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यात्रा-संस्मरण

यात्रा-संस्मरण

बर्लिन : हमारे सामने गिलोटीन थी

प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय महिला सम्मेलन : बर्लिन

मैं न्यूयार्क से होती हुई लगभग साढ़े बारह बजे (दोपहर) पश्चिमी बर्लिन के हवाई अड्डे फ्रैंकफर्ट पहुंची। पूर्वी बर्लिन की अंतर्राष्ट्रीय महिला समिति की सदस्याएं मुझे चेकपोस्ट पर ही लेने आ गई थीं। उनके साथ हम कार्यालय गए जहां उन्होंने मुझे मेरा प्रतिनिधि कार्ड और एक चमड़े का बैग दिया। साथ में जर्मन सिक्के मार्क की शक्ल का एक साविनियर भी दिया जिस पर कांफ्रेंस के उद्घाटन के प्रथम दिन की तिथि 20 अक्तूबर, 1975 अंकित थी। मुझे भी अन्य प्रतिनिधियों के साथ सैंतीस मंजिले ‘स्टैड’ नामक होटल में ठहराया गया, जो टी.वी. टावर के बगल में स्थित है। इस टी.वी. टावर पर दुनिया का सबसे ऊंचा घूमने वाला (उन दिनों में) रेस्टोरेंट बना हुआ है।

उसी दिन साढे़ तीन बजे (दोपहर) मैंने कमीशन नंबर तीन में भाग लिया जिसकी बहस का मुख्य मुद्दा थाµ‘महिलाएं और विकासµमहिलाओं का सामाजिक जीवन में अपने-अपने देश की राजनीतिक एवं आर्थिक स्वतंत्राता तथा जनतांत्रिक प्रक्रिया और प्रगति में योगदान’। मैंने इस बहस में भागीदारी करने की इच्छा पहले ही जाहिर कर दी थी।

पहले ही दिन अध्यक्ष मंडल के लिए सात महिलाओं का चुनाव हो चुका था। देर से पहुंचने के कारण मैं सुबह के सत्रा में भाग नहीं ले सकी थी। भारतीय प्रतिनिधि मंडल से वेलफेयर बोर्ड की अध्यक्ष श्रीमती वर्द्धप्पन भी उस ग्रुप के अध्यक्ष मंडल की सदस्या थीं। वे ही भारत की तरफ से बोली भी थीं। लेकिन उस ग्रुप में भारत की तरफ से श्रमिक संघ की एकमात्रा प्रतिनिधि होने के नाते, मुझे भी बोलने का अवसर दिया गया। इस प्रकार उस कांफ्रेस में यही एक ग्रुप था जिसमें किसी देश के दो प्रतिनिधियों को बोलने का मौका दिया गया था।

विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों ने अपने-अपने देशों की समस्याओं तथा महिलाओं की भूमिका एवं उन देशों की सरकारों के महिलाओं के प्रति रुख के बारे में बताया। चिली आदि देशों में फासिस्ट और साम्राज्यवादी शक्तियों द्वारा किए जा रहे हस्तक्षेप के बारे में भी कई प्रतिनिधियों ने प्रकाश डाला। भारतीय आर्थिक और राजनीतिक जीवन के विकास में महिलाओं की भागीदारी पर मैंने प्रकाश डालते हुए महिलाओं को खुद अपनी मानसिकता बदलने पर जोर देने की अपील की और भारत में हो रहे मजदूर आंदोलनों में महिलाओं की भागीदारी के बारे में बताया।

कांफ्रेंस ने महिलाओं को अपना दृष्टिकोण बदलने के मेरे सुझाव को स्वीकार कर, उसे अपनी मूल रपट में शामिल किया। मैंने कुछ लिखित सुझाव भी कांफ्रेंस में दिए थे। चूंकि प्रतिनिधियों की ओर से भारी संख्या में सुझाव आए थे और समयाभाव के कारण हर सुझाव या संशोधन पर बहस संभव नहीं थी, इसलिए सभी प्रस्ताव कमीशन सं. 3 के सचिव मंडल को दे दिए गए और यह सचिव मंडल के विवेक पर छोड़ दिया गया कि वे जिसे उचित समझें उसे प्रस्ताव में शामिल कर लें। हमारे ग्रुप तीन की बहस 22 अक्तूबर, 1975 को ही समाप्त हो गई थी। प्रातः 23 अक्तूबर को हमारी फाइनल रपट भी तैयार हो गई थी। 24 अक्तूबर को सभी ग्रुप एक बड़े हॉल में जमा हुए और सब ने अपनी-अपनी रपट पढ़कर सुनाई। सुश्री पूर्वी मुखर्जी (तत्कालीन सचिव, राष्ट्रीय कांग्रेस कमेटी), जो भारतीय दल की नेता भी थीं, ने अपने कमीशन की रपट पढ़ी जिसकी सभी प्रतिनिधियों ने सराहना की। ग्रुप तीन की रपट क्यूबा की अध्यक्ष मंडल की सदस्या ने पढ़ी।

अंतर्राष्ट्रीय महिला कांफ्रेंस में शामिल होना मेरे लिए अपने आप में एक अद्भुत अनुभव था। इस कांफ्रेंस में लगभग दो हजार महिला प्रतिनिधियों ने 87 से अधिक देशों का प्रतिनिधित्व किया था। भारत की ओर से कुल 110 महिला प्रतिनिधि सम्मेलन में भाग ले रही थीं लेकिन मजदूरों की तरफ से इंटक की मैं ही एकमात्रा प्रतिनिधि थी। इस कांफ्रेंस में चिली और साइप्रस के लिए भी एक प्रस्ताव लिया गया। कांफ्रेंस की अध्यक्षा सुश्री मिरेस ;डपतमेद्ध ने धीमी पर गंभीर आवाज में बहुत ही मार्मिक भाषण दिया। उनके भाषण ने श्रोताओं पर जादुई प्रभाव छोड़ा। पूरा-का-पूरा सभागार उनके शब्दों से चमत्कृत था। इस जटिल मनुष्य (पुरुष) द्वारा निर्मित समाज में स्त्रा-मुक्ति के लिए अध्यक्ष द्वारा दिए गए संदेश से प्रत्येक प्रतिनिधि ने प्रेरणा पाई। आमतौर पर यह महसूस किया गया कि सम्मेलन से महिला मुद्दे को तो काफी लाभ मिला ही है, पूरे विश्व को भी लाभ मिला है। इसमें महिलाओं के समक्ष जीवन के नए मूल्य प्रस्तुत किए गए।

जब गैलरियों और गलियारों से आए बच्चों ने हमें घेर लिया

इस आयोजन के दौरान पूर्वी जर्मनी के बच्चों द्वारा एक बड़ा ही प्यारा और रुचिकर कार्यक्रम पेश किया गया। एकाएक नीली और सफेद ड्रेस पहने बच्चों ने हाथों में फूल लियेµवाद्य बजाते और विभिन्न पेशों और उनके विभिन्न औजारों ;ज्ववसेद्ध और यंत्रों (प्उचसमउमदज) को दर्शाते हुए, हॉल के चारों ओर की विभिन्न गैलरियों और गलियारों में से आकर मुस्कराते हुए प्रतिनिधियों को फूल भेंट किए। यह महिलाओं और बच्चों का एक मिश्रित वृहद जुटाव था। बच्चों ने हमें यह संदेश दिया कि वे भी अपने ढंग से स्त्रा-मुक्ति के लिए जूझ रहे हैं। पूरा कार्यक्रम खुशी, स्नेह, संकल्प ;क्मजमतउपदंजपवदद्ध, आशाओं और आकांक्षाओं के साथ समाप्त हुआ।

इस रात हमें कई स्वागत-समारोहों में शामिल होने के लिए ले जाया गया। मैं श्रमिक-संघों द्वारा आयोजित स्वागत-समारोह में शामिल हुई, जहां मेरी आयरलैंड, कनाडा, सोवियत रूस, फ्रांस, पोलैंड, पूर्वी जर्मनी तथा चेकोस्लोवाकिया के प्रतिनिधियों से भेंट हुई। हालांकि श्रमिक संघों के प्रतिनिधि कम ही थे लेकिन यह बहुत ही सौहार्दपूर्ण और अच्छी मुलाकात थी, जिसमें रात्रि-भोज और नृत्य के अतिरिक्त अनौपचारिक वार्ता, बहस और विचारों तथा महत्त्वपूर्ण सूचनाओं का आदान-प्रदान भी संभव हो सका। आयरलैंड की महिला प्रतिनिधि तो अमेरिका के पूंजिपतियों द्वारा बरतानिया से सांठ-गांठकर आयरलैंड के प्राकृतिक संसाधनों के दोहन किए जाने के प्रति काफी कटु थीं।

हमारे सामने गिलोटीन थी

25 अक्तूबर, 1975 को हमें जर्मनी के पुराने शहर ड्रेसडन (क्तमेकवद) ले जाया गया, जहां बहुत ही खूबसूरत भवन, अजायबघर तथा वृक्ष देखने को मिले, जिन्हें युद्ध के बाद रूसियों ने पुनर्स्थापित किया था। हमें वहां जर्मनी के राजा के आभूषण भी दिखाए गए। उस महल में सोने का बना पूरा-का-पूरा मुगल दरबार भी देखा जिसमें जर्मनी के उस राजा ने गढ़वाते समय यह ध्यान रखा था कि दरबार की, उसकी पोशाकों की, चेहरों के हाव-भाव के साथ-साथ छोटी-से-छोटी डिटेल भी अंकित रहे। इस मुगल दरबार की स्वर्णिम छवि देखकर हमलोग आश्चर्य और आनंद में डूबते-डूबाते आगे बढ़ रहे थे कि सामने का दृश्य देखकर एकाएक हम रुक गए।

हमारे सामने गिलोटीन थी और उस पर चढ़ने वाले लोगों के बुत थे। वे बुत नहीं सजीव, संकल्पबद्ध और दृढ़-प्रतिज्ञ लोग दिखते थे जो जान रहे थे कि अगले ही क्षण गिलोटिन पर चढ़ना है। दुविधा, संशय या भय लेश मात्रा भी उनके चेहरे पर नहीं था, बस थी तो दृढ़-प्रतिज्ञा। जहां ये बुत खड़े थे वह स्थान हिटलर के समय में कोर्ट की बिल्डिंग के बीचोंबीच स्थित था। इसे अब यूनिवर्सिटी बना दिया गया है।

अगले दिन यानी 28 अक्तूबर, 1975 को हमने वह टी.वी. टावर भी देखा जो विश्व की सबसे ऊंची इमारत है। एक जर्मन बैले शो भी हमें दिखाया गया जो अत्यंत ही आकर्षक था। खासकर वह बैले जो जिंदगी के फूल के बारे में था। इसने मुझे अंदर तक झकझोर दिया था, शायद इसलिए भी कि मैंने स्वयं बचपन से ही एक बैले नर्तकी होने का सपना पाला था और मैं बचपन में बैले देखने के बाद उसकी नकल करने का भी प्रयास किया करती थी। अपने कथानकों पर ग्रुप और सोलो दोनों के अपने बैले भी बनाया करती थी।

दूसरों की कमाई पर जीने का मतलब स्वतंत्राता नहीं है

मैंने बर्लिन के लोगों से भी व्यक्तिगत रूप से यह जानने की कोशिश की कि वे पूर्वी बर्लिन की कम्युनिस्ट व्यवस्था में कितने आजाद हैं। कितने खुश। मीडिया द्वारा प्रायः प्रचारित किया जाता रहा है कि वे गुलाम हैं, आजाद नहीं। दुःखी हैं, सुखी नहीं। मैं उसकी हकीकत जानना चाहती थी। मैंने एक पूर्वी जर्मन मित्रा बोन्फाफ से पूछाµ‘‘क्या आप स्वतंत्रा हैं? या क्या आप अपने को स्वतंत्रा मानते हैं?’’ उनका उत्तर थाµ‘‘स्वतंत्राता एक सापेक्षिक शब्द (ज्मतउ) है। यदि आप दूसरों की कमाई पर जीना और उनका शोषण करने को स्वतंत्राता मानते हैं तो वह हमें प्राप्त नहीं है और न ही हम इसकी किसी को इजाजत देते हैं।“

उन्होंने आगे कहाµ‘‘यदि आप यौन प्रक्रिया में रत होने और उसके खुले प्रदर्शन को, जैसा कि पश्चिमी देशों में हो रहा है, ही स्वतंत्राता मानते हैं, तो यह हमारे यहां नहीं है। लेकिन यदि आप गरीबी से मुक्ति को, सब बच्चों के लिए भरपूर खाने की छूट की सुविधा को स्वतंत्राता मानते हैं तो वह स्वतंत्राता हमारे यहां है। पूर्वी बर्लिन में पश्चिमी बर्लिन से सस्ता खाना मिलता है। बर्लिन की दीवार बनने से पहले पश्चिमी बर्लिन के लोग हमारे यहां आकर खाने का सामान खरीदकर ले जाने के लिए लाइन लगाते थे। इससे पूर्वी बर्लिन की आर्थिक स्थिति प्रभावित होने लगी थी। यदि पूजा-अर्चना की स्वतंत्राता की बात कहते हैं तो पूर्वी बर्लिन में भी कुछ चर्च थे जहां पूजा होती थी पर सरकार इसमें हस्तक्षेप नहीं करती थी, न ही सरकार उनकी मदद करती थी। जहां तक राजनैतिक स्वतंत्राता का प्रश्न है तो पूर्वी बर्लिन में क्रिश्चियन डैमोक्रेटिक पार्टी का सदस्य बनने पर भी कोई प्रतिबंध या रोक नहीं है।“

मुझे उनके उत्तर से ही नहीं बल्कि दूसरों से जानने-सुनने पर लगा कि मीडिया एक साजिश के तहत योजनाबद्ध ढंग से समाजवादी देशों के खिलाफ भ्रामक और गलत प्रचार करता है। बर्लिन में खाने की चीजें सस्ती ही नहीं, प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थीं। हमें वहां यह भी जानकारी मिली कि पूर्वी बर्लिन की सरकार अपनी जनता को हर वर्ष घर भी आवंटित करती थी और उनके पुराने घरों के बदले, उन्हें नए घर देती थी। घर आवंटन में बड़े परिवार को प्राथमिकता दी जाती थी। दरअसल, वहां कम आबादी ही समस्या है। बड़े परिवार को प्रोत्साहित करने के लिए घर भी एक प्रेरक तत्त्व है।

सर्वोच्च अधिकारी और निम्नतर कर्मचारी के वेतनमान में कम अंतर

हमें एक ऊनी परिधान बनाने वाले कारखाने में भी ले जाया गया। फैक्ट्री के प्रबंधक तथा मजदूरों से बातचीत के दौरान हमें पता लगा कि सर्वोच्च अधिकारी और निम्नतर कोटि के मजदूर के वेतनमान में बहुत ही कम अंतर है। उस कारखाने में भी कुशल मजदूर थे। हमारा परिचय एक अस्सी वर्ष के मजदूर से करवाया गया। मजदूरों ने बताया कि उनके देश में सेवानिवृत्ति की कोई सीमा नहीं है। वे जब तक चाहें या जब तक वे काम करने में सक्षम हैं, काम कर सकते हैं चूंकि वहां कम आबादी की समस्या है। कुछ मजदूरों ने बताया कि उनकी कमाई वहां के अधिकारियों से भी अधिक है। हमने मजदूरों के कार्यभार के बारे में जानना चाहा। हमें अधिकारियों ने बताया कि कोई भी मजदूर निर्धारित कार्यभार से कम काम नहीं करता। हां, केवल शुरू के महीनों में, जब वह काम पर आता है तो उसे एक या दो महीने का प्रशिक्षण देना पड़ता है। इसी प्रशिक्षण की अवधि में उसका कार्यभार कम होता है अन्यथा सब मजदूर कार्यभार पूरा करते हैं या उससे अधिक काम करते हैं। साधारणतः हर मजदूर को तीन महीने का प्रशिक्षण लेना आवश्यक है। नियमित मजदूर और प्रशिक्षु मजदूर के वेतन में भी खास अंतर नहीं होता। पूर्वी बर्लिन में उन दिनों दो राजनीतिक दल थे। एक क्रिश्चियन जनतांत्रिक पार्टी और दूसरी कम्युनिस्ट पार्टी। दोनों का लक्ष्य समाजवाद ही है।

हर ग्रुप के प्रतिनिधियों के साथ दुभाषिए की व्यवस्था थी। कुछ ही लोग अंग्रेजी बोल सकते थे। अंग्रेजी के बिना हमलोग इशारों से बात करते थे। मैं कनाडा के एक प्रतिनिधि मित्रा को साथ लेकर खुद ही बर्लिन का अजायबघर देखने गई। इसमें रखी मूर्तियां अत्यंत ही सजीव, बोलती-सी दिखती थीं। सभी निर्माण कार्य गोयथिक वास्तुकला का नमूना था। 29 अक्तूबर, 1975 की सुबह मैंने पूर्वी बर्लिन से विदा ली। मेरे पास केवल किताबों के ही दो बड़े बंडल थे। इन्हें मैंने पूर्वी बर्लिन कांग्रेस के आयोजकों के पास जहाज द्वारा भारत भिजवाने के लिए छोड़ दिया था क्योंकि मेरे पास पहले से ही ढेर सारा सामान था।

‘आखिर पुरुष, पुरुष ही होता है’ वाली मानसिकता यहां भी

मैंने अपनी दुभाषिया जो एक महिला थी, के साथ जाकर बर्लिन में ही एक कैमरा खरीदा पर मुझे वह चलाना नहीं आता था। मैंने उस महिला दुभाषिया से उसके ठीक से काम करने का तरीका बताने को कहा। उसने अपनी अनभिज्ञता जाहिर करते हुए कहा कि वह किसी पुरुष को बुलाकर इस कैमरे को दिखाएगी ताकि वह कुछ बता सके। उसने साथ में यह भी जोड़ दिया थाµष्।जिमत ंसस ं उंद पे ं उंदष् आखिर पुरुष-पुरुष ही होता है न। मैं उसका कथन सुनकर मुस्कराई। महिला-मुक्ति के उस वर्ष में एक विकसित, वह भी समाजवादी देश की महिला की यह सोच थीµ‘आखिर पुरुष-पुरुष ही होता है न!’ यह सोच महिलाओं की मानसिकता का हास्यास्पद उदाहरण थी। मैंने उससे कहाµ‘‘पुरुष में ऐसी कोई खासियत नहीं होती कि वह ही इसे ठीक कर सकता है। इसमें सब हिदायतें जर्मन भाषा में लिखी हैं। उन्हें सही से पढ़कर अगर तुम भी मुझे समझा दो तो कैमरा काम करने लगेगा। हमें पुरुष के ज्ञान से आतंकित होने की दरकार नहीं। हां, अगर तुम यह कहो कि एक मैकेनिक को दिखा दें तो बात समझ में आ सकती है, क्यांकि यह कुशलता या प्रवीणता का सवाल है और यह कुशलता औरत या मर्द कोई भी हासिल कर सकता है।’’

खैर, मन को एक झटका जरूर लगा कि इतना बड़ा समारोह और यह सोच!

29 अक्तूबर, 1975 को ही मैं पश्चिमी बर्लिन पहुंच गई। हवाई जहाज के उड़ने में काफी समय बाकी था। छह घंटे का अंतराल था। इस अवधि में मैंने टूरिस्ट बस से पश्चिमी बर्लिन घूम लिया। पश्चिमी बर्लिन का बाजार भी घूमा। हिटलर के चिह्न एक खास अंदाज से वहां भी दिखाए जाते थे, पर अमेरिका का बोलबाला अधिक था और वहां लोग पूर्वी बर्लिन के खिलाफ कुछ-न-कुछ कहना नहीं भूलते थे। वे नाजियों के बारे में तो बताते थे लेकिन उनके मन से हिटलर खत्म नहीं हुआ था, भले ही स्थगित हो गया था। किसी-न-किसी रूप में वे अपने को एसर्ट करने का इंतजार ही करते दिखते थे। खंडहर यहां भी थे। युद्ध का विनाश यहां भी दिखाया गया और बाद का निर्माण भी।

मैं फ्रैंकफर्ट से लंदन पहुंची। वहां मुझे श्रीमती नागी, जो मेरे साथ भारत से मैक्सिको कांफ्रेंस में भाग लेने आई थीं, मिलीं। हमलोग मैक्सिको में ही अलग हो गई थीं। हमने अपनी उड़ानों को इस प्रकार तय किया था कि हम लंदन में आकर मिल जाएंगी। वहां मैं अपनी बहन माया के बेटे हरी मुरगाई के यहां गई। श्रीमती नागी भी मुझसे वहां आ मिलीं। चार तारीख को टूरिस्ट बस से हमने लंदन देखा और शाम को हम लंदन के एक बड़े स्टोर में शॉपिंग के लिए गए। वहां काउंटर पर लोग नहीं थे, ग्राहकों को जो माल पसंद आता वह ले लेते और अंत में काउंटर पर पैसा जमा करा देते। हमारे लिए यह भी एक अजीब अनुभव था। कोई चोरी नहीं कर रहा था, इस पर भी आश्चर्य हो रहा था।