युद्धरत आम आदमी क्यों

वे जो साधन संपन्न हैं
वे जो बौद्धिक हैं
अधूरे हैं तब तक
जब तक नीचे डंडे पर बैठा
आम आदमी वंचित है
गरीब है, कमजोर है
अशिक्षित है
उसे आदमी का दर्जा दिलाने के लिए
युद्धरत आम आदमी की इस मुहिम में शामिल
होओ

 

Ramnika Gupta

  • युद्धरत आम आदमी सन 1987 से निरन्तर प्रकाशन किया जा रहा है।

  • आदिवासी, दलित , स्त्री, अल्पसंख्यक एवं वंचितों के लिए प्रतिबद्ध पत्रिका।

  • यह पत्रिका नहीं आन्दोलन है।

    • Special Edition
    • Normal Issue
    • Why Yudrat AAm Admi?
    Subscription
    शुल्क की दरें भारत में विदेश में
    साधारण अंक 1 प्रति : 30 Rs/- 4$/-
    वार्षिक (साधारण डाक) : 350 Rs/- (व्यक्तिगत) 10 $/-
    द्विवार्षिक साधारण डाक) : 650 Rs/- (व्यक्तिगत) 20 $/-
    त्रैवार्षिक साधारण डाक) : 1000 Rs/- (संस्थागत) 26 $
    संस्थाओं के लिए वार्षिक 600 Rs/-(संस्थागत) 25$/-
    संस्थाओं के लिए द्विवार्षिक 1100 Rs/-(संस्थागत) 35$/-
    संस्थाओं के लिए त्रैवार्षिक 1700 Rs/-(संस्थागत) 45$/-
    आजीवन 10000 Rs/-(व्यक्तिगत) 250$/-
    आजीवन 20000 Rs/-(संस्थागत) 500$/-

    युद्धरत आम आदमी

    युद्धरत आम आदमी पत्रिका की शुरुआत 1986 में हिन्दी की चर्चित लेखिका, कवयित्री एवं जुझारू महिला नेत्री रमणिका गुप्ता ने त्रैमासिक पत्रिका के रूप में हजारीबाग से की थी। इसका निबंधन 1988 में हुआ।

    युद्धरत आम आदमी

    इसका मुख्य उद्देश्य आदिवासियों, दलितों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं की सृजनशीलता को प्लेटफार्म प्रदान करना था। बाद में इसका प्रकाशन दिल्ली से होने लगा और वर्ष 2013 के अक्टूबर माह से इसे मासिक पत्रिका में परिणत कर दिया गया।

    युद्धरत आम आदमी

    रमणिका जी अब 85 वर्ष की हो चुकी हैं लेकिन अपने मिशन के प्रति आज भी उतनी ही सक्रियता के साथ समर्पित हैं जितना झारखंड की आंदोलनकारी महिला नेत्री के रूप में अथवा बिहार विधान सभा व बिहार विधान परिषद में विधायक के रूप में सन 70 व 80 व 90 के दशक में सक्रिय थीं।

    युद्धरत आम आदमी

    युद्धरत आम आदमी पत्रिका की शुरुआत 1986 में हिन्दी की चर्चित लेखिका, कवयित्री एवं जुझारू महिला नेत्री रमणिका गुप्ता ने त्रैमासिक पत्रिका के रूप में हजारीबाग से की थी। इसका निबंधन 1988 में हुआ।

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    एक परिचय

    युद्धरत आम आदमी का त्रैमासिक रूप में 1987 से ही प्रकाशन किया जा रहा है। आदिवासी, दलित, महिला, सांप्रदायिक सद्भाव, जनवादी आंदोलन तथा शोध के क्षेत्र में यह पत्रिका कार्य करती है। यह हिन्दी की सम्मानित पत्रिका मानी जाती है।

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    हमारा लक्ष्य

    1. आदिवासियों, दलितों, स्त्रियों और अल्पसंख्यकों की अनसुनी आवाज़ को मंच देना।
    2. लक्षित समुदाय, आदिवासी, दलित, स्त्री एवं अल्पसंख्यक को जागरुक एवं सशक्त करके समतामूलक बदलाव लाना।

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    युद्धरत आम आदमी का सफरनामा

    सन् 1994-95 की ही बात है जब चन्द्रपुरा के दयानन्द बटोही मुझे ‘उज्जैन दलित सम्मेलन’ में ले गए थे। हमने ‘युद्धरत आम आदमी’ के नाम से एक पत्रिका का प्रकाशन 1985 में ही शुरू कर दिया था और सन् 1986 में पत्रिका का निबन्धन भी हो गया था।

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