इस सोच के पीछे कौन ?

युद्धरत आम आदमी पत्रिका श्रीमती रमणिका गुप्ता का मानस-शिशु है जो एक महत्वपूर्ण सामाजिक व्यक्तित्व हैं और जिन्होंने सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों को नई पहलकदमियों की शृंखला के माध्यम से एक नया आयाम दिया है। वे आदिवासियों, दलितों, स्त्रियों और अल्पसंख्यकों के लिए एक बेहतर ज़िन्दगी की मुहिम में पिछले 54 वर्षों से संघर्षरत हैं। रमणिका जी ने इन तबकों का प्रतिनिधित्व बिहार राज्य विधानसभा व विधान परिषद में भी किया है। उनकी छवि एक जुझारू महिला नेता के रूप में रही है। उनकी इच्छा, उनका दृढ़ निश्चय और उनकी योग्यता ने औरों को भी मानवीय कारणों से गूंगे को आवाज़ देने वाला एक शक्तिशाली और लोकप्रिय मंच बनाने के लिए प्रेरित किया है। बचपन से ही विद्रोही वे बहुआयामी व्यक्तित्व की धनी हैं। आज वे एक सामाजिक कार्यकर्ता, संस्कृतिकर्मी, समकालीन हिन्दी साहित्य की महत्वपूर्ण लेखिका-कवयित्री और एक श्रमिक नेता के रूप में ख्यात और प्रतिष्ठित हैं। उनकी गतिविधियां और समर्पण ऊपरी तौर पर भले ही बिखरीं और उग्र या दुष्कर लगें लेकिन जो भी गहराई में जाकर विचार करेगा वह महसूस करेगा कि आदिवासी, दबे-कुचले व वंचित समाज के बेहतर भविष्य के आदर्श से उनका जीवन-दर्शन जुड़ा हुआ एवं प्रभावित है। सामान्य आदमी की योग्यता और अच्छाई में उनका अदम्य विश्वास है। वे मानती हैं कि हर प्रकार के अन्याय को बढ़ावा देने और उसे वैधानिकता प्रदान करने वाले पारंपरिक वंशानुगत सामाजिक वर्गीकरण को नष्ट करने में जनसाधारण महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगा। श्रमिक आंदोलन के प्रमुख पैरोकार के रूप में वर्षों से झारखंड के छोटानागपुर क्षेत्र में आदिवासियों, दलितों एवं स्त्रियों के अधिकार के लिए वे एक अंतहीन संघर्ष छेड़े हुए हैं। वहां घर-घर में लोग उन्हें जानते हैं। वे वाम-लोकतांत्रिक संगठन से जुड़ी हुई हैं और विधान सभा तथा विधान परिषद में दलितों का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात है कि आज के दौर में जबकि लोगों के निजी जीवन और सामाजिक जीवन में परस्पर मेल कठिन है उनका मौलिक जीवन-दर्शन और जीवन-व्यवहार एक समान है। उनका जीवन हर प्रकार के अन्याय और अतीतोन्मुख व्यवहार के खिलाफ एक जंग है। 1948 में किए अपने अंतर्जातीय विवाह और समाज तथा परिवार के वर्चस्व के खिलाफ वैयक्तिक स्वतंत्रंता और जगह के लिए उन्होंने संघर्ष किया। उन्होंने कभी भी पुरानी अनुपयोगी परंपराओं का आदर नहीं किया।


सामाजिक बदलाव की उनकी इच्छा, उनका दृढ़ निश्चय और व्यग्रता बहुआयामी गतिविधियों से प्रकट लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित है। अपने लेखकीय जीवन में उन्होंने गद्य एवं पद्य विधा की कई महत्वपूर्ण किताबें लिखीं जिसमें उपेक्षितों खासकर आदिवासी और दलित स्त्रियों के प्रति प्रेम और आदर झलकता है, जो उन्हें हृदय से प्रिय हैं। यह ‘युद्धरत आम आदमी’ के नाम से ही प्रकट होता है जिसका शाब्दिक अर्थ हैµ‘अपने अस्तित्व के प्रति संघर्षरत आम आदमी।’ इस ख्याति प्राप्त पत्रिका का वे वर्षों से कुशल संपादन करती आ रही हैं। उनकी पत्रिका न केवल लोकप्रिय सामाजिक-संस्कृति मुद्दों और गरीबों की समस्या को उठाती हैं बल्कि यह बात भी रेखांकित करने लायक है कि उनके सहयोगी लेखक भी अधिकतर दलित, कमजोर और वंचित दलित आदिवासी समुदाय के ही होते हैं। उन रचनाकारों को हिंदी साहित्य में किसी से भी ज्यादा प्रकाशन और अपनी पत्रिका में गौरवपूर्ण स्थान देकर उन्होंने दलित-आदिवासी व महिला लेखकों के मुद्दों को उठाया है।


रमणिका जी ने नाटक, कथा साहित्य एवं विश्लेषणात्मक दलित खंडों का हिन्दी और अहिन्दी भाषाओं में परस्पर अनुवाद कार्य के अलावा आदिवासी, दलित लेखन पर आलोचनात्मक कार्य भी किया है। उन्होंने यह सब दलित-आदिवासी प्रतिभाओं को राष्ट्रीय नेटवर्क प्रदान करने के लिए किया है और सामाजिक-सांस्कृतिक रूप से बेहद जरूरतमंद वर्गों में जागरूकता फैलाने की तरफ लोगों के ध्यानाकर्षण के लिए प्रेरक की भूमिका निभाई है।


दरअसल उनकी सारी रचनात्मक ऊर्जा और भौतिक स्रोत, उनका समय और उनकी जगह, एक बड़े सामाजिक लक्ष्य से जुड़े हुए हैं। ऐसे में जबकि वे लंबे हृदय रोग के कारण जीवन के लिए संघर्ष कर रही हैं उनका धैर्य और संघर्ष अंधेरे में रोशनी जलाने की तरह अपने आप में अनूठा है। अपने सपनों को सच करने के लिए वे पूरी जीवंतता, उत्साह और उम्मीद के साथ निरंतर मिशनरी भावना से कार्य करती हैं। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि उनका घर जहां से वे अभी संगठन के सारे काम चलाती हैं देश भर के दलित-आदिवासी बौद्धिकों और कार्यकर्ताओं का प्रिय शिविर बन गया है। सचमुच आज वे युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत और आदर्श बन गई हैं और विभिन्न क्षेत्रों-स्तरों से आने वाले युवाओं को आत्मिक प्रेम, स्नेह देकर उनका उत्साह बढ़ाते हुए उनमें नेतृत्व एवं सांगठनिक क्षमता विकसित करती हैं क्योंकि उनका कहना हैµ”यह तो संघर्ष की शुरुआत है...“