किसने क्या कहा
कुमार पंकज

बिहार जनवादी लेखक संघ की मुख पत्रिका ‘युद्धरत आम आदमी’ अपने नए कलेवर और नए तेवर के साथ इक्कींसवीं सदी में दस्तक दे रही है। पत्रिका समय-समय पर अपने नए तेवर के लिए चर्चित भी रही है। यह महज दलितों की आवाज ही नहीं, बल्कि उनकी गाथा को एक आयाम देती हुई पत्रिका है। वैसे देखने में यह आया है कि ज्यादातर पत्रिकाओं ने आम आदमी की आवाज को उठाने की कोशिश तो की है, लेकिन गहराई तक जाने का कहीं से भी प्रयास नहीं किया है। लेकिन इस पत्रिका ने आम आदमी को नई दिशा ही नहीं दी, बल्कि उन्हें अपने बौद्धिक विकास के साथ-साथ सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक विकास का भी मार्ग प्रशस्त करने का अवसर प्रदान किया। उन्हें उनके इतिहास से भी परिचित कराया है। वास्तव में आम आदमी को वह चीजें सुलभ नहीं हो सकी हैं, जो कि उसकी बुनियादी जरूरत है। इसलिए पत्रिका उनकी बुनियादी जरूरतों की ओर भी ध्यान दे रही है। कहीं से ऐसा नहीं लगता कि दलित समाज वास्तविक मुक्ति नहीं चाहता, वह मुक्ति चाहता तो है, लेकिन उसे दिशा भी चाहिए।


दिशा देने का ही काम किया है ‘युद्धरत आम आदमी’ ने। दलित चेतना का कविता अंक, कहानी अंक, साहित्य अंक और सोच अंक ने एक नए प्रकार की शृंखला की शुरुआत की, जो शायद पत्रिकाओं के इतिहास में कभी नहीं हुआ। विशेषांकों की जो शुरुआत हुई वह फिर रुकी नहीं। इसमें दलित हस्ताक्षरों को खुलकर सामने आने का मौका मिला। सच यह भी है कि हिन्दी क्षेत्र में आज दलित साहित्य काफी आगे बढ़ चुका है। वैसे देखा जाए तो महाराष्ट्र में चलने वाले आंदोलन से बहुत पहले हिन्दी क्षेत्रों में 1914 में ‘सरस्वती’ में छपी हीरा डोम की ‘एक अछूत की शिकायत’ कविता दलित साहित्य का उद्गम बिन्दु मानी जा सकती है। लेकिन दलित आवाज को जितना बुलंद ‘युद्धरत आम आदमी’ ने किया है, उतना किसी भी पत्रिका ने नहीं किया है। दलित की अपनी सोच है, अपनी धारणा है, अपना विश्वास है। यदि उस सोच, धारणा और विश्वास को सही रूप से निर्देशित नहीं किया गया, तो चीजें वहीं की वहीं रह जाएंगी। यही नहीं, पत्रिका ने हिन्दी भाषा को ही दलित कलम से समृद्ध नहीं किया है, बल्कि अहिन्दी भाषा को भी नई दिशा दी है।


‘तेलुगु साहित्य के तेवर’ शीर्षक से पत्रिका ने दो खंड निकाले, जिसमें रचना खंड और आलोचना खंड हैं। रचना खंड में तेलुगु की प्रमुख कहानियां-कविताएं हैं, तो आलोचना खंड में तेलुगु साहित्य का लेखा-जोखा है। इस विशेषांक को पढ़ने के बाद ऐसा लगता है कि तेलुगु साहित्य की पूरी कलम दलितों पर ही टिकी हुई है। दलित लेखन ने समाज की तस्वीर को जिस ढंग से प्रस्तुत किया है, वैसा किसी भी लेखन में पढ़ने को नहीं मिलेगा। इसी तरह पत्रिका का अंक 53 ‘गुजराती में दलित साहित्य’ पर केंद्रित है। यह सच है भी है कि हिन्दी दलित साहित्य की तुलना में गुजराती दलित साहित्य में अधिक उपन्यास छपे हैं। उनकी कहानियां जहां पेशेगत जड़ता, दलितों की जातीय समस्या, जन्मना भेदभाव, छुआछूत जैसी त्रासदी को उभारती हैं, वहीं वे उनकी बेराजगारी, भूमिहीन, घर-विहीन होने के संकट अथवा उनके भीतर के अपने भेदभावों, कमजोरियों, अंधविश्वासों पर भी विवेचना करती हैं। अभी तो यह पत्रिका का अतीत है, लेकिन भविष्य की योजनाओं में भी चार चांद लगाने का प्रयास किया है। कुछ और विशेषांकों का जिक्र करना भी जरूरी है, जिसमें ‘समकालीन कहानियों’ का विशेषांक, लंबी ‘कविता विशेषांक’, दो खंडों में ‘आधुनिक महिला लेखन’ जिसमें 41 कवयित्रियों और 13 महिला कथाकारों की रचनाएं हैं। पत्रिका का सबसे रोचक और महत्वपूर्ण विशेषांक है ‘मजदूर अंक’, जिसकी खास बात यह है कि इसमें केवल मजदूरों की रचनाएं ही छपी थीं, जिसे उन्होंने स्वयं लिखा है।


अप्रैल-जून 2001

(प्रगतिशील आकल्प से)



कमलेश्वर

इस कथा संकलन की कहानियों को वकालत और सहानुभूति की जरूरत नहीं है। यह कहानियां दलितों के सदियों के संताप की कहानियां हैं। यह पच्चीस चौका डेढ़ सौ को पच्चीस चौका सौ बनाने वाली कहानियां हैं। अगर इस संकलन की दस कहानियां ही उठा ली जाएं तो यह दलित साहित्य के सघन संताप को साहित्य के दर्जे तक भी पहुंचाती हैंं और युद्धरत आम आदमी की प्रचंड जिजीविषा को उत्कीर्ण भी करती हैं। दूसरी दुनिया का यथार्थ की कहानियां एक सामाजिक संताप, सम्यक परिवर्तनवादी शक्ति से भरपूर हैं। मोहनदास नैमिशराय और रमणिका गुप्ता की कहानियां तो कहानियां नहीं, वे सदियों के संताप का दस्तावेज़ हैं।

 

कमलेश्वर

रमणिका गुप्ता ने युद्धरत आम आदमी के विशेष अंकों के माध्यम से देश के तमाम आदिवासी क्षेत्रों पर महत्वपूर्ण सामग्री देकर इस कमी को हिन्दी में पूरा करने का वंदनीय प्रयास किया है। दलित साहित्य पर उनका महत्वपूर्ण योगदान अलग से मौजूद है। अभी तक भारत के आदिवासी कबीलों को लेकर जो सघन शोध कार्य और सर्वेक्षण हुए हैं, उनमें सुश्री रमणिका गुप्ता द्वारा आदिवासियों के उद्गम के दो मूल स्रोत माने गए हैं- एक आस्ट्रोलायड और दूसरा द्राविड़ियन। रमणिका गुप्ता और परदेशीराम वर्मा के शोध कार्यों से मुझे इस आलेख की मूल बातों के बारे में बहुत सहायता मिली है और जहां-जहां मुझे उनके कथन में अपने विश्लेषण का अनुमोदन मिला, वहां मैंने इन्हीं दोनों के शब्दों के उपयोग से परहेज़ भी नहीं किया है।

 

कमलेश्वर

युद्धरत आम आदमी की संपादिका रमणिका गुप्ता बदाई की पात्र हैं। रमणिका जी द्वारा हिन्दी में विभिन्न भाषाओं के दलित साहित्य को प्रकाश में लाने का काम एतिहासिक महत्व का है। जिस कार्य को मैं और राजेंद्र यादव नहीं कर पाए उसे रमणिका जी ने किया।

 

डा. केदार नाथ सिंह

तेलुगु साहित्य में दलित दस्तक एक मुकम्मल संकलन है, जिसमें कविताओं के साथ-साथ कहानियां और निबंध भी हैं। कहानियों और निबंधों पर मैं यहां टिप्पणी नहीं कर रहा क्योंकि मेरा सबसे पहला ध्यान कविताओं ने ही आकृष्ठ किया । प्रचलित धारणा यह है कि दलित आंदोलन की सबसे सशक्त अभिव्यक्ति गद्य में ही हुई है। प्रस्तुत संग्रह की कविताएं इस धारणा को निरस्त करती हैं। मैं हिन्दी में इस चयन के प्रकाशन का स्वागत करता हूं।

 

मैनेजर पांडे

हम हिन्दी के दलित लेखन या थोड़ा बहुत मराठी के लेखन से परिचित थे लेकिन रमणिका जी ने हमें और हिन्दी के पाठकों को राष्ट्रीय स्तर पर, जो अन्य भाषाओं में हो रहा है अपने तेलुगु साहित्य में दलित दस्तक, गुजराती साहित्य में दलित कदम तथा पंजाबी साहित्य में दलित कदम एवं आदिवासी पुस्तकों के माध्यम से यह बतलाया कि दलित आंदोलन एक अखिल भारतीय आंदोलन है।

 

श्यौराज सिंह बेचैन

रमणिका गुप्ता तो सवर्ण संपादकों की भीड़ में एक विद्रोही संपादक हैं। दलित लेखक उनके इस प्रयास के लिए हमेशा याद रखेंगे।