आदिवासी स्वर और नई शताब्दी

महेश दर्पण

‘युद्धरत आम आदमी’ का द्विखंडिय आयोजन ‘आदिवासी स्वर और आम आदमी’ हिंदी कि दरिद्रता को कई अर्थों में दूर करता है. हिंदी के ‘बहुविद्वानों’ के लिए तो यह एक नई दुनिया में खुलने वाली खिड़की ही है. ‘खरी –खरी बात’ से ही संपादक रमणिका गुप्ता ने उन खतरों को सामने रख दिया है जो आज आदिवासी जमात के सामने है. लेकिन उन्होंने एक संत्वानापरक सन्देश भी दिया है कि आज साहित्य द्वारा आदिवासी समाज को राष्ट्रीय स्तर पर एक करने के प्रयास तेज हो रहे हैं. जिस खास ज़रूरत पर उन्होंने पाठकों का ध्यान खींचना चाहा है, वह है बिरसा के विस्तार कि ज़रूरत.


सुनियोजित तरीके से यह वृहद आयोजन जहां आदिवासी स्वर को रचनाओं के माध्यम से सामने रखता है वहीं वह विविध कोनों से इस स्वर की समालोचना भी प्रस्तुत करता है. ‘आदिवासी कविता: एक आकलन में’ डॉ० राजेंद्र ठाकरे रचना के मर्म तक पंहुचने के लिए शाब्दिक अनुवाद को नाकाफी मानते हैं. उनका यह कहना सही है कि साहित्यिक रचनाओं को न्याय वही दे सकते हैं जो उस जीवन के कष्टों, वहाँ की प्रादेशिकता और पर्यावरण की आत्मीय समझ रखते हों. यदि आज आदिवासी स्वर में यह आग्रह मिलता है कि ‘अपने जीवन के मूलभूत प्रश्नों को हम ही कहेंगे, तो यह सही भी है. इन रचनाओं को समझने में आकृतीवादी संरचनावादी दृष्टिकोण पर्याय नहीं दे सकता. संक्षिप्त होते हुए भी रेमिस कंडुलना का लेख ‘आदिवासी महिलाएं और साहित्य’ जानकारी बढ़ाता है.


आदोर एक पठनीय आत्मकथांश है. नजुबाई गावीत की इस आत्मकथा का कौसल्या बैसंत्री ने बेहतरीन अनुवाद किया है. लीलाधर मंडलोई द्वारा प्रस्तुत अंडमान निकोबार की लोककथाएं, जयपाल मीणा का लेख ‘मुहावरे, लोकोक्तियाँ एवं किवान्दितियां’ और लटारी कवदु मडावी का लेख ‘अहिंसावादी रावण: बुद्ध का समकालीन गण-नायक’ इस आयोजन को समृद्ध बना गए हैं.


सरकार बख्तावर सिंह के बहाने हरिराम मीणा अंडमान-निकोबार की जनजातियों से जिस तरह रु-ब-रु हुए हैं, वह पठनीय है. यह संस्करण-बातचीत हमें उस दुनिया के बहुत करीब ले जाकर खड़ा कर देती है. ‘इन सर्च ऑफ मैन’ का सन्दर्भ हो या ‘एन मे’ का उल्लेख, सभ्यता के विस्तार के साथ जो हादसा आदिवासी जन हर रोज झेल रहे हैं, उसके निकट के आत्मीय चित्र तो यहाँ मौजूद है ही, ये संस्मरण अजाने आदमी को आदिवासी रचनायें समझने की पृष्ठभूमि भी दे जाते हैं.


ग्रेस कुजूर से की गई बातचीत कई अर्थों में महत्वपूर्ण है. ग्रेस का यह कड़वा सच सही है कि सत्ता में आज सिर्फ अपनी चिंता कि जा रही है. यदि आदिवासियों के अनुरूप काम होता तो वे जागरूक होते, लेकिन उन्हें ऐसा माहौल नहीं मिला. राघवन अत्तोली और लाडो जोको से संवाद भी आँख खोलने वाला है. बातचीत के क्रम में हरिराम मीणा का यह भय निराधार नहीं है कि अब कहीं ऐसी होड़ न मच जाए कि आदिवासी साहित्य को मसाला बनाकर ढेर सरे गैर साहित्यिक तत्वा भी इसे भुनाने में लग जाए. पी.सी. हैम्ब्रम से की गई बातचीत सीधे अंदाज़ में खुलती है – “वे आदिवासियों से कहते है कि अगर तुम अपना विकास चाहते हो तो पहले तुम्हें अपने अस्तित्वा को भुलाना होगा. यह मानवीयता नहीं है. यह उनपर अपना धर्मं थोपना है. इसके लिए आदिवासियों को पहले अपना धर्म, अपनी संस्कृति को जानना होगा. अगर हमारे अंदर कुछ गडबडियां हैं तो उन्हें हम ही सही करेंगे. यह तब होगा जब आदिवासियों में शिक्षा का प्रचार–प्रसार हो. जहां पथिक चंद्र हेम्ब्रम ने ‘संथाली संस्कृति में नगाड़े का नाद’ के जारी उनका खूबसूरत क्लोज अप प्रस्तुत किया है, वहीं डॉ० विनायक तुमराम ने मूलभूत प्रश्न हल करने कि चेष्टा की है अपने लेख ‘आदिवासी कौन’ में. उनका यह कहना सही है कि सचमुच यह यथार्थ बहुत ही भयावह, पीड़ादायक और अंतर्मुख है कि जिन आदिम जनसमूहों ने इस देश का सांस्कृतिक क्षेत्र समृद्ध किया, आदिम जनजातियों को अपने पेट की खातिर जंगल-जंगल मारे –मारे भटकना पड़ता है. माया बोरसे के लेख में भी यही चिंता दूसरे शब्दों में मौजूद है. अम्बेडकर के चिंतन में आदिवासियों का स्थान रेखांकित करते हुए उन्होंने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाये हैं.


इस आयोजन में यदि एक खंड सृजन पक्ष का और एक विचार के लिए रखा गया होता तो अच्छा रहता. बहरहाल जिस खंड में केवल रचनायें है, वह इस दृष्टि से एक समृद्ध प्रस्तुति है कि वह अभिजात से बाहर की एक बड़ी दुनिया को हिंदी के पाठकों के लिए पहली बार इतने नियोजित तरीके से प्रस्तुत करता है. संपादकीय का इशारा बहुत ठीक है कि यहाँ समाहित रचनाओं में उदार –उदात्त –जीवन मनुष्य की छवि मौजूद है जो यह जान चूका है कि एक साजिश के तहत उसे समय से पीछे रखा गया है. इसलिए यह अपने इतिहास की खोज भी करने लगा और वर्तमान को भी बदलना चाहता है ताकि कल उसका हो सके.


इस दृष्टि से ग्रेस कुजूर, हरिराम मीणा और मीरा रामनिवास की कवितायेँ उल्लेखनीय है. निर्मला पुतुल की संथाली कविता , मूल सहित कई भाषाओँ में अनुवाद और लोक-गीत व लोक –कथाएँ तो यहाँ मौजूद है ही, हिंदी, मलयालम, मराठी, संथाली , खड़िया, तेलुगु की कहानियाँ भी ध्यान खींचती है. “कहानी से बाहर की औरत”, ‘साहूकार कि मछली’, और “खाखरा” जैसी रचनायें बताती है कि इस लेखन का पर्याप्त प्रसार हो तो यह पाठकों को बांधने की पूरी क्षमता तो रखती ही है, एक अजानी दुनिया का साक्षात् भी कराती है. इस उल्लेखनीय और श्रमसाध्य आयोजन के लिए “युद्धरत आम आदमी’’ का संपादक मंडल बधाई का पात्र है. लघुपत्रिकाओं को इस तरह के आयोजन आकर्षक बनाते हैं.