‘पंजाबी साहित्य में दलित कदम’ विशेषांक ‘युद्धरत आम आदमी’ 2001

26 नवम्बर, 2001, को ‘साहित्य अकादेमी’ दिल्ली के रवीन्द्र भवन सभागार में ‘पंजाबी साहित्य में दलित कदम’ पूर्णांक 58 का लोकार्पण श्री राजेन्द्र यादव ने किया। इसका संचालन श्यौराज सिंह ‘बैचेन’ ने किया। इसकी अध्यक्षता ‘पंजाबी साहित्य अकादमी’ के अध्यक्ष डाॅ. एस.एस. नूर तथा ‘साहित्य अकादेमी’ के सचिव के. सच्चिदानन्दन ने की। रमणिका जी ने अंक के प्रकाशन की पृष्ठभूमि पर वक्तव्य दिया। श्यौराज सिंह ‘बैचेन’ तथा महेश दर्पण ने इस विशेषांक पर आलेख पढ़े। डाॅ. ज्ञानसिंह बल, द्वारका भारती, बलवीर माधोपुरी तथा मोहन सिंह बाबा समेत पंजाब के कई वरिष्ठ लेखकों ने दिल्ली पहुंच कर इस कार्यक्रम में शिरकत की। प्रख्यात दलित लेखक एवं नाटकरकार चरण सिंह सिद्धू, ने भी शिरकत की। कमलेश्वर जी और मैनेजर पांडेय ने इस प्रयास को बहुत सराहा। इस कार्यक्रम में की गईं कुछ महत्त्वपूर्ण टिप्पणियां निम्न हैंµ


विशेषांक के लोकार्पण सह वैचारिक संगोष्ठी में विशिष्ट अतिथि कमलेश्वर ने कहा-‘‘जैसे-जैसे अन्याय और शोषण बढ़ते जाएंगे दलित-चेतना का विकास होता जाएगा। दलित साहित्य में अनुभव की दुनिया बड़ी महत्वपूर्ण और साहित्य में अनुभव की दुनिया का बड़ा महत्व है। साहित्य के सौन्दर्य-शास्त्र के पैमाने पर मनुष्य के अंतरतम की रचना कभी पूरी की पूरी नहीं उतरेगी। मैं यह स्वीकार करता हूं कि जब से मराठी एवं हिन्दी के दलित साहित्यकारों की आत्मकथाएं मैंने पढ़ी हैं, तब से लग रहा है कि अपनी तमाम संवेदनाओं के बावजूद मैं वैसा दलित साहित्य नहीं रच सकता क्योंकि वहां जो यातनाएं और उत्पीड़न हैं वह मेरे अनुभव का हिस्सा कभी नहीं रहीं। दरअसल दलित साहित्य में पूरकता की आवश्यकता है, परिवर्तनकामी दलित साहित्य अपने अनुभव सत्य के साथ-साथ उसके विपरीत के सच और उसके प्रतिरोध की चेतना को भी विकसित करे, तभी उसकी यात्रा आगे बढ़ेेगी। ‘युद्धरत आम आदमी’ की संपादिका रमणिका गुप्ता बधाई की पात्र हैं। रमणिका जी द्वारा हिन्दी में विभिन्न भाषाओं के दलित साहित्य को प्रकाश में लाने का काम ऐतिहासिक महत्व का है। जिस कार्य को मैं और राजेन्द्र यादव नहीं कर पाए उसे रमणिका जी ने किया।’’ संगोष्ठी की शुरूआत में विशेषांक की संपादिका रमणिका गुप्ता ने रमणिका फाउंडेशन और ‘युद्धरत आम आदमी’ पत्रिका के लक्ष्य को स्पष्ट करते हुए कहा -‘‘हमारा ध्येय, खासकर हाशिए पर रखी दी गईं जमातों को ऐसा मंच प्र्रदान करना है जहां वे लोग अपनी बात खुद कह सकें और कर सकें। उस पर अमल कर और करवा सकें। एक नीतिगत फैसले के तहत हमने यह तय किया कि ऐसे विशेषांकों में हम केवल दलित और आदिवासी का लिखा ही प्रकाशित करेंगे ताकि उनकी अपनी सोच सामने आ सके और उनकी समस्याओं के समाधान भी उनके माध्यम से ही आएं। मुख्यधारा का वर्तमान हिन्दी साहित्य एक अंतिम बिंदु तक पहुंच चुका है और वह बार-बार अपनी बातें दोहराने लगा है। उसके अनुभव भी बासी पड़ चुके हैं, इसलिए दलितों-आदिवासियों की ये पीढ़ी जिन अनुभवों के साथ लेखन कर रही है वह अनुभव मूलधारा के साहित्यकारों के पास नहीं है। ‘‘दलित लेखन अपना एक महत्व रखता है और नई संस्कृति का द्योतक है।’’


श्यौराज सिंह ‘बैचेन’ ने कहा किµ‘‘दलित मात्र सदियाें से दबे-कुचले ही नहीं हैं, दलित तो जन्म से ही अश्पृश्यता का दंश झेल रहे हैं। यदि पंजाबी साहित्यकारों ने दलित-साहित्य का बहिष्कार नहीं किया होता तो पंजाबी का दलित-साहित्य भी आज शिखर पर होता । सवर्ण संपादकों ने दलित साहित्य के साथ जो राजनीति की है, वह हैरत-अंगेज़ है। दलित साहित्य कभी भी केंद्रीय साहित्य की मुख्यधारा का हिस्सा नहीं बन पाया। रमणिका गुप्ता तो सवर्ण संपादकों की भीड़ में एक विद्रोही संपादक हैं। दलित लेखक उनके इस प्रयास के लिए उन्हें हमेशा याद रखेंगे।’’ महेश दर्पण ने कहा- ‘‘ दलित यदि अपनी पहचान छिपाते हैं तो लोग जानना चाहते हैं कि वे क्यों अपनी पहचान छिपाते हैं? इस पुस्तक में उन कारणों की विवेचना मिलती है। पंजाबी साहित्य में दलित कदम एक विचारोत्तजक अंक है।’’


‘हंस’ के संपादक राजेन्द्र यादव ने कहा-‘‘दलित एवं नारी अपने दमन में इतने नजदीक हैं कि इन्हें अलग नहीं किया जा सकता। दोनाें को अपने जन्म का दंश झेलना पड़ा है। सत्ता, संपत्ति, सुरक्षा और स्वतंत्रता यह ऐसी ‘काॅमन’ चीजें हैं जो इन दोनों के पास नहीं है। यही चीजें दोनों को एक जगह खड़ी करती हैं। यह सच है कि दलित और नारी पर बात करना आज लोग फैशन समझते हैं। दलित साहित्य पर बात करते हुए अक्सर साहित्य के सौन्दर्यशास्त्र की बात उठती है जो अकादमी क्षेत्र के पढ़े-लिखे विकसित किंतु वैचारिक रूप से बंजर लोग करते हैं। दलित साहित्य की परिभाषा मराठी या पंजाबी दलित साहित्य से ही निकलेगी, हिन्दी साहित्य से नहीं क्योंकि हिन्दी भाषा गढ़ी हुई है। यह भावनाओं की भाषा है और इसका अपना कोई भौगोलिक क्षेत्र भी नहीं है। लोक से जुड़ी भाषा ही किसी सामाजिक आंदोलन को गति दे सकती है। हिन्दी में दलित-विमर्श एक अकादमिक सवाल है क्याेंकि यहां संस्कृति का एक ‘गैप’ है जबकि मराठी या पंजाबी में दलितों के अस्तित्व का सवाल है, जिसमें कुछ भटकाव होने के बावजूद अपार ऊर्जा है। हिन्दी में आरक्षण और अनुकंपा के आधार पर ही दलित साहित्य को स्थान मिलता रहा है और दलित साहित्य आंदोलन को भटकाने की बातें होती रही हैं। अमूर्तता हम हिन्दी वालों की सबसे बड़ी कला है जिसका सामान्यीकरण कर दिया गया है। लोग शास्त्रों का उदाहरण देकर दलितों के साथ धूर्तता करते रहे हैं। ‘सर्वे भवंतु सुखिनः’ की बात करते हैं, लेकिन जो समाज वर्गों और वर्णों के आधार पर बंटा है, वह सुखी कैसे रह सकता है?’’


संगोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे डाॅ. मैनेजर पांडेय ने कहा- ‘‘राजेन्द्र यादव लोककथा की उस सास की तरह हैं जो किसी भी स्थिति में दूसरों की निंदा ही करती है। जिस दलित साहित्य के मुद्दे को लेकर राजेन्द्र जी हिन्दी में वर्षों से सब की ऐसी-तैसी कर रहे हैं, वही आज हिन्दी को गाली दे रहे हैं। मो सम कौन कुटिल खल कामी। दलित साहित्य की बहती गंगा में हाथ धोने वाले लोग बहुत हैं और ढेला मारने वाले भी बहुत हैं लेकिन इससे घबराने की जरूरत नहीं है। साहित्य में रचना और रचनाकारों के आधार पर बात हो सकती है। लोकार्पित विशेषांक की कविताओं में आक्रोश और विद्रोह का स्वर प्रमुख है और प्रतिरोध की चेतना का विकास भी इनमें दिखता है। हम हिन्दी के दलित लेखक या थोड़ा बहुत मराठी के लेखकों से परिचित थे लेकिन रमणिका जी ने हमें तेलगु, गुजराती, आदिवासी और इस पंजाबी अंक के माध्यम से यह बतलाया कि दलित आन्दोलन एक अखिल भारतीय आंदोलन है।’’


पंजाबी लेखक एस. एस. नूर ने कहा-‘‘दलितों को केवल जाति के आधार पर परिभाषित नहीं किया जा सकता क्याेंकि संसार में केवल दो ही जातियां हैं। एक दलित तो दूसरी उसे दलने वाली। दलित-चेतना के विकास में मार्क्सवादी विचारधारा का बहुत बड़ा योगदान है। लेखक कोई भी हो वह दलित ही होता है। दलित चेतना एक ‘विचारधारा’ की तरह है, जिसकी आवश्यकता है।

द्वारका भारती ने कहा-‘‘पंजाब में दलितों की हालत बहुत ही दयनीय है। यह धारणा कि पंजाब में जातिवाद नहीं है, सही नहीं है। वहां भी सिक्खों में वही ब्राह्मणवाद हावी है जो हिन्दुओं में है।’’ हिन्दी के दलित लेखक मोहनदास नैमिशराय का मानना था-‘‘लेखक की भी जाति होती है। वह जिस समाज और संस्कृति से आता है उसकी स्पष्ट छाप और दबाव लेखन में अवश्य दिखता है। उन्होंने कहा कि दलित जाति का व्यक्ति कितने भी ऊंचे पद पर पहुंच जाए लेकिन उसे यह अहसास करा दिया जाता है कि तुम दलित हो। सवर्ण लेखक अपने साहित्य में ऐसे शब्दों का प्रयोग करते हैं जो दलित जाति व अस्मिता को चोट पहंचाते हैं।’’


जयप्रकाश ‘कर्दम’ का मानना था-‘‘सभी भाषा साहित्य में दलित लेखकों की संवेदनाएं एक सी हैं। वामपंथ के साथ दलित साहित्य व साहित्यकारों के जुड़ावों को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि केवल धर्मांतरण से दलितों का कल्याण नहीं हो सकता। दलित साहित्य की सुस्पष्ट परिभाषा, सीमाएं, विस्तार, औकात का स्पष्टीकरण जरूरी है। इसके बिना हम दलित आंदोलन को बहुत आगे नहीं ले जा सकते।’’ पंजाबी लेखक चरणदास सिद्धू ने कहा-‘‘अगर हमारी कलम से क्षमता होगी तो हम उसी के बल पर आगे बढ़ेंगे क्योंकि कलम ही तलवार का मुकाबला कर सकती है’’ सुश्री विमल थोराट ने कहा-‘‘दलित चेतना और आंदोलन की दार्शनिक पृष्ठभूमि में जाने की जरूरत है।’’


ज्ञान सिंह बल ने कहा-‘‘गुरुवाणी मुक्ति की बात करती है लेकिन जाति को खत्म करने की बात नहीं करती । ऐसा दर्शन साहित्य नहीं हो सकता।’’ पंजाबी कथाकार मनेन्द्र सिंह कांग ने कहा-‘‘आज के हिंसक दौर में दलित-साहित्य की बात करना बड़े ही जोखिम का काम है। दलित साहित्य दबे-कुचले लोगों के लिए दलितों द्वारा लिखा गया है, इसलिए दलित-साहित्य की परिभाषा की ज़्यादा फिक्र न करें।’’

कार्यक्रम के अंत में पंजाबी कवि बलवीर माधोपुरी ने धन्यवाद ज्ञापन किया।