युद्धरत आम आदमी का सफरनामा

सन् 1994-95 की ही बात है जब चन्द्रपुरा के दयानन्द बटोही मुझे ‘उज्जैन दलित सम्मेलन’ में ले गए थे। हमने ‘युद्धरत आम आदमी’ के नाम से एक पत्रिका का प्रकाशन 1985 में ही शुरू कर दिया था और सन् 1986 में पत्रिका का निबन्धन भी हो गया था। निबन्धन से पहले ही हम तीन अंक निकाल चुके थे, जिनमें एक दलित कहानी का समावेश भी किया गया था। उज्जैन में डा. एन. सिंह से मुलाकात हुई और वहाँ हमने ‘दलित अंक’ निकालने की योजना बनाई। उन्होंने कुछ सामग्री मुझे दी जो ‘दस्तावेज़’ नामक पत्रिका निकालने के बाद उनके पास बची थी और कई पते भी दिए ताकि हम रचनाएं मंगवा सकें।

 

वैसे दलित-चेतना को केन्द्रित करके अंक निकालने से पहले ही हम ‘युद्धरत आम आदमी’ के कई विशेषांक जैसे-लघु-पत्रिका विशेषांक, गज़ल विशेषांक, जनभाषा (खोरठा) विशेषांक, मजदूर-विशेषांक, आधुनिक महिला लेखनः अनूदित कविता, आधुनिक महिला लेखन: कहानी तथा लम्बी कविता, खण्ड-1 और लम्बी कविता, खण्ड-2 भी प्रकाशित कर चुके थे, जिनमें भारत भर के हिन्दी रचनाकारों को शामिल किया गया था। दलित अंकों या विशेषांकों में हमने हिन्दी के साथ-साथ हिन्दीतर भाषाओं की अनूदित रचनाओं को भी शामिल किया था। महिलाओं के दोनाें अंकों-आधुनिक महिला: कविता और आधुनिक महिला: कहानी का सुझाव हमें कोचीन के मधुसूदन जी ने दिया था, जब मैं सी.पी.एम की कांग्रेस में भाग लेने केरल गई थी। इन दोनों अंकों में भी हिन्दीतर भाषा की रचनाकार शामिल थीं।

 

युद्धरत आम आदमी का दलित चेतना-कविता अंक-32 वर्ष-1995

उज्जैन से लौट कर हमने ‘युद्धरत आम आदमी’ के चार अंकों की घोषणा कर दी, ‘कविता’, ‘कहानी’, ‘साहित्य’ और ‘सोच’ अंक। ‘युद्धरत आम आदमी’ का पहला दलित चेतना: कविता, अंक-32, सन् 1995 में आया। इसमें 41 कवियों की रचनाएं प्रकाशित की गईं, जिनमें 30 कवि दलित थे और 11 अवर्ण। यह अंक हमने हीरा डोम को समर्पित किया। मैनेजर पांडे जी ने यह कविता खोज कर मुझे दी और इस शती में पहली बार इसे हमने ही छापा। इस अंक के संपादन में नागेश्वरलाल और मैनेजर पांडे जी ने बहुत सहयोग दिया। मैनेजर पांडे जी ने तो पटना से दिल्ली तक मेरे साथ ट्रेन में सफर करते हुए पूरे रास्ते सारी कविताएं सुनीं और बताया कि उन्हें किस क्रम में रखना है। बिहार खासकर, हजारीबाग और रांची के सभी बुद्धिजीवी मेरे इस प्रस्ताव का विरोध कर रहे थे। ऐसे समय में इन्हीं दोनों ने मेरा समर्थन और सहयोग करके मेरा हौसला बढ़ाया।

 

युद्धरत आम आदमी का दलित-चेतना: कहानी अंक-33, जनवरी-मार्च,1996

इस बीच मैंने दलित साहित्य का अध्ययन बदस्तूर जारी रखा। 1994 से ही हमने विधिवत दलित रचनाएं संकलित करनी शुरू कर दी थीं। दिल्ली में मेरा ‘अाम्बेडकर भवन’ जाना नियमित हो गया था। इन अंकों का विमोचन ‘रशियन भवन’ फिरोजशाह रोड में हुआ। इस कार्यक्रम से मेरे सम्पर्क में और भी इजाफ़ा हो गया तथा दलित संगठनों और लेखकों के साथ एक नेटवर्किंग भी बन चुकी थी। तब सन् 1995 में ही छपा दलित चेतना: कहानी अंक-33। इस अंक में हमने 28 कहानियां प्रकाशित कीं, जिसमें 16 दलित लेखक थे और 12 अवर्ण।

 

युद्धरत आम आदमी का दलित चेतना: साहित्य संयुक्तांक 34-35, अप्रैल-सितम्बर 1996

इस अंक में कहानी, लघुकथा, लेख के साथ-साथ साक्षात्कार और संस्मरणों को भी जोड़ा गया। पत्रिका समीक्षा, पुस्तक समीक्षा तथा पत्र-प्रतिक्रियाओं के अतिरिक्त, अलग से एक समीक्षा परिशिष्ट डाला गया। चार कवि, दो लघु कथाकार, नौ निबंधकार, एक साक्षात्कार, दो संस्मरण, चार रपटें, एक पत्रिका समीक्षा, चार पुस्तक समीक्षाएं और 12 समीक्षात्मक आलेख प्रकाशित हुए, जो दलित रचनाओं, दलित आंदोलनों तथा उनकी सामाजिक स्थितियों को केन्द्र में रखकर लिखे गए थे। इसमें डाॅ. मैनेजर पांडे के साक्षात्कार के अतिरिक्त विमल थोरात तथा कतिपय सामाजिक स्तर पर कार्यरत एक्टिविस्टों के आलेख भी थे।

 

युद्धरत आम आदमी का दलित चेतना: सोच अंक 36, अक्टूबर-दिसम्बर, 1996

इस अंक में हिन्दी और हिन्दीतर भाषाओं के लेखक शामिल हुए। इस अंक के केन्द्र में दलित साहित्य, दलित राजनीति, धर्म, डाॅ. अाम्बेडकर और उनके दर्शन और जीवन के विभिन्न पहलू, दलित-स्त्री, दस्तावेज़ (दलित सम्मेलन दिल्ली में पारित प्रस्ताव), आर्थिक नीति, मास-मीडिया, शिव सागर से साक्षात्कार, मास-मीडिया से साक्षात्कार, गोरखपुर में दलित साहित्य पर हुई राष्ट्रीय संगोष्ठी की रपट, पुस्तक-समीक्षाएं तथा बहस और पत्र-प्रतिक्रियाएं भी शामिल थेे। यह अंक भारतीय मानसिकता बदलने तथा शिक्षा (पाठ्यक्रम) में दलित-चेतना साहित्य के महत्त्व को समझने के लिए खास कर 17-18 जनवरी 1996 को होने वाली संगोष्ठी को ध्यान में रखते हुए निकाला गया था। इस गोष्ठी में बिहार विधान परिषद् के अध्यक्ष जाबिर हुसैन ने शामिल होने की स्वीकृति दे दी थी, जो हिन्दी-भवन, पटना में हुई। चार दलित अंकों को हिन्दी में लाने के पश्चात हमारे सम्पर्क का दायरा पूरे भारत में फैल गया था। थाॅमस मैथ्यू के माध्यम से हमारा केरल से भी नाता जुड़ गया। सी.पी.एम के सम्मेलन में मैं केरल गई, तो साहित्यकारों से मिलने कोचीन भी चली गई थी। वहीं मधुसूदन जी से परिचय हुआ और शुरू हुआ पत्राचार। बाद में दिल्ली के आंबेडकर फाउन्डेशन के कार्यालय में ही फाउंडेशन के निदेशक मनोहर प्रसाद से मुलाकात हुई। उन दिनों आंबेडकर फाउंडेशन का कार्यालय अशोका रोड पर हुआ करता था। तब वहीं मोहनदास नैमिशराय से भी मेरा परिचय हुआ, जो वहां आंबेडकर वाङमय का संपादन कर रहे थे। डा. एन. सिंह से तो भोपाल में परिचय हो ही गया था। वहीं मध्यप्रदेश के पुरुषोत्तम सत्यप्रेमी तथा तारा परमार से भी मुलाकात हुई। डाॅ. एन. सिंह के मार्फ़त ही कुसम वियोगी और सोहनपाल सुमनाक्षर से सम्पर्क स्थापित हुआ। मेरा दायरा और विशाल हो गया। सुमनाक्षर जी के संगठन ‘राष्ट्रीय दलित लेखक संघ’ से जुड़ाव ने भी मेरे परिचय का दायरा बहुत बड़ा कर दिया। बाबा साहब के निर्वाण दिवस, 6 दिसंबर पर आयोजित उनके समारोह में देश के कोने-कोने से भारी संख्या में लेखक जुटते हैंµहजारों की संख्या में, आज भी जुटते हैं। मेरा उनसे परिचय बढ़ा और पत्राचार शुरू हुआ।

 

इस दौरान यानी 1994 से 1997 तक मैं नागपुर में सम्पन्न दलित लेखकों के सम्मेलनों व गोष्ठियों में भाग लेने जाती रही थी। इन्हीं सम्मेलनों के जरिये सुशीला टांकभौंरे और अस्मितादर्श के सम्पादक गंगाधर पानतावणे, कुमुद पांवड़े, ज्योति लांजेवार, दक्षिण की -नेत्री रूथ मनोरमा, दिल्ली की विमल थोरात, रजनी तिलक, अशोक, जयप्रकाश कर्दम, सूरजपाल चैहान, श्योराजसिंह बेचैन, डा. धर्मवीर, मस्तराम कपूर तथा महाराष्ट्र के विमल कीर्ति जैसे कई गणमान्य दलित लेखकों से मेरा परिचय हुआ। उन दिनों अपने लेखों के माध्यम से मैंने दलित साहित्य को पाठ्यक्रम में लगाने की चर्चा भी शुरू कर दी थी।

 

‘युद्धरत आम आदमी’ के 41-42 अंक को संयुक्त रूप से प्रकाशित की। जो हिन्दी पट्टी में दलित-आंदोलन के विकास-शृंखला की एक मजबूत कड़ी है। ‘युद्धरत आम आदमी’ से दूर-दराज के लेखक जुड़ने लगे। इस संयुक्तांक को हिन्दी पट्टी के दलित आन्दोलन की विकास-यात्रा में एक दस्तावेज माना जा सकता है।

 

एक बार की बात है। एक सम्मेलन को लेकर वामपंथी और दक्षिणपंथी दोनों ही खेमों ने हमारे खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। प्रभात खबर में जब यह बहस छपी, तो न जाने कहां-कहां से बिहार के कोने-कोने से लोग बहस में शामिल होने लगे। छः महीने तक चली इस बहस में विरोधियों से कसकर टक्कर लेने वाले भी कुछ कम नहीं थे। विपक्ष भी जोरदार चोट कर रहा था। इस बहस का असर यह हुआ कि कुछ दिनों बाद जो लेखक, बुद्धिजीवी और विनोबा भावे विश्वविद्यालय के अध्यापक, हजारीबाग में हमारा विरोध कर रहे थे, वही लोग पुनः ‘युद्धरत आम आदमी’ के कार्यालय में पहुंचने लगे। अपनी दलित कविताएं या कहानियां लेकर। इस आयोजन और विमर्श की सार्थकता सिद्ध होने लगी थी।

 

महाराष्ट्र से शरणकुमार लिम्बाले, कुमुद पांवड़े, सुशीला टांकभौंरे, झारखंड के दयानन्द बटोही, कावेरी, दिल्ली के कुसुम वियोगी, सूरजपाल चैहान, कंवल भारती, श्योराजसिंह बैचेन, जयप्रकाश कर्दम, सोहनपाल सुमनाक्षर, गुरु प्रसाद, पंजाब के चमनलाल, हजारीबाग के डाॅ. कृष्ण कुमार नाग, नागेश्वरलाल, गुजरात के गंगाराम परमार और रांची, पटना, मुजफ्फरपुर, भागलपुर, मगध विश्वविद्यालयों के अलावे बोकारो, धनबाद, जमशेदपुर के प्राध्यापकाें साहित्यकारों ने भी प्रतिनिधि के तौर पर भारी संख्या में भाग लिया था। संत कोलम्बिया काॅलेज का हाॅल और गैलरी, सभी दो दिनों तक खचाखच भरे रहे।

 

इस सम्मेलन की गूंज पूरे बिहार में ही नहीं। बिहार के पार भी दूर-दूर तक सुनाई पड़ी और दलित बुद्धिजीवी वर्ग का एक व्यापक हिस्सा एकत्र हुआ। सम्मेलन के लिए चन्दा जुटाने में भी जिस तरह से दलित कर्मचारी और बुद्धिजीवी सक्रिय होकर जुटे, वैसा पहली बार देखने को मिल रहा था। सरकारी-गैर सरकारी सभी दलित कर्मचारियों ने मिलकर मुस्तैदी से इस सम्मेलन को सफल बनाया।

 

इस सम्मेलन का एक अहम प्रभाव तो यह पड़ा कि बिहार-झारखण्ड में दलित अस्मिता और दलित राजनीति की एक नई संस्कृति, जो डाॅ. अाम्बेडकर की समझ के अनुरूप थी, की नींव पड़ी। इससे पहले वहां ‘गांधी का हरिजन’ ही मौजूद था।

 

‘युद्धरत आम आदमी’ के ‘तेलुगू साहित्य में दलित दस्तक’ के दो क्रमशः अंक-44, वर्ष 1998, अंक-45, वर्ष 1999

आंध्र प्रदेश के केंद्रीय विश्वविद्यालय, हैदराबाद के हिन्दी विभाग के डाॅ. वी. कृष्णा ने पहल की और उन्होंने तेलुगु दलित साहित्य पर एक अंक निकालने का प्रस्ताव रखा। दरअसल, सीटू का सम्मेलन हैदराबाद में हुआ था और वहीं उनसे मेरी मुलाकात भी हुई थी। ‘तेलुगू साहित्य में दलित दस्तक’ अंक पर जोर-शोर से काम शुरू हुआ। इस अंक में लगभग 32 लेखकों की रचनाएं शामिल की गईं। कविता, कहानी, नाटक, संस्मरण, रेखाचित्र, निबन्ध, साक्षात्कार, उपन्यास-अंश, इतिहास, आन्दोलन, समीक्षा एवं रपटें आदि विधाएं इसमें शामिल थीं।

 

आन्दोलनों की धरती आन्ध्र्र प्रदेश के दलित साहित्य का एक नया आयाम हिन्दी भाषा में आ जुड़ा। ‘तेलंगाना आन्दोलन’ के बहुत से लेखक दलित धारा में आ चुके थे। वे भागीरथ की तरह एक नई धारा, जो वाम और अाम्बेडकर की दृष्टि से लैस थी, को साहित्य, दर्शन और चिन्तन की धरती पर लाने में जी-जान से जुटे थे। नक्सल आंदोलन के कई लेखक भी दलित साहित्य से अपना रिश्ता कायम कर चुके थे, की रचनाएं भी इसमें शामिल की गईं।

 

तेलुगू का दलित साहित्य तर्क पर आधारित है। कविता वहाँ एक तार्किक निष्कर्ष पर पहुँचती है, सवाल उठा कर बीच में ही नहीं छोड़ देती। कहानी एक ठोस आन्दोलन की पृष्ठभूमि पर पनपती है, जिसमें बहसें और वाद-विवाद स्वतः स्फूर्त तरीके से निःसृत होते हैं। मात्र नारेबाजी बनकर नहीं, बल्कि एक स्वाभाविक प्रक्रिया के तौर पर। आंध्र प्रदेश में ‘जाषुबा’ के काव्य में उठाए गये प्रश्न तेलुगु दलित साहित्यकारों को काफी पहले से ही मथ रहे थे। हर तरफ से वंचना और नकार का सामना कर रहे दलित लेखक राह खोज रहे थे कि अाम्बेडकर की विचारधारा ने उन्हें राह पकड़ा दी। आज वहाँ का दलित लेखक ‘कांचा इलैय्या’ बन कर बता रहा है। ‘मैं हिन्दू क्यों नहीं हूँ’ तो ‘वे क्यों नहीं बोले’ कहानी के कथाकार पी. रामकृष्ण रेड्डी भी कह रहे हैं ‘वे क्यों नहीं बोले?’

 

क्यों नहीं बोले वे, जब उनका एक साथी जिन्दा जलाया जा रहा था, जबकि मुसीबत पड़ने पर एक-दूसरे के कट्टर दुश्मन रेड्डी लोग दूसरे रेड्डी से हाथ मिलाने में नहीं हिचकते थे? क्यों ‘माला-मादिगा’ (दलित जातियां) सवर्ण रेड्डियों का हथियार बन कर उनके लिए खुद मरती रहीं? पर वक्त बदल रहा था। फिर एक दिन माला-मदिगा ने आँखों-आँख हाथ मिला लिया और शुरू कर दी दलित एकता की मुहिम! यही तो चाहिए था। हमने पहले-पहल ‘युद्धरत आम आदमी’ के ‘तेलुगू साहित्य में दलित दस्तक’ के अंक 44 एवं 45 के माध्यम से हिन्दी साहित्य जगत को सन् 1996 में उपरोक्त संदेश से रूबरू कराया।

 

युद्धरत आम आदमी’ का ‘गुजराती साहित्य में दलित कलम’ नाम से अंक-53, सन् 2000

इसी बीच (सीटू) की वर्किंग कमिटी की बैठक फरवरी 1999 में अहमदाबाद, गुजरात में हुई थी। तब मैं जयंत परमार से दूसरी बार मिली थी। मेरे जाने से पहले ही सुवर्णा बहन ने जयंत परमार से कहकर मेरा कार्यक्रम तय करवा दिया था। सुवर्णा बहन से मेरा परिचय जे.एन.यू. के प्रो.पुष्पेश पंत ने करवाया था। गांधी की धरती गुजरात में हमने दलित साहित्यकारों के पते जुटाने शुरू किए। हजारीबाग के दलित लेखक सम्मेलन में गुजरात के गंगाराम परमार भागीदारी कर चुके थे। मेरे अहमदाबाद पहुंचने पर वहाँ के दलित लेखकों ने अलग से बैठकें आयोजित कीं। हरीश मंगलम जी द्वारा किसी कार्यालय में एक सभा की गई और चन्द्राबेन विधायक द्वारा उनके घर गांधी नगर में दूसरी सभा हुई। वहीं नया मार्ग के संपादक इन्द्र कुमार जानी और एससी/एसटी के चेयरमैन डाॅ. विजय सोनकर शास्त्री से मेरी मुलाकात हुई। अगले दिन एक दलित गोष्ठी प्रतिष्ठित लेखक नरेंद्र दवे जी के यहां करवाई गयी। पहली बैठक में गुजरात के कई बड़े-बड़े आई.ए.एस. अफसर, अधिकारी और बुद्धिजीवी जुटे थे। इस बैठक में बिहार की राजनीतिक स्थिति और लालू प्रसाद यादव पर गंभीर चर्चा हुई। आरक्षण और बिहार में हो रहे उच्च जातियों द्वारा नरसंहारों पर भी लोगों ने जानना चाहा और बदले में दलितों और पिछड़ों द्वारा की गयी कार्रवाइयों पर भी जिज्ञासा जताई। दूसरी बैठक में अधिकारियों व संपादकों के साथ-साथ भारी संख्या में साहित्यकार भी आ जुटे। मैंने उस बैठक में गुजराती साहित्य में दलित कलम के लिए लेखकों को अपनी रचनाएं अनुदित कर भेजने का प्रस्ताव रखा। आगे आए हिन्दी भाषी फूलचन्द गुप्ता, जो हिम्मत नगर के एक काॅलेज में प्राध्यापक रहे हैं। वे गुजराती पर भी उतना ही अधिकार रखते हैं, जितना हिन्दी पर। साहिल परमार जी ने भी अनुवाद करने की पेशकश की और काम जोर-शोर से शुरू हो गया। तब तक मैं हजारीबाग से दिल्ली शिफ्ट कर चुकी थी।

 

गुजरात की तीसरी यात्रा में मैंने मॅकवान जी से भी भेंट की और वे भी हमारे इस अभियान में शामिल हो गये। सुवर्णा बहन, साहिल परमार, चंदू महेरिया, जयन्त परमार ने अथक प्रयास कर के रचनाएं जुटाईं। उन्होंने ही लिपि की गलतियां सुधारीं और फूलचन्द गुप्ता जी ने तो सारी की सारी पाण्डुलिपि देख दी और जहां जरूरत पड़ी अनुवाद भी सुधार दिया। प्रवीण गढ़वी, हरीश मंगलम, दलपत चैहान, अरविंद वेगड़ा, धरमाभाई श्रीमाली, बी. केशरशिवम्, बी.न. वणकर, केशुभाई देसाई आदि को मिलाकर लगभग 45 लेखकों की रचनाएं शामिल की गईं।

 

सबके प्रयास से सन् 2000 में ‘गुजराती साहित्य में दलित कलम’ नाम से ‘युद्धरत आम आदमी’ का अंक-53 सामने आया। इसमें सभी विधाओं की रचनाएं थीं। सन् 1950 तक गुजराती का दलित साहित्य भी गांधी के ‘हरिजन’ की महक से उबरा नहीं था। इस धरती पर जहाँ ‘हरिजन’ के उद्धार की मुहिम बड़े जोर-शोर से चल रही थीµदलित साहित्यकार को उससे उबरने में वक्त लगा। अन्ततः वह भी जागा। इन सब की पड़ताल इस अंक में गुजरात के दलित लेखकों ने की है। दरअसल गांधी की मुहिम में शामिल रहने के कारण दलितों को अपनी बात दबे स्वर में कहने की आदत थी! बहुत मुखर विरोध वे नहीं कर पाते थे। यह तो महाराष्ट्र से बाबा साहब की प्रेरणा और 1972 में पैंथर मूवमेंट जब गुजरात में आई, तब दलितों ने ऊंची आवाज में बोलना शुरू किया! बहुत लम्बे अरसे तक गुजराती दलित लेखक हिचकिचाता रहाµ‘हरिजन’ बना रहा। वह ‘पीर-पराई जानने वालाें’ का इन्तजार करता रहा। उनमें विवेक जगने की बाट जोहता रहा।

 

उन्हीं दिनों सूरत के नज़दीक बने एक बांध से पानी ओवरफ्लो होकर 10-10 फुट शहर में भर गया। इस अप्रत्याशित बाढ़ से शहर में प्लेग जैसी बीमारी फैल गयी। चूहों को मारने की सरकारी मुहिम में खुद भी चूहों की मौत मरते दलितों की किसी ने सुध नहीं ली। अखबारों में मृतकों के बढ़ते आंकड़ों में उनकी संख्या भी जुटती रही। इसका असर कहानी-कथाकारों पर भी पड़ा और बी. केशर शिवम् की कहानी आ गई ‘रामली’। हरीश मंगलम की ‘दाई’ निरीह आंखों से देखती रही उन्हें, जिन्हें उसने जन्म दिलाया था और जो उसे अछूत कह कर उससे ही दूर छिटक रहे थे! दुःखी थी वह, पर विद्रोही नहीं। दलपत चैहान अपनी ‘अस्पृश्य’ कविता में सवाल करते हैं-‘आज तक खोजता रहा मैं/ मेरे किस अंग उपांग पर लिखी गई हैं/ अस्पृश्यता की ऋचाएं।’

 

1974 में आंदोलन के घंटे बजने लगे और बिहार के आंदोलन से उसके सुर जा मिलेे। फिर 1981 में आरक्षण को लेकर पुनः आंदोलन शुरू हुआ, जिसे गुजराती में ‘हुल्लड़’ कहते हैं। मजदूर, बुद्धिजीवी, नौकरशाह, युवा वर्ग व छात्रा एकजुट हुए। मिलें बंद हो गईं। माहौल गरम हो गया। गांधी का हरिजन याचक एकाएक अाम्बेडकर का दलित योद्धा बन गया। मॅकवान के ‘आंगलियात’ में विद्रोह के अंकुर फूटने लगे। नीरव पटेल ने जोरदार शब्दों में चेताना शुरू कर दिया था-‘‘मां! मैं बड़ा कि मेरा भाई’ और मंदिर-प्रवेश को लेकर एक तरफ प्रवीण गढ़वी कहने लगे थेµ‘मंदिर प्रवेश मत करो, दोस्तो!/... कत्लगाह में एक भी कदम/ मत रखो/ दोस्तो!’ साहिल परमार की कविताओं ने तो ‘अपने कैमरे बना लिए’, जिससे वे हर जाति की फोटो खींच सकते है। वे अपने नये लेंस से दलित समस्या को देखने लगे। महेश चन्द्र पंड्या की कविता-‘‘चल री ओ रेवली खेत में बन्दूकें बो दंे’’ कहकर गांधी की धारा से अलग नया संदेश देने लगी, तो हरीश मंगलम अपनी कविता ‘तो भी’ और ‘अस्तित्व’ के माध्यम से विश्व अदालत में दलित मुद्दे पेश करने लगे। फिर तो एक के बाद एक रचनाएं विद्रोही तेवर लेकर आईं। शुरू में निःसृत ‘हरिजन’ का दबा स्वर अब एक चीख़ में बदलने लगा, जो कालांतर में दहाड़ बन गया... शेर की दहाड़! इसी दहाड़ की आकांक्षा और अपेक्षा अाम्बडकर को थी। गुजरात में दलित लेखकों ने बहुत ही अच्छे संस्थागत प्रयास किये हैं, जो दलित साहित्य के लिए एक अच्छी नींव बने। गुजरात की दलित साहित्य अकादेमी उनमें से एक ऐसी ही संस्था है।

 

अकादेमी की पत्रिका ‘हयाती’ और स्वतंत्रा रूप से प्रकाशित ‘नया मार्ग’, ‘आक्रोश’ और ‘कारे सूरज’ जैसी कई पत्रिकाओं ने दलित लेखकों को मंच देने का काम किया। पता नहीं क्यों अम्बेडकर के सूत्रों को दहाड़ने वाले दलित साहित्यकारों के होते हुए भी गुराजत अल्पसंख्यकों के नरसंहारो का प्रदेश बन गया और दलित भी उच्चवर्गीय सवर्ण मनुवादियों का हथियार बनकर हत्याएं करने लगा। आज इस यक्ष प्रश्न का उत्तर दलित साहित्यकारों को देना होगा। ‘युद्धरत आम आदमी’ की यात्रा की रफ्तार तेज होती जा रही थी। काफिला बड़ा हो रहा था। सन् 2000 में मैं दिल्ली आकर रहने की शुरुआत कर चुकी थी। यहीं हमने इस अंक को ‘गुजराती साहित्य में दलित कलम’ नामक पुस्तक रूप में छापा।

 

दिल्ली आकर मैंने अब तक प्रकाशित सभी विशेषांकों को पुस्तक रूप देने की ठानी। यहीं हमने ‘तेलुगु साहित्य में दलित दस्तक’ और ‘गुजराती साहित्य में दलित कलम’ के नाम से पुस्तकें प्रकाशित कीें। हमारीबाग में ही सन् 1999 में ‘दलित चेतना-कहानी’ अंक की ‘दूसरी दुनिया का यथार्थ’ नाम से पुस्तक प्रकाशित हो चुकी थी।

 

विश्व दलित लेखक सम्मेलन लंदन सन् 2000

सन् 2000 में ही सोहनपाल सुमनाक्षर जी द्वारा आयोजित विश्व दलित लेखक सम्मेलन में भाग लेने मैं लंदन गई थी। दलित लेखकों से वहां मेरा तथा लंदन रहने वाले दलित गैर दलित लेखकों से भी परिचय हुआ।

 

आदिवासी स्वर और नई शताब्दी विशेषांक: 55, सन् 2001

1998-99 में ही मुझे उदयपुर से प्रकाशित ‘अरावली उद्घोष’ पत्रिका के सम्पादक वी.पी वर्मा ‘पथिक’ समेत उनके कई पाठकों के पत्र आ चुके थे कि हमने दलितों की कहानियां तो प्रकाशित कीं लेकिन आदिवासी लेखकों को क्यों छोड़ दिया। फलतः उदयपुर जाकर मैंने पथिक वर्मा जी, कुसुम मेघवाल और भागीरथ मेघवाल जी से मुलाकात की। उन्हीं दिनों वहाँ अश्विनी जी द्वारा एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था, जिसमें मुझे और शबाना आजमी दोनों को भाग लेना था। मैंने इस कार्यक्रम के बाद पथिक जी के माध्यम से कई आदिवासी लेखकों से सम्पर्क किया। वहाँ के कई ‘मीणा’ लेखक मुझे मिले और उन सबसे पते व फोन नंबर हासिल हुए। मैंने जयपुर जा कर भी आदिवासी लेखकों से सम्पर्क किया। शंकरलाल मीणा, हरीराम मीणा और वहाँ के आई. जी. से भी मिली, जो मीणा ही थेµऔर साहित्य में रूचि रखते थे। वहीं मेरी मुलाकात वर्मा जी से हुई, जिन्होंने संघर्ष करके ‘मीणा’ जनजाति को अनुसूचित जनजाति में शामिल करवाया था। कई साहित्यकारों के पते लेकर मैं वापिस हजारीबाग लौटी और फिर रांची के लेखकों से सम्पर्क किया। वासवी ने मुझे कई आदिवासी लेखकाें के पते दिए। कृष्ण चन्द्र टुडू ने भी भरपूर सहयोग दिया। वहीं महादेव टोप्पो, जो उन दिनों कलकत्ते से रांची आए हुए थे, ने मुझे बम्बई तथा पुणे के आदिवासी लेखकों के पते के साथ-साथ पुणे से प्रकाशित ‘सुगावा’ पत्रिका का पता भी उपलब्ध कराया, जिसने आदिवासी लेखन पर अपना एक अंक केन्द्रित किया था। फिर क्या था! पुणे में मैं शरणकुमार लिम्बाले के यहाँ जा पहुँची। वे हजारीबाग के सम्मेलन में भाग लेने आए थे तब से उनसे पत्राचार जारी था। नागपुर से सुशीला टांकभौंरे और कुमुद पांवड़े भी आई हुई थीं हजारीबाग। पुणे में शरण ने मुझे कई लेखकों से मिलवाया। मनहर से भी मिलाया, जिन्होंने आदिवासियों पर बहुत लिखा है। वे मुझे ‘सुगावा’ के कार्यालय में भी ले गये, जहां से मुझे कई आदिवासी लेखकों के पते मिले और उनकी मराठी भाषी ‘सुगावा’ पत्रिका, जोे महाराष्ट्र के आदिवासियों पर केंद्रित थी, की एक प्रति भी हमें मिली, जो हमारे लिए स्रोत बन गई। हमने मराठी के कई लेख सुगावा पत्रिका से लेकर अनुवाद करवाए और प्रकाशित किए। फिर तो पूरे भारत से मुझे पत्रा आने लगे और रचनाएं जुटने लगीं। पटना के ही एक वीरेन्द्र सिंह अरुणाचल प्रदेश में कई वर्ष रहकर आए थे। उन्होंने मुझे अरुणाचल की ‘आदी’ और आपातानी भाषा से हिन्दी में अनूदित गीतों की पुस्तक दी। आपातानी जनजाति पर लेख भी उपलब्ध कराए, कई लोकगीत भी मूलभाषा से अनुवाद करके दिए।

 

इसी बीच जमशेदपुर में संथाली साहित्यकारों का जमावड़ा हुआ। शिबू सोरेन भी वहां आए थे। मुझे भी बोलना था सभा में। उस सभा में मुझे असम के कई लेखक भी मिले। पृथ्वी मांझी, जो उस समय असम विधानसभा में विधायक थे, बाद में जो असम विधानसभा के स्पीकर भी बनेे, से भी परिचय हुआ। उसी सभा में उड़ीसा के संताली लोग भी जुटे थे। बस मैं उड़ीसा जा पहुँची।

 

मैं कोल इण्डिया की वेलफेयर कमेटी की सदस्य थी। उनकी मीटिंग भारत में विभिन्न क्षेत्रों में होती थी, खासकर जहाँ कोयला था। जब भी मैं मीटिंग में जाती, तो दो दिन ज्यादा रुक जाती ताकि उस शहर या राज्य के साहित्यकारों से मिल सकूं। मैं उड़ीसा में उत्कल विश्वविद्यालय, भुवनेश्वर में भी बुद्धिजीवियों से मिली। पुरी के लोगों से भी सम्पर्क साधा। उड़ीसा के शिक्षा विभाग के जिला अधिकारी (डी. ई. ओ.) मिश्रा जी से परिचय हुआ, जो आदिवासियों और उनके साहित्य में रुचि लेते थे। उन्होंने मेरा परिचय कई दलित व आदिवासी साहित्यकारों से करवाया। मैं यू.जी.सी. के चेयरमैन मिर्धा जी से मिली और दिल्ली के खालसा काॅलेज में कार्यरत राजकुमार नामक एक उड़िया प्रोफेसर के पिता से मिली, जो दलित लेखक हैं। मिश्रा जी स्वयं एक लेखक तो हैं ही, अनुसंधान करने में भी रुचि रखते हैं। वहां के आदिवासी विभाग के लोगों से भी परिचय हुआ, जिन्होंने मुझे कई पत्रिकाएं व किताबें उपलब्ध कराईं, जिनमें आदिवासियों द्वारा रचित साहित्य या आलेख प्रकाशित थे। वहीं मुझे राउरकेला की तरफ की एक आदिवासी पार्षद मिलीं, जिन्हाेंनेे अपनी आत्मकथा भी लिखी थी। उन्होंने मुझे अपनी वह आत्मकथा हिन्दी में अनुवाद करके प्रकाशित करने को दी।

 

वापिस लौट कर शुरू हुआ अनुवाद का काम। मध्यप्रदेश, राजस्थान समेत छत्तीसगढ़ के आदिवासी तो हिन्दी में ही लिखते हैं। लेकिन उड़ीसा, बंगाल, केरल, बिहार, झारखण्ड समेत कई भाषाओं के लेखकों के अनुवाद में काफी समय लगा। यह काम हमने 1997 में ही शुरू कर दिया था।

 

आन्ध्रप्रदेश और केरल के लेखकों से भी मेरा परिचय तब हुआ, जब मैं सीटू की जनरल मीटिंग की बैठक में भाग लेने गई थी। केरल और चेन्नई भी मैं दो बार जा चुकी थी, एक सी.पी.एम. की कांफ्रेंस में और दूसरी बार सीटू की जनरल काउंसिल की बैठक में। मैंने उसी वक्त लेखकों के पते ले लिये थे और उनसे पत्राचार शुरू कर दिया था। उन लेखकों से सम्पर्क करवाने में चेन्नई के पार्टी साथियों ने भी मेरा काफी सहयोग किया था।

इस शुरुआत से पहले ही 1998 में हम युद्धरत आम आदमी के आदिवासी स्वर और नई शताब्दी पर काम करना शुरू कर चुके थे।

 

सन् 1998 में इस अंक के प्रकाशित होने के बाद वाणी प्रकाशन ने इसी नाम से एक पुस्तक भी प्रकाशित कर दी। यह आदिवासी स्वर और नई शताब्दी पहला खंड यानी सृजन खंड था। ये अंक कुल नौ भागों में बंटा है। पहला भाग संपादकीय है, तो दूसरे में 12 हिन्दी भाषी आदिवासी कवियों की 66 कविताएं, तीसरे में अनूदित कविताओं के तहत 6 कवियों की 19 कविताएं। चैथा भाग है मूल सहित अनुदित कविताओं का। इसमें कुडुख़ के 6, खड़िया के 3 और नगपुरिया, भिलौरी, मराठी, संताली, मुंडारी के एक-एक कवि यानी कुल 14 कवियों की 24 कविताएं शामिल हैं। लोक गीतों के 5 प्रस्तुतकर्ता हैं। अरुणाचल प्रदेश के आपातानी भाषा, झारखण्ड के बिरहोर व संथाली और आन्ध्रप्रदेश के लाम्बाड़ी तथा एक राजस्थानी। इनके कुल 72 गीत हैं। कुछ अनुवाद के साथ हैं और कुछ केवल हिन्दी में। पांचवां भाग हैµअनूदित कहानियों का जिसमें मलयालम, मराठी, खड़िया की एक-एक और संताली की दो कहानियां हैं यानी कुल 4 कहानीकार हैं। छठा भाग है उपन्यास अंश, जिसमें कुल 4 उपन्यासकार हैंµहिन्दी के दो, तेलुगू, मलयालम के एक-एक यानी 4 उपन्यास अंश। सातवां भाग ‘विविध’ का है, जिसमें 2 रचनाकारों की 2 हिन्दी व्यंग्य कथाएं हैं। आठवां खंड नाटकों का है, जिसमें 2 नाटककारों के 2 नाटक सम्मिलित हैंµएक हिन्दी में, दूसरा खड़िया में। इसी खंड में 4 भाषाओं की लोककथाएं, भी शामिल की गई हैं। अरूणाचल प्रदेश से आपातानी भाषा की एक, झारखंड से खड़िया एवं संताली भाषा की एक-एक यानी दो तथा आंध्रप्रदेश की कोंडा एवं कुंबी द्रविड़ जनजाति की लंबाड़ी भाषा की एक। इस प्रकार इस अंक में लगभग नौ राज्यों के आदिवासी लेखकों ने अपनी रचनाओं के साथ भागीदारी की। इसमें सम्पादक सहित 59 लेखक-लेखिकाओं ने अपनी हिस्सेदारी की और सभी विधाओं की कुल 119 रचनाओं को शामिल किया गया है।

 

युद्धरत आम आदमी का पंजाबी साहित्य में दलित कदम विशेषांक: 58, वर्ष 2001

इसी बीच जालंधर में ज्ञानसिंह बल और द्वारका भारती ने ‘मानववादी रचना मंच’ ने सन 7 मई, 2000 में दलित साहित्य को प्रोत्साहित करने और स्वयं दलितों के बारे में लिखने के उपलक्ष्य में डाॅ. अम्बेडकर चेतना अवार्ड-1999 से मुझे सम्मानित किया। जालंधर जाने पर मेरा पंजाब के सभी लेखकों से परिचय हुआ। पटियाला के चमनलाल जी तो हजारीबाग सम्मेलन में भाग लेने पहले ही आ चुके थे, उनके अतिरिक्त ‘भीम’ पत्रिका के संपादक बाली जी से भी परिचय हुआ। सोमा सबलोक, सुरेन्द्र अज्ञात, मदनवीरा, सरूप सियालवी, बलबंत सिंह आदि कई लेखकों से मुलाकात हुई। उसी सभा में पंजाबी के दलित साहित्यकारों की रचनाओं का अनुवाद करवा कर ‘युद्धरत आम आदमी’ का ‘पंजाबी साहित्य में दलित कदम’ नाम से एक विशेषांक प्रकाशित करवाने की घोषणा हमने की। दलित साहित्य पर ही एक संगोष्ठी 23 जून, 2001 को होशियारपुर में द्वारका भारती जी ने करवाई थी, ताकि पंजाबी साहित्य में दलित कदम के लिए लेखकों को योगदान करने के लिए आह्वान किया जा सके। इस गोष्ठी में साहित्य को दलित साहित्य कहने पर भी कई दलित लेखकों ने आपत्ति की। सबका समाधान तो हम नहीं कर पाए, किन्तु अंत में काफी लोग हमारा साथ देने को तैयार हुए। इस तरह तैयारी शुरू हो गयीµ‘पंजाबी साहित्य में दलित कदम’ विशेषांक 58 की। द्वारका भारती, मदनवीरा, ज्ञानसिंह बल ने अनुवाद करने का जिम्मा संभाला। एन.बी.टी. के बलदेव सिंह बद्दन तथा ‘योजना’ पत्रिका के सम्पादक बलबीर माधोपुरी और मनमोहन सिंह बावा से भी हमने सम्पर्क साधा।

 

इस अंक में 18 कहानियां, 1 उपन्यास-अंश, 4 आत्मकथा-अंश, 2 संस्मरण, 20 कवियों की 57 कविताएं, 2 नाटक-अंश, 6 आलेख, 10 मूल्यांकन, 7 विचारपरक लेख और 5 साक्षात्कार शामिल किये गये। इसमें 65 लेखकों ने योगदान दिया। कुल 102 रचनाएं छपीं। दरअसल उन दिनों पंजाब का दलित कथाकार व कवि खुद को दलित कहने से घबराता था। वे प्रगतिशील थेे, जनवादी थे। मध्यमार्गी थे, तटस्थ थे, अकाली थे, कांग्रेसी थे, भाजपाई थे, बसपाई थे, कम्युनिस्ट थे, स्वांतः सुखाय थे, कलावादी थे, यथार्थवादी थे, पर दलित लेखक कहलाने की बात पर वे सोच में पड़ जाते थे। उन्हें डर था कि कहीं पंजाबी की वाम या दक्षिण पंथी लेखक बिरादरी, जो ज्यादातर उच्च जातियों व जाटों की थी, उनके दलित होने का रहस्य जान लेने पर, उनके साहित्य को नकार न दे। होशियारपुर में हुई इस गोष्ठी में शायद पहली बार पंजाब के दलित लेखकों ने खुद को दलित लेखक घोषित किया। उस गोष्ठी में खुलकर बातें र्हुइं। उस दिन हमने ‘युद्धरत आम आदमी’ के माध्यम से दलित साहित्य के औचित्य को बताया। इस तरह से काफी हद तक पंजाबी दलित लेखकों की चेतना पर जमी बर्फ को तोड़ने में हम कामयाब हुएµजो दलित लेखकांे को खुल कर सामने आने नहीं दे रही थी।

 

इस अंक के प्रकाशन के बाद हमने ‘दलित साहित्य में पंजाबी कदम’ विशेषांक 58 पर जोर-शोर से काम शुरू किया और ये 2001 में प्रकाशित हो गया। दिल्ली साहित्य अकादेमी के सभागार में गोपीचंद नारंग की अध्यक्षता में कमलेश्वर जी ने इस अंक का लोकार्पण किया और मैनेजर पांडे, नूर साहब, ज्ञान सिंह बल, द्वारका भारती, जयप्रकाश कर्दम, रजनी तिलक समेत कई दलित लेखकों ने भाग लिया। लोकार्पण के इस कार्यक्रम में पंजाब अकदेमी के लोग भी आए और वहां के दक्षिणपंथी एवं वामपंथी लेखक भी।

 

युद्धरत आम आदमी का आदिवासी स्वर और नई शताब्दी-खंड-2 (विचार आधारित), अंक-67 वर्ष-2002

फिर जद्दोजहद शुरू हुई आदिवासी स्वर और नई शताब्दी का विचार-आधारित खंड-2 निकालने की। हमारे सम्पर्क दक्षिण, पश्चिम, मध्य और पूर्वोत्तर भारत में हो चुके थे। हमने इन नौ राज्याें के आदिवासी लेखकों को शामिल करते हुए ‘युद्धरत आम आदमी’ का दूसरा विशेषांक निकाला। इन दोनाें विशेषांकों में शामिल लेखकों के आधार पर हमने एक आदिवासी लेखक सम्मेलन आहूत करने का निर्णय लिया।

 

लक्ष्मण गायकवाड़ जिनसे मेरा परिचय शरण कुमार लिंबाले ने करवाया था और भुजंग मेश्राम,वाहरू सोनवणे, विनायक तुमराम, उषाकिरण आत्राम, वामन शेल्के (महाराष्ट्र), निर्मला पुतुल, ग्रेस कुजूर (झारखण्ड) नारायण (केरल) और आंध्रप्रदेश से बंजारा लेखक श्री बी. चीनिया नायक ‘युद्धरत आम आदमी’ के आदिवासी स्वर और नयी शताब्दी खंड-1 और 2 में छप चुके थे।

 

पूर्वोत्तर राज्यों का क्षेत्रीय सम्मेलन, गौहाटी, 21 दिसंबर 2002

कोल इण्डिया की वैलफेयर कमिटी की दो दिवसीय बैठक गोहाटी में 2002 में हुई थी, जिसमें मैंने भाग लिया था। वहां जाने से पहले मैंने असम, कोकराझर, शिलांग के कई लेखकों से पत्राचार कर उन्हें मिलने के लिए बुलाया था। कोल इंडिया के गैस्ट हाउस में मुझे कार्बी, बोड़ो असमिया तथा खासी लेखक आकर मिले थे। पृथ्वी मांझी जी ने भी कई लेखकों को बुला भेजा था। एक छोटी-सी टीम भी हमने तैयार कर ली थी। दिसम्बर 2002 की बड़ी सभा हेतु विधायक प्रमिला बोड़ो की अध्यक्षता में हमने एक तैयारी कमिटी भी बना दी। 21 दिसंबर, 2002 को लक्खीराम बरुआ सदन, गोहाटी में अभासम का पूर्वोत्तर राज्यों का क्षेत्राीय सम्मेलन संपन्न हुआ। इसका उद्घाटन असम विधान सभा के अध्यक्ष पृथ्वी मांझी ने किया और अध्यक्षता रामदयाल मुंडा जी ने की। इस बैठक में पूर्वाेत्तर के राज्यों के अतिरिक्त महाराष्ट्र से उषा आत्राम, उड़ीसा से चेतन मांझी, बोड़ो जनजाति से करींद्र बासुमैत्राी और त्रिपुरा के बिमल देब बर्मा ने भाग लिया। विधायक प्रमिला बोडो इस सम्मेलन में स्वागताध्यक्ष थीं। इस सम्मेलन मेें साहित्य अकादेमी की तरफ से दो पर्यवेक्षकµ भट्टाचार्या जी और गिरधर राठी जी भी शामिल हुए। इस आयोजन में सभी पूर्वोत्तर राज्यों की भाषाओं का कविता-पाठ भी हुआ, जिसमें खासी, कोकबरोक, मिजो, बोडो, कार्बी, राभा व टीवा के अतिरिक्त गोंडी, नागपुरी, मुंडारी, उड़िया व हिंदी कविताएं भी पढ़ी गयीं। विस्थापन के ज्वलंत मुद्दे पर बनी श्रीप्रकाश की फिल्म ‘फायर विदिन’ यहां दिखाई गई।

 

इस सभा में छह प्रस्ताव पारित हुए, जिसमें

 

दक्षिण राज्यों का आदिवासी साहित्यिक मंच का द्विदिवसीय सम्मेलन, कन्नड़ विश्वविद्यालय हम्पी, 18-19 जनवरी, 2003

इसी बीच 3-4-5 जनवरी को हैदराबाद में डब्लूसीएफ का सम्मेलन हुआ। मैं उसमें दलित लेखकों द्वारा आयोजित कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में गई थी। अगले दिन उसी मैदान में सीताराम येचुरी, मेधा पाटेकर द्वारा इस आयोजन का मुख्य कार्यक्रम हुआ जिसमें मैंने भी भाग लिया। लेकिन वहां बहुत ही अधिक भीड़ थी और धूल भी उड़ रही थी। मुझे एकाएक दमे का दौरा पड़ गया। मुझे कुछ ज्यादा ही मात्रा में स्टेराइड की दवाएं दे दी गयी थींµफलतः मैं बेहोश हो कर गिर पड़ी थी। साथी लोग हैदराबाद के अपोलो अस्पताल ले गये। काफी बीमार हो गयी थी मैं। दिल का दौरा भी पड़ गया था। साथी अमर सिंह और मेघनाथ जी ने मेरी बहुत देखभाल की। मुझे हवाई जहाज से दिल्ली भेज दिया गया। मैं कुछ ठीक तो हो चली थी पर सफर करना कठिन था। फिर भी जिद करके ट्रेन से दो दिन का सफर करके हम्पी में सम्मेलन के लिए पहुंच गयी। हालांकि वहां से लौटते ही मुुझे पुनः दिल्ली एस्कार्ट अस्पताल में भर्ती होकर हार्ट में स्टेंट बिठवाना पड़ा। यह तो गनीमत थी कि इस बार बायपास न करके स्टेंट से ही काम चल गया था। खैर!

 

गुजरात दंगों पर युद्धरत आम आदमी की ‘जलता गुजरात’ नाम से पत्रिका एवं एक परचे का प्रकाशन वर्ष 2 जून 2002

युद्धरत आम आदमी की ओर से गुजरात के दंगे पर एक स्मारिका भी निकाली गई एक पर्चा दयामणि बारला, जो इंसाफ संस्था की अध्यक्ष थी, ने गुजरात जाकर दंगों की रिपोर्ट तैयार की और आदिवासियों की बस्तियों का दौरा करके पूरा ब्योरा तैयार किया। हमने उनकी रपट को युद्धरत आम आदमी की स्मारिका में प्रकाशित किया। इसमें हरिराम मीणा, पंकज बिष्ट, ब्रजरंजन मणि, जोसेफ मॅकवान, मोहनदास नैमिशराय और लक्ष्मण गायकवाड के आलेख तथा रपटें छपीं और कुछ कविताएं भी।

 

युद्धरत आम आदमी’ का ‘नई सदी का युवा स्वर’ विशेषांक 64 सन 2002

युद्धरत आम आदमी’ के माध्यम से लगातार आदिवासियों, दलितों, स्त्रिायों पर कई विशेषांक निकालने के बाद पत्रिका के साधारण अंकों में भी इन मुद्दों को प्रमुख स्थान देना शुरू कर दिया था। युद्धरत आम आदमी ने जहां 62, 63, 65 अंक उपरोक्त मुद्दों पर केंद्रित कर निकाले वहीं अंक 64 युवाओं को समर्पित किया। इस प्रकार ‘नई सदी का युवा स्वर’µअंक 64 प्रकाशित हुआ। ये अंक श्रीधरम और प्रमिला, जो हमारी प्रबंधक और सहयोगी थीं, के सहयोग से संपन्न हुआ।

 

पूर्वोत्तर का आदिवासी स्वर’ विशेषांक: 75, वर्ष 2005

शुरू हुई अंक 75 की तैयारी, जिसमें विचार प्रधान लेखों का समावेश किया गया और साथ ही पूर्वोत्तर की भाषाओं पर काम शुरू हो गया। जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है, हम दिसम्बर 2002 में ही गोहाटी में पूर्वोत्तर के लेखकों की मीटिंग बुलाकर आदिवासी साहित्यिक मंच के पूर्वोत्तर की शाखा और हम्पी, कर्नाटक के सम्मेलन में दक्षिण राज्यों की एक क्षेत्रीय कमिटी का गठन कर चुके थे। रचनाएं काफी आ गई थीं। कुछ बोड़ो युवा संगठन के संयोजक ने भी हमारी मदद की, तो ‘बोडो साहित्य सभा’ के मुखपत्र ‘द बोड़ो’ के 24 फरवरी 2004 के 29 वें अंक से हमें काफी सामग्री मिल गई, जिसके मुख्य संपादक असम के प्रसिद्ध बोड़ो लेखक एवं भाषाविद् प्रबन बरगोयारी थे। एक और अंक हमें श्रीप्रकाश के माध्यम से प्राप्त हुआ, जो खासी छात्र-सभा ने निकाला था। इससे हमें बहुत से आलेख, कविताएं, घोषणा पत्र और जानकारियां मिलीं। बाद में इसी अंक की रचनात्मक कृतियाें को हिन्दी में अनुवाद करके हमने अंक-91 में प्रकाशित किया। गांधी हिन्दुस्तान साहित्य सभा, राजघाट सन्निधि, दिल्ली ने गैर अनुसूचित भाषाओं पर कई सम्मेलन आयोजित किए थे। इन्होंने जब-जब ये सम्मेलन आयोजित किए, तब-तब सन्निधि नाम से स्मारिकाएं भी प्रकाशित कीं। इनमें प्रकाशित सामग्री भी हमारे बहुत काम आई। इन स्मारिकाओं के सम्पादक द्वय एस. के. बसुमुथियारी और रमेश भारद्वाज हैं। बिहार से गए उलुपी पत्रिका के सम्पादक और उनकी पत्नी ने भी हमें लेखकों से मिलवाने में बहुत सहयोग दिया। हमने उन रचनाओं का हिन्दी में अनुवाद कराया। असम के दिनकर कुमार, जो असम की सैन्टीनल पत्रिका के संपादक हैं ने भी हमारे लिए अनुवाद किया। मंगल सिंह हाजोवारी कोकराझार से और उनके दामाद और बेटी, जो दिल्ली में रहते हैं तथा बिजोया सावियान (मेघालय) ने दिल्ली में हमारे यहां आकर अनुवाद में तथा बोड़ो व खासी नामों का हिन्दी में उच्चारण लिखवा कर, हमारी मदद की। इस प्रकार युद्धरत आम आदमी का पूर्वोत्तर का आदिवासी स्वर (विशेषांक-75) जनवरी, 2005 में प्रकाशित हुआ। इस अंक में आठ खंड हैं। ‘विचार खंड में 6, साहित्य खंड में 6, आकलन खंड में 6 और भाषा एवं शिक्षा खंड में 30 आलेख हैं। स्मृतियां और सपने खंड में 2 साक्षात्कार एवं 1 संस्मरण है। इन सभी खंडों में लगभग हर लेख के बाद हमने एक-एक लोककथा भी सम्मिलित की। इस प्रकार इस विशेषांक में कुल 45 लोककथाएं हैं। इस तरह हमने वैचारिक आलेखों के साथ-साथ लोककथाओं का एक जख़ीरा भी संकलित कर लिया। असम में अंतर्राष्ट्रीय इन्डिजिनस राइटर्स का एक सात दिवसीय सम्मेलन, इन्डियन कन्फेडरेशन आॅफ इन्डिजिनस एंड ट्राइबल पीपुल्स के सचिव जे़बरा जी और अध्यक्ष रामदयाल जी मुंडा ने आयोजित किया था। इस सम्मेलन में एशिया भर के प्रतिनिधि शामिल हुए थे। उस पूरी कार्रवाई के सांस्कृतिक कार्यक्रमों की वीडियोग्राफी भी हमने करवाई। अभिषेक कश्यप ने इस वीडियोग्राफी को कराने में सहयोग दिया। इसी कार्यक्रम का समापन-दिवस समारोह, जो कोकराझार में एक वृहत जनसभा के रूप में संपन्न हुआ, जिसमें असम के तत्कालीन एवं वर्तमान मुख्यमंत्राी श्री गोगोई ने ‘पूर्वोत्तर का आदिवासी स्वर’ विशेषांक-75 का विमोचन किया। इस सभा में बोडो, स्वायत्त शासन के सभी अधिकारियों के अलावा हजारों की संख्या में आदिवासी और बोड़ो लोग मौजूद थे। ये सभा आदिवासी शरणार्थी कैम्प में हुई, जहां कभी आदिवासी और बोड़ो जनजाति के परस्पर संघर्ष के कारण आदिवासियों ने शरण ली थी। उस दिन बोडो, आदिवासी और कार्बी जनजातियों का अभूतपूर्व समारोह और सम्मेलन देखने को मिला। मैंने और रामदयाल मुंडा जी ने भी सभा को संबोधित किया।

 

इस विशेषांक में सम्मिलित लोककथाओं की अलग से एक पुस्तक भी तैयार की गयी, जिसे एन.बी.टी. ने सन् 2010 में पूर्वोत्तर के सृजन मिथक व लोककथाएं नाम से प्रकाशित किया। बाकी लेख हमने अलग-अलग पुस्तकों में अलग-अलग विषयानुसार शामिल किए। ये पुस्तकें राष्ट्रीय पैमाने पर किसी एक विषय को लेकर तैयार की गयीं। जैसे, 1. आदिवासी लोक-अस्मिता, 2. आदिवासी लोक-संस्कृति, 3. आदिवासी विस्थापन, 4. आदिवासी साहित्यिक यात्रा व 5. आदिवासी कौन आदि। इन्हें क्रमशः शिल्पायन व राधाकृष्ण प्रकाशन ने प्रकाशित किया। अभी 6 और पुस्तकें प्रकाशनाधीन हैं, जो इन्हीं अंकों की देन है।

 

महाराष्ट्र के बाहरू सोनवणे, जो ‘अखिल भारतीय आदिवासी साहित्यिक मंच’ के जेनरल सेक्रेटरी और मिजोरम के ‘अभासम’ के सचिव डाॅ. एल टी लियाना खियांगते ने क्रमशः इस पूरी रपट को छापने और ऐसे सृजन सम्मेलनों को हर राज्य में करवाने का एक प्रस्ताव रखा। इन सत्रों के दौरान ही कहानी, कविता और लोककथाओं पर भी तीन सत्रा रखे गये। ‘कविता सत्र’ में झारखंड और प. बंगाल के पांच संथाली कवियों के अतिरिक्त मेघालय से खासी, त्रिपुरा से कोकबरोक, असम से राभा और नागालैंड से टैनिडे, केरल से मलयालम, मणिपुर के पैतेइ, गोवा से कोंकणी और झारखंड से खड़िया और हो भाषा-भाषी आदिवासी कवियों ने अपनी-अपनी भाषाओं में एक-एक कविता पढ़ी, जिनका हिन्दी अनुवाद भी साथ-साथ पढ़ा गया। कहानी सत्र अरुणाचल प्रदेश के शार्दुकपेन भाषी येशे दोरजी थोंगची की अध्यक्षता म सम्पन्न हुआ। इसमें अरुणाचल प्रदेश की शार्दुकपेन, झारखंड की हो, खड़िया और संथाली, उड़ीसा की संथाली और मराठी में एक-एक कहानियां पढ़ी गयी।

 

लोककथा सत्र में खड़िया, खासी, कार्बी, आपातानी, कोकबोरोक, बोड़ो तथा तेलुगू लेखकों ने लोककथाएं पढ़ीं। ये सारी की सारी सामग्री ‘युद्धरत आम आदमी’ ने अपने अखिल भारतीय आदिवासी विशेषांक-80 में दिसंबर 2005 में प्रकाशित की।

 

दलित दर्शन विशेषांक-82 वर्ष 2006

इस तरह से हम एक तरफ दलित मुद्दों पर काम करने लगे और दूसरी तरफ आदिवासी मुद्दों पर। लेकिन दलित आंदोलन के चलते जो लोग ऊंचे ओहदों पर पहुंच गये और काफी समृद्ध हो गये, वे अब ब्राह्मणों की नकल कर उन्हीं के आचरण को अपनाने लगे थे या अपनी जाति छुपाकर या खुद को उच्च जातीय घोषित कर एक छद्म जीवन जीने लगे थे, खासकर हिन्दी पट्टी में। ऐसे लोग अाम्बेडकर को भी भूल गए और उनकी सीख को भी। वे न केवल जातिविहीन समाज का निर्माण करना भूल गए बल्कि आत्मसम्मान छोड़कर जातीय समीकरण व जातीय उन्नयन के चक्कर में फंस गए। उससे भी भारी विडंबना यह थी कि उन्होंने सवर्णों की तरह ही अपनी जाति की स्त्रियों पर भी मनुवादी वर्जनाएं थोपनी शुरू कर दीं। धर्मवीर एक प्रसिद्ध तथाकथित दलित लेखक ने तो दलितों का अलग धर्म करके और भगवान बनने की योजना बनाने के दौरान यहां तक कह दिया -‘‘हमें तो एक भगवान चाहिए ही चाहिए, चाह वह सौ पूंछ वाला हनुमान ही क्यों न हो।’’ इस तरह से दलितों के भीतर भी मनुवादी सामाजिक व्यवस्था का ही एक और घिनौना, कायर और संकीर्ण रूप विकसित होने लगा।

 

इस व्यवस्था ने कई ‘दलित ब्राह्मण’ पैदा कर दिए। राजनीति में भागीदारी का उनका नारा काफी हद तक कांसी राम और मायावती के प्रयास से सफल हुआ था किन्तु शीघ्र ही सत्ता में बने रहने हेतु ‘तिलक, तराजू और तलवार, जहाँ पाओ तहाँ जूते चार’ का नारा बदल कर सामंजस्य, समीकरण और सर्वजन हिताय बन गया। यानी शोषक और शोषित दोनों का हित। इससे वे सत्ता तो पा गये, काफी हद तक दलितों को एकजुट भी कर लिया। कुछ हद तक उनमें आत्मविश्वास भर कर उन्हें सशक्त भी बना दिया, लेकिन सामाजिक प्रतिष्ठा, न्याय या सुधार की प्रक्रिया शून्य हो गई। आज भी दलितों का उत्पीड़न जारी है। उनका न आर्थिक विकास हुआ, न सामाजिक और न ही शैक्षणिक। हां, राजनैतिक तौर पर कुछ व्यक्ति अथवा कुछ लोग जरूर सक्षम हुएµवह भी एक पासंग के रूप में, यानी जिस पलड़े में वे बैठ जाएंगे वह पलड़ा भारी होकर सत्ता में आ जाएगा। इनकी बदौलत भाजपा जैसा हिन्दुवादी-मनुवादी दल भी सत्ता में आ गया। लेकिन जो इनका शोषण करते थे यानी ब्राह्मण, राजपूत, बनिए, चलती उन्हीं की रही। इसलिए वहां भी दलितों को न्याय नहीं मिल पाया। हरिजन एक्ट में भी सवर्ण वर्गों ने दवाब डालकर ढिलाई करवा दी और दलित अत्याचार की श्रेणी में थाने में रपट दर्ज करने के लिए केवल रेप को ही अत्याचार माना।

 

दलितों को न्याय मिलने का अर्थ होता है शोषक वर्गों या जातियों का अहित किंतु सर्वजन हिताय में यह संभव नहीं हो सकता। चूंकि सत्ता में भागीदारी के लिए या उसमें बने रहने के लिए, दलित-विरोधी शक्तियों को खुश रखना जरूरी हो जाता है। जिन लोगों को सत्ता से लाभ मिला, वह मध्यवर्गीय मानसिकता लिए हुए एक नौकरीपेशा तबका जरूर उभर आया। दरअसल सच्चाई यह है कि आज भी जो दलित है वह विरोध करता है, आंदोलित भी है और चेतन भी, किंतु दिशा वह तय नहीं कर सका। कुछ मिली हुई सुविधाओं के छिन जाने के डर से, तो कुछ सक्षम जातियों के आतंक के चलते, वे जमीनी आंदोलन पर उतरने से कतराते रहे। वे प्रतिरोध का स्वर तो जरूर बन गए लेकिन अपने भीतर समाई हीन-भावना से आज भी मुक्त नहीं हो पाए। बाबा साहब ने कहा था शेर बनो। विडंबना यह है कि दलित का आदर्श आज भी ब्राह्मण की धूर्तता, क्षत्रिय की बर्बरता और बनिये की ठगी जैसी वर्चस्ववादी प्रवृत्तियां ही हैं। वह उनका स्थान लेकर वैसा ही बनना चाह रहा है, यानी सामन्ती प्रवृत्ति वाला, मनुवादी, वर्चस्ववादी व्यक्ति। इन प्रवृत्तियों से इतर बाबा साहब के शब्दों में नये संस्कार, नयी संस्कृति की ललक उतना ज़ोर नहीं मार रही है, जितना कि वांछित है। आज तक दलित आंदोलन यह तय नहीं कर पाया कि उसे पूंजीवादीµसामंती व्यवस्था चाहिए या समाजवादीµसमतामूलक। डाॅ. अम्बेडकर ने हमेशा लोकतंत्रा और समाजवादी व्यवस्था की बात की लेकिन आज के दलित आंदोलन का एक धड़ा अमरीका की तर्ज़ पर ठेकेदारी में भी हिस्सा मांगता हैµकरोड़पतियों में अपनी गिनती चाहता है। करोड़पति किनकी कीमत पर बनते हैं, क्या उन्हें मालूम नहीं? करोड़पति रहेगा तो सर्वहारा रहेगा ही। गरीबी रेखा से नीचे की संख्या बढ़ेगी ही और गरीबी रेखा से नीचे दलित-आदिवासी-अल्पसंख्यक और कुछ पिछड़ी जमातों के अतिरिक्त और कौन लोग होते हैं? भूमि के राष्ट्रीयकरण की बात तो दलित आंदोलन लगता है कि भूल ही गया है, जिसे बाबा साहब ने अह्म माना था।

 

ऐसे में जाति तोड़ने और जातीय समीकरण और समाजवादी अथवा सामंती व पूंजीवादी व्यवस्था या सांप्रदायिकता को लेकर दलितों में बढ़ते भ्रम, दुविधा और भटकाव की प्रवृत्तियों का जायज़ा लेने के लिए ‘दलित दर्शन’ अंक निकालने का निर्णय लिया गया। ज्ञानसिंह बल इस अंक के अतिथि संपादक बने। साथ में सहयोगी हुए द्वारका भारती। इस प्रकार ‘दलित दर्शन’ विशेषांक आया 2006 में, जिसमें हिन्दी व हिन्दीतर भाषाओं के 18 दलित चिन्तकों ने भाग लिया। इसमें सम्पादकीय के अतिरिक्त धर्म, दर्शन एवं नैतिकता, कला, संस्कृति एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता, वैश्वीकरण, दलित एवं समाजवाद, अम्बेडकर एवं मार्क्सवाद और इतिहास एवं राजनीति दर्शन अध्यायों के तहत संपादकीय लेकर कुल 20 आलेख दर्ज किए गये।

 

युद्धरत आदमी का स्त्री नैतिकता का तालिबानीकरण: अंक-87, वर्ष 2007

गौरतलब है कि स्त्रियों को लेकर स्वयं दलितों में भी कई मत हैं। कई इलाकों में आदिवासियों ने भी भारतीय हिन्दू संस्कृति में ढलकर स्त्री के प्रति अपना रवैया बदला है। आदिवासी समाज स्त्री को स्वतंत्रता देता है, भले काम के बंटवारे में आदिवासी समाज ने स्त्रियों के साथ पक्षपात किया है। वहां स्त्री घर के काम के अतिरिक्त बाहर का काम भी संभालती है, लेकिन झारखंड के आदिवासी समाज में अभी भी स्त्रियों का हल जोतना, घर छाना व तीर-धनुष छूना दण्डनीय अपराध बना दिया गया है। दिलचस्प बात है कि जिस उरांव जाति की औरतों ने मुगल सेना को अपने तीरों की बौछार से तीन-तीन बार परास्त किया और जिसकी याद में आज भी वे अपने माथे पर तीन गोदने गुदवाती हैं, उस बहादुरी की अप्रतिम इतिहास-गाथा को भी पुरुष समाज जल्दी ही भूल गया और उनके तीर छूने को भी उसने दण्डनीय अपराध बना दिया। किन्तु सभी आदिवासी क्षेत्रों में ऐसी वर्जनाएं नहीं हैं। मिजोरम में स्त्री हल भी जोतती है। हुआ यह कि जिस क्षेत्र में तथाकथित मुख्यधारा या कहें हिन्दू धारा का प्रभाव रहा, उसे ग्रहण करने से आदिवासियों की परंपराएं टूट रही हैं।

 

दलित समाज में सामाजिक स्तर पर चल रही उथल-पुथल, स्त्री-पुरुष की गैरबराबरी, स्त्री की आगे बढ़ने की चाह और इसे लेकर पुरुष मानस में उत्पन्न भांति-भांति की कुंठाओं की कहानियां और दृष्टांत मौजूद हैं, जिन्हें देख-पढ़ कर दलितों में भी स्त्रियों को लेकर किस कदर अव्वल दर्जे का पिछड़ापन और पुरुषसत्तात्मक मानसिकता व्याप्त है, समझा जा सकता है। धर्मवीर ने दलित स्त्री को वेश्या तक करार कर दिया और कोर्ट में जाकर उन्होंने अपनी पत्नी के डी. एन. ए. टेस्ट तक की मांग कर दी। अपने व्यक्तिगत मामले को उन्होंने पूरे दलित समाज की महिलाओं पर थोप दिया और उन्हें मनु से भी कड़ी वर्जनाओं में बांधने का ऐलान किया। धर्मवीर ने अपने आलेखों तथा पुस्तकों में स्त्रियों, खासकर दलित स्त्रियों और दलित लेखिकाओं की इतनी छीछालेदर की, उनके बारे में नाम ले-ले कर इतनी अपमानजनक बातें लिखीं कि दलित लेखिकाएं उस अपमान को बर्दाश्त नहीं कर सकीं। उन्होंने एक मीटिंग बुलाई और धर्मवीर की ‘प्रेमचन्द: सामन्त का मुंशी’ पुस्तक के विमोचन के अवसर पर धर्मवीर और उनकी पुस्तक का विरोध करने की ठानी। अगले ही दिन मीटिंग में विरोध स्वरूप चप्पलें भी फेंकी गईं। कई तथाकथित दिग्गज लेखकों ने चप्पल फेंकने का विरोध भी किया, पर सवाल यह था कि इन पुरुष बुद्धिजीवियों ने स्त्रियों की कलम को भी तो कभी नहीं स्वीकारा। साहित्य का जवाब कलम से दिया जा सकता है लेकिन गाली का जवाब तो चप्पल ही हो सकती है। खैर! धर्मवीर ने अाम्बेडकर को भी नकारा और गौतम बुद्ध को भी। गौतम बुद्ध ने स्त्रियों को थेरी बनाकर मुक्ति की राह दिखाई थी, इसलिए धर्मवीर को बुद्ध मंजूर नहीं हैं। गौतम बुद्ध पर वे स्त्रियों को बरगलाने और खुद उन्हें गृहस्थ धर्म से विमुख रहने का आरोप लगाते हैं और स्त्रियों को थेरी बना कर गृहस्थ जीवन से दूर रखने की आलोचना करते हैं। अाम्बेडकर ने बुद्ध का समर्थन किया, इसलिए उन्हें अाम्बेडकर भी मंजूर नहीं हैं। जरूरी हो गया था कि कतिपय दलित साहित्यकारों में स्त्रियों के प्रति फैलती इस प्रवृत्ति पर कोई अंक निकाला जाए। इसी का परिणाम था ‘युद्धरत आम आदमी’ का ‘स्त्री नैतिकता का तालिबानीकरण’ विशेषांक 87, जो 2007 में आया। इस अंक के लिए सभी दलित लेखिकाओं ने दबाव बनाया अंततः अतिथि संपादन के लिए विमल थोरात, अनिता भारती और प्रोमिला से अनुरोध किया गया। तीनों की स्वीकृति के बाद हमने जोर-शोर से इस पर कार्य शुरू कर दिया।

 

2007 में तालिबानीकरण अंक छपा जिसमें सम्पादकीय लेकर 38 लेखकों ने भागीदारी की, जिसमें 12 लेखिकाएं थीं। इसमें सम्पादकियों के अतिरिक्त आधी दुनिया का जवाब, चिन्तक का यथार्थ, कफन: तर्क या कुतर्क, फोबिया कथा और परिचर्चा के अध्यायों में बांटकर, बहस चली।

 

आठवें विश्व हिंदी सम्मेलन, न्यूयाॅर्क में युद्धरत आम आदमी की भागीदारी, 13-16 जुलाई, 2007

वर्ष 2007 में आठवें विश्व हिन्दी सम्मेलनों में भाग लेने मैं और रामदयाल मुंडा जी न्यूयार्क गए। वहां से मैं केलीफोर्निया की बर्कले यूनिवर्सिटी में कार्यरत पूर्व व वर्तमान हिन्दी लेखकों से मिलकर कनाडा पहुंची, वहां भी कई हिन्दी व पंजाबी लेखकों से मुलाकात हुई और उनके कार्यक्रमों में भाग लिया। एक बड़ी दलित लेखकों की जमात से भी परिचय हुआ। बीमार पड़ने के कारण मुझे जर्मनी और लंदन का कार्यक्रम रद्द करके वापस भारत लौटना पड़ा।

युद्धरत आम आदमी का पूर्वोत्तर: आदिवासी सृजन-स्वर विशेषांक-91, 2008

हमने 2004 वर्ष के आस-पास पूर्वोत्तर के 105 आदिवासी लेखकों की बिब्लियोग्राफी भी तैयार करनी शुरू कर दी थी, जिसे कांन्सेप्ट पब्लिकेशन ने वर्ष 2006 भारत के आदिवासी लेखक: परिचय एवं अवदान भाग-1: पूर्वोत्तर भारत नाम से प्रकाशित किया। इसमें पूर्वोत्तर के 105 आदिवासी लेखकों के परिचय और साहित्यिक अवदान सम्मलित हैं। इसी बिब्लियोग्राफी में प्रकाशित लेखकों से मैंने सम्पर्क साधा और उनकी रचनाएं मगवाईं, ताकि पूर्वोत्तर: आदिवासी सृजन स्वर तैयार हो सके।

 

वर्ष 2006 में भारत आदिवासी सम्मान वितरण हेतु मैं आॅइजल गई थी। वहां कई मित्रों व लेखकों से परिचय हुआ और एक हिन्दी के अनुवादक श्री बी. आर. राल्टे से भी मुलाकात हुई। हमने पूर्वोत्तर का आदिवासी सृजन अंक निकालने का फैसला रांची के आदिवासी सम्मेलन में ले लिया था। रांची के सम्मेलन में भी हमें कई रचनाएं प्राप्त हो चुकी थीं। वर्ष 2006-2007 में मैं असम, शिलांग और त्रिपुरा तक जा आई थी। त्रिपुरा में चंद्रकांत मुरासिं, स्नेहमयी चैधुरी, नन्ददेब बर्मा, बिमल देब बर्मा और मेघालय के मिनिमोन लालू, स्ट्रीमलेट डखर, डेज्मंड खरफिलियांङ, न्गनगोम, बिजोया सावियान तथा किमफाम सिं मिले। रांची में नागालैंड के नेचुरियाजो चूचा और मणिपुर के पैतै भाषी एच. कामखेनथान भाग ले चुके थे, उन्होंने भी कई लेखकों के सम्पर्क दिये। अरूणाचल प्रदेश से ममंग देइ और ताखेकानी, येशे दोर्जी दोरजी भी रांची सम्मेलन में आ चुके थे। इनके अतिरिक्त हमें लेपचा भाषा की त्रौमासिक पत्रिका ‘अचूले’ बीनसमलद्ध के अंक और एक पुस्तिका भी दार्जीलिंग के श्री एन. टी. लेपचा और दोर्जी श्रिंग लेपचा ने भिजवाई थी। इनसे हमें लेपचा भाषा तथा उनकी कहानी व लोककथाएं मिलीं। इससे पहले भी इनके यहां से अंक-75 के लिए भाषा संबंधी लेख प्राप्त हो चुके थे। इस प्रकार हमने सिक्किम में बोली जाने वाली भाषा की कृतियां भी प्राप्त कर लीं।

 

थेसो क्रापी ने हमें अंग्रेजी भाषा में बारलाॅग तेराङ की ‘हिस्ट्री आफ कार्बी’ उपलब्ध करवा दी थी। उसने स्वंय भी सीधे कार्बी भाषा से हिन्दी में अनुवाद करके कई रचनाएं हमें दीं। ताखे कानी, येशेदोर्जी औैर ममंग देइ ने अरूणाचल प्रदेश से और एल. टी. लियाना खियाङते और दरछावना ने मिजोरम के लेखकों से परिचय करवाया और उनकी रचनाएं भी उपलब्ध करवाईं। मिजोरम के बी. आर. राल्टे ने हिन्दी में अनुवाद करके कहानी भेजी। मेघालय से न्गनगोम द्वारा संपादित नाॅर्थ-ईस्ट राइटर्स फोरम की अंग्रेजी पत्रिका न्यू फ्रंटियर्स भी हमें राॅबिन. एस. न्गनगोम ने ही उपलब्ध करा दी थी। इससे भी हमें बहुत सी रचनाएं मिलीं, जिनका हमने हिन्दी अनुवाद कराया। इस पत्रिका से हमने पूर्वोत्तर का आदिवासी स्वर विशेषांक-75 में भी बहुत से आलेख लिए। पूर्वोत्तर: आदिवासी सृजन-स्वर के लिए भी इस पत्रिका की बहुत सी रचनाएं हमारे काम आईं। खासी छात्रों की पत्रिका से तो हमें मूल और अंग्रेजी अनुवाद सहित रचनाएं मिल गईं। मेघालय, त्रिपुरा, असम से तो मैं स्वयं जाकर रचनाएं एकत्रित करके लाई थी।

 

इस प्रकार युद्धरत आम आदमी का पूर्वोत्तर: आदिवासी सृजन-स्वर विशेषांक-91, 2008 में प्रकाशित हुआ। इस अंक में अरुणाचल प्रदेश से 2 कहानियां, 2 कविताएं, असम से 13 कहानियां, 17 कविताएं, एक नाटक-अंश और 7 शौर्यगाथाएं, मणिपुर से एक कहानी, एक उपन्यास-अंश, 4 कविताएं, मिजोरम से 2 कहानियां, एक नाटक-अंश, 4 कविताएं, मेघालय से 3 कहानियां, 1 उपन्यास-अंश, 9 कविताएं, 7 शौर्यगाथाएं, नागालैंड से 2 कहानियां, 5 कविताएं, सिक्किम से 2 कहानियां, 1 कविता, त्रिपुरा से 1 कहानी, 14 कविताएं और 1 शौर्यगाथा छपी। इसी अंक में छपी कुछ कहानियों में इन्हीं लेखकों की दूसरी कहानियां मंगवा कर एक पुस्तक तैयार की गई, जिसे वर्ष 2009 में एन. बी. टी. ने पूर्वोत्तर की आदिवासी कहानियां नाम से प्रकाशित किया।

 

इस पत्रिका का विमोचन 28 जुलाई 2008, को साहित्य अकादेमी में हुआ। इसकी अध्यक्षता नाॅर्थ-ईस्टर्न हिल यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति डाॅ. मृणाल मिरी ने की और मैनेजर पांडे तथा कृष्णदत्त पालीवाल, रामदयाल मुंडा, बिजोया सावियान ने इस अंक पर विशेष चर्चा की।

 

युद्धरत आम आदमी का ‘मल मूत्र ढोता भारत: विचार की कसौटी’ विशेषांक-97 वर्ष 2009

वर्ष 2008 में मैं मंडावी जी के आमंत्रण पर आदिवासी सम्मेलन में भाग लेने नागपुर गई थी। वहीं सुशीला टांकभौंरे और उनके पति सुन्दर लाल टांकभौंरे जी आए थे। सुशीला टांकभौंरे से जब भी बात होती, तो वे बताती थीं कि उनकी जाति के लोग उनका आदर तो बहुत करते हैं, लेकिन जैसे ही वे उन्हें गंदा काम छोड़ने को कहती हैं, तो तुरंत सवाल करते हैं-‘‘तब खाना क्या तुम दोगी? अभी तो पुश्तैनी रोजगार मिल जाता है क्योंकि इसे कोई दूसरी जाति का आदमी करना नहीं चाहता।’’ मैंने उन्हें इस बात का जवाब खोजने के लिए कहा था ताकि ये जाना जा सके कि उन लोगों की जीवनचर्या के फलस्वरूप मानसिक स्तर पर चलने वाली प्रक्रियाएं किस तरह से आकार लेती हैं और वे समाज में अपने आपको कहां देखते हैं? गंदा काम न छोड़ने की उनकी क्या मजबूरियां हैं अथवा विकल्प मिलने पर क्या वे गंदा काम छोड़ देंगे? काम करने पर जब अपमान महसूस होता है, तो उनकी प्रतिक्रिया क्या होती है, जैसे प्रश्नों का उत्तर तलाशने का आग्रह किया था। मैंने उन्हें बताया था कि भारतीय समाज में इन मुद्दों पर एक बहस छेड़ने की दरकार है और इस बहस में सफाई कर्मियों को विशेष तौर पर शामिल किया जाना चाहिए। उस समय इसके लिए वे राजी नहीं हो पाई थीं। लेकिन सन् 2008 में जब मैं मडावी द्वारा आहूत आदिवासी सम्मेलन में नागपुर गई तो उन्होंने और उनके पति सुन्दर टांकभौरे ने स्वयं ही मेरे प्रस्ताव को दोहराते हुए एक विशेषांक निकालने की पेशकश की। उन्होंने इस विशेषांक की जिम्मेदारी भी संभालने का आश्वासन दिया। बस! शुरू हो गया युद्धरत आम आदमी के ‘मलमूत्र ढोता भारत’ विशेषांक का काम। शुरू में इस अंक का नाम वाल्मीकि विशेषांक रखा गया था, किन्तु कई दलित लेखकों ने इस पर आपत्ति जताई। उनका मानना था कि एक तो सफाई कर्मचारियों की अनेक जातियों में वाल्मीकि केवल एक जाति है। उनका दूसरा तर्क था कि ‘वाल्मीकि’ नाम आर्यसमाजियों ने भंगी समाज पर थोपा था, ताकि यह समाज ईसाई बनने की तरफ उन्मुख न हो। खैर, दिल्ली में इसी विषय पर दलित लेखकों की एक मीटिंग बुलाई गई, जिसकी पूरी विडियोग्राफी भी की गई। लम्बी बहस के बाद ‘मल-मूत्र ढोता भारत’ नाम का चयन किया गया। बस काम जोर-शोर से शुरू हुआ। तीन अतिथि सम्पादक हुए 1. डाॅ. सुशीला टांकभौंरे 2. सुन्दर टांकभौंरे 3. सुधीर सागर और बाद में चौथे हरिनारायण ठाकुर आ जुड़े।

 

युद्धरत आम आदमी’ का 2009 में ‘मल-मूत्र ढोता भारत: विचार की कसौटी’ विशेषांक छपा, जिसका सम्पादन रमणिका गुप्ता और अतिथि संपादन सुशीला टांकभौंरे ने किया। संपादन सहयोग सुंदरलाल टाकभौरे, डाॅ. सुधीर सागर और हरिनारायण ठाकुर ने दिया। इस पुस्तक में रमणिका गुप्ता, सुशीला टाकभौरे, सुंदरलाल टाकभौरे और डाॅ. सुधीर सागर के संपादकीय लेखों के अलावा ‘बहस-विमर्श-समाधान खंड’ में 7 आलेख, ’मलमूत्र ढोने की प्रथा’ पर 18 आलेख, ‘शौर्य-विद्रोह-इतिहास खंड’ में 8 आलेख और ‘साक्षात्कार खंड’ में 16 आलेख छपे थे। रजनी तिलक, जयप्रकाश वाल्मीकि, राज वाल्मीकि और डेविड ग्रिफिट्स की पांच रपटें छपीं। ‘दस्तावेज़ी पत्र खंडों’ में सुशीला टाकभौरे की ‘चिट्ठी बापू के नाम एक अछूत की’ छपी और छपा अमृतलाल नागर से के. एस. तूफान का दस्तावेज़़ी पत्र-व्यवहार। अनिता भारती ने ‘सामाजिक क्रांतिकारी गब्दूराम वाल्मीकि’ और ‘कश्मीरी कविता की जनक कवयित्री ललदेह’ के व्यक्तित्व पर लिखा। सुधीर सागर ने सात और डाॅ. सुरेश मारुतिराव मुले ने आठ केस हिस्ट्रियों का प्रस्तुतिकरण किया, जिसमें मल-मूत्र ढोने वालों से साक्षात्कार लेकर उनके अनुभव व प्रतिक्रिया तथा समाधान के लिए सुझाव दर्ज किए गए। इस प्रकार कुल 75 आलेख व साक्षात्कार छपे। इसमें पूरे देश के स्तर पर लेखकों ने भागीदारी की, खासकर सफाई कर्म में लगे लेखकों ने। इस प्रकार समाज के सबसे निचले पायदान पर बैठे लेखकों ने अपने समाज के इतिहास, दशा व दिशा पर अपने विचार रखे। भारत में इस जमात के सन्दर्भ में यह पहला प्रयास था, जिसने सफाईकर्मियाें की समस्याओं पर न सिर्फ विचार किया गया बल्कि उनमें फैले अन्धविश्वास व रोज़ खड़े हो रहे धर्मगुरुओं व धर्मपिताओं के सत्य को भी उजागर कर, उन्हें अाम्बेडकर के ‘शिक्षित होे, संघर्ष करो, संगठित हो’ के आह्वान की ओर अग्रसर किया। इस खंड के बाद एक पुस्तक भी इसी नाम से छपी। इस खण्ड के छपने में सफाई कर्मचारियों में एक होकर अपनी लड़ाई लड़ने का सन्देश तो गया ही बल्कि वे स्वयं भी लिख कर अपनी बात कहने लगे। इस विशेषांक के बाद देश के हर कोने से हमें दर्जनों नए लेखकों, विशेषतया सफाई का काम करने वालों अथवा उसके संदर्भ में लिखने वालों की कई रचनाएं प्राप्त हुईं।

 

युद्धरत आम आदमी का मलमूत्र ढोता भारत: सृजन के आइने में, अंक-101, वर्ष 2010

दरअसल मलमूत्र ढोता भारत अंक के लिए इतनी अधिक रचनाएं आ गई थीं कि हमें इसे दो खण्डों में प्रकाशित करने का निर्णय लेना पड़ा, एक विचार खण्ड और दूसरा सृजन खण्ड। इस प्रकार 2009 में ही पहले खण्ड से बची सृजन-सामग्री और बाद में अतिरिक्त सामग्री मंगाकर ‘युद्धरत आम आदमी’ का दूसरा विशेषांक 101 ‘मलमूत्र ढोता भारत-सृजन के आईने में’ पर काम शुरू हो गया और उसी वर्ष यानी 2009 में ही प्रकाशित भी हो गया।

इसकी अतिथि संपादक सुशीला टांकभोरे ही थीं। इस अंक में हिंदी की 16 कहानियां, 28 कविताएं, मराठी की 2 कहानियां, गुजराती की 3 कहानियां, 4 कविताएं, तेलुगु की 2 कहानियां, 2 कविताएं और पंजाबी की 3 कविताएं थीं। 4 लघुकथाएं, 3 संस्मरण, 6 समीक्षात्मक आलेख, 3 नाटक और 7 मूल्यांकन शामिल किए गए। इसके अलावा सुशीला टाकभौरे, जयप्रकाश वाल्मीकि के आत्मकथांश और ओमप्रकाश वाल्मीकि, संजीव खुदशाह और हरिनारायण ठाकुर की पुस्तकों के अंश छपे।

 

युद्धरत आम आदमी का हाशिये उलांघती स्त्री विशेषांक-108 (कविता), 26 मार्च, 2011

युद्धरत आम आदमी’ का जुलाई-दिसंबर संयुक्तांक 27-28 1994 में ही ‘आधुनिक महिला कविता’ और 1995 में ‘आधुनिक महिला कहानी’ के नाम से प्रकाशित हो चुके थे। इन अंकों में स्त्रियों द्वारा लिखी गयी कविताएं और कहानियां दर्ज थीं, जो स्त्री मुक्ति के मुद्दों के अतिरिक्त कई अन्य मुद्दों पर भी केन्द्रित थीं। कविता खंड में रूसी और जापानी कविताएं भी शामिल थीं। लेकिन दिल्ली में जिस दौरान हम पंजाबी साहित्य में दलित अंक प्रकाशित करने में सारी ऊर्जा जुटा रहे थे, तो एक दलित शोध छात्रा ने ही सुझाव दिया-हाशिये के पार स्त्री मन’ नाम से एक कविता अंक निकालने का। काफी चर्चा के बाद तय हुआ कि इस अंक में मुद्दा केवल एक रहेगा-‘स्त्री-मुक्ति’। उससे संबंधित कविताएं, कहानियां और आलेख मंगवाये जाएँगे। ये वर्ष 2003 की बात है। हमने इसका विज्ञापन अपनी पत्रिका के अतिरिक्त ‘हंस’ में भी दिया और रचनाएं आनी शुरू हो गयीं। वर्ष 2004-2005 में हमारे पास रचनाओं की इतनी संख्या हो गई कि हमने इसे दो भागों में बांटने का निश्चय किया। कंचन शर्मा छुट्टियों में दार्जीलिंग से आकर दो तीन बार इसको सुधार चुकी थीं। वर्ष 2003 में ही मैं कोल इंडिया की बैठक में बिलासपुर गई थी। मैंने वहां गुरुघासीदास विश्वविद्यालय में हेमलता महिश्वर को खोजा। उनकी रचनाओं से मैं परिचित थी। वे तो नहीं मिलीं, पर मैं एक संदेश उनके लिए छोड़ आई। बाद में हेमलता महिश्वर ने स्त्री-मुक्ति की मराठी मूल कविताएं, उनके अनुवाद के साथ मेरे पास भेजीं। अभिषेक कश्यप उन दिनों मेरा सहयोग कर रहे थे। उन्होंने भी खूब मेहनत की। सबसे पहली खेप आई थी सोलजी थंपी की तरफ से, जिन्होंने तमिल और मलयालम कविताओं का अनुवाद करके तत्काल भेज दिया था। विजय राघव रेड्डी ने भी तेलुगू की कई कवयित्रियाें की कविताएं भेज दीं। इसी दौरान तेजस्वी कट्टीमनी दिल्ली आए, तो उन्हाेंने कन्नड़ कविताआें का जिम्मा लिया और कइयों का तो मेरे साथ बैठकर अनुवाद और उच्चारण भी शुद्ध कराया। वे हमें पहले से ही दलित अंकों के लिए अनुवादित रचनाएं भेजा करते थे। प्रतिभा मुदलियार ने भी कन्नड़ कविताएं भेज दीं। प्रतिभा जी मराठी भाषी हैं, लेकिन मैसूर में कन्नड़ भाषा पढ़ाती हैं। उन्हाेंने ‘आदिवासी स्वर और नई शताब्दी’ अंक के लिए भी मराठी भाषा से काफी अनुवाद करके हमें दिया था। इस बीच मैं बीमार हो गयी। फिर विदेश चली गयी। हमारा पुराना आॅपरेटर संस्था छोड़कर चला गया। दो बार कम्यूटर क्रैश कर गया। बड़ी मुश्किल से मैटर कुछ मिला, कुछ दोबारा टाइप करना पड़ा। 2007-2008 में विदेश से लौटने पर मुझे लगातार हस्पतालों के चक्कर लगाने पड़े। इसी बीच अन्य मुद्दों के दवाब के कारण कई और विशेषांक प्रकाशित भी करने पड़े।

 

स्त्री विशेषांक टलता रहा। 7-8-9 दिसम्बर, 2009 में गुजरात विद्यापीठ अहमदाबाद में ‘अंतर्राष्ट्रीय स्त्री सम्मेलन’ हुआ। उस आयोजन की संयोजक, जो उस समय महादेव देसाई समाजसेवा महाविद्यालय, अहमदाबाद की आचार्य भी थीं और आजकल गुजरात विद्यापीठ की एक वर्ष के लिए ट्रस्टी भी बना दी गई हैं, दिल्ली आकर मुझे आमंत्रित कर गयीं। वहां देश-विदेश की लेखिकाओं से मेरा परिचय हुआ। उनकी सभा में मैंने स्त्री-मुक्ति को केन्द्र में रखकर ‘युद्धरत आम आदमी’ का विशेषांक निकालने पर हो रहे प्रयासों की चर्चा की और बताया कि इस विशेषांक की अतिथि संपादक अनामिका जी होंगी। साथ में विभिन्न भाषा-भाषी लेखिकाएं व लेखक अनुवाद और संपादित करके अपनी-अपनी भाषाओं की रचनाएं भेज रहे हैं। उषा उपाध्याय ने गुजराती लेखिकाओं का अनुवाद कर भेजने का जिम्मा लिया। आदिवासी और दलित लेखिकाओं से हमारी नेटवर्किंग पहले से ही काफी मजबूत थी। उन सबसे संपर्क साधते हुए हमने उनकी रचनाएं मंगवाईं। इस बीच हमसे युवा कवयित्री विपिन चौधरी आ जुड़ी। कलम के जरिये दलित मुद्दों पर निरंतर सार्थक हस्तक्षेप कर रहीं गुरु घासीदास विश्वविद्यालय, बिलासपुर, छत्तीसगढ़ से प्रोफेसर के पद पर जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली आ चुकी थीं, ने इस अंक के लिए सम्पादन में पूरा सहयोग प्रदान किया। ‘जागोरी’ की सुनीता ठाकुर तो पहले से ही हमारे संपर्क में थीं। बस फिर क्या था। हम सबने मिलकर इंटरनेट से विदेशों में बसी हिन्दी, उर्दू, पंजाबी व अंग्रेजी कवयित्रियों के अतिरिक्त देश में बसी अंग्रेजी में लिखने वाली कवयित्रियों से संपर्क साधा। हमने उर्दू से पाकिस्तानी रचनाकारों को जोड़ा। पूर्वोत्तर के आठ में से छह राज्यों-त्रिपुरा, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मेघालय, मणिपुर, असम को भी जोड़ा। कश्मीर की ललद्यद के अतिरिक्त और कश्मीरी भाषी कवयित्रियां भी जुड़ीं। अब इतनी सामग्री जुट गई कि उसे एक अंक में प्रकाशित करना कठिन हो गया। इतना भारी-भरकम अंक शायद कोई पढ़ता भी नहीं, चूंकि उसे उठाना ही कठिन हो जाता। इसलिए हमने उसके दो खंड कर दिए। हिंदी के रचनाकारों का एक खंड और उसी की निरंतरता में हिन्दीतर भाषाओं का दूसरा खंड प्रकाशित हुआ। केवल अनुक्रम दो हुए। दोनों का मूल्य एक ही रखा ताकि दो खंड एक साथ ही लिये-दिये जा सकें। हमने लेखन को तीन खंडों में बांटा-1. कोठी में धान, वे कवयित्रियां जो हमारे बीच नहीं है। 2. खड़ी फसल, वे कवयित्रियां जो हमारे बीच हैं और चर्चित हैं, फिर दूसरे खंड को भी हमने ऐतिहासिक दृष्टि से तीन भागों में बांटा (क) स्वतंत्रता के बाद की कवयित्रियां, सन 1949 तक (ख) 1950 से 1959 तक के दशक की कवयित्रियां (ग) 1960 से 1969 के दशक की कवयित्रियां 3. नई पौध-इसमें हमने 1970 से लिखने वाली सभी कवयित्रियों को लिया। संपादकीय के अतिरिक्त हमने दक्षिण के स्त्री-मुक्ति लेखन पर के. वनजा, मराठी में हेमलता महिश्वर, उत्तर भारत और पूर्वोत्तर में भी हेमलता महिश्वर के आलेखों को शामिल किया। साथ ही मणिपुरी भाषा में स्त्री लेखन पर एक समीक्षात्मक आलेख भी जोड़ा। लेख तो और भाषाओं के भी आए थे पर पन्नों की संख्या इतनी अधिक हो गई थी कि उन्हें जोड़ना कठिन था। अब अगले किसी विशेषांक में भिन्न-भिन्न कविताओं और कहानियों की विधा में स्त्री-मुक्ति के लेखन के विषय की चर्चा करने का प्रयास करेंगे। साथ ही ‘हाशिये उलांघती औरत: कहानी’ पर भी अंक लायेंगे। स्त्री-मुक्ति के इस अंक में हमने इतिहास को भी खंगाला। इस प्रक्रिया में हम हिंदी मेें जहां मीरा तक पहुंचे, वहीं पंजाबी में पीरो परेमन और कश्मीरी में ललदेह की कविताओं में भी हमने स्त्री-मुक्ति के अंकुरों को तलाशा हमने कन्नड़ की अक्कमहादेवी के विद्रोह को भी दर्ज किया।

 

शरण कुमार लिंबाले विशेषांक: 109, वर्ष 2011

शरण से मेरा परिचय वर्षों पुराना है। हजारीबाग सम्मेलन 1997 के बाद हम शिमला सेमिनार में भी मिले थे। वहाँ भी धर्मवीर द्वारा प्रेस काॅन्फ्रेंस में डाॅ. अाम्बेडकर के विरोध में बोलने पर लिम्बाले और मैंने मामला संभाला था। काफी बहस भी हुई थी। मैं कई बार पूना गई हूँ। कभी उनके बुलाने पर गई, तो कभी किसी और कार्यक्रम में बम्बई गई तो उनसे पूना में जरूर मिली। हमारे बीच काफी लम्बी बहसें भी चलती थीं। उन्होंने अपनी पुस्तक ‘दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र’ किसी लेखक से हिन्दी में अनुवाद कराने का प्रसास किया था। वे चाहते थे कि मैं उस पुस्तक की भाषा सुधारकर उसे पूरा करूं। मैंने किताब देखी, जिम्मा तो मैंने ले लिया पुनरीक्षण करने का, लेकिन करना पड़ गया मुझे अनुवाद ही। उन्होंने मूल पुस्तक भी मुझे दे दी थी। मुझे हजारीबाग से लम्बी टेलीफोन वार्ता करके मूल पंक्तियों का अर्थ पूछकर ठीक करना पड़ता था। एक बार स्वयं भी हम दोनों ने बैठ कर उस अनुवाद को सुधारा। कई शब्दों का तो अर्थ ही अनर्थ हो रखा था। खैर, लगातार दो साल की मेहनत से कभी लिंबाले जी मेरे पास आए तो कभी मैं उनके पास गई, कभी टेलीफोन पर वार्ता से, तो कभी पत्र में पंक्तियों का संदर्भ देकर मैंने लिंबाले जी की मदद से इस पुस्तक का अनुवाद कार्य पूरा किया। वाणी प्रकाशन ने इसे प्रकाशित भी कर दिया। हिन्दी में दलित साहित्य के सौंदर्यशास्त्र पर यह पहली पुस्तक थी, इससे न सिर्फ प्रकाशक को लाभ हुआ बल्कि दलित साहित्य पर शोध करने वाले छात्रों के लिए भी ये पुस्तक बहुत उपयोगी बन गई। इस प्रकार एक लोकतांत्रिक ढंग से मिल-जुल कर यह पुस्तक तैयार हुई। इसमें जितना श्रेय मेरा है उतना ही लिंबाले जी का है और उनका भी है, जिन्होंने इसे टूटी-फूटी हिन्दी में अनूदित किया था। मैं उस हिन्दी से कुछ समझ तो पाती ही थी न। दलित-साहित्य में सौन्दर्य शास्त्र पर विवेचन का शायद देश भर में यह पहला प्रयास था। इस शोध-ग्रंथ ने दलित-साहित्य की अलग पहचान ही नहीं, बल्कि उसकी अनिर्वायता भी सिद्ध कर दी। सिद्धांताें की व्याख्या के साथ-साथ विश्व स्तर के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य जुड़ने से, यह पुस्तक एक अमूल्य व प्रमाणिक स्त्रोत बन गई।

 

एक बार जब मैं किसी और कार्यक्रम से मुंबई गई थी। कार्यक्रम के बाद मैं लिम्बाले जी से मिलने पूना चली गई। उन्होंने मेरे कई कार्यक्रम यूनिवर्सिटी में करवाए। भारती गोरे से भी उन्होंने ही परिचय करवाया। जब भी शरण या लक्ष्मण गायकवाड दिल्ली आते हैं, तो वे मुझसे जरूर मिलते हैं और कभी-कभी तो वे मेरे यहां ही ठहर जाते हैं। इन दोनाें की मित्रता भी खूब है, जो कम से कम हिन्दी पट्टी में मुझे कहीं नज़र नहीं आई। हिन्दी पट्टी में दलित साहित्य और लेखकों के रुझान पर हम खूब चर्चा भी करते। एक बार मैं एक कार्यक्रम में पूना गई थी, लेकिन मैं ठहरी शरण के घर ही। दिन भर बहुत व्यस्त कार्यक्रम के बाद, रात को हम जम कर चर्चा ही नहीं करते थे, बल्कि आम आदमी के लिए या अनुवाद पर भी गुफ्तगू होती। कई अनुवादकों से भी उन्होंने मेरी मुलाकात करवाई और दोपहर में आकर क्राइस्ट पर एक अंग्रेजी फिल्म देखने लगे। दरअसल इस फिल्म को मैं दिल्ली में देखना चाहती थी, चूंकि मैं सिनेमा देखने नहीं जाती, इसलिए मैंने घर पर आए इस अवसर को छोड़ना उचित नहीं समझा। इस फिल्म में हम इतना मशगूल हो गए कि फ्लाइट का समय निकल गया। यह जानते हुए भी कि फ्लाइट नहीं मिलने वाली है, लिंबाले जी मुझे हवाई अड्डे लेकर चल दिए। किसी तरह से अधिकारियों से कह कर, पांच सौ रुपये का दंड भरकर उसी टिकट को अगले दिन के लिए रिन्यू करवाया और हम घर लौट आए। अगले दिन का उपयोग हमने खूब किया और समय रहते ही एयरपोर्ट पहुंच गए। इन दो दिनों में मैं आशा-निराशा, तनाव, चिढ़ और अपने बचपने पर हंसती व परिस्थितियों से जूझती रही। अंततः मैं इस निष्कर्ष पर पहुंची कि ‘क्राइस्ट’ की उस फिल्म को देखने के लिए इन कष्टों का न कोई अर्थ है और न ही कोई मूल्य।

 

जब मैं अस्मितादर्श पत्रिका के सम्पादक गंगाधर पानतावणे और लिंबाले के आमंत्रण पर दिनांक 26-27 मई, 2001 को ‘अस्मितादर्श साहित्य सम्मेलन’, इचकरंजी में मुख्य अतिथि के रूप में भाग लेने गई, तो मैंने वहां एक और नई व्यवस्था देखी, जो हिन्दी पट्टी के बिल्कुल विपरीत थी। सभा चल रही थी कि इस बीच मन्त्री जी आ गए। ज़रा भी खलबली नहीं मची। वक्ता बोलते रहे और मन्त्री जी सामने दर्शकों के साथ बैठे रहे। आधे-पौने घंटे बाद चालू समाप्त होने पर उनकी बारी आई और उन्हें मंच पर बुलाया गया। इचकरंजी में कनाडा से मुखर्जी दम्पत्ति भी आए थे। श्रीमती मुखर्जी उन दिनाें उनके उपन्यास का अंग्रेजी अनुवाद कर रही थीं। मुखर्जी दंपत्ति ने सम्मेलन में तीनों दिन शिरकत की। मातंग लोगों ने भी उतनी ही शिद्दत से उस सम्मेलन में भागीदारी की, जितनी महार व अन्य दलित जातियों के लोग कर रहे थे। बल्कि पानतावणे जी ने तो यह जानने के लिए हाथ उठवा लिया था कि उस सभा में कितने मांतग हैं और कितने बाकी लोग। ज्यादा संख्या मातंगों की ही नज़र आई। मराठी लेखन में जाति-तोड़ने की मुहिम अभी भी बरकरार है, जिसके बीज डाॅ. अाम्बेडकर ने डाले थे। मैंने देखा कि वहां सम्मेलनों में सभी दलित जातियों के लोग बिना हिचक भागीदारी करते हैं और एक होेकर संघर्ष का रास्ता निकालते हैं। वे एक-दूसरे की रचनाओं को पढ़ते भी हैं, प्रोत्साहित भी करते हैं और उनकी आलोचना भी। आलोचना होने पर वे एक-दूसरे के शत्रु नहीं हो जाते, जैसा हिन्दी पट्टी में हो रहा है। इचकरांजी में महार भी मातंगों के सवाल उठाते हैं। उन्हीं से प्रेरित होकर हमने हिंदी में सफाईकर्मियों का अंक निकालने का फैसला लिया था। दरअसल सफाईकर्मी और वाल्मीकि समाज अभी भी डाॅ. अाम्बेडकर की विचारधारा से पूरी तरह सहमत नहीं हो पाया। यह समाज आज भी कई धर्म गुरुओं, धर्म-पिताओं या अतीत के मनुवादी ऋषियों में अपनी जडें खोजने में व्यस्त है। कोई खुद को वाल्मीकि का वंशज बताता है, तो कोई चरक का और कोई सुदर्शन का। जबकि ये सब के सब अंग्रेजों के आने के बाद आर्यसमाजियों द्वारा दलितों को ईसाई धर्म में जाने न देने के लिए गढ़े गये पितामह व पाखण्ड धर्मगुरु थे। इसे हिन्दू बनाए रखने का षड्यंत्र कहा जाए या मुक्त न होने देने की साजिश। लेकिन यह एक सत्य है कि इस षड्यंत्र को खूब गौरवान्वित किया हिन्दी साहित्य और हिन्दूवादी समाज ने। इस प्रक्रिया ने दलित के विकास की गति धीमी कर दी, जो अंग्रेजों के आने के बाद कुछ ज़ोर पकड़ने लगी थी। भले अपने स्वार्थ व अपने धर्म प्रचार हेतु साधान के लिए ही सही, कम से कम ईसाई मिशनरियां उन्हें शिक्षा व स्वास्थ्य में सहयोग तो दे रही थीं, जिससे भारतीय संस्कृति और समाज ने उन्हें वंचित रखा था। खैर!

 

इस सभा में शरण का अध्यक्षीय भाषण बेजोड़ था। उन्होंने दलित आंदोलन और आंदोलनकर्ताओं की अपनी कमजोरियों को न छिपाते हुए आत्मालोचन करके खुले मन से संदेश दिया कि अगर विकसित होना है, सम्मानित जिन्दगी जीना है और सही मायने में मानवीयता को जमीन पर उतारना है, तो जाति तोड़ना, संगठनों से रिश्ते कायम करना, संगठनों को जमीन पर उतारना और दलितों में व्याप्त जातीय संकीर्णताओं को खत्म करना जरूरी है। उनके इस साहित्यिक भाषण का भी उन्होंने पूना लौटते ही, रात भर में मुझसे अनुवाद करवाया।जो ‘युद्धरत आम आदमी’ के अंक में छपा भी था।

 

उनके उपन्यास ‘नरवानर’ को हमने युद्धरत आम आदमी के कई अंकों में धारावाहिक प्रकाशित किया। राधा-कृष्ण प्रकाशन ने भी बाद में इसी उपन्यास को प्रकाशित किया। इसी प्रकार रामनाथ चाव्हाण का ‘बामनवाड़ा’ नाटक भी हमने धारावाहिक प्रकाशित किया, जिसे बाद में वाणी प्रकाशन ने उसी नाम से प्रकाशित किया। गिनती तो बहुत है, लेकिन कुछ अन्य चर्चित कृतियां भी हैं, जिन्हें हमने ही पहले-पहल युद्धरत आम आदमी में प्रकाशित किया। जैसे श्यौराज सिंह बैचेन की आत्मकथा, जो अब ‘मेरा बचपन मेरे कन्धे पर’ प्रकाशित हुई है, का भी आधे से अधिक अंश (जितना वे सन 2000 तक लिख पाए थे) युद्धरत आम आदमी ने ‘चमार का’ नाम से प्रकाशित किया था, जो कई अंकों तक प्रकाशित होता रहा। इसे प्रकाशित करने में मुझे न सिर्फ दिल्ली के चक्कर लगाने पड़े थे बल्कि कई-कई घंटों श्यौराज जी से बात करके वाक्य-विन्यास का भी संशोधन करना पड़ा था। इसमें उनकी पत्नी रजत रानी ‘मीनू’ ने भी हमारी मदद की। इसके बाद हमने युद्धरत आम आदमी में सूरज पाल ‘चौहान’ की दोनों आत्मकथाओं ‘तिरस्कृत’ और ‘संतप्त’ को धारावाहिक एक-एक के बाद एक प्रकाशित किया।

 

हम लोग समय-समय पर अपने साधारण अंकों में विशिष्ट दलित व गैर दलित कवियों और कथाकारों को भी चिन्हित कर उनके बारे में विशेष सामग्री प्रकाशित करते रहे हैं। उस शृंखला में प्रतिष्ठित और नवोदित दोनों प्रकार के रचनाकारों को शामिल किया जाता रहा है। शरण पर भी हम इस शृंखला में 30-35 पृष्ठों की सामग्री प्रकाशित कर चुके थे, जिनमें उनका साक्षात्कार भी शामिल है। हमने दलित लेखन के इस अत्यंत ही प्रतिष्ठित, विद्रोही, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने वाले और अपनी आत्मकथा व अन्य सृजनात्मक व आलोचनात्मक कृतियों से लोगों के मन को विचलित कर, विद्रोह की प्रेरणा देनेवाले शरण कुमार लिंबाले पर केंद्रित अलग से एक विशेषांक निकालने का निर्णय लिया। आनेवाले समय में ऐसी विशिष्ट विभूतियों पर निकाले जाने वाले विशेषांकों की शृंखला की लिंबाले अंक पहली कड़ी है। शरण कुमार लिंबाले एक बहुआयामी व्यक्तित्व हैं। वे आत्मकथा लिखकर ही चुप नहीं बैठे। शरण की कलम को उपन्यास, कहानी, कविता, नाटक और पत्राकारिता के लिए आलेख लिखने में भी सफलता मिली। उन्होंने विभिन्न विधाओं में सफलता से कलम चलाई। इनकी रचनाओं का कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। उनकी बहुजन, हिन्दू, उपल्या, भिन्नलिंगी नामक पांच उपन्यास, अक्करमाशी, रानी काशी और पुनः अक्करमाशी नामक तीन आत्मकथाएं लिखीं। दलित ब्राह्मण, रथ-यात्रा और बारहमासी नामक तीन कहानी-संग्रह, उत्पात नामक एक कविता-संग्रह के अतिरिक्त आलोचना की 2 पुस्तकें, 11 संपादित पुस्तकें, संयुक्त सम्पादन की तीन और दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्रा नामक एक शोध-पुस्तक प्रकाशित हो चुकी हैं। इसका मैंने अनुवाद किया और वाणी प्रकाशन ने प्रकाशित किया। यह पुस्तक उनका दलित साहित्य को अत्यन्त ही दुर्लभ तोहफा है, जिससे मराठी ही नहीं, हिन्दी वाङमय भी समृद्ध हुआ है।

 

उनका सारा लेखन समाज की मानसिकता को झकझोरता ही नहीं, उसे बदलने के लिए भी प्रेरित करता है। मेरा तो यह दावा है कि उनके लेखन ने बहुत हद तक इस समाज को बदलने की मुहिम में अहम् भूमिका निभाई है। दरअसल हिन्दी के लेखक आत्मालोचन करने से डरते हैं और कोई उनकी आलोचना करे तो उसे दुश्मन मान बैठते हैं। कभी-कभी तो कुछ दलित महानुभाव आलोचक अपने ही साथी दलित लेखक की रचना को जातीय विद्वेष, गुटवाजी या वादवाज़ के चलते दो कौड़ी का सिद्ध कर देते हैं। ये प्रवृत्ति हिन्दी के अन्य व सवर्ण लेखकों में भी प्रचलित है। विडंबना तो यह है कि इस प्रवृत्ति को दलित भी ग्रहण करने लगे हैं। हिन्दी साहित्य के लेखकों की तरह ही दलित साहित्य में भी एक-दूसरे से बड़ा लेखक बनने की होड़ लगी है। ये होड़ यदि प्रतिस्पर्धा है, तो निश्चित तौर पर सार्थक है, यदि ये दूसरे को छोटा कर खुद को बड़ा बनाने की मानसिकता से की जा रही है, तो बहुत घातक है। दलित साहित्य का आंदोलन खासकर हिन्दी का, इसी घातक प्रवृत्ति का शिकार होकर दिशा-विमुख हो रहा है। दरअसल दलित साहित्य के उद्भव का लक्ष्य दलित समाज की समस्याओं को उभारना, उन्हें देश के सामने लाकर देशवासियों का नज़रिया बदलना, खुद दलित लेखकों में आत्मसम्मान भरकर उन्हें हीनभावना से मुक्ति दिलाना और समाज में दलितों और सवर्णों, दोनों की मानसिकता बदलना है। ऐसा होना इसलिए भी जरूरी है कि दलितों को अभिव्यक्ति की ताकत मिले और वे खुद से अपने लेखों व कृतियों द्वारा अखबारों, पत्रिकाओं और पोस्टरों के माध्यम से, अपने हित में वैकल्पिक नीतियां बनवा सकें और सरकार को इन्हें लागू करने के लिए बाध्य कर सकें।

 

शरण अपनी राह खुद बनाने वाला व्यक्तित्व है। उनकी ‘अक्करमाशी’ का अनुवाद भी अंग्रेजी में किया गया है, जो कनाडा में भी पढ़ाई जाती है। अक्करमाशी पढ़ कर मेरे मन में कई सवाल उठे थे, जो मुझे आज तक मथते रहे हैं। इसी पुस्तक से प्रेरित होकर मेरा झुकाव दलित आंदोलन की तरफ हुआ था। इस पुस्तक को पढ़ने के बहुत बाद में मैंने अाम्बेडकर का साहित्य पढ़ा था।

 

आखिर अक्करमाशी (नाजायज़ बच्चा) से समाज को इतनी घृणा क्यों है? सच तो यह है कि इस पृथ्वी पर जो पहला पुरुष या औरत या उनकी सन्तति जन्मी, वे सब के सब अक्करमाशी ही थे! उस समय ब्याह, स्वयंवर, अपहरण अस्तित्व में नहीं था, यानी कोई सामाजिक नियम या व्यवस्था नहीं बनी थी। मनुष्य की स्वाभाविक अन्तःप्रेरक शक्ति (न्तहम) और परस्पर आकर्षण की जन्मजात प्रवृत्ति के तहत स्त्री-पुरुष जरूरत के अनुसार मिलते थे और बच्चे पैदा हो जाते थे। अर्थात यह बच्चे प्राकृतिक नियम के तहत एक स्वाभाविक प्रक्रिया की संतान होते थे। बहुत बाद में समाज के नियम बने। जब कृषि प्रथा आई, तभी विवाह की प्रथा का प्रादुर्भाव हुआ। विवाह से इतर या विवाह से पहले जो बच्चे जन्मे, उन सभी पर अक्करमाशी का ठप्पा लगा दिया जाने लगा। वैसे भारत में आज भी ‘राठवा’ जैसी जनजातियां गुजरात में मौजूद हैं, जहां शादी किए बगैर ही बच्चे पैदा होते हैं और वे नाजायज़ नहीं कहलाते। जब सुविधा होती है, तो मां-बाप शादी कर लेते हैं, नहीं तो बिना शादी किए जिन्दगी बीत जाती है। विवाह-प्रथा स्थापित होने के बाद पति के अलावा पर-पुरुष से जन्मे या विवाह बिना जन्मे सभी बच्चों को अक्करमाशी माना जाने लगा। ये सब नतीजा था सामंती और पितृसत्तात्मक व्यवस्था का। यह व्यवस्था पुरुष को स्त्री का स्वामी मानती है और स्त्रियों को अपनी दासी। यानी वर्चस्ववादी प्रवृत्ति और स्त्री पर कब्जे के रूझान ने ही जन्म दिया विवाह-प्रथा को। बलशाली लोग जबरन स्त्रियों को अपनी हवस का शिकार बनाते हैं और बदले में दे जाते हैं ‘अक्करमाशी’। इसमें अक्करमाशी बालक या उस स्त्री का दोष कहां है? दोष तो समाज का है। पुरुष वर्चस्व का है। फिर यह समाज उन बच्चों या उनकी मां पर ही क्यों ऊंगली उठाता है? क्यों नहीं जी सकता है एक ‘अक्करमाशी’ बच्चा सिर उठाकर? जी सकता है। जैसे शरण जिया! शरण कुमार लिम्बाले ने अपनी इस आत्मकथा में, एक अक्करमाशी को निडरता से अपना सत्य स्वीकार कर, बुलंद होकर साहस से जीना सिखाया है। ये साहस मानवीय अधिकारों का प्रतिबिंब है और शरण ने इन अधिकारों और साहस को जिया है। ऐसे व्यक्ति के सामने किसी का भी सिर नतमस्तक हो जाएगा। मेरा उन्हें नमन। इतिहास खंगालने पर ऐसे लोग विरले ही मिलेंगे, पर जो मिले उन्होंने इतिहास ही रचा है। वे व्यास हों या विदुर और अब शरण लिंबाले!

 

इस विशेषांक में विवाहेतर संबंधों पर लिंबाले जी का एक लम्बा लेख शामिल किया गया है, जो विवाह प्रथा के इतिहास, विवाहेतर संबंधों के कारण वर्तमान समाज में उसके दुखद व सुखद परिणामों की व्याख्या के साथ-साथ, इन संबंधों से पैदा हुए बच्चाें की व्यथा पर भी प्रकाश डालता है। आज के युग में ऐसे संबंधों के प्रति विकसित हो रहे उदार दृष्टिकोण का भी लिम्बाले के इस लेख में उल्लेख है। दरअसल आदिवासियों की संस्कृति से हमारा आधा भारत नावाकिफ है। भारतीय जनता तो असम के बाद पूर्वोत्तर के बाकी राज्यों के आदिवासियों को पहचानती ही नहीं। उनकी भाषा, संस्कृति या जीवन-शैली के बारे में वे क्या समझेंगे। संभवतः लिंबाले ने भी उनका अध्ययन नहीं किया। आदिवासी समाज में ‘बच्चा’ और उसका जन्म लेना प्रमुख है। स्त्री मनुष्य मानी जाती है और उसकी उतनी ही इज्जत है जितनी किसी मर्द की। उनके लिए प्रजनन की प्रक्रिया व रिश्ते गौण हैं। मानवता, समानता, भाईचारा व सामुहिकता प्रमुख है। ऐसे भी मनुष्य के स्वाभाविक-प्राकृतिक रिश्तों को सभ्यता के नाम पर ही बांधा, नकारा या स्वीकारा गया है। आज के इस युग में जब क्लोन से बच्चे पैदा किये जा सकने की सामर्थ्य मनुष्य ने हासिल कर ली है, तो विवाह जैसी संस्था खुद हास्यास्पद बनती जा रही है। लिंबाले ने अपने उल्लेख में बच्चे के जन्म को मान्यता दी है। कैसे किसने और क्यों सवाल नहीं उठाये। उन्होंने समाज से सवाल किये हैं, जिनका मानव ने आज तक उत्तर नहीं दिया है और जब तक धर्म, जाति, नस्ल, लिंग के भेदभाव रहेंगे तब तक शायद दे भी न पाएµचूंकि मानव संकीर्ण-दर-संकीर्ण होता जा रहा है। एक बड़ी उदारµखुली दृष्टि के विकास की जरूरत है। इन प्रश्नों के उत्तर देने के लिए। एक पूर्ण मनुष्य ही उत्तर दे सकता है। अक्करमाशी के सवालों का! विभक्त, पूर्वाग्रही, संकीर्ण मनुष्य इस काबिल ही नहीं है कि उत्तर दे।

 

शरणकुमार लिंबाले के तर्क के अनुसार ही देखें तो भूमण्डलीकरण से जातियां दूर रही हैं, तो विवाह कैसे टिक सकता है। उसकी जरूरत भी क्या रह जाती है। इन सब प्रश्नों पर बहस की जरूरत है। मनुष्यता का जन्म ही विवाहेतर रिश्तों पर आधारित है और विडम्बना यह है कि युगों-युगों से मनुष्य स्वयं ही अपने पैदा होने के औचित्य पर प्रश्न लगाता आ रहा है! आज इन सब पर पुनर्विचार की जरूरत है और लिम्बाले ने यह प्रश्न उठाए हैं।

 

108 अंक के दौरान लिए गए फैसले के अनुरूप 40 भाषाओं की स्त्री मुक्ति की कहानियों को संकलित करने का काम जारी रहा। इस क्रम में वर्ष 2013 तक 22 भाषाओं की कहानियां एकत्र हो चुकी थीं। इसमें हिन्दी भाषा की स्त्री मुक्ति की कहानियों को तीन खंडों में विभाजित किया गया। 11 सितंबर 2013 को साहित्य अकादमी के रवींद्र भवन में इनका लोकार्पण सीपीआई (एम) नेत्री सांसद वृंदा करात के हाथों संपन्न हुआ। इस मौके पर राजेंद्र यादव, पुरुषोत्तम अग्रवाल, निर्मला जैन, अनामिका, अर्चना वर्मा, सबीहा जैदी, हेमलता माहिश्वर, विपिन चौधरी, अजय नावरिया, भरत तिवारी, ज्योति कुमारी, रेणु यादव, अनिता भारती, श्यौराज सिंह बेचैन अशोक गुप्ता सहित हिन्दी के साहित्यकार भारी संख्या में शामिल हुए। इस बीच दूसरी भाषाओं की कहानियों के संकलन, अनुवाद और संपादन का काम चलता रहा

 

युद्धरत आम आदमी से जुड़ने वाले रचनाकारों के बढ़ते कुनबे और रचनाओं की आमद को देखते हुए हमने महसूस किया कि त्रैमासिक पत्रिका में इन्हें समेट पाना कठिनाई हो रही है। अच्छी-अच्छी रचनाओं को छापने में भी कई-कई महीने बाद जगह मिल पा रही थी एेसे में हमने तय किया कि इसे मासिक बना दिया जाए। इसके लिए डीसीपी से लेकर आरएनआई तक के चक्कर लगाने के बाद सितंबर में अनुमति मिली और अक्टूबर माह से हमने पत्रिका को मासिक रूप में छापना शुरू किया। इसका प्रवेशांक, दूसरा और चौथा अंक आदिवासियों के मिथकों, शौर्यगाथाओं, कहानियों और कविताओं को केंद्र में रखकर प्रकाशित किए गए। अब पत्रिका ने अपना आफिस भी किराये पर ले लिया है। वहीं से इसका प्रकाशन होगा। पत्रिका के इस सफरनामे के दौरान काफी कठिनाइयों का भी सामना करना पड़ा लेकिन साहित्यकारों के स्नेह और समर्पित भावना ने हमें तमाम मुश्किलों को पार करने का संबल प्रदान किया। साहित्यकारों ने निशुल्क सहयोग करके हमारे मुहिम को आगे बढ़ाया।