पुसाई पड़े यह खयाल भी तो ठेकेदार को ही रखना पड़ता है। वरना पुसाई न पड़ने से मजदूर भाग जाएगा। सो मजदूरों के फायदें के लिए ही भट्टों के पास रखने का अच्छा-खासा तर्क था मालिकों के पास। इसलिए खदान के अगल-बगल अपने छप्पर छानकर रहे, जिसे रहना है, कमाई करना है। जब माल (कोयला) मिल जाय तो भट्टा लगाए। पानी दूर है तो भी लाए। भट्टा को ‘बुताना’(बुझाना )ही पडे़गा ना। इसलिए बुताओ(बुझाओ)

वहाँ किसी यूनियन का संगठन नहीं था। उस क्षेत्रा को लोग ‘नोमैन्स लैण्ड’ कहते थे। ठेकेदारों, लठैतों, रंगदारों ,महाजनों का राज था। धनबाद का माफिया शब्द अभी वहाँ नहीं पहुँचा था। पर 16वीं शती के मध्यम युग जैसा सामन्ती परिवेश था। राजा साहब की खदानें थीं। राजाशाही चलती थी, भले कम्पनियों, ठेकेदारों, पहलवानों की मार्फत ही सही।

चैता भी बारह घंटा तक खटता था। भट्टा लगाने, तोपने (झाँपने) का काम उसका दंगल मिलकर करता था। सो दिन-भर कोयला फाँकता था-धुआँ पीता था--और कमाई के लिए समय समेटता चलता था। एक क्षण भी नहीं गँवाता था। भोरे पाँच बजे मुँह -अँधेरे काम पर आना। भट्टा लगाकर चले जाने। दिन में झाँपना। रात में आ-आकर झाँपना-देखना। फिर तीन दिन बाद लड़भिड़कर भट्टा बुताना (बुझाना) क्यों? डयोटी का बँधा समय नहीं था क्या? क्या अपना भी कोई समय नहीं था उसका? समय तो था। पर वह था उन दहलते कोयले के अंगारों का-जो उसके पेट में भूख की लपटों को बुझाते थे।

सो वही चैता मरा। साँप काट गया था। रात को भट्टा ‘बुताने’ निकला था। सर्दी की रात, अँधेंरी रात। चारों तरफ भट्टों से निकलती सफेद छोटी-छोटी साँप की जीभों-सी लपटें। लौट रहा था झाँपकर, कि पाँव में काँट -सा कुछ चुभा, कि बस पुरा शरीर लहर गया। करिया साँप था। ज्यादा ‘टैम’ नहीं लिया जहर ने फैलने में, और उसके होश गँवाने में। साँप को गुजरते देख वह हदस गया। दहशत से भरकर वह चिल्लाया। सीता का झोपड़ा बगल में था- ‘‘करिया डस गेलो रे सीता ....बचावा, बचावा रे शुकरा!’’ पूरा राँची -धौड़ा जमा हो गया था। ओझा भी आया, मौलवी भी आया। पर विष नहीं उतरा। कभी का मर चुका था चैता। कोलयरी का अस्पताल तो कभी खुलता ही नहीं था। डॉक्टर था जो आता नहीं था। सो हजारीबाग ले आई पुलिस। वहाँ पर पोस्टमार्टम के बाद मैंने देखी थी उसके फेफडों में, पेट की पोटली में कोयले की धुल। कोयला पाए जाने की खबर आग की तरह मुहों-मुँह कोलफील्ड में फैल गई । तब से ग्रामीणों और मजदूरों में सुगबुगाहट पैदा हो गई । मिलकर आन्दोलन करने का मन बनाने लगे थे वे सब। केदला के राँची-धौड़े में मीटिंग हुई थी। पर मन में अभी भी डर भरा था। खासकर मजदूरों के। कहीं ठेकेदार काम से हटा दे तो क्या होगा? यह अहम सवाल था। पिछले साल अकाल भी पड़ गया था। गाँव में खेत परती रह गए थे या फसल सूख गई थी । सरकार ने खिचड़ी और दर्रा बाँटने का काम शुरू किया था गाँव में । इस साल भी वैसा हुआ तो गाँव में भी गुजर नहीं होगी , काम न मिलने पर।

‘‘का काम न मिलने पर यहाँ धूल भी फाँकने को न मिलेगी?’’ शुकरा ने सबको समझाया ।

‘‘कोई नेता-वेता या ऊनियन (यूनियन) वाला आया तो भले वह आगे रहता और हमनी सब पीछू रहते और लड़ाई लड़ते।’’

सुमित्रा ने टोकते हुए कहाµ

‘‘हजारीबाग में तो एक नेता जी आईन है--सोनगढ़ा की लड़ाई जहाँ का चैता रहा, ओहे नेता जी लड़ी रही । टाटा की घाटो कोलयरी में भी तो हाई स्कूल के बिलि्ंडग बना देत रहीं रातों-रात । जंगल सिपहियन के खिलाफ, उन्ही के कहे पर। हमनी के भी उन्ही के बुलाय के ले आयल चाही, इन ठेकेदारवन के जुल्म के खिलाफ’’ बुधराम जो विलासपुर का आदिवासी मजदूर था, बोला।

राधे, घसिया, मियाँ बाई, बुधराम कीरत, पटेल राम (विलासपूरिया) रामचन्द्र नोनिया और रामा चौधरी (क्रमशः गया और पलामू) और शुकरा तथा सुमित्रा कारमाली (राँची धौड़ा से) चुने गये। केदला के सरपंच जयराम महतो को साथ लेकर, मुझे केदला में यूनियन बनाने के लिए निमंत्राण देने हेतु इन्हें जिम्मा सौंपा गया। सरपंच पैटी ठेकेदारी करता था। उसने परेज के ललित बाबु से रात को जाकर बात की और सब मामला फिट कर लिया। चुपचाप बिना ठेकेदारों को खबर लगे मुझसे बात करने का प्रोग्राम बन गया। ललित बाबू की राजा साहब के प्रबन्धन तथा पी.डी. अग्रवाला की कम्पनी से लेन-देन को लेकर कुछ खट-पट चल रही थी। इसलिए उन्होंने विभीषण की भूमिका निभाई। हजारीबाग जाकर मुझसे बाज की गई ं सीधें कोलयरी ना जाकर पहले बगल वाले राहों गाँव में, जो चुटवा नाला पार करके था- जहाँ हर सोमवार को बाजार लगता था और मजदूर हाट करने जाते थे- पहली मीटिंग करने का फैसला हुआ, चूँकि उसमें खतरा कम था। कोलयरी में तो ठेकेदारो के लठैत मुझ पर वार कर सकते थे।

कीरत राम ने केदला चौक का अपना धौड़ा यूनियन के ऑफिस के लिए देने का वायदा किया, वह उसी के पीछे दूसरा झोंपड़ा बना लेगा। किसी को चुपचाप एकाएक ऑफिस में आकर झण्डा फहराया था मेरी राहों की मीटिंग के बाद। गाँव में भी पहले गुपचुप से लीडर लोग जाएँगे। पुरी तैयारी के बाद मेरा जाना तय हुआ। तब तक चुपचाप राहों/लइयो बाजार में जाकर सदस्यता काटी जाएकी। कोलयरी में सदस्यता-बुक पकड़े जाने का खतरा था। इसलिए बुक राहों बाजार के महतो के यहाँ रखवा देने का जिम्मा सरपंच जयराम महतो ने लिया। मैं एक बार केदला बस्ती हो आई थी चुनाव के दिनों में। राहों में जंगल की लड़ाई को लेकर ग्रामीणों की मीटिंग कर चुकी थी। ग्रामीणों का मोह राजा साहब से टूटने लगा था, पर भय और लिहाज बना हुआ था, जिसे तोड़ने के लिए चार -चार मीटिंग और आन्दोलन का सहारा ले रही थी मैं। कोलयरी में केवल राजा साहब ही नहीं, उनके लठैतों , पहलवानो , कर्मचारीयों, ठेकेदारों का हित भी जुड़ा था उनके साथ-इसलिए इतने लोगों से एक-साथ लड़ाई लड़ना संभव नही था। मजदूर कितनी भी एकता करते, वह महाभारत के व्यूह से भी अधिक सुदृढ़ था। अर्जुन भी शायद तोड़ न पाता उसे। इसलिए बड़े ठेकेदारों के खिलाफ मजदूरों के साथ-साथ पैटी ठेकेदारों के हितों को भी जोड़ा गया। उनकी रायल्टी की दर ज्यादा थी। उसे कम कराने का वायदा किया गया इस शर्त के साथ कि उनकी रायल्टी दर कम होने पर वह मजदूरों का रेट भी बढ़ाएगे। हालाँकि हम अच्छी तरह जानते थे कि ऐसा वह नहीं करेंगे, और मजदूरों को फिर उनके खिलाफ भी लड़ना पड़ेगा। पर स्वार्थों की एक जुटता तोड़ने के लिए यह पासा फेंकना जरूरी था। दर असल सबसे अधिक ‘खटाली’ पैटी ठेकेदार की होती थी। जोखिम भी वही उठाता था। मजदूरों से सीधा सम्पर्क भी उसी का था। बाकी तो ‘भूत-मालिक’ (घोस्ट लॉर्ड्स ) थे। पर मुनाफा सबसे कम इसी का था सो मजदूर इसी को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानता था, चूँकि भुगतान वही करता था, और आधिक मुनाफे के लिए मजदूर का पेट काटता था। दोनों को दोस्त बनाकर बड़े ठेकेदारों के वर्चस्व को तोड़ने की मुहिम हमने चलाई । ललित बाबू जो घसियादास की मियाँ बाई की मार्फत हमारे साथ आए थे, इस काम में जुट गए। सरदारों की एकता मजदूरों के पक्ष में जाय, उनके विरोध में नहीं , इसके लिए भी कई स्तर पर लोग तैयार और तैनात किए गए, मजदूरों में से--ग्रामीणों में से एवं कुछ पैटी ठेकेदारों में से भी ।

ग्रामीणों ने डटकर साथ दिया । फिर हमारी जंगल और पानी की लड़ाई के चर्चे भी फैल चुके थे। टाटा की जमीन पर स्कूल बनाने की चर्चा भी पुरजोर थी। मजदूरों का विश्वास जम रहा था। संघर्ष और संगठन के लिए सबसे जरूरी ,सबसे अहम तथ्य होता है - विश्वास। इसे हमने अर्जित कर लिया था। सुरंगें बिछ गई थीं। आग लगाना बाकी था। फिर तो एक के बाद एक विस्फोटों का सिलसिला शुरू होना था।

दो

सीता अपनी बहनों के साथ खटती थी। चारों बहनों की धूम पूरे कोल-फील्ड में थी। दो-दो मलकट्टा भी कम पड़ता था उन चारों को खटाने क लिए । कहीं सीता की माय सुमित्रा आ जूमती (जुटती) तो गजब हो जाता था। झोड़ा भरा न मिलने पर सब ‘जनीमन ’ (औरतें) मलकट्टों पर हँसती थीं। क्या भाग-भागकर ,‘हाथे -हाथ’ थोड़ा बदलकर , चट से ‘दूसर भरल’(दूसरा भरा) झोड़ा लेने आ जाती थी सीता और प्यारी । रानिया और सास्वतिया आगे-आगे पारी बाँध के माटी-पत्थर फेंक, या कोयल चट्टे पर साज सीता और प्यारी के ‘भरल’ झोड़ा लेकर खाली झोड़ा थमा जाती थीं। सीता की माय सुमित्रा तो इन तीनों से फुर्तीली नजर आती थी। पर वह शुकरा के साथ ही अधिक खटती थी। सीता और प्यारी के मर्द इन चारों को साथ में खटाते थें। पर वह सकते नहीं थें चारों को खटाने। इसलिए मुंशी बाबू ने दूसरे मलकट्टे बदल दिए इन चारों के साथ और इनके मर्दों के साथ दूसरी कामिनें दे दी थीं ।

चारों बहनों की देह लशकती थी। खूब काली केन्दू पत्ते से गाछ-सी । उनकी देह थी गठी-गठी, गुथी-गुथी ,पत्थर-सी मजबूत, पर हाथ रखांं तो इतनी कोमल कि फिसल जाए, चुटवा नदी की तलहटी में पडे़ सपाट काले पत्थरों-सी , साफ-सुथरी, सरपट देह। चारों जनी रात को रोज नहाकर कडुआ तेल (सरसों का तेल) लगाती थीं। चाहे कितनी ही शीत पड़े , पर इनका नहाना नहीं रूकता था। छुट्टी के दिन, घर-बार और दीवारें और मिट्टी और गोबर से लीपना-पोतना या जंगल से बीनकर लाई लाल, बैंगनी , काली मिट्टी से ‘पोतल’ (पुती हुई) दीवार पर ‘छाई’ (राख)के फूल बनाना सुमित्रा और सीता का काम था। एतवार के एतवार सिर नहाकर लम्बे काले बाल सुखाना, फिर एक-दूसरे का सिर देखना, कहीं जूँ-वूँ तो नही, उनकी ड्यूटी का हिस्सा-सा बन गया था। सीता और सरस्वतिया के बाल घुँघराले थे।

अपने ही जुल्फें निकल आती थीं। कसी-कसी देह पर खूब टाइट बाहों वाली ब्लाउज ,लाल पाड़ वाली साड़ी पहनकर, चारां बहनें घाटों, राहों या लइयों बाजार जाती थीं, तो बाजार लहक उठता था । अलग-थलग-सी दीखती थीं वे। बड़ी हसरत-भरी नजरों से देखते थे मुंशी और ठेकेदार इन्हें। पर परिवार बड़ा था। शुकरा सरदार का रुवाब भी था। घर में लोहरा के काम का पूरा सामान था, इसलिए भाला भी बना पड़ा रहता था। किसी की हिम्मत न होती थी छेड़खानी करने की। फिर चारों बहनें हमेशा साथ रहती थीे। कमर में हाथ डालकर चलती थीं एक-दूसरे के। ऐसे भी आदिवासी लड़कियाँ इकट्ठी ही चलती हैं कमर में हाथ डालकर, अकेली नहीं। सुमित्रा अपनी बेटियों पर जान देती थी। सारी कमाई एक जगह बाप के पास जमा होती थी और पेमेन्ट के बाद वह सबका हिस्सा बाँटकर अलग-अलग जोड़ों को दे देता था। राँची -धौड़ा में हर रविवार को खस्सी (बकरा) कटता था। विलासपुरिया मजदूर भी उसी में अपना हिस्सा डालकर ले जाते थे। सीता का मरद खस्सी लाकर बेचने भी लगा था। फिर सोमवार को पीलकर सब ‘मातल’ रहते थे। और यह नशा सोमवार तक रहता था। फिर सोमवार को राहों बाजार जाते तो यहाँ भी चबेना के साथ एक आध कट्टा सभी पी-पीकर लौटते। रात को फिर हँड़िया का दौर चलता । कभी-कभी पीने में मुंशी भी शामिल हो जाता । ठेकेदार बाबू आ जाता तो उसके लिए खास तौर पर ‘खास्सी ‘कटाता’।

प्रायः साँझ में सब सरदार के चबूतरे पर जमा होते और दिन-भर की चर्चा --मुंशी , ठेकेदार या किसी हजारीबाग शहर की , बैठकर करते। भुगतान के बँटवारे में झगड़ा का निपटारा भी सरदार ही करता। उससे न निपटता तो ठेकेदार को बुलाया जाता।

इन खदानों में उन दिनों मैनेजर नाम की कोई चीज न थी, हाँलाकि नियमतः मैनेजर के बिना खदान चल ही नहीं सकती थी। इसलिए राजा साहब ने एक मैनेजर रखा छोड़ा था खाना-पूर्ति के लिए, जो सभी ठेकेदारों का मैनेजर था। वह परेज बंगला में ही रहता था। यदा-कदा वहीं बैठता था। खदान में कभी भूलकर भी नहीं जाता था। ठेकेदारी में उसका भी हिस्सा था। काहे को आने लगा भला खदान में? कभी-कभी ठेकेदार तंग करता तो कोई इक्का-दुक्का पुराना मुँह-लगा मजदूर जिसे या तो मुंशी या किसी अन्य ठेकेदार की शह हो, पहुँचता था शिकायत करने, अन्याथा किसकी मजाल कि परेज बंगला के दफ्तर पहुँच जाय! वह तो राजा साहब का दफ्तर था। ‘बड़-बड़’(बड़े-बड़े) हकिम बैठते थे वहाँ। भला वहाँ मजदूर का क्या काम? कोई ऐरा-गैरा ‘ढुक’(घुस) जाय, यह संभव नहीं था। हाँ, कभी-कभी कुछ बाबुओं या ठेकेदारों की मुँह-लगी कामिनें या उनके दलाल जरूर आते-जाते रहते थें। पर मैनेजर से छिपकर। परेज ऑफिस के कई स्टाफ-बाबू और अधिकारी भी ठेकेदारी में पत्तीदार थे। इस नाते वह कोलयरी में आते-जाते रहते थे। कइयों के तो विलासपुरी कामिनों से भी सम्बन्ध थें। सो रात को कोलयरी में धौडे़ में ही दारू-चबेना, चुहलबाजी होती रहती थी। कामिन का मर्द सब सुविधाएँ उपलब्ध कराता था ‘बाबू -मन को।’ उसके बदले उसे एक पेटी बोतल, खस्सी का एक बड़ा टुकड़ा, या कभी-कभी कमाई में कुछ जुड़ जाता था, वह भी किसी और की कमाई घटाकर। जब माँगे तब कर्ज की सुविधा तो उसे मिलती ही थी। उसी में उसकी कामिन बँधकर रहती थी बाबू साहब के पास। घसिया दास की मियाँ बाई का किस्सा चर्चित था। लाल मियाँ पर मुग्ध थे- यह जग-जाहिर था।

अन्य मजदूरों की तरह सीता का परिवार भी मुँह-अँधेरे उठकर, ‘भोंथा-भात’ (पानी डाला हुआ बासी भात) खाकर, साथ में एल्यूमीनियम के डिब्बे में या माटी की हाँडी में पानी भरकर तथा दूसरी हाँड़ी में पानी-भात डालकर काम पर चले जाते। ऐसे तो खदान का समय मौसम के अनुसार प्रातः 7 बजे और 8 बजे के बीच बदलता रहता था। मुंशी उसी समय आते थे और दिन में 12 से 2 बजे तक खाने की छुट्टी रहती थी। लेकिन काम के घंटे व्यवहार में न तो निर्धारित थे, न निश्चित ही। इसलिए जैसे ही ‘सुझने’ लायक होता तो मजदूर खदान में चले जात, और ‘सूझना’ बन्द हो जाता तो लौट आते। लाइट का इन्तजाम नहीं था। जरूरत पड़ने पर डीजल में भींगा कपड़ा जलाकर रोशनी की जाती थी। सभी के सभी पीस-रेटिड-ठीका मजदूर थे। जितना खाटते थे उतना ही पैसा पाते थे। दिहाड़ी का हिसाब नही। एक टन पर रेट तय थे। सब को ‘कचिया’ कोयला (बिना ब्लासि्ंटग किए गैंती से जो कोयला काटा जाता है उसे ‘कचिया’ कहते हैं ) काटना होता था। मिट्टी-पत्थर का रेट चौका पर था। हुल मारना (पत्थर तोड़ने के लिए ब्लासि्ंटग की खातिर बारूद भरने के लिए किए गए सुराख को हुल कहते हैं) भी उसी रेट में शामिल था। हार्ड-पत्थर और सफ्ट-पत्थर का रेट अलग होता था, कोयले का अलग। फायर-क्ले भी इन खदानों में होती थी और पत्थर जैसी हार्ड मिट्टी भी, जो बिना डायनामाइट के नही टूटती थी। पर टुटने पर चूर-चुर होकर बिखर जाती थी। इनका रेट इतना कम होता था कि परिवार का पेट पोसने लायक कमाने के लिए मजदूरों को 12 घण्टे तो अवश्य खटना पडता था। कोई ज्यादा जरूरतमन्द मजदूर हुआ, तो वह रात को तीन घंटा लोडिंग करनी पड़ती थी। उसका कोई समय निर्धारित नहीं था। वही तो असली लक्ष्मी था। उसी से पैसा आता था। इसलिए गाड़ी कभी रूकती न थी। ट्र्कलोडर पहले गाड़ी ‘लौकने’(पकड़ने) के लिए रात-दिन अगोरते रहते थे।

सीता दो बच्चियों की माँ हो गई थी। बिना मरद के कमाई में पूरा न पड़़ता था। छोटी को वह भी पीठ पर बाँधकर ले जाती और बड़ी के सिर पर भात की हाँड़ी या पानी की डेगची रखकर साथ ले जाती। खदान में वह ऊपर टेंगरी पर बिठा देती उन्हें किसी चट्टान के साये में। ‘बड़की’ छोटी बहन को खिलाती रहती, कभी सुला देती। दिन-भर माँ को खटते देखती। कभी पत्थर बिनकर खेलती, कभी छोटी बहन को कुछ-कुछ सुनाती रहती, जिसे वह ख्ुद भी समझती न थी, ना ही छोटकी समझती थी। पर कहानी सुनना और सुनाना दोनों को ही अच्छा लगता था। खदानों में काम देना और हाजरी गिनना मुंशी का ही काम था। नापी भी वही करता था। माइनिंग बाबू (ओवर मैन) चार-पाश्ँच खदान में होता था जो साँझ को अपनी रिपोर्ट भेज देता था--मुंशी की रिपोर्ट के आधार पर। माइनिंग सरदार को ब्लासि्ंटग करवानी होती थी होल में।

पर वह सब काम कानून के विपरीत मजदूरों से ही कराए जाते थे। मजदूर भी ब्लासि्ंटग स्वयं करना चाहता था चूँकि उसे ‘पुरकस’ (भरपूर) बरूद भरने का मौका मिलता था जिससे ‘माल’ ज्यादा अच्छी तरह टूटता था। वरना अगर माइनिंग बाबू के हाथ छोड़ देते तो ‘माटी-टोपी’ चोरी कर वह बेच देता था और मजदूरों को कम ब्लासि्ंटग के कारण ज्यादा मेहनत करनी पड़ती थी, जिससे कमाई कम होती थी। इसी में तो फिरतू का हाथ उड़ गया और अभी भी चौक में बैठकर भीख माँगने लगा था।

फिरतू उस दिन सवेरे ही जाकर होल में ठसानी का आया था। माइनिंग बाबू ने चैक भी कर लिया था। ब्लासि्ंटग भी हो चुकी थी। कुछ होल उड़े नहीं। फिरतू वही देखने गया कि बारूद उड़ा या नही। जैसे ही वह होल के पास गया, होल उड़ गया। साथ ही उसका हाथ भी उड़ गया। यह तो गनीमत थी कि बारूद कम था कि वह समूचा नहीं उड़ सका। उसका तो पता भी न चलता। चिल्लाया। मजदूर भी दौडे़। ‘ह-ह-ह’ करता माइनिंग सरदार भी भागते-भागते रुक गया और खड़ा का खड़ा रह गया। एक भयानक चुप्पी छा गई पूरी पोखरी में। थाना-पुलिस को खबर तो कोई करता ही नहीं था। डॉक्टर के पास भी जाता नहीं था कोई, कि रिपोर्ट न हो जाय। सो वहीं पर कपड़ा फाड़कर पट्टी कर दी गई। मजदूर जो आ जुटे थे उन्हें छुट्टी कर, धौड़े में भेज दिया गया। फिरतू को धौड़े में लाकर लिटा दिया गया जिससे घटने घर में घटी साबित हो। घटना-स्थल पर से खून समेत सभी प्रमाण मजदूरों ने ही साफ कर दिए। फिरतू के कोई कि पैसा नहीं हैं इलाज के लिए। परदेस में कर्ज मिलना भी कम बड़ी बात न थी मजदूरों के लिए। 100 रूपए कर्ज मिलता था। घर जाने का भाड़ा लेता तो वहाँ जाकर खाजा क्या? कौन खिलाता उसे? कम-से-कम यहाँ अगल-बगल धौड़े वाले उसकी खोज-खबर तो कर ही लेते थे। यूनियन पूरी तरह बनी नहीं थी। जंगलों में मीटिंग होती थी। इसकी चर्चा भी राहों में गुप्त मीटिंग में हूई। ‘अभी समय नही है आवाज उठाने का--इसलिए सहो’-- यही फैसला लिया था सब ने। पर उस दिन से मजदूरों ने ठसारी का काम बन्द करने का निर्णय मन-ही-मन से लिया था। वे धौड़ो में भी यह चर्चा चलाने लगे थे कि अब ठसानी का काम उनका नहीं है तो वे क्यों करें? उनका यह काम करना गैर-कानूनी हैं।

‘‘आखिर तो जीने के लिए कमाते हैं न! अधिक कमाई के चक्कर में मर ही जाएँगे या लाँगड़-लूल्हा हो जाएँगे तो के पोसेगा हमनी के? ज्यादा कमाये से हमनी के का फैदा होत है? हमनी ते ज्यादा तो ठेकेदार के फैदा होत हैं। ऊ तो हमरा के ज्यादा पैसा न देत है ज्यादा खटाली या फालतू काम के बदले। हमनी भी तो ठीका पर है। तो काहे ले आपन जान गँवाए के उकर घर भरेंगे? ई जोखिम के काम मा हमरा हिस्सा भी तो होवे के चाही।’’ करमू बोला था। फिरतू का दामाद था वह।

धौड़े में बहस चल पड़ी थी भीतर-ही-भीतर । पर ऊपर से सब शान्त था। मुंशी ठेकेदार भी अकबकाहट-सी महसूस कर रहे थे। आदत के विपरीत वह फिरतू को घर पर भी आए थे। असल में करमू सरदार की नाराजगी से वे डर थे। वह लगभग 150 मजदूरों का सरदार था। चाहे वह कितना भी वफादार राह हो, पर उसकी नाराजगी 150 मजदूरों के माध्यम से जाहिर हो सकती थी। वही करमू सरकार अब यूनियन की मीटिंगों में जाने लगा था। वह गुस्सा था। मजदूर अपने सरदार पर आस लगाए बैठे थे। शुरू में सरदरों ने यूनियन का विरोध किया था। चैता के बाद फिरतू की घटना सामने था। यूनियन ने बताना कि फिरतू के हाथ उड़ने से उसकी भरपाई ठेकेदारों को देनी पड़ेगी केस करने पर। तब से मजदूर उखड़ा-उखड़ा रहने लगा था।

‘‘यहाँ तो मरने पर भी कोई नहीं पूछता है, कानून तो घायल होने पर भी भरपाई करे का हैं। हम ही आन्धर हैं। आपन भला-बुरा नहीं विचारते। गाय-गोरू माफिक सरदार हंकाय चलत है हमनी के। आखिरी हमनी भी तो इन्सान है! अब तक हम पीछू-पीछू चलत रहे सरदार के , अब हमनी जे महव, सरदार के करे पड़ते। बोल सरदार, तू हमर साथ है या ठेकेदार के साथ?’’ जोहित राम पे सवाल दागा।

करमू चूप रहा। मजदूरों में हल्ला होने लगा।

‘‘ कल के बताएँ।’’

अगले दिन सवेरे-सवेरे करमू हजारीबाग चला आया मुझसे मिलने। साँझ को लौटा तो चेहरे पर एक दृढ़ता थी-- एक संकल्प था। आँखों-ही-आँखों में मजदूरों ने उसका फैसला पढ़ लिया।

‘‘अभी ठेकेदारों को खबर नहीं होनी चाहिए, नहीं तो वे तुम्हें हटा देंगे। अभी सरदारों को फोड़ो, और साथ मिलाकर फिर एक दिन मीटिंग में मुझे गुलाओ। मैं सब इन्तजाम करके आऊँगी।’’ मैंने उसे ताकीद की थी। ,

फिरतू चौक पर बैठकर भीख माँगता था तो आते-जाते मजदूरों के मन में एक बेचैनी भी पैदा करता था। उन्हें उनकी कमजोरी का अहसास कराता था। उनहें एक होने की तरफ प्र्र्रेरित करता था।

‘‘एक होना चाहिए।’’ यह मन्त्रा मन-ही-मन उसके कानों में बराबर गूँजने लगा। ‘डर, भय-- बस इसी से मुक्ति पानी थी। किस दिन? सवाल यह भी था। कई सरदार टूट चुके थे। लोडर साथ नहीं दे रहे थें। उनकी कमाई मलकट्टों से ज्यादा होती थी और ठेकेदार भी उन्हें बाकी सब पर तरजीह देता था। वक्त पर उनसे मलकट्टों को पिटवाने का काम भी लेता था। ज्यादा पलामू और गया के थे। विलासपुरी जल्दी एकता करता है। शुरू में जितना डरपोक होता है,उतना ही निडर भी हो जाता है बाद में। औरतों अधिक बहादुर होती हैं उनकी।

राँची वाले आदिवासी या तो साथ आते ही नहीं, आ जाते हैं तो उन्हें खुदा भी वापस नहीं कर सकता।

पलामू और गया के लोडर अधिकांशतः नोनिया, पासवान या मेहरा थे। नोनिया छोड़कर बाकी सब अकेले खटने आते हैं। जल्दी एक नहीं होते; पैसा घर भेजना है, इसकी चिन्ता उन्हें सोचने का मौका नहीं देती। अधिक लोभी भी हो जाते हैं, ऐसे अकेले काम पर आने वाले लोग। पर अगर वे यूनियन में आ जाते हैं तो किसी भी यूनियन का अगल(हरावल) मारक दस्ता बन जाते हैं। उन्हें फोड़ने का काम शुकरा को मिला। चूँकि राँची वाले भी खासकर आदिवासी औरतें, ट्रक लोडिंग का काम अधिक करते हैं, सो शुकरा भी सुमित्रा, सीता, सरस्वतिया सब को इस काम पर लगा दिया।

तीन

यासीन मियाँ सीता की पोखरी का मुंशी था। हाजरी भी मुंशी ही लगाता था, नश्यापी भी वही करता था और काम भी वही बाँटता था। ठेकेदारी के दौरान नियमानुसार अलग से हाजरी लगाने वाला कोई था ही नहीं। इन खदानों में मुंशी ही अपनी डायरी में नाम लिखता था, हिसाब-किताब के लिए। हाजरी-बही में तो कम नाम होते थे और वह खाता ठेकेदार के पास रहता था। उसे तो सरकारी अधिकारियों को दिखाने केलिए भरा जाता था। इसलिए जिसको हाजरी बाबू का पदनाम भी दिया गया था वह भी यह काम नहीं करता था। हाँ, रजिस्टर वह जरूर तैयार करता था। मुंशी होने के नाते दरअसल यासीन बाबू ही सीधे मजदूरों से जुड़ा हुआ था। सारा दारोमदार इन मुंशियों पर ही होता था ठेकेदारोंका। रेजिंग (कोयले का उत्पादन) से लेकर वेतन के हिसाब तक, सब यही लोग रखते थे। हालाँकि ‘रेतिंग कान्ट्रेक्टर’ केनाम से ही नियमानुसार बड़ी कम्पनी को ठेका मिलता था, किन्तु वास्तविक रेजिंग पेटी ठेकेदार और मुंशी ही करवाता था। पैटी ठेकेदार कोयला उत्पादन कर बेचता और रायल्टी बिचौलिये ठेकेदार को देता। बिचौलिया ठेकेदार बिना काम किए अपश्नया हिस्सा रखकर रायल्टी रसीवर को देती थीं, जोइन खादानों पर राजा रामगढ़ और बिहार सरकार के विवाद में कोर्ट ने बिठाया था। रसीवर आने के बाद ही केदला-फील्ड में यूनियन का बनना संभव हुआ था। चूँकि बिहार सरकार का हस्तक्षेप खदानों में था और उसके द्वारा पुलिस और प्रशासन भी बीच में आ जाता था, अतः इन्हीं प्लसमाइनस प्रभावों के बीच यूनियन का विकास होता रहा था। मजदूरों की एकता बढ़ती रही थी। ठेकेदारों का मनोबल टूटता रहा था। खदानों के सरकारीकरण की लड़ाई मैंश्ने छेड़ दी थी। डेढ़ बरस खदानें बन्द रहने के बाद हड़ताल तोड़ी थी मजदूरों ने, जब केदला का नाम दो-दो बार सरकारीकरण की सूची में आ गया था। अब लड़ाई भारत सरकार के साथ शुरू हुई थी। पर ठेकेदार के साथ मुंशी सुपरवाइजर बने बाबुओं से भी युद्ध ठन गया था मजदूरों का।

पतला-दुबला, गोरा, तीखें नै-नक्श, होंठों पर हमेशा मुस्कान, तेज आँखें भेदती हुई-सी यासीन के चेहरे को सलोना, आकर्षक , माहक और चुम्बकीय बश्ना देती थीं। यही आँखें तो कामिनों के मन-प्राण में उतर जाती थीं कभी-कभीं। उसकी मुस्कान पश्र भी बड़े व्यंग्य-बाण फेंकती रहती थीं कामिन सब। कोई भाभी तो कोई दीदी, तो कोई अल्हड मदमस्त भामिनी, कई रूपों में उन्हें देखता ,पुकारता, मानता था यासीन । पर बिना मरजी, जबरन कभी कुछ न करता था। धीमा बोलता था। हिसाबी पक्का था। ‘एको’ पैसा न मारता था, न छोड़ता था। ‘बखात’ पर काम भी चला देता था मजदूरों का। ठेकेदार का भी विश्वासी था और मजदूरों का भी दुश्मन नही था, भले दोस्त न हो । पर दूसरे मुंशियों से ज्यादा नजदीक था मजदूरों के ,खासकर कामिनें बहुत मानती थीं उससे। उनके बच्चे काम पर साथ आते तो वह अपने गिर्द खेलने देता था उन्हें। ‘दूध-पियाने’ की छुट्टी माँगने पर तंग न करता था कामिनों को।

अभी निकाह नहीं पढ़ायाथा उसने अपना। घर में तीयन बहनों का निकाह करना जरूरी था। बाप था नहीं इसलिए पूरी कमाई में से आधा घर भेज देता था। माँ उसकी कमाई पर जिन्दा थी। छोटा भाई भी यहीं उसके पास था, जो पढ़ता था और उसके साथ काम में हाथ बँटाता था। काम भी सीखता था।

सीता और उसके मर्द दोनों अलग चूल्हा कर लिया था, पर गुजर करना कठिन था। वह और अधिक पीने लगा था। ‘‘ इतना मत पियो कि सड़क पर गिर जाओ। घर के लिए भी कुछ बचाकर रखो।’’ यासीन मियाँ ने कई बार सीता के मर्द को समझाया । पर पता नहीं सीता के मर्द के दिमाग में उसकी कोई नसीहत क्यों नहीं अटी थी कभी भी। सीता से झगड़ा भरी जाता था कई बार वह । वह सीता को पूरा माल (कोयला या मिट्टी -पत्थर ) नहीं दे पाता था। सीता को खड़ी रहना पड़ता था, तब वह टोकरी में माल बोझना था। इसी से यासीन ने उसे कई बार डाँटा था। शुकरा भी जो दंगल-सरदार था उसे अपने दंगल से हटानेकी चेतावनी दे चुका था। कम खटने वाले को अक्सर सरदार ओर मजदूर पसन्द नहीं करते थे, चूँकि उनकी अपनी कमाई पर असर पड़ता था। न जाने क्या सोचता रहता था वह कि जब तक सीता लौट न आए वह पास पड़ी वाली टोकरी भी भरकर तैयार नहीं रखता था। वह खड़ा-खड़ा सीता को देखता रहता था। दूसरे मलकट्टे (कोयला काटने वाले मजदूरों को मलकट्टा कहते हैं) दो-दो कामिनों को खटाते थे । यह एक सीता को भी न खटा रहा था। बार-बार ठेकेदार ने भी डाँटा था उसे कि ‘‘भगा देंगे अगर काम नहीं करेगा तो ।’’ पर सीता दुगुना खटके भरपाई कर देती थी ।

‘‘तोहनी के काम चाही ना, सो हम पुराय देब। झठो उकरा के डाँट नाय ।’’ सीता कहती । फिर भी यासीन ने सीता के साथ दूसरा मलकट्टा लगा दिया था इसे बदलकर। सीत का मर्द अपने को सीता से छोटा समझने लगा था। वह उससे डरने भी लग था। इसलिए अब काम में उसका मन नहीं लगता था, ना ही वह घर में टिककर रह सकता था। ससुर से पटरी बैठती न थी। झगड़ने भी लगा था वह रोज-रोज । इसलिए वह घर से कटा-कटा रहने लगा था। पहले तो दारू पीकर घर में पड़े रहना उसकी आदत थी । अब वह ज्यादा समय घर से बाहर ही रहने लगा। शुकरा से रोज झगड़ा होता- और सीता से बतकही।

अब वह देश जाता तो तीन-तीन महीना तक नहीं लौटती था। सीता को अकेले घर, बच्चे और खदान का काम सँभालना पड़ता था। बच्चे पैदा होने के बाद सीता और निखर आई थी। पर वह चिंतित रहने लगी थी। चिन्ता ने उसके चेहरे पर मासूमियत भर दी थी जो मोहक लगती थी। मरद अभी तक लौटा नहीं था। देश खबर भेजी तो पता चला वह असम चला गया है दूसरी जनाना लेकर। सीता का मन टूटगया। किसी भी काम में मन न लगता । सुमित्रा और शुकरा बेटी के दुःख से चिन्तित थे--दुःखी थे। पर क्या करते! कोई सामने हो तो पंच बैठाकर फैसला करे। असम में कहाँ पर खोजने जाएँ? बरस भी बीत गया। यासीन मियाँ जो खदान में पत्तीदार (पैटी-ठेकेदार) भी था और मुंशी भी, नेसीता को दूसरे मलकट्टेके साथ काम दे दिया था।

अब सीता की देह गलती जा रही थी। आँखें जो सदा हँसती थीं, उदास हो गई थीं। सीता खदान में आती थी तो पूरी खदान जान जाती थी कि सीता ओ गई। पर लोग जान भी नहीं पाते थे।

इस हफ्ता चापल के दाम-भर भी पैसा नही उठा। यासीन मियाँ ने पूछ ही तो लिया था उससे--

‘‘क्या बात हैं सीता ? कैसे हफ्ता चलाओगी? कमाई तो हुई नहीं?’’

सीता की आँखों में आँसू थे। मरद पर गुस्सा भी था।

‘‘जन्म जला अपने तो भायग गेले, और आपन औलाद के हमर खतिर छोड़ गेल। हम केने-केने (कहाँ-कहाँ) देखबै! बचिया बीमार हले, तबै एक हफ्ता नागा बेशी (अधिक ) हो गेल। जे पैसवा हले, ओझा के दिया गेल, बचिया पर ‘छाया’ प्रेत-छाया) के दूर करे खातिर ! अब तो उपासे ही रहे पड़ते। गीदरवन (बेटियों) की फिकर है मुंशी बाबू , हमनी तो खायले बिना भी गुजर कर सकिहये।’’

‘‘तू फिकर न कर , सीता मैं जुगाड़ बिठा देता हँ। करमू धर गय है। बीच हफ्ता में उसके अरखे (कार्य-स्थल) की कमाई तेरे नाम पर चढ़ाकर पैसा बना देता हूँ। जब वह आएगा तो तू निपट लेना, अपनी कमाई उसको दे देना ।’’

‘‘ठीक है।’’

और इस हफ्ता वह बढ़ोतरी पैसा ले आई। उसे यासीन मियाँ अच्छा लगने लगा। यारीन भी मौका निकालकर हँसी-ठट्ठा कर लेता। सीता जो पहले किसी की बात बर्दाश्त न करती थी, अब गुमसुम रहने लगी। हर हफ्ते सीता के खाते में कुछ-न-कुछ बढ़ाकर यासीन चढ़ा ही देता था। उसकेइस अहसान के बोझ-तले दबी दबी जा रही थी सीता। पैसा न बढ़ता तो गुजर मुश्किल थी। वह माँ-बाप से माँगना नहीं चाहती थी। दुसरा कोई मर्द करने की इच्छा नहीं थी। फिर यासीन मियाँ का चेहरा जो उसकी आँखों के आगे तैरता रहता था। उसका मन मछली-सा बिंध गया था काँटे में । डोर ढीली छोड़ दी मछुवारे ने। एक दिन तो खिंचनी ही थी डोर । यासीन के पास खिंचकर उसे जाना ही था।

एक दिन खदान में सबसे पीछे रह गई सीता। प्यारी ने कहते हुए टोका, ‘‘घर नाय चलबे दीदी? बेला हो गेले।’’

‘‘चार झोड़ा माल बाकी हय। ढो के ही आयब। तू जो घर।’’

प्यारी तथा बाकी सब चले गए। वह अकेली माल ढो रही थी जो मलकट्टा काटकर या जमा करके जा चुका था। ासीन उसके पास आया और झोड़ा अलगाने (उठावाने)लगा। सीता पहले तो सकपकाई। यासीन मुस्कराया, फिर हिम्मत जुटाकर उसके हाथ को छुआ।

‘‘तेरी कसम सीता, मुझसे तेरा दुःख देखा नहीं जाता। मैं तुझे रखने को तैयार हूँ।’’ वह बोला। सीता की आँखों से टपटप आँसू टपक पडे़। होंठों से हँसी भी फूट निकली।

‘‘ पर तोर धर्म नाय अलगे है, हमर बिरादरी अलग कर देते। ओकर पर(उस पर) बी की तू हमरा रखबे?’’

‘‘हाँ सीता हाँ, तोजे कहबे ओहो (वही) हम करग। तू बस हाँकर दे।’’

‘‘हम धरम नाय बदलब। हमर रीती से ब्याह करे पड़तै। नाय तो तोर धरम माय चार शादी करे के हक हय। हम सैतिन घरे नाय आय देब।’’

‘‘नहीं सीता, हमऊ माँझी बन जाब। पाहन बुला के ब्याह करबे, दूसर ब्याह कभी न करबे। बस तें हाँ कर दे।’’ उसी की भाषा में यासीन बोला।

और सीता ने हाँ कर दी। माल पूरा उठाकर सीता सीधे यासीन मियाँ के साथ हो ली। एक बेटी को यासीन ने उठाया, एक का सीता ने। दोनों धौड़े में आए तो बिना बोले लोगों ने आँखो-ही-आँखें में सवाल पूछे। सबकी नजरें सवाल बनकर उठ गईं। नजरों का मुकाबला कर उत्तर दिया सीता न भी, आँखों-ही-आँखों में।

‘‘हमर मन तुम लोग कौन हो दखल देये बाले?’’

‘‘शुकरा को मालूम हुआ। सुमित्रा दौड़ी आई। पर सीता ने एक ही रट लगा रखी थी--‘‘हमर मन हय।’’

सुमित्रा सबको कहती फिरती--‘‘जादू कर दिया है यासीन मियाँ ने हमर सीता पर। कोई गंड़ा-ताबीज किसी मौलवी से करवाकर उस पर फेंक दिया, तभी तो पगला गई है। ’’

‘‘न जाने नासपीटा कौन जड़ी-बूटी खिलाय देले है हमर कोयल जैसन बेटी के, कि भयर दिन(भर दिन) यासीन मियाँ के नाम लेत रहल हय। हाय रे! हमर बेटी के भरमा देल है ई साला कटुआ।’’

लगता था सचमुच सीता को नशा हो गया हो। नशा-यासीन का नशा। एकाएक बाँध टूट गया हो जैसे। बाढ़ की तरह तोड़ बहने लगा सीता का प्रेम। सीता नदी-सी बही जा रही थी। यासीन भँवर-सा उसे पकड़ने समेटने के लिए चक्कर काट रहा था। भँवर-सा उसका प्यार उसे भीतर-ही-भीतर अपने मे खींचे लिये जाने लगा था।

दोनों सवेरे काम पर निकलते-सबकी नजरें उठतीं। राँची-धौड़ा वाले मुँह फेर लेते। विलासपुरी उँगली उठाते।

‘‘ऊ जा रहल है सीता, यासीन मियाँ के साथ! और मुँह दबाकर हँसते।

कुछ युवक रश्क करते, ईर्ष्या से कुढ़ते-- वह पहले क्यों नहीं सोेचे सीता के बारे में? लड़कियाँ मने-मन खुश होतीं, मुस्कातीं-- कभी वह भी अपना मनपसन्द दुल्हा चुनेंगी। उनका प्रेम भी चुटकी भरता-उड़ानें भरता। यासीन और सीता की जोड़ी चर्चा का विषय बन गई थी। दोनों साँझ को काम सेे लौटते। नहाते। बच्चों को कपड़े पहनाकर घाटो बाजार चले जाते।

घाटो में हर शनिवार को टाटा-कम्पनी एक फिल्म दिखाती थी मैदान में। वे भी भीड़ में घुस, बेंच पर बैठ जाते। दोनों एक-दूसरे का हाथ पकड़े रहते। सीता न जाने क्यों बेचैन हो उठती थी, एक पल भी यासीन के आँखों से ओझल हो जाने पर।

ऐसा तो उसे पहले कभी नहीं हुओ था। इसीलिए लोग कहते हैं कि जादू कर दिया है यासीन ने उस पर। वह एकटक उसे देखती रहमी चुपके-चुपके। यासीन उसकी इस ऊष्मा से अछूता नहीं था। एक घोंसलें में जो ऊष्मा मिलती है- गर्मी और सुरक्षा मिलती है,वही उसे सीता के सान्निध्य में मिलती थी। वह था तो बिना घोसला वाला पंछी इतने दिनों तक। न खाने का ठिकाना न सोनेका ठौर ,न ओढ़ने-बिछानें का जुगाड़। जब से सीता मिली थी, उसने बाहर-भीतर दोनों सँभाल लिया था। अब उसे खुद चुल्हा धराना नहीं पड़ता था। भोरे-भोरे सीता कर लेती थी सब। कपड़ा भी फींच लाती थी उसका, जब अपना और बच्चों का कपड़ा फींचने जाती थी। कमाती भी थी। पुरी कमाई उसे लाकर दे देती थी। यासीन सीता को घर चलानेका खर्च देकर बाकी सब खुद रख लेता था। सीता की पूरी कमाई का अब मालिक बन गया था यासीन। यासीन साग-सब्जी लेने जाता तो सीता खुद साथ जाती। ताजा सब्जी लाएगी देखकर। सामने खस्सी (बकरे का गोश्त) कटवकर लाती। अब वह हलाल गोश्त कटवाकर लाने लगी थीं यासीन क चलते। कभी-कभी वह मजाक भी करती थी इसी बात को लेकर।

‘‘आखिर तो खस्सियों का मांस ही रहत है न! कलमा पढ़े से की खस्सी और कुछ बन जौते? की ज्यादा स्वाद हो जैते?’’ वह पूछती। यासीन हँसकर टाल जाता। ठेकेदार बाबू को मालूम हूआ तो मुस्कराए। वह कुछ चिन्तित भी हुए। कहीं यासीन चोरी न करने लगे, सीता के नाम ज्यादा नापी न चढ़ाना शुरू कर दे! इसी डर से उन्होंनेयासीन ाक अपनी दुसरीपोखरी में स्थानान्तरित करना चाहा। पर यासीन अड़ गया। जिद करके वह वहीं रह गया था दोनो के प्रेम में फरक नही पड़ा यासीन भी सीता की बेटियों को अपनी बेटियों की तरज मानता। बड़ी बेटियों के बाप के नाम में अपना नाम चढ़वा दिया ठेकेदारी रिकॉड में। हालाँकि वह पैदा सीता के पहले मरद से हुई थी।

यासीन अब जमीन खरीदने, ट्रक खरीदने के सपने पाले लगा था। सीता की कमाई से घर चलता। उसकी अपनी कमाई ‘सर्रा’ (पूरी) बच जाती। शुकरा उससे अभी नाराज था। यासीन महसूस करता था कि शुकरा को पटाना जरूरी है।पर शुकरा माने तब न!

उधर शुकरा की गतिविधियाँ यूनियन में बढ़ गई थीं, मेरी मीटिंग एक रात धुम-धड़ाके से केदला-चौक में हो चुकी थी। सारे मजदूर रात के अँधेरे में बाल-बुतरू समेत मीटिंग सुनते रहे थे। वे मरने के लिए तैयार होकर गए थे। ठेकेदारों के लठैत लाठी-भाला लेकर खडे़ रह गए, पर किसी की हिम्मत न हुई थी इतनें मजदूरों के बीच कुसकने की । पुलिस भी थी। अखबार वाले भी थे। मार होती तो मजदूरों भले कुड मरते, पर ठेकेदार भी एक न बचता। ना ही उसके पहलवान जिन्दा रहते। उस दिन ठेकेदार चुप्पी साध गए थे। यासीन तो उस खदान के मुंशी के साथ-साथ पैटी ठेकेदार भी था। सबका हिसाब वही रखता था। उसने शुकरा को भी रियायत देनी शुरू कर दी। अब क्या बोले शुकरा? आदिवासी मन वाला शाकरा बारीकियाँ नहीं समझता था। उसका गुस्सा यासीन के प्रति कम होने लगा। गरीब लोग लिहाज ज्यादा करते हैं। सो शुकरा भी अब यासीन का लिहाज करनेलगा। जो सलाम-दुआ बन्द होई थी, पुनः चालू हो गई । यासीन मे अब उसे कोई खोट नजर नहीं आता था।

‘‘इन्सान आदमी है जो दूसर की औलाद आपन जैसा पोस रहल है।’’ एक दिन शुकरा ने सुमित्रा से कहा।

‘‘जिकर औलाद है, ऊ तो जानपे कैने (कहाँ ) गू खा रहल है! हमर सोनेजैसन बेटी के छोड़ के भायग गेले है दुसर की के लै के।’’ सूमित्रा ने जोड़ा ।

‘‘हमर बेटी भी तो जवाने है। आखिर कैसे कटत ओकर जिन्दगी ? सो कर लेले है यासीन के। अब गरियों देले पर, जानो मारये पर ऊ न छोड़ते उकरा।’’ कहकर सुमित्रा माथे पर हाथ धरकर बैठ गई ।

‘‘जाये दे, जे करे है करे दे। बिरादरी का डर है, नाय तो हमहू पाहन बुलाय के ब्याह देब सीता के यासी संग।’’ शेेकरा चिन्तित-सा बाला। ,

‘‘की होते? बिरादरी के भोज-भात कराय देब। सब भुलाय जैते।’’ युमित्रा बोली।

एक दिन पाहन आया और यासीन की शादी सीता के आदिवासी रिवाज से करवा गया।

यासीन को बीवी भी मिली और कमाई भी। सबने कहा- अच्छा सौदा पटाया है उसने। बीवी भी ऐसी-वैसी नहीं। दो जनों जितनी अकेली कमा सके, ऐसी बीवी थी वह। पहले वह उसके धौड़े में आया-जाया करता था, और देर रात गए अपने धौड़े में लौटता था। अब वह सीता के धौड़े में ही रहने चला आया।

सीता के गाँव सब रुष्ट हो गए। उन्होने आदिवासी तरीके से बिरादरी बुलाकर उसे मरा घोषित कर भोज-भात कर लिया। सीता मुक्ता हो गई बिरादरी से भी, पहले पति से भी और पुरानी रूढ़ियों। के बंधन से भी। वह अब खटती थी। यासीन ने कहा, ‘‘घर पर जमीन लेंगे और एक ट्रक भी। ‘‘ट्रक लेने का तो भूत ही सवर हो गया था दोनों पर। वह जो कमाती, पूरी-की-पूरी कमाई उसे दे देती। जमीन किन(खरीद)ली गई, पर यासीन के नाम।ट्रक भी हिस्सेदारी में आ गया, पर यासीन और गनी मुंशी के नाम। सीमा का नाम कहीं न था। फिर भी सीता को उस पर अटूटअ विश्वास था।

‘‘आपन हाथ-पाँव काट के ना देवे के चाही, चाहे कोऊ आहो दीदी! आपन गीदरवन (बेटियों) के आगा (भविष्य)भी देखा? कुछ उनकर खतिर भी रखा? ‘‘प्यारी ने उसके अन्धाधुन्ध विश्वास पर प्रश्न करते हुए कहा, समझाया।

‘‘दुःख के दिन सहारा देले है बहिन, एसन आदसी कखनियों (कभी भी) ठग नाय सके हय। हमर जान भी माँगते तो दे देब, पर उकर पर सक (शक) न करबै।’’ सीता अपने अडिग विश्वास का तर्क देते हुए उसे कहती।

यासीन कभी उसके लिए साड़ी ले आता सीता उसे डाँटती, ‘‘काहे ले पैसा बरबाद करले है? आपन ट्रक किना (खरीदा) जैते तो हमर देह ढेर लुग्गा से अपने-आप। अभी किश्त खतिर पैसा बचावे के दरकार हय।’’

चार

सीता को यासीन मियाँ की पहली औलाद हुई एक लड़की-1973 में। कोलयरी तब तक सरकारी हो चुकी थी। मैटरनिटी बैनेफिट का सवाल यूनियन उठा चुकी थी, पर पुरी तरह लागू नहीं करवा पाई थी।

बच्ची होने पर सीता ने यासीन से कहा-

‘‘मैटरनिटी बैनेफिट ले लेबै।’’

‘‘जाने भी दो-- हमे नहीं चाहिए बैनेफिट।मैं उससे दुगुनें पैसे तुम्हें जुगाड़ कर दूँगा और बिना खदान जाए तुम्हारी हाररी बन जाएकी। मैं बिरंची बाबु से बोल दूँगा।’’

‘‘पर एसन तो सब के लाभ नाय होतै! खाली हमर पाकिट भरते !’’ सीता तुनककर बोली।

‘‘अच्छा बाबा, मैं बिल बनवा दुँगा।’’

यह कहकर टाल दिया यासीन ने। वह भी ज्यादा अड़ी नहीं। दूसरी बच्ची भी हो गई। इस बार सीता अड़ गई--

‘‘इस बार तो बैनेफिट लेके रहब!’’-- सीता बोली।

‘‘अपनी बेअी के बाप के नाम में भी तुम अपने ही बाप का नाम लिखवा देना, मेरे नाम के बदले।’’ यासीन ने चिढ़कर कहा।

सीता ने कान पकड़कर अपने दोनों गालों को थपड़ाते हूए कहा--

‘‘एसन बालत मत कह, पाप लगतै? तततु पागलाय गेल की? दूसर के बेटी के तो आपन नाम देलय, अब आपन बेअी के नाम देय ाबखत काहे झंझट कर रहल हय तू?’’

पर यासीन ने साफ कह दिया-वह अपना नाम नहीं लिखवाएगा। सीता मानो आकाश से गिर गई। प्यार का भूत सिर पर से उतरने लगा। नशा उतरने के बाद शरीर की टूटन-सा, उसका विश्वास भी टूटने लगा। बड़ा धोखा हो गया उसको। बिना सोचा-समझे वह सारी कमाई यासीन को ही देती हरी थी। कभी पूछा तक न था सीता ने कि पैसा क्या किया? कभी सवाल नहीं किया कि जमीन ली है तो उसके नाम पर चढ़ी है कि नहीं? कभी अलग माना ही नहीं था उसने अपने को। पर जिस पर उसने सब न्योछावर कर दिया, वह जपनी औलाद को ‘गछने’ (अपनाने) तक को तैयार नहीं! शंका का बीज रोपा गया उस दिन प्यार की बाड़ी में और अविश्वास की लहरें पनप गईं मन-मगज की दीवारों-मुँडेरों पर, जिनसे केवल विष-बीज ही झर सकते थे।

‘नाय, हमर धोखा भै गेल, एसने मजाके-मजाक में कह देल हे, एसन बुड़बेकारी(मूर्खता) के बात। ऊ एसन नाय हय। भरम हो गेले हया हमर मन में दुनियादारी न समझे है ऊ।’ वह मन को समझाती। पर मन न मानता। दिन-भर काम में मन नहीं लगा उसका।

रात में यासीन मियाँ कुछ देरी से आया।

‘‘केने(कहाँ) देर भय गेले?’’ सीता ने भयभीत -सा होकर पूछा।

पहली बार सीता को भय लगा था उससे।

‘‘यहीं हजारीबाग गया था। तोर और तोर बचिया के कपड़े किने खातिर। तू झठो परेसान होती है । ले साड़ी और फ्राक। दोनों माय-बेटी पीन्धो (पहनो)!’’ उसने मिली-जुली जबान में रुक-रुककर कहा।

सीता की जबान बन्द थी। पर मन में बहस चल पड़ी थी। वह चुप था। क्या कहे? किससे कहे? यूनियन के पास शिकायत करे? सह ाब लाकर क्या वह उसकी बोली बन्द करना चाहता है? क्यों अपना नाम बाप में नहीं लिखाता?

साड़ी उसने बक्से में रख दी, और कभी न पहनने का निर्णय लिया। बेटी को पुराने लुग्गे (कपड़े) में लपेटे रही, पर फ्राक न पहनाया। उसेउन कपड़ों में दुराव की, धोखे की ‘धा’ आ रही थी।

पहले तो ऐसा नहीं था वह। कुछ बदल-सा गया था यासीन। दरअसल कोलयरी हो गई और उसमें बना रिकॉर्ड पक्का माना जाने वाला था कोर्ट -कचहरी में भी। वह पतिव पिता मे अपना नाम चढ़ाएगा तो सीता व उसकी औलाद उसकी कमाई व जमीन-जायजाद की हकदार हो आएगी।

अब वह ट्रक और जमीन का मालिक तो हो ही गया था। पैसा भी काफी जमा कर लिया था। घर में माँ का दबाव पड़ रहा था कि अपनी जात से निकाह कर ले। पर उसे सीता से डर भी लगता था। उससे भी ज्यादा डर राँची दंगल से। भले सीता को बिरादरी से अलग कर दया था, पर अबर सीता को कुछ होगा तो पुरा दंगल उस पर पिल पडे़गा--यह वह जानता था। अब तो यह झगड़ा दुसरे-दुसरे रूप भी ले सकता था। भड़काने वाले इसे साम्प्रदायिकता से लेकर क्षेतीयता तक का आधार भी दे सकते थे । औरत का आधार तब भ्ज्ञी कोई मायने नहीं ही रखता था उन सबके लिए। सच तो था कि पुरुष-दम्भ ही सीता की त्रायदी का कारण था। पर इस सत्य का स्वीकारने की बजाय, सब दूसरे कारण ही ढूँढने में लगे थे। औरत का महत्त्व इस मायने में,उस अनुपाततः अधिक मुक्त समाज में भी नहीं ही था। औरत को छोड़ देना, रख लेना मामूली बात है इस समाज में भी।

यासीन मियाँ को फिकर यह लग रही थी कि अगर सीता को उससे बेटा पैदा हो गया तो वह जायजाद का वारिस हो जाएगा। तब क्या होगा? सीता तो धर्म बदलेगी नहीं। उसका अपना निकाह भी उसकी बिरादारी के अच्छे घर की लड़ाकी से होना तय हो गया था। वह सीता से कटने का रास्ता खोजने लगा अब। पर उसके मन में सीता की कमाई का लालच और विश्वास टूटश्ने पर उसकी प्रतिक्रिया का भय था। सीता के दंगल का गुस्सा उसे रोके हुए था। वह सीता के गुस्से से भी बहुत डरता था।

पाँच

दरअसल केदला में रेजिंग कान्ट्रेक्टर क नाम से ही नियमानुसार बड़ी कम्पनी को ठीका मिलता था।किन्तु वास्तविक रेजिंग (उत्पादन) पैटी ठेकेदार और मुंशी ही करवाते थे। पैटी ठेकेदार कोयला उत्पादन कर बेचते और रायल्टी बिचौलिये ठेकेदार को देते थे। बिचौलिये ठेकेदार बिना काम किए अपना हिस्सा रखकर रायल्टी कम्पनी को दे देते थे। उसी तरह ये कम्पनियाँ अपना हिस्सा रखकर रायल्टी राजा रामगढ़ को देती थीं। उसी पैसे से राजनैतिक शक्ति बनकर राजा साहब चुनाव लड़ते थे। कभी सोशलिस्ट पार्टी के साथ हो जाते तो कभी किसी और के साथ। संविद सरकार में उन्होने मंत्रा-पद भी ले लिया था। अपनी पार्टी के लिए वह कांग्रेस से भी गुपचुप मिले थे और िंविद सरकार केसाथ्ज्ञ समर्थन के बदले वह अपनी सम्पत्ति पर से केस उठा लेने की सौदेबाजी बराबर करते रहते थे। संविद सरकार को इसकी खुन्दक थी। अब उनका विवाद बिहार सरकार से और भी अधिक बढ़ गया था। बिहार सरकार उस केस का शीध्र निपटारा कर खदानो का हधिग्रहण करना चाहती थी ताकि उसकी धन-शक्ति कम हो। राजा साहब कोर्ट में केस लटकाए रखना चाहते थें, तकि धन मिलता रहे। एक दिन रातों-रात तैयारी कर सरकारी वकील को मुस्तैद कर प्रवण चटर्जी जो सोशलिस्ट पार्टी के अध्यक्ष थे-ने स्वयं रुचि लेकर कोर्ट से रसीवर बैठाने का आदेश लिया और इससे पहले कि राजा ऊपर कोर्ट में जाते , रसीवर ने परेज-ऑफिस और खदानों पर पुलिस की सहायता से कब्जा भी कर लिया। केदला की सारी रायल्टी अब रसीवी के पास जमा होने लगी।

रसीवर आने के बाद ही केदला-फील्ड मे यूनियन का बनना संभव हुओ था। चूँकि बिहार सरकार का हस्तक्षेप खदानो में हो गया था, इसलिए उसके द्वारा पुलिस और प्रशासन भी बीच में सकता था। यूनियन के लिए इससे सुविधा हो गई थी। इन्हीं प्लस-माइनस प्रभावों के बल मैंने केदला मे भी यूनियन बनाने की योजना बनाई। एक दिन मेरी मीटिंग धूम-धड़ाके से केदला-चौक में हो गई थी। हजारों मजदूर रात के अँधेरे में बाल-बुतरू समेत मीटिंग सुनने आए थे। वे मरश्ने को तैयार होकर आए थे। ठेकेदारों के लटैत जाठी-भाला लेकर खडे़ रह गए, पर किसी की हिम्मत न हुई थी- इतने मजदूरों के बीच कुछ करने की। पुलिस भी थी। अखबार वाले भी थे। मार होती तो मजदूर भले कुछ मरते, पर ठेकेदारे भी एक न बचता। न ही उसके पहलवान जिन्दा रहते। सो उस दिन ठेकेदार चुप्पी साध गए थे।

इन्हीं बनती-बिगड़ती, घटती-बढ़ती परिस्थितियों के बीच यूनियन का विकास होता रहा--मजदूरों की एकता बढ़ती रही- ठेकेदारों का मनोबल टूटता रहा और मजदूरों के अपने अस्तित्व की, पहचान की, जिन्दबी की सुरक्षा की माँग के साथ-साथ अब अधिक मजदूरी की, बोनस की माँग की तैयारी भी होने लगी थी। ठेकेदारी हटानेकी चर्चा भी शुरू हो गई, जो बाद में सरकारीकरण की लड़ाई में परिवर्तित हो गई।

छः

अब केदला-फील्ड में विधिवत् यूनियन बन चुकी थी। ठेकेदारों के खिलाफ जबर्दस्त आन्दोलन शुरू हो चुका था। अवध, करमू, पटेल, कीरत राम, तुलाराम, घसयादास एवे शुसरा उराँव और सियाराम तथा दादू राम नेतृत्व सँभार चुके थे। कई कामिनें भी यूनियन के नेतृत्व में आ चुकी थीं। सीता और सीता का परिवार यूनियन का मैम्बर तो बन ही गया था, साथ ही सीता और सरस्वतिया नेतृत्व में भी आ गई थीं। शुरू-शुरू

में यासीन मियाँ सीता को यूनियन की मीटिंगों में जाने से राकता था। उसे उसमें अपने लिए कोई लाभ नजर नहीं आया था। फिर सीता की समझदारी बढ़ने का मतलब यासीन की कमाई का स्रोत बन्द हो जाना भी सकता था, जो सीता से उसे प्राप्त होती थी। कहीं सीता उसे छोड़ न दे, ऐसा भी डर उसे हमेशा लगा रहने लगा था।

कोयला-खदानों में प्रायः मुंशी ठेकेदार कुछ-एक कामिनों को रखैल के रूप में रख लेते थे, जिसका अर्थ उनका आर्थिक और यौन-शोषण। हालाँकि सीता और यासीन का पाहन ने विधिवत् ब्याह कराया था, पर समाज ने उसे ‘रखनी’ संज्ञा ही दी थी। ‘रखनी’ दूसरी औरत होती है और ‘घरनी’ ब्याहता। इसमें और एक परम्परा भी प्रचलित है, जो ऐ मायने में बहुत अच्छी है। दूसरा मर्द करने पर औरत अपने पहले मर्द से हुण् जो बच्चे साथ मे लाती है,